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अरमानों की राह पर

परंपरावादियों का मानना है कि महिला आइपीएल शुरू करने की जल्दबाजी से अनावश्यक दबाव बनेगा

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आनंद वसु, मेलबर्न में

आठ मार्च रविवार की वह रात भारतीय महिला क्रिकेट के लिए बेहद अहम थी. पर जीत धोखा दे गई क्योंकि प्रतिद्वंद्वी ऑस्ट्रेलियाई टीम हर पहलू से मुकाबले में कहीं भारी पड़ी. मजे की बात, हरमनप्रीत कौर की कप्तानी में भारतीय टीम फाइनल तक एक भी मुकाबला नहीं हारी थी पर आइसीसी ट्वेंटी-20 विश्व कप में उनका अपराजित अभियान मेग लैनिंग की टीम के सामने पूरी तरह बिखर गया. महिला क्रिकेट के इस मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने पांचवीं बार चैंपियनशिप जीती.

भारतीय क्रिकेटप्रेमियों और टीम के लिए यह हार फिलहाल गहरी निराशा भरी हो सकती है. अपनी शानदार बल्लेबाजी से सभी का दिल जीत लेने वालीं भारत की उभरती 16 वर्षीया बल्लेबाज शेफाली वर्मा इस हार के बाद अपने आंसू नहीं रोक पाईं. वह दृश्य भारतीयों को लंबे समय तक याद रहेगा. पर महिला क्रिकेट के लिए यह सचमुच एक बड़ा झटका था. अगर वह यह चैंपियनशिप जीत जाती तो भारतीय महिला क्रिकेट टीम को उन सारी सुविधाओं और संसाधनों की झड़ी लग सकती थी, जिनसे भविष्य की चैंपियन तैयार हों.

अभी हाल तक महिला क्रिकेट टीम को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) से पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाती थीं. खेल बस कामचलाऊ ढंग से खेला जा रहा था, कोचिंग का स्टाफ भी स्थायी नहीं होता था. महिला क्रिकेटरों को पुरुषों के मुकाबले नाममात्र की सुविधाएं मिल पाती थीं. उनके मैच दिखाए जाने की तो बात ही छोडि़ए.

इसकी वजह यह सुनने को मिलती थी कि महिला क्रिकेट के लिए दर्शक नहीं होते. यह भी वजह बताई जाती थी कि महिला क्रिकेट की रक्रतार सुस्त होती है, बल्लेबाजी में दम नहीं होता, तेज गेंदबाजी में भी खास रफ्तार नहीं होती. इन सब वजहों से महिला क्रिकेट का बाजार कभी भी बड़ा नहीं बन सकता था. लेकिन ट्वेंटी-20 क्रिकेट के आने के साथ यह धारणा टूटने लगी है और एक युवा भारतीय टीम खड़ी हो गई है—इस विश्व कप में भारतीय महिला खिलाडिय़ों की औसत उम्र 22.8 वर्ष थी और इनमें से चार तो किशोर उम्र की लड़कियां थीं.

विश्व कप की इस प्रतियोगिता में बहुत रोमांचक क्रिकेट देखने को मिला और दर्शकों की संख्या भी पहले के मुकाबले अच्छी-खासी थी. इस टूर्नामेंट से पहले ऑस्ट्रेलिया के मैदान में महिला क्रिकेट मैच के दर्शकों की रिकॉर्ड संक्चया 7,000 से भी कम थी. लेकिन इस बार फाइनल मैच में मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में दर्शकों की संख्या 87,164 तक पहुंच गई. और मैदान में मौजूद लोग इसकी गवाही दे सकते हैं कि पिछले साल लॉर्ड्स के मैदान में पुरुषों के विश्व कप के मुकाबले यहां का माहौल कहीं ज्यादा रोमांच से भरा हुआ था. मैदान से बाहर टेलीविजन, सोशल मीडिया और वेबसाइटों पर भी महिला विश्व कप ने दर्शकों की संख्या का सारा रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया था. युवा बल्लेबाज शेफाली वर्मा ने दर्शकों को इतना अधिक प्रभावित किया कि पेप्सी ने उन्हें अपने उत्पाद के लिए चुन लिया.

कुछ वक्त से आइपीएल का महिला संस्करण शुरू करने की मांग की जा रही है. ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में सफल महिला लीग मैचों ने उनकी खिलाडिय़ों को बहुत फायदा पहुंचाया है. बड़े मुकाबलों में खेलने का मौका देना और कठिन परिस्थितियों में दबाव झेलने का अनुभव बहुत अहम होता है. लेकिन भारत में इस दिशा में अब तक बेहद मामूली कदम उठाए गए हैं. आइपीएल प्लेऑफ में महिलाओं के प्रदर्शनी मैच ही होते हैं. विश्व कप में जीत से महिला क्रिकेट का आइपीएल किए जाने की जरूरत को बल मिलता, जिसकी वकालत अब सुनील गावस्कर जैसे दिग्गज भी कर रहे हैं. हाल ही में उन्होंने कहा था कि महिला आइपीएल से प्रतिभाएं छांटने में मदद मिलेगी.

लेकिन महिला क्रिकेट से निकटता से जुड़े कुछ लोगों को इस समय ऐसा कोई टूर्नामेंट शुरू किए जाने में बहुत संभावना नहीं दिखती. अगर हर टीम में चार विदेशी महिला खिलाडिय़ों को भी शामिल कर लिया जाए तो भी बमुश्किल तीन स्तरीय टीमें ही बनाई जा सकती हैं. परंपरावादी ढंग से सोचने वालों का मानना है कि किसी तरह की जल्दबाजी से महिला क्रिकेट पर अनावश्यक दबाव पैदा होगा, जिससे उनके खेल का विकास रुक सकता है.

अगले कुछेक वर्षों में भारत में वाकई स्वतंत्र रूप से महिला आइपीएल कराना मुमकिन हो सकता है. लेकिन इसके लिए निचले स्तर पर काम शुरू किए जाने की जरूरत होगी ताकि ऐसी खिलाडिय़ों के आधार को मजबूत किया जा सके जो गंभीरता से खेल को अपनाएं. उन खिलाडिय़ों का ज्यादा सशक्तिकरण करना होगा जो इस खेल को पेशेवर तरीके से खेलना चाहती हैं और पूरा समय देना चाहती हैं. तेज रोशनी से भरे मैदान में उतारने से पहले उनको पूरा सहयोग और उनकी प्रतिभा को निखारे जाने की जरूरत है.

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