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किताबेंः नींद के इर्द-गिर्द

बेशक संग्रह की एक कहानी का शीर्षक है दिल्ली में नींद लेकिन गहराई से देखा जाए तो नींद हर कहानी के केंद्र में है.

दिल्ली में नींद दिल्ली में नींद

देवेंद्र राज अंकुर

आज से दस-बारह साल पहले उमाशंकर चौधरी का पहला कहानी संग्रह अयोध्या बाबू सनक गए हैं प्रकाशित हुआ था और उन्होंने कहानी को कहने के एक नए अंदाज से बहुत उम्मीदें जगाई थीं. संग्रह में आने से पहले ही अयोध्या बाबू सनक गए हैं को मैंने एक पुरस्कार योजना के तहत पहला स्थान दिया था. बाद में हम लोगों ने उसका नाट्यमंचन भी किया और उसके बहुत सारे शो किए थे.

कुछ सालों के बाद उनका दूसरा संग्रह कट टू दिल्ली और अन्य कहानियां आया और वह उम्मीद बरकरार रही जो पहले संग्रह से बनी थी. अब इधर उनका तीसरा संग्रह छप कर आया है दिल्ली में नींद. इस संग्रह में चार कहानियां हैं और हर कहानी बहुत लंबी है. कुल जमा 160 पृष्ठ में चार कहानियां यानि हर कहानी की औसत लंबाई चालीस पृष्ठ. इसके बावजूद जब हम इन कहानियों को पढ़ना शुरू करते हैं तो हर कहानी आपको भीतर तक झकझोर कर रख देती है.

बेशक संग्रह की एक कहानी का शीर्षक है दिल्ली में नींद लेकिन गहराई से देखा जाए तो नींद हर कहानी के केंद्र में है. पहली ही कहानी है कहीं कुछ हुआ है इसकी खबर किसी को न थी. एक बड़े शहर के एक मुहल्ले में एक परिवार का सारा कीमती सामान लूटे जाने की घटना हो जाती है और आसपास रहने वालों को पता भी नहीं चलता अर्थात् दीन दुनिया से बेखबर सब अपने में मस्त सोते रहे और इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई.

दिल्ली में नींद कहानी में एक महानगर में धीरे-धीरे बढ़ते औद्योगिकीकरण और ध्वनि प्रदूषण से उसके मुख्य पात्र को नींद नहीं आती. एक और कहानी नरम घास, चिड़िया और नींद में मछलियां का मुख्य पात्र पर्यावरण को लेकर इतना सजग और सचेत है कि वह नींद में भी उसे लेकर बड़बड़ाता रहता है.

सिर्फ नींद ही नहीं, कुछ और बातें भी सब कहानियों में एक समान दिखाई पड़ती हैं. हर कहानी में गांव से शहर तक की यात्रा है लेकिन उसके अलग अलग रूप सामने आते हैं. एक में मुख्य पात्र वासुकी बाबू को प्रमोशन के तहत गांव से कानपुर जैसे बड़े शहर में जाना पड़ता है, जहां एक रात परिवार की अनुपस्थिति में घर का सारा सामान चोरी हो जाता है. कंपनी राजेश्वर सिंह का दुख में बड़ा भाई नर्मदेश्वर अपाहिज होते हुए पढ़ाई के लिए शहर की ओर प्रस्थान करता है और एक ऊंचे ओहदे पर पहुंचता है.

दिल्ली में नींद का चारूदत्त सुनानी एक प्राइवेट गैराज में मैकेनिक है और यहां के ध्वनि प्रदूषण का शिकार बनता है. नरम घास...के फुच्चू मास्साब गांव से इलाज के लिए अपने बेटे के पास दिल्ली आते हैं और घास, चिडिय़ा और मछलियों को बचाने के क्रम में पागलपन की हद तक पहुंच जाते हैं. इस रूप में वे अयोध्या बाबू की याद दिलाते हैं.

हर कहानी में कहानीकार ने हर बार एक ही परिवार को केंद्र में रखा है लेकिन उससे जुड़े हर ब्यौरे को इतनी सूक्ष्मता में साकार किया है कि ये सभी पात्र हमारे सामने जीवंत हो उठते हैं. लगता है कि लेखक इन पात्रों से कहीं गहरे में परिचित है. एक तरफ एक बुजुर्ग पीढ़ी है और दूसरी तरफ एक जवान पीढ़ी और इन दोनों के बीच का वैचारिक द्वंद्व भी इन कहानियों में प्राय: मुखर हो उठता है. यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी तरफ रचनाकार बार-बार लौटता रहा है.

मजे की बात यह है कि हर कहानी का परिवेश यथार्थवादी तेवर लिए हुए है लेकिन वे उस परिवेश के भीतर इतने गहरे तक उतर जाते हैं कि वह अतियाथार्थवादी लगने लगता है जिसे अंग्रेजी में 'सरियलिज्मÓ कहा जाता है. पूरी तरह से प्रयोगशील होने के बावजूद ये कहानियां किस्सागोई के अपने अंदाज से भरपूर हैं—यही वह गुण है जो उमाशंकर चौधरी को अपने समकालीन लेखकों में एक अलग पहचान देता है.

दिल्ली में नींद
लेखक:
उमाशंकर चौधरी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
कीमत: 160 रुपए

 

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