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पुस्तक अंशः विपदा केवल उस्मानाबाद की न थी

‘’बाप-बेटे के बीच चल रही मौन प्रतियोगिता को बेटी दो घंटे से महसूस कर रही थी. उससे रहा नहीं गया. सूनी सड़क पर जैसे कोयल कूकी, 'मेडल नहीं मिलेगा किसी को. रुककर पानी तो पी लो. मुझे भी प्यास लगी है.”

अमर देसवा अमर देसवा

पुस्तक अंश अमर देसवा

एक जोड़ी साइकिल उस्मानाबाद से साल भर पहले चली थी. साइकिल सवार महासागर में अपना नक्शा खो चुके किसी जहाजी जैसे थे जिनका दिशा-बोध लड़खड़ाया हुआ था. वे किनारे को नहीं जानते थे पर भीतर की उम्मीद को जानते थे. उसी के दम पर वे अब तक का जीवन काटते आए थे और आगे उसी के सहारे कड़ी धूप में साइकिल खींचते हुए निकले थे. पर बेछांह और जल्लाद सड़क उनकी उम्मीद से ज्यादा लंबी और गरम थी, जिस पर उनकी साइकिल के पहिए बारी-बारी से पंचर हो रहे थे.

पहली साइकिल पुरानी और जर्जर हो चुकी थी जिसके हैंडल और कैरियर पर घर का लगभग हर सामान टंगा था. बेडशीट-चादरों, पतले-पतले गद्दों और थोड़े-से अनाज को साइकिल सवार ने टेंट वाली प्लास्टिक की चद्दर से ढक रखा था और उसे अपनी सीट के पीछे कैरियर पर मजबूती से बांध दिया था. उसके ऊपर प्लास्टिक की एक-दो बाल्टियां औंधी पड़ी थीं, जिनमें मग और छोटी-मोटी जरूरतों के सामान के साथ थालियों, कटोरों और गिलासों को ठूंसा गया था.

बाल्टियों को रस्सियों के सहारे कसा गया था और उन्हीं रस्सियों के सहारे उनके दाएं-बाएं दो तसले लटकाकर बांधे गए थे. रोटी बनाने के तवे के हैंडल को साइकिल सवार ने अपनी सीट के नीचे फंसा दिया था. तवा औंधा ही रखा गया था. सब कुछ कायदे से इतना विन्यस्त था कि साइकिल के चलने से सामान आपस में टकराते नहीं थे.

बस कटोरियां ही थीं जो थाली से टकराकर कभी-कभार शोर कर जातीं. साइकिल सवार को उस शोर से भी दिक्कत नहीं थी. उसकी नजर बिलकुल सीधी सड़क पर थी और बीच-बीच में वह साइकिल के हैंडल के मध्य फंसे स्टोव को कनखियों से घूर देता था. स्टोव से मिट्टी का तेल रिस रहा था और यह चीज उसे परेशान कर रही थी. 

साथ चल रही दूसरी साइकिल अपेक्षाकृत नई थी. उस पर एक लड़का और एक लड़की सवार थे. लड़का चौदह-पंद्रह का होगा और लड़की बारह की उम्र के आसपास. लड़का साइकिल चला रहा था और साइकिल के हैंडल पर घंटी के अलावा कुछ नहीं था. लड़की पीछे साइकिल के कैरियर पर तौलिया डाले गुमसुम बैठी थी और उसके हाथ में एक एयरबैग था. बैग में दो-दो जोड़ी कपड़े और पानी भरी बोतलें थीं.

साइकिल चलाते-चलाते लड़का कुछ हांफने लगा था. उसके कांपते हुए पैर बता रहे थे कि वह अपनी उम्र से कहीं अधिक बोझ ढो रहा था. उसके साथ चल रहा साइकिल सवार उसका बाप था जो बेटे को हांफते देखकर भी पिघल नहीं रहा था. बाप को लग रहा था कि अभी दो घंटे पहले ही तो साइकिल चलाने की अदला-बदली हुई थी उससे. तब बेहूदे ने जर्जर साइकिल को ऐसा हांका था कि स्टोव से तेल रिसने लगा.

अगर स्टोव की टंकी फूटी होगी तो भगवान ही मालिक है. बाप ने एक बार फिर स्टोव को घूरा और साइकिल की रफ्तार बढ़ा दी. बेटा बाप की हरकत समझ रहा था. इसी रोष में वह भी रुका नहीं बल्कि बाप की ताकत आंकने का फैसला करते हुए उसने भी साइकिल की रफ्तार बढ़ा दी. धूप अब भी तेजाबी थी और काली लंबी सड़क बेछांह.

बाप और बेटे के बीच चल रही इस मौन प्रतियोगिता को बेटी दो घंटे से महसूस कर रही थी. उससे रहा नहीं गया, सूनी सड़क पर जैसे कोयल कूकी, ''मेडल नहीं मिलेगा किसी को. रुककर पानी तो पी लो. मुझे भी प्यास लगी है.’’ 

कोयल के कूकते ही दोनों साइकिलों की रफ्तार धीमी हुई और फिर वे रुक भी गईं.

माधुरी बैग से पानी की बोतल के साथ थोड़ा गुड़ और चना भी निकालने लगी. लड़के ने साइकिल से उतरते ही मोबाइल निकाला और आसपास के नक्शे को उसमें टटोलने लगा, फिर कुछ उम्मीद से बोला, ''यह आगे कोई नदी दिखा रहा है.’’ बाप ने जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह नक्शे को नहीं उम्मीदों को टटोलना जानता था. इन मशीनी नक्शों पर उसको भरोसा नहीं था. उसे कहीं भी बस अपना जुगाड़ बैठाना था जिससे तीन जीवों का दाना-पानी चलता रहे. वह भीतर से बहुत डरा हुआ था.

सने सालभर में दर्जनों मजदूरों की लाशों को भूख और प्यास के मारे सड़कों पर मरा हुआ देखा था. एक गर्भवती मजदूरनी तो राजमार्ग पर बच्चा जनते हुए ही मर गई थी. जब तक मजदूरों की कोई दूसरी खेप वहां तक पहुंचती गिद्ध और चीलें उस मरी हुई मां के साथ उसके जिंदा नवजात की देह नोचकर आधा खा चुके थे. मजदूरों की बिखरी हुई फौज बिलखकर रह गई.

मजदूर इतने नासमझ नहीं होते कि निजाम के इस मानवता विरोधी अपराध को न समझ रहे हों. बस पढ़े-लिखों की तरह उन्हें परिभाषाएं गढ़नी नहीं आती हैं. इस सरकारी अपराध को वे तालाबंदी के नाम से पुकार रहे थे और भुनभुनाते हुए मुठ्ठियां भींच रहे थे. उस बिखरी हुई फौज का एक हिस्सा इन दो बच्चों का बाप भी था. पर उसकी नजर सरकार से ज्यादा सड़क पर थी. और सड़क से ज्यादा तीन प्राणियों के पेट पर.

चना-गुड़ फांकते हुए बाप ने बेटे को डपटा, ''तुम्हारे नक्शे के चक्कर में तीन बार फंसे हैं हम लोग. बंद कर नक्शा और मुरारी को फोन लगा.’’

बेटे का पहले से ही माथा गरम था, बाप से उलझ गया ''इसी नक्शे के दम पर तीन माह दाना-पानी चला था नांदेड़ में. नहीं तो मैं भी देख ही रहा हूं तुम्हारे दोस्तों को. कहीं ढंग की नौकरी नहीं लगवाई किसी ने तुम्हारी.’’

एकदम छील दिया बेटे ने बाप को. बाप भी उलझ ही गया, ''उस्मानाबाद में तुम्हारे दादा ने नौकरी दिलवाई थी क्या? खाली हम पर ही बीत रहा है यह? सब लोग उजड़ गया तालाबंदी में! फोन लगाओ मुरारी को फिर से.’’

''अरे आपका मुरारी फोन उठाएगा तब न? उठा ही नहीं रहा है!’’ लड़का एकदम आपे से बाहर हो रहा था.

अजीब मुसीबत है. साला कोई कहीं साथ नहीं दे रहा है. ऐसे तो भूखे ही मर जाएंगे. कुछ-कुछ सोचते हुए बाप परेशान हो गया. साल के तीन-साढ़े तीन महीने सड़क नापते हुए ही गुजर गए थे. पर कहीं ढंग का काम मिले तब तो! बेटा अभी भी मोबाइल में घुसा पड़ा था. बाप झल्ला गया, ''हम कह रहे हैं विजय कि उठाकर पटक देंगे मोबाइल. चना-गुड़ फांको और साइकिल उठाओ.’’

''वीडियो गेम नहीं खेल रहा. आसपास कोई फैक्टरी खोज रहा हूं. क्या पता कुछ काम का निकल आए!’’

''अरे भाग! फैक्टरी होगी तो काम भी मिल जाएगा क्या? नक्शा केवल ई बताएगा कि फैक्टरी है. वहां काम है कि नहीं, यह थोड़े न बताएगा.’’

विजय कसमसा कर रह गया. पर पिता की बात कुछ हद तक सही थी. अब तक का अनुभव भी यही कह रहा था. अब सच्चाई तो यह थी कि दोनों ही जीव इस हालत से बाहर निकलने का भरोसा खो चुके थे. ऊपर से तपते सूरज और दहकती धरती के बीच होश संभालना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में मोबाइल पर विजय क्या ही खोजबीन करता? वह साइकिल पर झटके से बैठ गया और बोला, ''चल माधुरी बैठ.’’

''चना-गुड़ तो खा लो भाई,’’ माधुरी ने मिन्नत की. 
''ना, अब सीधे नदी किनारे.’’ विजय ने पानी भी नहीं पिया. बाप का कलेजा कट रहा था पर कुछ बोलता तो फिर झगड़ा शुरू हो जाता. चुपचाप उसने भी अपनी साइकिल को पैडिल मार दिया. 
***
नक्शे ने इस दफा कोई जालसाजी नहीं की थी. अगले सवा घंटे की मौन प्रतियोगिता के बाद नदी दिखी. बीच में एक पुल भी था. जल्लाद सड़क नदी के पुल पर जाकर धूसर हो रही थी. पुल के पार आगे की सड़क फिर वैसी ही काली और बेछांह थी. 

थके जीव बेछांह सड़क से अलग होकर एक ढलान की ओर बढ़े और आहिस्ता-आहिस्ता पुल के ठीक नीचे आ गए. साढ़े तीन घंटे बाद किसी छाया ने पनाह दी थी. नदी सूखकर पतली हो गई थी. पर उसमें धार थी. एक बहती हुई नदी से बड़ा सहारा भला क्या हो सकता है! उसकी शीतलता पुल के नीचे पसरी थी. माधुरी को लगा कि जन्नत नसीब हुई है. पिता ने भी साइकिल खड़ी करके अंगड़ाइयां लीं. इधर प्यासा विजय गश खाकर गिर गया. अचानक ही.
बाप और बेटी एक साथ उसकी ओर दौड़े.

पुल के नीचे माधुरी स्टोव जलाकर भात रांध रही थी. अनाज की गंध से विजय की आंख खुली. उसने आसपास निहारा. सांझ ढल रही थी. पिता नदी में पैर डाले आसमान निहारता दिखा. पिता की उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी और वह देह से भी मजबूत था पर कुछ था जो भीतर ही भीतर उसे कमजोर कर रहा था. आखिर इस देह की भी सहने की एक सीमा थी. उस्मानाबाद आने के बाद जैसे उसकी देह ही शापित हो गई थी.

तब विजय पांच महीने का था. पता नहीं क्या सोचकर वह उस्मानाबाद आया था मैनेजर बनने! उतना पढ़ा-लिखा भी नहीं था पर ख्वाब बहुत बड़े देख लिए थे. उन ख्वाबों को किसी की नजर लग गई. हालात ने मजदूरों के बीच उनकी ही तरह की जिंदगी गुजर-बसर करने का सबक सिखा दिया. यहां आने के दो साल के भीतर माधुरी का जन्म हुआ. गृहस्थी डांवाडोल होने लगी. बहुत सोच-समझकर अतिरिक्त आमदनी के लिए एक परचून की दुकान भी खोली गई. पर वह भी गरीब मजदूरों के बीच संभल नहीं पा रही थी

 दुकान पत्नी के देखरेख में ही थी पर उस दुकान के न चलने में उसका क्या कुसूर था? मजदूर अक्सर उधारी लगाते थे. कुछ उधारी चुकाते तो कुछ बिना चुकाए अपने गांव-घर भाग जाते. मजदूर और मजदूरी में से कोई भी टिकाऊ न था. उधार बढ़ता गया और तंगी से दुकान बंद करनी पड़ी. फिर विजय की मां लगातार बीमार रहने लगी. डॉक्टर ने बताया कि उसके दिल में छेद है. उसके सालभर के भीतर ही विजय की मां ने सबका साथ छोड़ दिया.

पिता क्या सोचकर आया था और क्या होकर रह गया. कई बार यह भी सोचा कि वापस अपने घर लौट जाए. पर घर लौटकर वह करता ही क्या? कायदे के काम की गारंटी और कहीं दिख नहीं रही थी और यहां कमोबेश एक बंधी-बंधाई आमदनी थी. काम भी बहुत वजनी नहीं था. जिंदगी संभालने वाले कुछ भरोसेमंद साथियों का साथ भी तो था.

वह जैसे-तैसे बच्चों को पालने लगा. बच्चे स्कूल जाने लगे. पिता ने सोचा कि विजय दसवीं कर लेगा तो कुछ कमा लेगा कायदे का. पिता वाली फैक्टरी बहुत बड़ी नहीं थी और उसका भविष्य भी कुछ बढ़िया नहीं दिख रहा था. पर उसी में विजय को घुसाने की जुगत में था वह. बस दसवीं कर जाए विजय. इसी उधेड़बुन में पिता पित्तमारू जिंदगी काट रहा था.

किसी को अंदाजा ही नहीं था कि ऐसी विपदा पड़ेगी. वह भी केवल उस्मानाबाद में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में. अचानक महामारी का शोर उठा. देखते-ही-देखते खदानें और फैक्टरियां धड़ाधड़ बंद होने लगीं. जब तक कोई होश संभालता सड़क-दुकान-मकान सब सूने पड़ गए. लोग रेल-बस-ट्रक जैसे जहां थे वहीं थम गए.

मजदूरों में अफरातफरी मच गई. आधे तो तत्काल अपना जुगाड़ लगाकर भाग खड़े हुए. जिनमें थोड़ी कुव्वत थी वे टिके रहे. एक माह तो बैठकी में ही निकल गया. मजूरी करके भी जिन परिवारों का पेट नहीं भर रहा था उन्हें आटे-दाल का भाव सताने लगा. 

अपने दो कहानी संग्रहों छबीला रंगबाज का शहर और वास्को डी गामा की साइकिल से चर्चा में आए कथाकार प्रवीण कुमार का यह पहला उपन्यास है

अमर देसवा
लेखक: प्रवीण कुमार
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
कीमत: 250 रुपए.

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