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धोनी को देखते हुए भी जो नहीं दिखता

जो भी क्रिकेट में है उसमें धोनी का अक्स है लेकिन किसी के पास वह लय नहीं जिसकी बात होती है.

और ये छक्का 2011 विश्व कप के फाइनल में भारत-श्रीलंका के बीच मुकाबले में विजयी शॉट लगाते धोनी और ये छक्का 2011 विश्व कप के फाइनल में भारत-श्रीलंका के बीच मुकाबले में विजयी शॉट लगाते धोनी

आनंद वासु

जब धोनी अचानक परिदृश्य में आए तो वे एक से ज्यादा तरीकों से पूरी तरह बेगाने थे. उनके बारे में जो अपेक्षाएं की जा सकती थीं, वे उन सबसे अलहदा थे. लंबे-सीधे झूलते बाल तो विकसित रूप नहीं था, लेकिन प्रचंड ताकत से क्रिकेट की गेंद पर जोरदार प्रहार विकसित किया गया था. रुक-रुककर खास ढंग से अंग्रेजी बोलना तो आकांक्षा का इजहार नहीं था, लेकिन क्रिकेट में जिंदगी बनाना साफ तौर पर महत्वाकांक्षा थी, जिसे हर कीमत पर पूरा करना था.

2004 के अनजान शख्स से 2020 की उस शख्सियत तक जिसे जाना नहीं जा सकता, धोनी का अंतरराष्ट्रीय करियर डेढ़ से ज्यादा दशकों के दौरान गहरी नुक्ताचीनी के तले परवान चढ़ा और जब वे रुखसत हुए, अपने लिए एक धुन बजाते हुए, तो उनकी खिचड़ी दाढ़ी ने हरेक को अपना सिर खुजलाते हुए यह समझने की कोशिश करने के लिए छोड़ दिया कि आखिर यह क्या था जो उनकी नजरों के सामने से गुजरा है.

लौटकर 2006 में चलें. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर के तौर पर अपने पहले पूरे सत्र के बाद धोनी एक इंटरव्यू के लिए बैठे. ज्यादा सटीक यह कहना होगा कि धोनी ने मुझे एक इंटरव्यू के लिए बैठाया. ये वे दिन थे जब धोनी अब भी इंटरव्यू देने में यकीन करते थे. क्रिकेट के एकांतवासी के तौर पर उन्होंने नाम कमाना शुरू कर दिया था.

टेलीफोन से उन्हें परेशानी होती थी और रिपोर्टरों तथा क्रिकेटर की जिंदगी में उनकी भूमिका पर वे बढ़-चढ़कर संदेह करते थे. धोनी के पास एक मोबाइल फोन जरूर था और वे नंबर भी देते थे, लेकिन वे कभी कॉल रिसीव नहीं करते. होटलों में रिसेप्शन को हिदायत दे दी जाती कि उनके कमरे के लैंडलाइन पर 'डू नॉट डिस्टर्ब’ लिख दिया जाए; अगर वे ऐसा नहीं करते तो रिसीवर उठाकर फोन से अलग रख दिया जाता.

टेलीफोन के साथ धोनी के रिश्ते के कई मशहूर किस्से हैं. इनमें अप्रमाणित स्रोतों से आए किस्से भी हैं. एक तब घटा जब एन. श्रीनिवासन बीसीसीआइ (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के सेक्रेटरी और इस हैसियत से चयन समिति के संयोजक थे. बहुतेरी कोशिशों के बाद भी श्रीनिवासन धोनी को पकड़ नहीं पाए, यह जानने के लिए कि भावी एक बैठक के लिए वे उपलब्ध होंगे या नहीं. संपर्क तभी हुआ जब दोनों आमने-सामने थे,

लेकिन यह साफ नहीं है कि यह हुआ कैसे. फिर एक बार ऐसा हुआ कि अमिताभ बच्चन किसी चीज की मुबारकबाद देने के लिए धोनी से संपर्क की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने पाया कि उनके फोन कॉल और मेसेज नजरअंदाज कर दिए गए हैं. जिस अदाकार की तरफ हर कोई खिंचा चला आता था, उसने फिर अपनी शुभकामनाएं पहुंचाने के लिए ट्विटर का सहारा लिया पर उसका भी कोई जवाब नहीं आया.

एक वक्त कहा जाता था कि धोनी के पास दुनिया का सबसे महंगा पेजर है. आखिर क्यों नहीं, वे अपने मोबाइल फोन का इसी तरह इस्तेमाल जो करते थे. आप धोनी को कॉल नहीं करते थे, धोनी आपको कॉल करते थे. लेकिन यह आपके प्रति बेअदबी की वजह से नहीं था बल्कि अपने को और समय बचाने की बुनियादी सूझबूझ थी. उस शुरुआती इंटरव्यू में साफ हो गया कि धोनी अपने विचारों के पक्के थे.

जब परिपक्वता की देहरी पर खड़े इस नौजवान से पूछा गया कि क्या उन्होंने अपनी नई हासिल शोहरत से निपटने के बारे में सचिन तेंडुलकर, सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड़ सरीखों से बात की है, उन्होंने कहा, ''मैंने खास तौर पर इसके बारे में तो उनसे बातचीत नहीं की. लेकिन उनसे सीखा है और उन्हें देखकर सीखा है. वे आपस में कैसे बात करते हैं, मीडिया के साथ वे कैसे बात करते हैं... एक बात मैंने (अपने दिमाग में) साफ कर ली है. मैं विवादों में पडऩा नहीं चाहता. अगर मैं किसी चीज के बारे में बोलना नहीं चाहता, तो मैं नहीं बोलूंगा.’’

धोनी ने टीम के अपने वरिष्ठों से सीखा जरूर, लेकिन उनकी नकल नहीं की. स्थापित होने के बाद पहली चीज उन्होंने यह की कि हर उस चीज को निकाल दिया जो उनके क्रिकेट से हटकर थी. इंटरव्यू को तिलांजलि दे दी गई और प्रेस कॉन्फ्रेंस भी बस उतनी ही, जितनी अनिवार्य थीं.

यहां तक कि उन प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी ऐसे प्रश्न होते जिनसे वे मुखातिब ही नहीं होते. सबसे अहम, टीम के राज मजबूती से बंद कर दिए गए. एक दूसरे के बारे में कहानियों का रिसकर बाहर आना रुक गया और चयन के बारे में चर्चाएं गोपनीय रहने लगीं. धोनी के लड़कों को सीधा-सादा संदेश दे दिया गया: क्रिकेट खेलो, टीम के प्रति सच्चे रहो और बाकी चीजें भाड़ में जाएं.

कहने का मतलब यह नहीं कि धोनी रूखे और अशालीन थे. वे तो इससे बहुत अलग थे. क्रिकेट के मैदान में या किसी आयोजन में या हवाई अड्डे की लाउंज में जब वे आपसे मिलते, तो लतीफे के साथ आपको निहत्था कर देने वाले पहले वही होते. यही वजह है कि हरेक के पास धोनी की एक कहानी है, फिर भले ही वे धोनी की उस कहानी का हिस्सा होने का दावा न कर सकते हों. हमारी बनिस्बतन लंबी बातचीत में से एक देरी से उड़ रही उड़ान का इंतजार करते हुए ही हुई थी.

इसमें जब उनसे कहा गया कि अग्रणी शख्सियतों से अब मशाल उनके हाथ में आ गई है और यह उनके ऊपर है कि वे इसके साथ कैसे दौड़ते हैं, तो धोनी हंस पड़े. उन्होंने कहा, ''अगर आप सोचते हैं कि सचिन या राहुल की तरह मेरा 15 साल का करियर होने जा रहा है और मैं सौ टेस्ट वगैरह खेलूंगा तो आप हैरान रह जाने वाले हैं. मैं यहां बस क्रिकेट खेलने के लिए हूं. जब वह गया तो मैं गया. आपको फिर मुझसे सुनने को नहीं मिलेगा.’’ बेशक, यह सच नहीं निकला.

यहीं हम धोनी की एक और ताकत से रू-ब-रू होते हैं. वह है खुद को ढालने की क्षमता. उनके करियर के आखिर में यह तकरीबन भुला दिया गया है कि वे गेंद के जबरदस्त स्ट्राइकर के तौर पर क्रिकेट की दुनिया में आए थे. वे ऐसे बल्लेबाज थे जिसने भारतीय क्रिकेट में पहले नहीं देखी गई, बेरहम ताकत और शॉट सेलेक्शन के जोड़ के दम पर अपनी इच्छा और समय से इस फन की बुनियादी बातें सीखीं. जब वे नौजवान के तौर पर अपनी भूमिका के लिए यहां से वहां हिचकोले खा रहे थे, तब वे बेपरवाह बल्लेबाज, बेधड़क दुस्साहसी मालूम देते थे. 

लेकिन यह सचाई से कोसों दूर था. वन्न्त गुजरने के साथ पता चला कि तमाम फॉर्मेट में कामयाब होने की खातिर धोनी, असल में, ज्यादा जोखिम उठाने से बचने वाले क्रिकेटरों में थे. सीमित ओवर के क्रिकेट में नाकाम होने के नतीजों से डरे बगैर जोखिम के आकलन की उनकी क्षमता ही थी जिसकी बदौलत वे अंधाधुंध हाथ चलाने वाले करिश्माई बल्लेबाज होने से हटकर डरावने बल्लेबाज बन पाए जो शुरू से आखिर तक पारी के रक्रतार को अपनी मुट्ठी में बांधकर रखता था.

मनोवैज्ञानिक सीधा-साधा उदाहरण देकर बताएंगे कि इनसानी दिमाग इससे कैसे निपटता है. ठोस जमीन पर बने एक फुट चौड़े रास्ते पर चलना बच्चों का खेल है. जमीन से तीन फुट ऊपर दो कुर्सियों के बीच संतुलित तक्चते पर इसी काम को अंजाम देने पर गिरने की आशंका होती है, पर तकरीबन हर कोई इसे आजमाने को तैयार हो जाएगा.

यही तख्ता अगर जमीन से सौ फुट ऊपर दो इमारतों के बीच फैला हो, तो केवल खतरे के रोमांच का पीछा करने वाले ही आगे बढ़कर यह जोखिम उठाने की हिक्वमत करेंगे. एक तरह से काम एक ही है लेकिन चुनौती बिल्कुल अलग-अलग है, क्योंकि गिरने का जोखिम नाटकीय ढंग से अलग-अलग है.

धोनी की बल्लेबाजी की खासियत, दबाव में या सबकी पैनी नजरों के सामने, खतरे और जोखिम को नजरअंदाज करने की क्षमता थी. उनके लिए इस बात की कम ही अहमियत थी कि वे रांची के मेकन ग्राऊंड में तीन कुत्तों और एक आदमी के सामने खेल रहे हैं या खचाखच भरे वानखेड़े स्टेडियम में विश्व कप के फाइनल में खेल रहे हैं. यही वजह है कि उन्होंने नौ रन का लक्ष्य छन्न्के के साथ पूरा किया, जो कोई दूसरा क्रिकेटर नहीं कर सका. 

जोखिम को इतने शानदार ढंग से संभालने की क्षमता ने सीमित ओवर के क्रिकेट में धोनी की महानता के अफसाने को मजबूती दी. उसी सीमित ओवर के क्रिकेट में जहां उन्होंने तमाम रन चेज को खुद अपने और बॉलर के बीच शूट-आउट में बदलते हुए जिंदगी गुजार दी, जहां वे तमाम बाहरी कारकों को सिरे से हटाते हुए एक ऐसी स्थिति ले आते, जिसमें हाथ में बल्ला लिए गेंद का सामना कर रहे वे होते और उनकी तरफ आ रही गेंद होती थी और इसके सिवा कुछ भी न होता था.

लेकिन उनका बेपरवाह अंदाज, बड़े शॉट खेलने की उनकी क्षमता, क्रीज पर उनका जाहिर आत्मसंयम और शांतचित्तता, जो अगली गेंद खेलने के सीधे-सादे काम में उनकी जेन सरीखी तल्लीनता से आती है, इस सबको उनका जोखिम उठाने का माद्दा समझा जाता है, जो गलत है. असल में जुआ खेलने की अनिच्छुकता ने उन्हें भारत के ज्यादा रक्षात्मक कप्तानों में से एक बनाया. 

पैडी अप्टन ने मानसिक खैरियत और कामयाबी का सही माहौल बनाने के लिए भारतीय टीम के साथ काम किया था. मानसिक दमखम और नतीजों के बारे में उनकी एक थ्योरी है. अप्टन खिताबी खेल के मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक नहीं चलते, फिर भी वे तालीम और आचरण दोनों में इनसानी दिमाग और उसके काम करने के तरीकों के उत्सुक छात्र हैं.

''जब हम बेहतरीन में से भी बेहतरीन का अध्ययन करते हैं, मानसिक दमखम के साथ जुड़ी परिभाषाओं की इस फेहरिस्त पर विचार करते हैं: अपने आप में और अपनी क्षमता में जबरदस्त विश्वास; जज्बात पर काबू; दबाव में साफ सोचना, लक्ष्य का निर्ममता से पीछा करना; अफरा-तफरी के बीच अच्छे-से काम करना; दूसरों के डर-धमकी में न आना; हार या नाकामी से अप्रभावित; विरोधियों की कमजोरियों को तेजी से पहचानना; प्रेरक, लोकप्रिय, प्रभावशाली; बेलगाम झूठा.’’

ठहरिए, यह क्या? अप्टन ने यह चुपके से डाल दिया है, क्योंकि वे महज मानसिक दमखम की बजाए मनोरोग के लक्षणों की फेहरिस्त बना रहे हैं. इससे पहले कि आप उन्हें सनकी समझें, वे और भी कुछ कह रहे हैं. ''मान लो मैं आपसे कहूं कि बेहतरीन एथलीट में मानसिक दमखम का अध्ययन करने वाले अध्येताओं ने अनजाने में ही उनमें साइकोपैथ या विक्षिप्त के लक्षणों का पता लगाया है और इन्हें मानसिक दमखम के लक्षणों की तौर पर निर्धारित किया है. यही वजह है कि इतने सारे मनोविक्षिप्त लोग कारोबार के साथ ही राजनीति तथा खेलों में बड़ी कामयाबियां हासिल करते हैं.’’

अपनी आंखें बंद कीजिए और धोनी के बारे में सोचिए. आप इनमें से सभी लक्षणों के आगे सही का निशान लगा देखेंगे, केवल एक को छोड़कर, जो बेलगाम झूठा होने के बारे में है. लेकिन फिर आप झूठ न बोलें, यह पन्न्का करने का एक तरीका कुछ न बोलना है. अप्टन इसे आम आदमी को ज्यादा साफ ढंग से समझ में आने वाली भाषा में समझाते हैं. ''कॉर्पोरेट साइकोपैथ और हनीबल लेक्टर (साइलेंस ऑफ द लैक्वब) ऐंड कंपनी—जिन्होंने बच्चों के तौर पर पशुओं को यंत्रणाएं दीं और वयस्कों के तौर पर जिनका हश्र सीरियल किलर होने के नाते जेल में हुआ—के बीच एकमात्र फर्क हिंसा की प्रवृत्ति का है.’’

 इससे पहले कि आप तेजी से नतीजे पर पहुंचें, अप्टन जब यह कह रहे थे, तब वे किसी भी बिंदु पर धोनी का जिक्र नहीं कर रहे थे, लेकिन इस कौंध से बच पाना मुश्किल है कि उन पर यह बात कितनी फिट बैठती है. वे कहते हैं, ''मैंने कुछ साइकोपैथ के साथ काम किया है. मैंने मानसिक दमखम के तथाकथित गुण उनमें देखे हैं, जो मैदान पर नतीजे देने में मदद करते हैं. मैंने देखा है कि प्रशंसक, दोस्त और मीडिया किस तरह इन लोगों को पूजते है. लेकिन मैंने यह भी देखा कि जब उनका मानसिक दमखम विक्षिप्त व्यवहार के तौर पर बेनकाब कर दिया जाता है तब यह कैसा दिखता है."

इससे पहले कि यह धोनी पर आलोचकीय हमले की तरह मालूम दे, उन्होंने जो विरासत छोड़ी है, उन्होंने जो सिस्टम बनाया है, उस पर विचार कीजिए:

➦ भारतीय टीम में जगह बना रहा एक नौजवान आज भारतीय क्रिकेटर के बारे में दुनिया की बनाई छवि में फिट होने का कोई दबाव महसूस नहीं करता: हार्दिक पंड्या को देखिए, जिस तरह वह खेलता है, जिस तरह वह बर्ताव करता है, जिस तरह वह अपनी सार्वजनिक जिंदगी जीता है.

➦ शिखर की तरफ बढ़ रहा होनहार नौजवान व्यवस्था चलाने वाले बड़े लोगों की जी-हुजूरी की जरूरत महसूस नहीं करता: विराट कोहली को देखिए, जिस तरह कोच और चयनकर्ताओं, प्रशासकों और मीडिया के साथ उनका रिश्ता है.

➦ अपने इतिहास और भूगोल की जंजीरें तोडऩे का अभिलाषी नौजवान मेज पर अपना आसन ग्रहण करने के न्यौते का इंतजार नहीं करता: जसप्रीत बुमराह को देखिए, जिस तरह उसने गुमनामी से सबसे भयभीत करने वाले तेज गेंदबाज बनने तक के सफर में अपनी पहचान कायम रखी है.

धोनी और उससे ज्यादा धोनी के बिंदु या सार की विरासत यह है कि वह बंधे-बंधाए सांचे में फिट होने के लिए क्रिकेट में नहीं आया था. बल्कि उन्होंने अपने इर्दगिर्द के माहौल पर खुद को थोपा, अपनी सोच को एजेंडा तय करने वाले दिमागों में प्रत्यारोपित किया और भारतीय क्रिकेट को अपने आगमन के वक्त के मुकाबले बेहतर जगह बनाकर छोड़ गए.

जब तेंडुलकर ने संन्यास लिया, देश ने अपने को जज्बाती अतिरंजना में जकड़ा पाया था. जब धोनी रुखसत हुए, वैसे ही बगल के दरवाजे से जिससे वे अंदर दाखिल हुए थे, कइयों को खामोश कृतज्ञता में खड़ा होना ही चाहिए. अगर तेंडुलकर ने अंदर आने के लिए एक दरवाजा खोला था, तो धोनी ने उसे दूसरों में से बेहतरीन के लिए उनके नक्शेकदम पर चलने की खातिर अधखुला ही छोड़ दिया. 

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