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किताब समीक्षाः मिथकों का नया पाठ

यह बात कई लोगों को थोड़ी अजीब लग सकती है पर पिछले साल छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में दुर्गापूजा मना रहे आयोजकों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई.

महिषासुर मिथक व परंपराएं महिषासुर मिथक व परंपराएं

महिषासुर मिथक व परंपराएं के संपादक प्रमोद रंजन हैं, प्रकाशन हाउस द मार्जिनलाइज्ड से यह किताब प्रकाशित हुई है.

यह बात कई लोगों को थोड़ी अजीब लग सकती है पर पिछले साल छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में दुर्गापूजा मना रहे आयोजकों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई कि उन्होंने आदिवासी समुदाय का 'अपमान' किया है. दरअसल कुछ आदिवासी संगठनों ने महिषासुर के वध के चित्रण को उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया. यह वंचित समुदायों में बीते कुछ वर्षों में उभरे नए अस्मिताबोध को दर्शाता है.

यह वर्चस्व जमा चुके पौराणिक मिथकों से इतर नई सांस्कृतिक लहर है. आलम यह कि 2011 में दिल्ली में पहली बार आयोजित हुआ महिषासुर दिवस कई शहरों-कस्बों में फैल गया. यह किताब इसी नए उभार की पड़ताल करती है और इससे जुड़ी रोचक जानकारियां उपलब्ध कराती है. किताब के संपादक प्रमोद रंजन लिखते हैं, ''यह आंदोलन हिंसा और छल के बूते खड़ी की गई असमानता पर आधारित संस्कृति के विरुद्ध है.''

किताब छह खंडों में बंटी है. पहले खंड में विभिन्न राज्यों में महिषासुर से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्यों और स्मृतियों की तलाश में की गई यात्रा का वृतांत है. उत्तर प्रदेश के महोबा की यात्रा में प्रमोद रंजन पाते हैं कि महिषासुर के स्थल वहां भैंसासुर और मैकासुर जैसे नामों से जगह-जगह मौजूद हैं. नवल किशोर कुमार झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड में असुर समुदाय के लोगों और उनकी संस्कृति से रू-ब-रू होते हैं.

ढोल छतरा यानी असुरों का स्वयंवर और मृत्यु के बाद दफनाया जाना, ऐसी कई रोचक परंपराओं की जानकारियां हैं. दूसरे खंड में संजय जोठे, सिंथिया स्टीफन से लेकर गौरी लंकेश के लेख हैं. इसी खंड में महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाली सुषमा असुर पूछती हैं, ''मैं असुर की बेटी आपके प्रचलित धर्मग्रंथों में हजारों बार मारी या अपमानित की गई हूं, क्या हमारी मौत से होकर विकास का रास्ता जाता है?'' किताब में जोतीराव फुले, संभाजी भगत, कंवल भारती, रमणिका गुप्त समेत संजीव चंदन की साहित्यिक रचनाएं भी हैं. कुल मिलाकर, किताब में अस्मिताओं की नई सामाजिक पड़ताल और खोजपरक तथ्य हैं.

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