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बिसात पर उतरा नन्हा उस्ताद

महज 15 की उम्र में निहाल सरीन ने हासिल की शतरंज में ऐसी महारत कि उसे हरा पाना बड़े बड़ों के लिए हुआ मुश्किल

सैकत पॉल गेट्टी इमेजेज सैकत पॉल गेट्टी इमेजेज

चेसबेस इंडिया ने एक वीडियो अपलोड किया था जिसमें उस वक्त महज 11 साल के निहाल सरीन को शतरंज की एक पहेली हल करते दिखाया गया था. तमाम संभावनाओं पर गौर करते हुए वे पलक झपकते ही सटीक जवाब सामने रख देते हैं कोई चेसबोर्ड सामने नहीं; निहाल ने सब कुछ अपने दिमाग में हल किया था.

अब 15 के हो चुके निहाल फेडरेशन इंटरनेशनाल डिस चेक (एफआइडीई/फिडे) की रेटिंग लिस्ट में एलो 2600 अंक पार करने वाले दुनिया के तीसरे सबसे युवा और भारत के सबसे युवा खिलाड़ी बन गए हैं. पिछले साल नवंबर में उन्होंने कोलकाता में टाटा स्टील रैपिड चेस टूर्नामेंट में भारत के नंबर एक और पूर्व विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद के खिलाफ ड्रॉ खेला था. वे कबूलते हैं कि यह योजना के मुताबिक नहीं हो सका था.

''मैं मुकाबला करना, पूरा गेम खेलना और हो सके तो जीतना चाहता था. मिडिल गेम के बाद मौका मिला, जब वे थोड़ी-सी गलत चालें चलने लगे. पर मैं इसका फायदा उठाने में नाकाम रहा और फिर रक्षात्मक ही खेला.''

महान खिलाड़ी के सामने हालांकि वे आदर और श्रद्धा से भरे थे पर गेम खत्म होते ही नेपथ्य में उन्होंने आनंद के दिमाग को समझना शुरू कर दिया. सीखने की यही अदम्य भूख निहाल को आगे बढ़ाती है. यह उनमें तभी से है जब उन्होंने कोट्टयम के अपने घर पर दादा के खिलाफ पहला गेम खेला था.

उनके शुरुआती कोच में से एक निर्मल ई.पी.—उस वक्त राज्य चैंपियन—पहली बार 2012 में उनके स्कूल में उनसे मिले थे. निर्मल याद करते हैं, ''वह बहुत तेज था और उसके चेहरे पर जीनियस के हाव-भाव स्पष्ट थे.'' वे 2014 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में मिले स्वर्ण पदक को, जिसने उसे अंडर-10 विश्व चैंपियन बनाया, उसकी ब्रेक देने वाली जीत मानते हैं. उस वक्त तक वह ''कभी न बैठने वाले लड़के'' की प्रतिष्ठा हासिल कर चुका था. निहाल कहते हैं, ''टहलते वक्त या उसके बाद मैं बेहतर सोच पाता हूं. मुमकिन है इससे मेरे विरोधी थोड़ा डर जाते हों.''

वक्त के साथ उनके जज्बात शांत हुए हैं, हालांकि सोच और पैनी हुई है. इसका संकेत पिछले साल वर्ल्ड ब्लिट्ज चैंपियनशिप में मिला, जहां वे आखिरी दौर के बाद आनंद, शखरियार मैमेद्यारोव और बोरिस गेलफैंड सरीखे तजुर्बेकारों से आगे रहे.

निहाल की टीम के अंग प्रियदर्शन बंजन कहते हैं, ''वह भले आपसे बात कर रहा हो,  कुछ खा रहा हो या बैडमिंटन खेल रहा हो, उसके दिमाग में शतरंज ही चल रहा होता है.'' पर एक प्रतिद्वंद्वी छोटी बहन नेहा से आज भी उसे पसीने छूट जाते हैं. निहाल के शब्दों में, ''ऐसा इसलिए क्योंकि वह कभी हारती ही नहीं—बस मोहरे चंपत हो जाते हैं.''

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