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किताबेंः अक्षरों में उतरतीं अप्पाजी

उनकी शिष्या सुनंदा शर्मा का संस्मरण इस विशेषांक का सबसे सुगठित और सर्वांग लेख है. अप्पाजी जी ने शिष्यों को नकल की जगह अपना मूल बचाए रखने को कहा

छायानट:  विदुषी गिरिजा देवी विशेषांक छायानट: विदुषी गिरिजा देवी विशेषांक

राजेश गनोदवाले

अप्पाजी को चारो पट की गायिकी का सिद्ध साधक दुनिया ने माना. वे थीं भी. उधर बनारस, कोलकाता, मंच और उनकी शिष्याएं. ये चारों कोण उनके जीवन का मूलाधार बने. इन्हीं से उनको पहचाना गया. इन चार बिंदुओं के सहारे बुनी गई तस्वीर का नाम है उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की त्रैमासिक पत्रिका छायानट का यह विशेषांक. इसकी सामग्री के प्रति जिस निष्ठा का ईमानदार प्रदर्शन संपादक आलोक पराड़कर ने किया है, वैसी साफ कोशिश कम नजर आती है. ''भाई कुछ भी भेज दीजिए'', वाली औपचारिक नीति के खिलाफ क्या जाना है और किनसे लेना है? इसे लेकर कोई झोल न होना ही गिरिजा देवी पर एकाग्र अंक को लंबी उम्र देगा. व्यक्तित्व आधारित शोध करने वाली नई पीढ़ी इस अंक को अपने काम का प्रस्थान स्वर मान सकती है.

एक सौ ग्यारह पृष्ठ में आलेख और पच्चीस पृष्ठ तस्वीरों के. बला की खूबसूरत रहीं गिरिजा देवी के चेहरे में नमक कितना था इसका पता उनसे पूछिये जो व्यक्तित्व पढ़ना जानते हैं. खयाल और ठुमरी के साथ उनका जीवन बराबरी से गुजरा. दोनों ने उन्हें गढ़ा. और अपनी खनकदार आवाज लिए उन्होंने इन दोनों के माध्यम से पूरब अंग की गायिकी का नया गिरिजा पन्ना खोल कर दिखा दिया. पत्रिका में आए आलेख इसका बढ़िया खुलासा करते हैं.

गिरिजा देवी गायिकी में अपने समकालीनों से, अगर वे वाद्यों में बड़े नाम हैं तो भी, इसीलिए अलग थीं कि प्रशिक्षण उनका दूसरा बड़ा परिचय बना. बनारस जब तक रहीं, सिखाया. कोलकाता आईं ही इसीलिए थीं कि न्यौता सिखाने को लेकर मिला था. इनके मध्य संगीत सभाएं, सेमिनार, वर्कशॉप्स और एक महिला की भूमिका का निर्वहन. परिवार भी वे साध रही थीं. बहुतेरे मोर्चों के मध्य स्वास्थ्य के बदलते क्रम और उम्र के बढ़ते दौर के बावजूद उनके चेहरे पर चमक बनी हुई थी तो इसका सीधा-सा कारण रहा शिष्याओं के मध्य उल्लास की लय थामे रहना. इस पुरबिया शैली के बंगाल घर में गुरु और शिष्याओं के मध्य मां बेटी का रिश्ता अधिक था. वरना, 'अब आप आराम करिए', चिकित्सकों ने कह ही दिया था. तब उनका जवाब आता: मैं जीवन के आखिरी वक्त तक गाना चाहती हूं. मुझे अगर दूसरा जन्म मिला तो मैं उस जन्म में भी गाना चाहती हूं.

सितारा कलाकार प्राय: इतने आत्मकेंद्रित देखे गए हैं कि अपने प्रभामण्डल के भीतर दूसरे को लाना पसंद नहीं करते. समय नहीं मिलता, यह रेडीमेड उत्तर होता है. इसके सामने अप्पा जी अपनी ओर से प्रतिभाशाली आवाजों को 'मुझसे कुछ लेना है तो चली आना' कह कर नई बगिया तैयार करने हरदम खड़ी रहती थीं. संगत, परंपरा, गान और मधुकरी इस तरह चार खंड एक मूर्धन्य गायिका का अंतरंग और बहिरंग खोलकर रख देते हैं. दूसरी विधाओं के दिग्गज साधकों के अनुभव भी उन्हें समझाते हैं. वहीं शिष्याओं की गुरु को प्रणति भी है. तीसरा खण्ड लेखकों की भावनाओं से भरा है. और आखिरी में उन्हीं के साक्षात्कारों पर आधारित लेख हैं.

ऐसी पत्रिकाओं का संपादकीय आमतौर पर ड्यूटी बजाता लेख होकर रह जाता है. 'उनकी निकटता का मुझ पर ऋण है' कहते हुए पराड़कर शास्त्रीय जटिलताओं को न दोहराते हुए सहजता में भिगोकर अपनी बात रखते हैं. पत्रिका का संगत खंड सबसे अधिक अर्थपूर्ण है. छन्नूलाल मिश्र का आलेख नई शाब्दिक संरचनाओं से अप्पाजी को बयान करता है. बिरजू महाराज बताते हैं कि नए तबलावादकों को उन्होंने खूब मौके दिए. हरिप्रसाद चौरसिया के मुताबिक, महिला कलाकारों में संत व्यक्तित्व कोई था तो अप्पाजी. हैदराबाद के शास्त्री स्टेडियम की एक घटना लिखते हुए कामेश्वर नाथ मिश्र बताते हैं, ''पं. दीनानाथ मंगेशकर स्मृति उत्सव में गाना सुनकर लता जी अप्पाजी से लिपट गईं और रोते हुए कहा, गिरिजा दीदी, आज आपने ऐसा गाया, जरूर आज मेरे पिता की आत्मा को शांति मिलेगी.''

उनके खान-पान के मूड़ को तो सभी ने पकड़ा है. वे अच्छा खाना खाने की शौकीन तो थीं, एल.के. पण्डित के मुताबिक, खिलाने की भी उतनी ही. राजन-साजन मिश्र याद करते हैं, कैसे उन्होंने एक दफा अमेरिका में दही-चूड़ा बनाकर खिला दिया था! संगीत समाज से शिकायत करते मिश्र बन्धु उस ओर भी इशारा करते हैं कि समाज ने उन्हें मात्र ठुमरी गायिका के रूप में समेट दिया था जबकि वे निष्णात खयाल गायिका थीं. यकीनन अपने कार्यक्रम का आरंभ वे विलंबित बड़ा खयाल से ही किया करती थीं. ठुमरी का क्रम तीसरे नंबर पर आता था. एक लेख में रोनू मजूमदार उनके टप्पा की तैयारी को 'कहीं और वैसी तैयारी का न सुनाई देना' कहते हैं.

परिवार के 40 लोगों का भार अप्पाजी ने ही उठाया. शिष्याओं को भी उन्होंने घर-परिवार के मध्य संतुलन साधने का गुर दिया. यानी घरेलू काम से पूरी तरह अनजान शिष्याएं भी ठुमरी-दादरा-कजरी चैती के साथ करीने से कामकाज और रसोई के रंग सीख रही थीं.

जिस बनारस अंग को उन्होंने बंगाल में लोकप्रिय बनाया उसे लेकर उनके मन में छिपी गहरी टीस कभी-कभार बाहर आ जाती थी. उत्तर भारत की लड़कियां इसे अपनाने के मामले में ठंडी थीं जबकि बंगाल में वे लगातार बंगाली लड़कियों से घिरी होती थीं.

उनके अंतिम कार्यक्रम में बजाने वाले हारमोनियम वादक धर्मनाथ मिश्र याद करते हैं, ''दिल्ली के कमानी सभागार में जगह नहीं थी. चारों तरफ रसिक. अप्पाजी मंच पर आई और श्रोताओं को खड़े देखा तो उनका पूर्वी स्वर उमड़ पड़ा—जो बंगाल में भी बनारस को साथ लिए था: तू लोग काहे अइसे हाल मा खड़ा हउवा भाई? सब लोग आ के स्टेज मा हमरे चारों तरफ बइठ जा.''

उनकी शिष्या सुनंदा शर्मा का संस्मरण इस विशेषांक का सबसे सुगठित और सर्वांग लेख है. अप्पाजी जी ने शिष्यों को नकल की जगह अपना मूल बचाए रखने को कहा.

छायानट:  विदुषी गिरिजा देवी विशेषांक
संपादक: आलोक पराड़कर
प्रकाशक: उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ
कीमत: 50 रुपए

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