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साहित्य

उसने गांधी को क्यों मारा

पुस्तक समीक्षाः लाजिमी था भावुक होना

27 अक्टूबर 2020

गांधी की अहिंसा में साहस सबसे महत्वपूर्ण अवयव था. इस किताब ने मुझे सबसे पहले साहस दिया. भय नजदीक नहीं आया

 मन्नत टेलर्स

पुस्तक समीक्षाः छोटी बातों के बड़े निहितार्थ

12 अक्टूबर 2020

पिछली गली और मन्नत टेलर्स की पृष्ठभूमि में भी परिवार है लेकिन अपने व्यापक अर्थों में ये बाजारवाद के दो अलग-अलग पक्षों को सामने लाती हैं.

जीवन संवाद लेखक: दयाशंकर मिश्र

पुस्तक समीक्षाः बंद कमरों की घुटन में ताजी हवा

12 अक्टूबर 2020

लेखक का यही अंदाजेबयां इस किताब को पर्सनालिटी डेवलपमेंट या डिप्रेशन मैनेजमेंट की चलताऊ किताबों से अलग कर देता है.

एकदा भारतवर्षे

पुस्तक समीक्षाः किस्सों में सभ्यता सार

05 अक्टूबर 2020

चलते-फिरते मोबाइल पर लिखी गई ये बोध कथाएं कब वैदिक साहित्य से शुरू होकर रामायण, महाभारत में गोते लगाते हुए जातक कथा सागर में तैरने लगती हैं, पता ही नहीं चलता.

हल्ला बोल: सफदर हाश्मी की मौत और जिंदगी 

पुस्तक समीक्षाः नुक्कड़ नाटकों का स्पार्टाकस

30 सितंबर 2020

इस किताब में सुधन्वा ने फिल्म की फ्लैश बैक प्रविधि अपनाई है मतलब कि जो बाद में घटित हुआ, उससे शुरुआत करके फिर वे अतीत में जाते हैं.

'वॉयस ऑफ द नेशन’

कहानी 'कृष्ण की बांसुरी की

10 सितंबर 2020

यह बातचीत करीब एक दशक पुरानी है पर फन की हदों को काफी आगे बढ़ा चुकीं फनकार लता मंगेशकर से जुड़ी हर बात दिलचस्प है, खासकर जब वे खुद बयान कर रही हों.

राहत इंदौरी

ये सिर्फ़ मातम की तस्वीरों का कैनवस है

14 जुलाई 2020

देश के शीर्ष शायर कोरोना त्रासदी को अपने अंदाज में बयां कर रहे थे


राजेश रेड्डी

'दुनिया यूं ही रहेगी हमारे बगैर भी’

14 जुलाई 2020

मुशायरों की वो रंगीन फ़िजा बहाल होने में अभी ख़ासा वक्त लगने के आसार. लेकिन देश के शीर्ष शायर इस बीच कोरोना की त्रासदी को अपनी शैली और अंदाज में बयान कर रहे










वसीम बरेलवी

नज़्म व ज़ब्त का दौर

14 जुलाई 2020

मुशायरों की वो रंगीन फ़िजा बहाल होने में अभी ख़ासा वक्त लगने के आसार. लेकिन देश के शीर्ष शायर इस बीच कोरोना की त्रासदी को अपनी शैली और अंदाज में बयान कर रहे










बंशी कौल

एक पहलू कॉमिक रिलीफ से परे

08 अप्रैल 2020

भारतीय रंगजगत की एक अहम शख्सियत बंसी कौल घोर मानवी त्रासदी को लेकर कॉमिक रिलीफ वाले रवैए पर उंगली रखते हैं. उनके हिसाब से यह हंसी-मजाक का नहीं. गहरे सोच-विचार और पहल का वक्त है.

आलोक धन्वा

फुसरतः करो न दिल की बात

06 अप्रैल 2020

वैश्विक महामारी ने साहित्यिकों की संवेदना को भी झकझोरा. उनकी राय में कोरोना के असर ने रचनाओं की जमीन को हमेशा के लिए बदल डाला.