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पुस्तक समीक्षाः अपूर्व विजय की अंतर्कथा

यह किताब भारतीय लोकतंत्र की उस खूबसूरती को रेखांकित करती है जहां सेवा, श्रम और समर्पण के स्वागत में जनता को पुरानी बेड़ियां झटकने में देर नहीं लगती

अमेठी संग्राम: ऐतिहासिक जीत की अनकही दास्तां अमेठी संग्राम: ऐतिहासिक जीत की अनकही दास्तां

विनोद अनुपम

लगता भले ही अप्रत्याशित हो, भारत की चुनावी राजनीति में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं होता. जो कुछ भी यहां चुनावी जीत-हार के रुप में दिखाई देता है, वह वास्तव में सुनियोजित होता है, उसके पीछे सेवा, श्रम,साधना की लंबी कहानी होती है. अनंत विजय की सद्य: प्रकाशित अमेठी संग्राम—ऐतिहासिक जीत अनकही दास्तां भारतीय लोकतंत्र की इसी विशेषता को प्रामाणिक रुप से रेखांकित करती है.

अमेठी, गांधी परिवार की अमेठी कैसे बन गई, इसकी बुनियाद अनंत विजय जवाहर लाल नेहरू के चुनावक्षेत्र फूलपुर में तलाश करते हैं. अपना राजनीतिक रसूख बरकरार रखने के लिए किस योजनाबद्ध तरीके से लोगों की गरीबी और पिछड़ेपन का इस्तेमाल किया, यह नेहरू, फिर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी के चुनावी क्षेत्र के चयन में साफ दिखता है. आखिर गांधी परिवार का कोई सदस्य अपेक्षाकृत विकसित और सुशिक्षित इलाहाबाद से चुनाव लड़ने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा सका?

सवाल यह भी है कि गांधी परिवार की थाती समझी जाने वाली सीट अमेठी को विकसित करने की कोशिश किस योजना के तहत नहीं की गई? कोई तो बात होगी कि राजीव गांधी ने जिस बस स्टैंड की नींव रखी थी, उस पर 2014 तक काम की शुरुआत भी नहीं हो सकी. वास्तव में गांधी परिवार को एहसास था कि उनकी ताकत ही, उनकी उच्चता में है, जिसके लिए क्षेत्र का पिछड़ापन और गरीबी जरूरी है. आश्चर्य नहीं कि अमेठी संसदीय क्षेत्र पर इतने लंबे समय तक काबिज रहने के बाद भी गांधी परिवार को एक किराए के घर तक की भी वहां जरूरत महसूस नहीं हुई.

अमेठी संग्राम ऐसे कई सवालों को गंभीरता से विश्लेषित करते हुए भारतीय लोकतंत्र की उस खूबसूरती को रेखांकित करती है, जहां सेवा, श्रम और समर्पण के स्वागत में जनता को पुरानी बेड़ियों को झटकने में देर नहीं लगती. अमेठी संग्राम स्मृति ईरानी की जीत की गाथा से अधिक अमेठी के गांधी परिवार की गुलामी की बेड़ियों से आजादी की कहानी कहती है. इस संदर्भ में अनेकों संस्मरण पुस्तक में वर्णित हैं. महत्वपूर्ण है कि अनंत पुस्तक में ज्यादातर जानकारी प्राथमिक स्रोत से उल्लिखित करते हैं, जो पुस्तक को विश्वस्त बनाती है. आश्चर्य नहीं कि नरेंद्र मोदी ने वहां अपने चुनावी भाषण में भी कहा, ''स्मृति जी को हमने राहुल जी की मुसीबतें बढ़ाने के लिए नहीं भेजा है, मैंने उनको भेजा है अमेठी की मुश्किलें कम करने के लिए.'' पुस्तक के परिशिष्ट में स्मृति ईरानी की ओर से क्षेत्र के विकास के लिए किए गए कामों की सूची में भी इसे देखा जा सकता है.

वास्तव में अमेठी ने अभी तक जीतने के बाद नहीं दिखने वाले प्रतिनिधि देखे थे, उसके लिए यह सुखद आश्चर्य था कि कोई हार जाने के बाद भी उसके हर सुख-दुख में खड़ा दिख रहा है. अमेठी में स्मृति ईरानी की इस विजय यात्रा को अनंत विजय जीत से बना इतिहास, चुनौतियों से टकरा कर पलटी बाजी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका, परिवार के खिलाफ बगावत, बचपन के माहौल से मिली दृढता, गांधी परिवार की राजनीतिक चतुराई, स्वार्थ का सियासी गठबंधन तथा आंकड़ों में अमेठी और सियासत जैसे आठ खंडों मे प्रस्तुत करते हैं. सभी खंड एक-दूसरे के पूरक लगते हैं, जो देश के सबसे चर्चित चुनाव की रणनीति को मुकम्मल रूप से समझने का अवसर देते हैं. चुनावों में आरएसएस की भूमिका सुनी-सुनाई जाती रही है. अनंत अमेठी के बहाने यहां उसकी पूरी रणनीति प्रस्तुत करते हैं.

कई अनसुने अनजाने संदर्भ स्मृति ईरानी के कठोर राजनीतिक व्यक्तित्व के पीछे छिपे संवेदनशील स्त्री से भी परिचित कराते हैं, जो अमेठी के लाखों लोगों के हरेक दुखदर्द में दीदी बनकर खड़ी हैं. पुस्तक से गुजरते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि स्मृति ईरानी के लिए अमेठी मात्र एक चुनावी जमीन भर नहीं थी, कहीं न कहीं इसकी माटी से वे भावनात्मक रूप से जुड़ गई थीं. 2014 में ही अमेठी के एक इलाके में महिलाओं को लंबे घूंघट में और पीठ फेरकर बात करते हुए देखा तो पता चला कि उन्होंने दिन का सूरज देखा ही नहीं. स्मृति को झटका-सा लगा, किसी प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र में ऐसा पिछड़ापन कैसे हो सकता है? अनंत विजय लिखते हैं, ''उन्होंने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि चाहे जो हो, जीवनपर्यंत जितना भी संभव होगा, वे अपने तईं समूचे देश की महिलाओं और अमेठी के लिए जरूर करेंगी, करती ही रहेंगी.''

राजनीतिक लेखन की बोझिलता से अलग अमेठी संग्राम में भाषा ही नहीं, वर्णन के स्तर पर भी जीवंतता इसे एक बैठक में पठनीय बनाती है. इतिहास नहीं, लगता है आंखों के सामने चित्र गुजर रहे हों.

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