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जिंदगी: खट्टी-मीठी जिंदगी के मनकों की माला

संजय सिन्हा की यह किताब जिंदगी के अनुभवों का खूबसूरत लेखा-जोखा है. लेखक के साथ घटी घटनाओं के अनुभवों से कई सबक मिलते हैं.

हर रोज संजय फेसबुक पर अपनी जिंदगी के अनुभवों से जुड़ी कहानियां लिखते हैं और उन्हीं अनुभवों को  उन्होंने जिंदगी में संजोया है. उनका मानना है कि मनुष्य भावनाओं से संचालित होता है, कारणों से नहीं. कारणों से तो मशीनें चलती हैं. इससे पहले आई संजय की पुस्तक रिश्ते को काफी पसंद किया गया था, और तीन माह में ही इसके तीन संस्करण छापे गए थे.

रिश्ते की अगली कड़ी है जिंदगी जिसमें लेखक ने मां और भाई के रिश्तों को सबसे ज्यादा अहमियत दी है. इस किताब से स्पष्ट है कि लेखक का अपनी मां से कितना गहरा जुड़ाव था. उनकी मां ने मृत्यु से एक रात पहले उन्हें बताया था कि वे कल चली जाएंगी. संजय लिखते हैं, “मैंने मां से पूछा तुम चली जाओगी तो मैं अकेला कैसे रहूंगा. मां ने कहा, मैं तुम्हारे आस-पास ही रहूंगी, हर पल.” जिंदगी का यह अंश अत्यंत मार्मिक है. किताब की बहुत-सी बातें हमें अपनी जिंदगी का आईना लगती हैं. इस किताब का विमोचन पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था और इसके गवाह लगभग 10,000 लोग बने थे.

लेखक ने उल्लेख किया है कि उनकी मां ने ही उन्हें फेसबुक पर लोगों से जुडऩे की सलाह दी थी. उसी के नतीजतन उन्हें मां, भाई, बहन, दोस्तों समेत रिश्तों का पूरा कारवां मिला और फिर वे फेसबुक पर नियमित रूप से पोस्ट करने लगे. संजय सिन्हा की इस जिंदगी की शुरुआत होती है 21 नवंबर से. लेखक ने किताब में अनेक छोटी-छोटी घटनाएं दर्ज की हैं और उनके माध्यम से महत्वपूर्ण संदेश देने की कोशिश की है. पहले भरोसा करके फिर आजमाने वाले व्यक्तियों के विषय में संजय कहते हैं कि वे प्रायः तन्हा रह जाते हैं क्योंकि वे भावनाओं से संचालित होते हैं.

जिंदगी हमें बताती है कि आदमी चाहे कितना कुछ कर ले, एक दिन सब छूट जाएगा, रह जाएंगे तो बस रिश्ते. तन की नजदीकियां जब मन की नजदीकियों में तब्दील होती हैं तभी रिश्ता सच्चा और प्यार भरा होता है. संजय ने अपने अनुभवों से अपने और पराए का भेद जानने के तरीके भी बताए हैं. संजय लिखते हैं कि अपनों की चोट मन तक लगती है. शरीर की तकलीफ तो सही जाती है लेकिन मन की चोट से आदमी बिलबिला जाता है. वे लिखते हैं, “याद रखिए जिंदगी सिर्फ हमारी अमानत नहीं, उस पर बहुतों का अधिकार है और उस अधिकार को छीनने का हक किसी को नहीं. हम जिंदगी से प्यार करें और उसे बांधने का प्रयास न करें. प्रेम तो समर्पण है बंधन नहीं, समर्पण से ही खुशी मिलती है.” संजय बताते हैं कि उनकी मां ने कहा था, “खुश रहोगे तो बाकी चीजें खुद ब खुद मिलने लगेंगी.” उन्हें हर पल अपने आस-पास अपनी मां का एहसास रहता है. जब उनकी पत्नी कहती हैं कि “जिस आदमी की रूह में बुराई समाहित हो जाती है उससे छुटकारा बहुत मुश्किल होता है” तो संजय को मां की कही बात याद आ जाती है जो कहती थीं, “बस आदमी का मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता.”

फेसबुक पर पोस्ट करते-करते संजय के अपनों की फेहरिस्त भी लंबी हुई है और जिंदगी के अनुभव भी. इन्हीं के आधार पर वे कहते हैं कि जीवन में रिश्ते बहुत अहम होते हैं इसलिए प्यार बांटिए. जिंदगी संदेश देती है कि रिश्तों में खुद को नियंत्रण में रखिए तभी भरोसा पनपेगा. जीवन में मजबूरी का सामना होने पर भी ऐसे लोगों की प्रशंसा कभी न करें जो उसके हकदार नहीं हैं वरना एक दिन वे अपने साथ आपको भी ले डूबेंगे. जब अमिताभ बच्चन ने एक मुलाकात में लेखक की पीठ पर हाथ फेरकर कहा “खुश रहो” तो उन्हें याद आया कि उनकी मां कहती थीं कि अच्छी भावना के साथ किए गए काम से आशीर्वाद अवश्य मिलता है.

फेसबुक से जुड़े एक बुजुर्ग का दर्द गहराई से महसूस करते हुए जिंदगी में लेखक ने लिखा है, “माता-पिता का सम्मान करने पर ही आप सम्मान पाने के हकदार बनते हैं. रिश्ते, मन के भाव होते हैं. इन्हें जीने की कोशिश कीजिए. बड़ों का सम्मान कीजिए. जब आपको हमेशा यह एहसास रहता है कि कोई आपके साथ है तो आत्मबल बढ़ता है और यही कामयाबी दिलाता है. टूटा हुआ रिश्ता कभी जुड़ता नहीं. तो फिर रिश्ते को सहेजिए प्यार से, दुलार से, उसे तोड़िए मत.”

जिंदगी में संजय के शब्दों में, “शादी के बाद जो भी मेरी पत्नी से मिला, सबने कहा यह तुम्हारी मां का पुनर्जन्म है.” उनका कहना है कि विरोधाभासों और कल्पनाओं के अथाह समंदर का नाम ही जिंदगी है. किताब में लेखक ने सिर्फ शब्दों के साथ ही कई तरह के प्रयोग नहीं किए बल्कि उनकी पूरी लेखन शैली ही अपने आप में अनूठा प्रयोग है. मन को छू लेने वाली संजय की यह जिंदगी अपने आप में अपूर्व है.

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