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अब कांग्रेस यहां से जाए तो जाए कहां?

नेताओं के टूटकर जाने और सत्तारूढ़ भाजपा के हमलावर रुख से कांग्रेस आज से अधिक पस्त कभी नहीं दिखी, आखिर यह मर्ज है क्या? हमारे विशेषज्ञ पैनल और पार्टी दिग्गजों की राय.

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प्र. क्या कांग्रेस पार्टी खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी है या वह फिर जी उठेगी?

शशि थरूर

मैं इससे इनकार नहीं करता कि 2019 हमारे लिए एक सदमे जैसा था—हम सभी बहुत बेहतर करने की उम्मीद कर रहे थे. इसकी कई वजहें थीं. मसलन, उत्तर भारत में, हम चुनावी मुद्दे के रूप में मतदाताओं के मानस पर राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रभाव का सही आकलन (पुलवामा हमले और बालाकोट स्ट्राइक के बाद) नहीं कर पाए. बढ़ती बेरोजगारी और नोटबंदी जैसी आर्थिक समस्याओं से पैदा नाराजगी को गांवों में शुरू हुई 'छोटी परियोजनाओं’ ने कम करने में मदद की.

हमें भाजपा को बेहतर चुनाव अभियान चलाने का श्रेय भी देना चाहिए, जिससे वह अपनी स्पष्ट नाकामियों से लोगों का ध्यान हटाने में सफल रही. लेकिन हमने वापसी की और आधा दर्जन राज्य विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया, जहां हम चुनाव जीत गए या बहुत करीब पहुंच गए. आपसी कलह के कारण कर्नाटक और मध्य प्रदेश में हमारी सरकारें चली गईं और राजस्थान में सरकार अस्थिर-सी हो गई है, वह दर्शाता है कि भाजपा की बेशुमार दौलत की ताकत और नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के आगे हमें खुद को एकजुट रख पाने में मुश्किलें पेश आ रही है. हमें इन सबसे सबक लेना है.

क्रिस्टोफ जैफरलो

पार्टी अतीत में भी कई बार मुश्किल दौर से गुजरी है. तकरीबन आधे राज्यों में, कांग्रेस या तो सत्ता में है या फिर भाजपा की मुख्य विपक्षी पार्टी है. हकीकत यह भी है कि भाजपा ने 2017 के बाद से अपने दम पर कोई राज्य चुनाव नहीं जीता है. मतदाता भाजपा का कोई विकल्प खोजते हैं, तो कई राज्यों में वे कांग्रेस की ओर रुख करेंगे. घना होता मौजूदा आर्थिक संकट लोगों को हर हाल में विकल्प तलाशने को बाध्य करेगा. इसलिए, मैं नहीं समझता कि कांग्रेस खत्म हो रही है.

सलमान खुर्शीद

राजनीति में इसका कोई मायने नहीं कि आप क्या हैं, मायने यह रखता है कि लोग आपकी बातों को किस तरह लेते हैं. राजनीति आपसी संवाद का मामला है. ऐसे समय आते हैं जब लोगों को आपके विचार नहीं जमते. फिर आपको कड़ी मेहनत करनी होती है और अपनी रणनीति में सुधार और बदलाव करने पड़ते हैं. नए सिरे से सोचना-समझना पड़ता है. ब्रिटेन में लेबर पार्टी से लेकर यूरोप में सोशलिस्ट वामपंथी पार्टियों को और समय-समय पर अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट पार्टी के साथ, ऐसा दुनियाभर में हुआ है. वक्त बदलेगा तो आपकी किस्मत फिर से चमक उठेगी. यह चक्र लगातार चलता रहता है.

पवन कुमार वर्मा

पार्टी के हालिया राजनैतिक गिरावट को 'खत्म होना’ नहीं कहा जा सकता है. हमने कई उदाहरण देखे हैं जब कई पार्टियों के बारे में लगा कि अब उनका वजूद ही मिट चुका है, वे फिर से उठ खड़ी हुईं. 1984 में, कांग्रेस की शानदार जीत के बाद, भाजपा संसद में दो सीटों पर सिमट गई. लेकिन आज पार्टी के पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत है.

तरुण गोगोई

कांग्रेस के साथ कुछ परेशानियां आई हैं लेकिन हम मजबूत क्षेत्रीय नेताओं को उभारकर उन परेशानियों को दूर कर सकते हैं. जब तक हमारे पास बूथ स्तर तक मजबूत आधार नहीं तैयार होता है, हम खोई जमीन वापस नहीं ले पाएंगे. देश की राजनीति का कायदा बदल गया है, यह अब उद्योग की तरह है जहां अपने विचारों को बेचने के लिए शानदार पैकेजिंग और दमदार मार्केटिंग की आवश्यकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी शुरुआत की; उन्होंने पारंपरिक और सोशल मीडिया, दोनों का उपयोग किया.

सुधींद्र कुलकर्णी

कांग्रेस को गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन इसे खत्म होना तो नहीं कहा जाएगा. यह पार्टी खुद को पुनर्जीवित कर सकती है. भारत जैसे जीवंत बहुदलीय लोकतंत्र में, हर राजनैतिक दल की किस्मत में उतार-चढ़ाव के दौर आते रहते हैं. कोई भी पार्टी हमेशा शीर्ष पर (कांग्रेस खुद एक अच्छा उदाहरण है) या सबसे नीचे (भारतीय जनसंघ और भाजपा अच्छे उदाहरण हैं) नहीं रह सकती. भाजपा 1984 में लोकसभा में केवल दो सीटें जीती थीं.

यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी भी हार गए थे. हालांकि भाजपा ने बाद में शानदार बढ़त हासिल की, लेकिन 2004 और 2009 में फिर से उलटफेर हुआ. इसलिए, कांग्रेस को खत्म न मानें और न ही यह मानकर चलें कि मोदी और अमित शाह के भाजपा की सत्ता में उतनी लंबी पारी होने वाली है, जैसी 1947 के बाद कांग्रेस की रही.

मनीष तिवारी

देश भर में कांग्रेस की ताकत में क्रमिक ह्रास धर्मनिरपेक्ष ताकतों के पतन का हिस्सा है जो चार दशक पहले हुआ और उस पर कभी ढंग से ध्यान नहीं दिया गया. इसकी शुरुआत 1967 में तमिलनाडु को गंवाने के साथ हुई, 1977 में पश्चिम बंगाल के नुक्सान के साथ यह तेज हो गया, फिर 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा के नुक्सान के साथ यह बहुत अधिक बढ़ गया. ये ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस फिर कभी नहीं लौटी. फिर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे अन्य राज्य भी हैं, जहां पार्टी 10-15 वर्षों तक सत्ता से बाहर थी, लेकिन फिर से जीत हासिल करने में सफल रही.

1990 के दशक की शुरुआत से हम गुजरात में सत्ता से बाहर हैं—बीच में दो साल के लिए गठबंधन की सरकार को छोड़कर—फिर भी वहां जमीनी स्तर पर हमारी अभी भी मजबूत उपस्थिति है. इससे पहले, जब भी हम कोई चुनाव हारते थे, तब उसके कारणों पर गहन और कठोर समीक्षा हुआ करती थी ताकि गलतियां सुधारी जा सकें. हालांकि, 2014 और 2019 के चुनावों में हार के बाद पार्टी ने न जाने क्यों पुराना अभ्यास नहीं दोहराया. हमें इस बात पर आत्ममंथन करने की जरूरत है कि कौन-सी चीज पार्टी को नुक्सान पहुंचा रही है और वे सुधार लागू करने होंगे जिससे कांग्रेस 2024 में मजबूत व्यावहारिक चुनौती के रूप में सामने आए.

महेश रंगराजन

यह गिरावट भौगोलिक और सामाजिक दोनों लिहाज से गंभीर है. 1980 के दशक के अंत तक गंगा घाटी हाथ से फिसल गई थी. दक्षिण में, विशेष रूप से तेलुगुभाषी क्षेत्रों में पंगु होती जा रही है. दलित और अल्पसंख्यक बहुत पहले राज्यों के उन अन्य दलों के साथ चले गए जहां वे कांग्रेस के व्यावहारिक विकल्प बने. और अब कांग्रेस को युवाओं और बढ़ते मध्यम वर्ग के बीच संकट का सामना करना पड़ रहा है. किसी भी पार्टी को समाप्त नहीं कहा जा सकता है, लेकिन कांग्रेस को अपने विचारों के संकट को दूर करना होगा. राज्य स्तर के परिणाम, लगभग 150 लोकसभा सीटों के बराबर क्षेत्रों में, यह दिखाते हैं कि यह उन लोगों को जोड़ सकती है जिनकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. कांग्रेस जब भी सत्ता से बाहर हुई, इसी तरह से वापसी की है, सबसे चर्चित 1980 की वापसी है.

अधीररंजन चौधरी

हालांकि हमारी संगठनात्मक शक्ति कमी आई है, लेकिन हमें ऐसे शासन का आक्रमण झेलना पड़ा है जिसका एकमात्र उद्देश्य 'कांग्रेस-मुक्त’ भारत बनाना है. कांग्रेस ने इस तरह की आक्रामकता पहले कभी नहीं देखी. हमारी पार्टी एक स्वैच्छिक संगठन है और जहां बहुत-सी विचारधाराओं को समाहित किया जाता है. कैडर-आधारित राजनैतिक संगठन के रूप में भाजपा इससे एकदम उलट है जो कांग्रेस को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. उसके लिए यह एक राजनैतिक संघर्ष नहीं, एक युद्ध है जिसकी कोई हद नहीं है.

2014 में, मोदी ऐसे शुभंकर समझे जाते थे जो कुछ गलत कर ही नहीं सकता. अब उनको कई सवालों के जवाब देने हैं. इसीलिए प्रधानमंत्री में मीडिया का सामना करने का साहस नहीं है. और मीडिया मोदी का भरपूर बचाव कर रहा है लेकिन राहुल गांधी ने लगातार पीएम की गलतियों को उजागर किया है. एक समय आएगा जब मोदी की कहानियों से लोग ऊब जाएंगे. कांग्रेस को उस पल का इंतजार करना होगा जब भाजपा सरकार की अक्षमता खुलकर सामने आ जाएगी.

जोया हसन

2014 और 2019 में कांग्रेस को दो बड़ी हार का सामना करना पड़ा. एक के बाद एक राज्यों से पार्टी की सरकार जाती रही और भाजपा, जो लोगों के सामने एकमात्र विकल्प के रूप में दिखती थी, खासकर उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत में, राज्य उसके हाथ से जाते रहे. यूपी में यह लगभग विलुप्त हो चुकी है, बिहार में लगभग गैर-मौजूद है, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा और ओडिशा में इसका जनाधार भाजपा या किसी क्षेत्रीय दल ने हड़प लिया है. पिछले एक दशक के चुनावी रुझान कांग्रेस की यही संक्षिप्त रूपरेखा दर्शाते हैं.

हालांकि, कांग्रेस के पतन का इतिहास काफी पुराना 1980 के दशक से ही है. 2004 के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की जीत अस्थायी राहत थी. इस राजनैतिक पुनरुद्धार (2004-09) ने भविष्य की इसकी दीर्घकालिक गिरावट को कुछ वक्त के लिए थाम लिया था. लेकिन मौजूदा संकट अभूतपूर्व है. 2019 में अप्रत्याशित हार के बाद से कांग्रेस नेतृत्व के मुद्दे को हल करने में असमर्थ रही है और स्थितियां जटिल हो रही हैं.

रणदीप सुरजेवाला

जिसे कई लोग कांग्रेस के संकट के रूप में देख रहे हैं वास्तव में वह भारत में लोकतंत्र और शासन प्रणाली के लिए गहरा संकट है. मोदी-शाह की जोड़ी ने लोकतंत्र पर एक शातिर, शैतानी हमला किया है और देश में पार्टी प्रणाली, बहुमत के जनादेश और विधायी प्रक्रियाओं को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है. जब हम उन राज्यों में कांग्रेस के बहुमत गंवाने की बात करते हैं जहां जनता ने हमें चुना है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमने बहुमत गंवाया क्योंकि हमारे बहुमत को धनबल और प्रवर्तन निदेशालय, आयकर और सीबीआइ के रूप में सरकार की शक्ति के बेशर्म उपयोग से खरीद लिया गया. हर किसी को यह सोचना होगा कि भारत में लोकतंत्र कैसे बचेगा. संसदीय लोकतंत्र के सर्वनाश के सामने जो आखिरी दीवार खड़ी मिलेगी, वह कांग्रेस है. हमने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया है और लोकतंत्र पर इस हमले से लडऩे के लिए दृढ़ संकल्प हैं.

सुहास पलशिकर

ह्रास की शुरुआत 1989 में हुई और 2014 के बाद का समय तो शायद पार्टी के लिए सबसे खराब रहा है. कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों में हमेशा से ही अपनी जमीन को फिर से पाने की क्षमता है, लेकिन क्या कांग्रेस खुद को पुनर्जीवित करने में सफल होगी, यह वास्तव में उसके उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगा.

‘‘राजनीति में इसका कोई मायने नहीं कि आप क्या हैं, मायने यह रखता है कि लोग आपकी बातों को किस तरह लेते हैं. वक्त के साथ किस्मत फिर चमक उठेगी. यह चक्र चलता रहता है’’

—सलमान खुर्शीद

‘‘किसी पार्टी को खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन कांग्रेस को विचारों के संकट से उबरने के लिए मिशन की भावना फिर से जगानी होगी’’

—महेश रंगराजन

प्र. आपकी नजर में कांग्रेस ने अपना जनाधार इतना क्यों गंवा दिया?

क्रिस्टोफ जैफरलो

ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस का गठन एक सर्वसम्मति की पार्टी की तरह किया गया था. यही कारण है कि पहली नेहरू सरकार में आपको सभी प्रकार के लोग मिलेंगे. उसमें हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे तो बाबा साहेब आंबेडकर भी थे.

हर तरह के लोगों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी बने रहना 1990 के दशक में मुश्किल हो गया जब देश में जाति (मंडल के बाद) और धर्म (अयोध्या मुद्दा) के आधार पर दो तरह का बंटवारा साफ-साफ दिखने लगा था. कांग्रेस ने दलित वोट बसपा, ओबीसी वोट सपा और राजद के हाथों, और हिंदू राष्ट्रवादी वोट भाजपा के हाथों गंवा दिया. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद, कुछ मुस्लिम वोट सपा, राजद और अन्य दलों की ओर चले गए. कांग्रेस इससे कभी उबर नहीं पाई, लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार ने विकास के बूते मध्यम वर्ग को खुश रखा और मनरेगा जैसी योजनाओं के जरिए गरीबों का दिल जीता.

दूसरे, कांग्रेस कैडर-आधारित पार्टी नहीं है. उसमें स्थानीय नेताओं और क्षेत्रपों का बोलबाला है. ये ताकतवर क्षत्रप अपने विधायकों और (कई बार) सांसदों के बूते गुट बना लेते रहे हैं. ये गुट विचारधारा नहीं, बल्कि क्षत्रपों की टकराहट के आधार पर बंटे थे. वे अब भी यही करते हैं. यह कार्यशैली तब बड़ी कमजोरी बन गई, जब कांग्रेस का सामना संघ परिवार और कैडर-आधारित भाजपा के दुर्जेय चुनावी मशीन से हुआ.

सलमान खुर्शीद

जब भी आपके सितारे गर्दिश में होते हैं, आपका वजूद खत्म होने की भविष्यवाणियां की जाने लगती हैं. कुछ लोग सोचते हैं कि हमें वैचारिक रूप से बदलने की जरूरत है. मैं और कई दूसरे मानते हैं कि कांग्रेस वैचारिक रूप से सुदृढ़ है. समय-समय पर कुछ रणनीतिक बदलाव आवश्यक हो सकते हैं लेकिन कांग्रेस के बुनियादी मूल्य—उदार, वामपंथ की ओर झुका मध्यमार्ग, कमजोर आर्थिक वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा, सभी के लिए समान अवसर और एक समावेशी समाज—आज भी प्रासंगिक हैं.

पवन कुमार वर्मा

कांग्रेस ने अधिकांश लोगों का प्रतिनिधित्व करना बंद कर दिया है और यह वंशवाद की ओर झुकी दिखती है. जब पार्टी बनी थी तब यह विभिन्न तरह के विचारों का समन्वय करने वाली हुआ करती थी. इसका वैचारिक आधार लोकतंत्र था (पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र सहित), सभी धर्मों के प्रति सम्मान के साथ समावेशी भारत का विचार और सबको बराबर आर्थिक विकास का वादा था. ये विचार बौद्धिक विपन्नता और वंशवादी एकाधिकार के आगे धराशाई हो चुके हैं.

तरूण गोगोई

कांग्रेस बदलती परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने में असमर्थ रही है. हमें नई रणनीति की जरूरत है. पार्टी इस पर विचार कर रही है. हमें ऐसे प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की भी सख्त आवश्यकता है, जिन्हें हमारी विचारधारा में पूरा विश्वास हो. कांग्रेस कैडर-आधारित आरएसएस और भाजपा के विपरीत, एक जनाधार वाली पार्टी रही है. हमें कांग्रेस का एक प्रतिबद्ध कैडर बनाने के लिए आरएसएस के रास्ते पर चलना होगा.

सुधींद्र कुलकर्णी

कांग्रेस का समर्थन आधार सैद्धांतिक रूप से सिकुड़ गया है क्योंक आज यह तीन संकटों—नेतृत्व, संगठन और विचार—से ग्रस्त है. इसकी समस्याएं 1969 में शुरू हुईं जब पार्टी में विभाजन हो गया. उस विभाजन के बाद कांग्रेस का चरित्र बुनियादी रूप से बदल गया. भले ही इंदिरा गांधी के करिश्माई नेतृत्व के कारण कुछ समय के लिए राजनीति में मजबूत पकड़ बनी रही, लेकिन पार्टी इंदिरा के जीवनकाल में और उनकी दुखद मौत के बाद—नेतृत्व के लिए विशेष रूप से नेहरू-गांधी परिवार पर ही निर्भर रही.

इसने पार्टी संगठन को कमजोर कर दिया, राज्यों में मजबूत जन नेताओं के उदय को रोक दिया और केंद्र में नेताओं का उदय तो बहुत ही कम हो गया. इसका समावेशी सामाजिक आधार क्षेत्रीय दलों की पहचान की राजनीति और भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में बंट गया. यूपीए-2 के बाद, नई पीढ़ी के दिल और दिमाग में अपनी जगह बनाने में इसकी नाकामी जाहिर हो गई. मोदी ने कांग्रेस की इन सभी पुरानी कमजोरियों का फायदा उठाया और कांग्रेस आज ऐसी स्थिति में पहुंच गई है.

अधीररंजन चौधरी

भाजपा सरकार के प्रायोजित मीडिया का एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस पार्टी की छवि बिगाडऩा और उसको लेकर भ्रांतियां फैलाना रह गया है. हमारा राजनैतिक संगठन इस समय इतना मजबूत नहीं रह गया है कि हम अपने नेतृत्व के विचारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का काम कर सकें. हम निश्चित रूप से एक अस्तित्व के संकट से गुजर रहे हैं. लेकिन यह दौर बदलते ही स्थितियां दूसरी हो सकती हैं. इसलिए लोगों के बीच हमें अपना संदेश पहुंचाने की जरूरत है.

सुहास पलशिकर

कांग्रेस परंपरागत रूप से एक 'समावेशी’ पार्टी रही है लेकिन धीरे-धीरे वह समाज के विभिन्न वर्गों का समर्थन खोती गई है. 1971 में इंदिरा गांधी का दुस्साहस की हद तक की गई कोशिश एक अपवाद थी, लेकिन पार्टी ने इमरजेंसी के बाद नए सिरे से अपने गठन का काम बंद कर दिया. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अपना जनाधार मजबूत करने का पार्टी के पास दूसरा अवसर आया, लेकिन राजीव गांधी कांग्रेस में नई जान फूंकने में विफल रहे.

उनकी हत्या के बाद, जब पार्टी का नेतृत्व 'गांधी परिवार’ से अलग हो गया था, तब कांग्रेस फिर से खुद को मजबूत कर सकती थी लेकिन उसमें वह नाकाम रही. सोनिया गांधी के नेतृत्व के बारे में भी यही सच है. उन्होंने वास्तव में एक नई पार्टी बनाने की जगह केवल पार्टी के भीतर की विभिन्न ताकतों को संतुलित रखने पर ही जोर दिया.

प्र. क्या पार्टी खुद को नए सिरे से ईजाद कर सकती है? इसके लिए क्या करना होगा?

शशि थरूर

नए सिरे से ईजाद करने की तो उतनी जरूरत नहीं है, लेकिन नई जान फूंकने की जरूरत है. वह भी इस आधार पर कि हम जिन मूल्यों के पक्ष में खड़े हैं उन्हें फिर जोरदार ढंग से कहें, पार्टी संगठन में उन जगहों पर जोश भरें जहां वह कमजोर हो गया है, सभी स्तरों पर साफ और निर्णायक नेतृत्व, नए चेहरे और रचनात्मक विचार लाएं, और कुछ संस्थागत सुधार. पार्टी पहले भी कई बार पूरे दमखम से जोरशोर से लौटी है, सही फोकस के साथ वह फिर ऐसा कर सकती है—क्योंकि देश को विश्वसनीय राष्ट्रीय विकल्प की जरूरत है और केवल कांग्रेस ही यह दे सकती है.

क्रिस्टोफ जैफरलो

भारतीय राजनीति के नियम-कायदे बदल रहे हैं. ये उन पार्टियों के अनुकूल नहीं हैं जो सत्ता से बाहर हैं. कांग्रेस अपनी स्थानीय जड़ें क्षेत्रीय और पहचान-आधारित पार्टियों के हाथों गंवा चुकी है. भारत में राजनीति फिलहाल निष्पक्ष और बराबरी के खेल का मैदान नहीं है. मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, कुछेक अपवाद जरूर हैं. चुनाव अभियानों में धन बड़ी भूमिका अदा करता है. 2019 में भाजपा ने करीब 3.5 अरब डॉलर खर्च किए, कांग्रेस से तीन गुना ज्यादा. न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता गंवा रही है. चुनाव आयोग ने टी.एन. शेषन के दौरान जो ताकत हासिल कर ली थी, वह उसे गंवा चुका है. सीबीआइ का भी यही हाल है...

इस परिदृश्य में कांग्रेस नंबर एक निशाना है. सत्ताधारी पार्टी का खुल्लमखुल्ला मकसद 'कांग्रेस मुक्त भारत’ है, जिसका अर्थ है कि सबसे बड़ा विपक्षी दल विरोधी नहीं, बल्कि दुश्मन है. यह वह बदलाव है जो आप लोकप्रियतावाद से अधिनायकवाद की तरफ बढ़ती ज्यादातर राजनैतिक व्यवस्थाओं में देखते हैं. आज कांग्रेस बंद गली के आखिरी मुहाने पर है और उसकी बहाली का सबसे अच्छा रास्ता चुनावी प्रतिस्पर्धा शायद नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन का रास्ता है. अगर कांग्रेस फिर जनांदोलन बनना चाहती है, तो उसे गरीबों—जिनकी तादाद आने वाले महीनों में बढ़ेगी—के हितों को उठाना होगा.

सलमान खुर्शीद

मैं लंबे समय से कहता रहा हूं कि लोकतंत्र किस्सागोई का खेल है. पहले कांग्रेस में कुछ शानदार किस्सागो थे. दुखद यह है कि हाल के वर्षों में हमने किस्सागोई को महत्व नहीं दिया है. फिर सड़कों पर पार्टी की ताकत की बात है. एक वक्त था जब कांग्रेस जनधारणा के मामलों में देश की सड़कों पर राज करती थी. हमें फिर लोगों के दिमाग में संदेश पहुंचाना होगा. यहीं किस्सागोई अहम हो जाती है. जब आप अच्छी किस्सागोई में नाकाम हो जाते हैं, तो दूसरे कमान संभाल लेते हैं. लेकिन अगर आपकी कहानी दूसरों की कहानी से बेहतर है—और मैं मानता हूं कि कांग्रेस की कहानी है—तो लोग आज नहीं तो कल आपके पास लौट आएंगे. हम एक बार फिर लोगों के दिल और दिमाग जीतेंगे.

संगठन भी बहुत अहम है. 1977 में जब जनता पार्टी सरकार सत्ता में आई, उसके पास संगठन नहीं था. वह इसलिए सत्ता में आई क्योंकि उसकी कहानी उस वक्त बहुत जोरदार थी. इसी तरह भाजपा का एक संगठन है जो हमें बताया जाता है कि हर जगह मजबूत है. दूसरी जगहों की तरह दिल्ली में भी उसका संगठन मजबूत रहा होगा. फिर भी वह जीत नहीं सकी, क्योंकि आम आदमी पार्टी (आप) की कहानी ज्यादा जोरदार थी. इसीलिए मैं कहता हूं कि संगठन कहानी के पीछे चलता है, न कि कहानी संगठन के पीछे चलती है. इसके बाद भी, कांग्रेस को विचार करना चाहिए कि मजबूत संगठन खड़ा करना हमारे लिए मुश्किल क्यों हो रहा है.

नेता किस तरह पैदा होते हैं और किस तरह गायब हो जाते हैं, इसका वास्ता भी बहुत कुछ किस्सागोई के साथ है. लेकिन पहले हमें साथ मिलकर बैठना होगा और कहानी गढऩी होगी, पार्टी के भीतर कहानी लिखने की कला सीखनी होगी और फिर भरोसा दिलाने वाले ढंग से उसे देश को सुनाना होगा.

पवन कुमार वर्मा

हां, कांग्रेस कर सकती है. लेकिन उसके लिए कई बातें जरूरी है. नेतृत्व में बदलाव होना ही चाहिए. पार्टी के प्रतिभावान नेताओं को साथ आना चाहिए और बदलाव की योजना तैयार करनी चाहिए. नई कांग्रेस कार्यसमिति का चुनाव होना चाहिए. बिल्कुल जमीन से शुरू करके संगठन के ढांचे को राज्यवार मजबूत करने पर ध्यान देना होगा. प्रभावी गठबंधन करने होंगे. सबसे अच्छी आवाजें मीडिया में दिखाई देनी चाहिए. विचारधारा को छोटे-मोटे हेरफेर के साथ असरदार बनाना होगा. मसलन, धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता के साथ-साथ वोट बैंक की राजनीति की खातिर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के खिलाफ दो-टूक रवैया अख्तियार करना होगा.

तरुण गोगोई

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने ऐसी स्थिति का सामना किया है या उसके नेताओं पर हमले हो रहे हैं. इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी पार्टी के भीतर भी अलग-थलग पड़ गई थीं, कांग्रेस कार्यकर्ता उनसे मिलना तक नहीं चाहते थे. असम आंदोलन जब चरम पर था, राज्य के लोगों ने कांग्रेस का बहिष्कार कर दिया था. लोगों की तीखी प्रतिक्रिया की वजह से मैं अपने भाई की शादी तक में शामिल नहीं हो सका था. तिस पर भी असम के उन्हीं लोगों ने 15 साल बाद मुझे फिर राज्य का मुख्यमंत्री बनाया. कांग्रेस की जड़ें मजबूत हैं—कोई तूफान भी उसे नहीं उखाड़ सकता.

सुधींद्र कुलकर्णी

खुद को नए सिरे से ईजाद करने के लिए कांग्रेस को पहले बताए गए तीन संकटों से उबरना होगा. सबसे ऊपर उसे खुद में नई जान फूंकने के लिए केवल या मुख्य रूप से मोदी सरकार की कई नाकामियों को आधार नहीं बनाना चाहिए. बल्कि उसे अपने पुनरोद्धार पर ध्यान देना होगा. इसके लिए उसे निर्ममता और ईमानदारी से अपने भीतर झांकना होगा और देखना होगा कि पार्टी के साथ गड़बड़ी कहां-कहां हुई है.

इस आलोचना से किसी को भी बख्शा नहीं जाना चाहिए, जिसके बाद निश्चय ही संगठन के लिहाज से खुद में सुधार लाना होगा. उसके नेतृत्व को तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, वाइएसआर कांग्रेस और दूसरी समान विचारों वाली पार्टियों को मातृ संगठन में लाकर कांग्रेस परिवार को फिर से एक करने की पहल करनी चाहिए.

लेकिन केवल यही सब काफी नहीं होगा. लोकतंत्र को चौतरफा नया बनाने के लिए देश में जनांदोलन की जरूरत है. कई तरीकों से हमारा लोकतंत्र कमजोर कर दिया गया है, हमारा विकास बदसूरत रहा है और हमारा राजकाज संवैधानिक मूल्यों से बंधा नहीं रह गया है. कांग्रेस इस विशाल राष्ट्रीय मंथन का अग्रणी हिस्सा बनकर ही अपना जोशो-खरोश फिर हासिल कर सकती है और प्रतिबद्ध युवा नेताओं की नई फसल खड़ी कर सकती है.

हम भूल न जाएं कि जनसंघ केवल अपने दम पर कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सका था. दो जनांदोलनों ने उसके उत्थान में मदद की थी: जयप्रकाश नारायण की अगुआई में इमरजेंसी विरोधी जनांदोलन और लालकृष्ण आडवाणी की अगुआई में अयोध्या आंदोलन. बेशक उसके पास वाजपेयी सरीखे कद्दावर नेता भी थे, जिनकी समावेशी राष्ट्रीय अपील थी. कांग्रेस उसी रास्ते पर नहीं चल सकती. उसे अपना रास्ता खुद गढऩा होगा जो आज की जरूरतों और स्थितियों के माकूल हो और देश के अपने खास विचार से मेल खाता हो.

मनीष तिवारी

निष्पक्ष चुनाव अधिकारी की देखरेख में संगठन के चुनाव वक्त की जरूरत हैं. शीर्ष पर स्थिरता विपक्ष की एकजुटता में चुंबक का काम करेगी. देश में राजकाज की गंभीर कमी है. आज देश की समस्या सरकार नहीं है. उसकी साख तार-तार हो चुकी है, मगर सक्षम विपक्ष नदारद है. लोग चाहते हैं कि सुसंगत विपक्ष साथ आए और मुद्दों तथा विचारधारा पर सरकार को चुनौती दे. अगर विपक्षी पार्टियां इस मुकाम पर खुद को असरदार ढंग से तैयार और पेश नहीं करतीं, तो इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा.

अधीररंजन चौधरी

इस वक्त भी 'भाजपा का विरोध’ मजबूती से कांग्रेस ही कर रही है. राहुल गांधी मोदी सरकार के खिलाफ बोलने वाली अकेली आवाज हैं. यही वजह है कि केंद्रीय मंत्रियों सहित भाजपा उनकी हर बात पर हमला बोल देती है.

जोया हसन

कांग्रेस की तीन बड़ी चुनौतियां हैं, वह ऐसी राजनैतिक कशमकश में, जो सांस्कृतिक सिद्धांतकार स्टुअर्ट हॉल का मुहावरा उधार लेकर कहें तो 'द ग्रेट मूविंग राइट शो’ या चलते-फिरते विराट दक्षिणपंथी तमाशे और उससे पैदा ध्रुवीकरण से तय हो रही है. उसे ऐसे नेता पर राजी होना या उसे चुनना होगा जो कांग्रेस को एकजुट रख सके; तमाम राज्यों में अपने संगठन के ढांचे को नए सिरे से खड़ा करना होगा; और भाजपा के बरअक्स दो-टूक वैकल्पिक अफसाना पेश करना होगा. पार्टी के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए उसे ठीक इसी वक्त तीन चीजें करने की जरूरत है—नया अध्यक्ष नियुक्त करे; नई कांग्रेस कार्यकारिणी नियुक्त करे; अपनी राज्य इकाइयों और नेताओं को मजबूत करे. नए अध्यक्ष और सीडब्ल्यूसी की नियुक्ति चुनावों के माध्यम से करनी होंगी, नामजदगी के जरिए नहीं.

रणदीप सुरजेवाला

बिल्कुल. कांग्रेस निरंतर विकसित होती संस्था है. उसने अपनी नीतियां और सिद्धांत हमेशा बदलते वक्त की जरूरतों के हिसाब से बदले हैं. मसलन, लाइसेंस राज और घरेलू उद्योगों के संरक्षण से हटकर 1991 में हमने उदारीकरण को अपनाया. कांग्रेस जब लडख़ड़ाकर गिरी, उसने फिर से खड़ा होना, चलना और फिर दौडऩा सीखा. पार्टी खुद को नए सिरे से ईजाद करेगी, जैसे उसने 2004 के चुनाव की तैयारी के वक्त किया था.

सुहास पलशिकर

पार्टी को बहुसंख्यक पहचान/अल्पसंख्यकों को संरक्षण, उदार अर्थव्यवस्था/निष्पक्ष वितरण और जाति के सवाल सरीखे मुद्दों पर नए नजरिए से सोचना है. पार्टी ने पिछले 10 साल में इनमें से कुछ मुद्दों पर सोचा तक नहीं है.

प्र. क्या गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस का काम चल सकता है?

शशि थरूर

नेहरू-गांधी परिवार की कांग्रेस सदस्यों के दिलों में खास जगह है और उसकी अच्छी वजह भी है. महान विरासत के अलावा उन्होंने अपने शानदार पुरखों का उत्तराधिकार हासिल किया है, वे तमाम किस्म के समूहों, विचारधाराओं, इलाकों और समुदायों को लगातार एक साथ लाए और यही सब मिलकर कांग्रेस पार्टी का ताना-बाना बुनते हैं. पार्टी की अगुआई करते हुए उनकी सफलता और अनुभव का साफ-सुथरा रिकॉर्ड है, जब सरकार में थे तब भी और गर्दिश के मुश्किल दिनों में भी, जब वे कांग्रेस की महिलाओं और पुरुषों को एक साथ इकट्ठा रखने में कामयाब रहे.

पार्टी के लिए उन्होंने जो कुछ हासिल किया उसकी अहमियत को—या परिवार के दो पूर्व पार्टी अध्यक्षों के अंतिम बलिदान को—हमें भूलना नहीं चाहिए. साथ ही, उनकी अगुआई के जरिए पार्टी एक के बाद एक कई पीढिय़ों के दौरान केंद्र में भी और राज्यों में भी जोशीले नेताओं की मजबूत फसल उगाने में कामयाब रही. ये ऐसे पुरुष और महिलाएं हैं जो मजबूत नेतृत्व प्रदान करते हैं और जिन्होंने पार्टी को आगे ले जाने के लिए अथक और असरदार काम किया है. राहुल गांधी का 2014 के चुनाव का नारा याद है, 'मैं नहीं, हम’. पार्टी को नेहरू-गांधी विरासत से दूर किए बगैर उस तंत्र को मजबूत बनाना, जिसमें ऐसे नेता फल-फूल पाते हैं, कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए आगे का सबसे अच्छा रास्ता होगा.

क्रिस्टोफ जैफरलो

कभी चल नहीं सका. 1990 के दशक में पार्टी के नेता सोनिया गांधी के नेतृत्व देने के लिए लालायित थे. आखिरकार उन्होंने नेतृत्व संभाला और पार्टी को छोड़कर चले गए गुटों के नेता वापस आ गए—शरद पवार को छोड़कर. राष्ट्रीय स्तर पर और राज्य स्तर पर गुटबाजी को बेअसर करने के लिए गांधी परिवार की जरूरत है, लेकिन राज्य स्तर पर इसे हासिल कर पाना ज्यादा मुश्किल है.

पी.वी. नरसिंह राव वह कतई नहीं कर सकते थे, जो सोनिया ने किया. मगर यह कोई रामबाण दवा नहीं है. एक बार फिर, यह जरूरी शर्त है, लेकिन यही काफी नहीं है, क्योंकि शीर्ष नेता को उसकी वैधता का इस्तेमाल इस तरह करना होता है कि पार्टी में हर कोई महसूस करे कि वह सम्मानित है और पार्टी के पास एक योजना, एक रणनीति है. मौजूदा परिप्रेक्ष्य में केवल चुनाव लडऩे के लिए ही नहीं, बल्कि कांग्रेस की गांधीवादी जड़ों की तरफ लौटने के लिए पार्टी को दिशा देना शायद सबसे अच्छा तरीका हो सकता है.

सलमान खुर्शीद

क्या गांधी परिवार के आलोचक गारंटी दे सकते हैं कि हम उनके बगैर जिंदा रहेंगे? कल अगर हम गांधी परिवार को छोड़ दें और पार्टी भरभराकर धराशायी हो जाए, तो यही लोग हम पर अपनी सबसे बड़ी संपत्ति को छोड़ देने का आरोप लगाएंगे. यह जज्बे और जुनून का मामला है और हमारा जज्बा और जुनून कहता है कि आज जिस रूप में हम कांग्रेस को जानते हैं, उसमें सबसे अहम गांधी परिवार है. मेरा और पार्टी में बहुत से लोगों का उनमें भरपूर भरोसा है.

पवन कुमार वर्मा

इसमें कोई शक नहीं. मगर कांग्रेस के असरदार नेताओं को बदलाव की स्थिति को परिपक्वता के साथ संभालने की जरूरत होगी. खतरा यह है कि कई सारी निजी महत्वाकांक्षाएं पार्टी का अपहरण कर सकती हैं. लेकिन नेतृत्व में कोई भी बदलाव, यहां तक कि रचनात्मक अस्थिरता का एक दौर भी, आज जो हालत है उससे बेहतर होगा.

तरुण गोगोई

जो लोग पार्टी में नई जान फूंकने की रणनीति के तौर पर गांधी परिवार की विदाई की वकालत करते हैं, उन्हें यह भी समझना होगा कि आरएसएस हमेशा नेहरू-गांधी परिवार पर ही हमले क्यों करता रहा है. अगर राहुल गांधी इतने ही अप्रासंगिक हैं, तो संघ परिवार उनकी हर बात पर हमला क्यों करता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें गांधी परिवार की ताकत और कांग्रेस पार्टी में जोशो-खरोश फूंकने में उनकी भूमिका का एहसास है. गांधी परिवार को बदनाम करने का अभियान इसलिए मजबूत होता रहा है क्योंकि कांग्रेस चुनावी तौर पर बैकफुट पर है. गांधी परिवार से ही कांग्रेस आज जिंदा है.

सुधींद्र कुलकर्णी

अपने विकास के मौजूदा दौर में कांग्रेस का काम गांधी परिवार के बगैर नहीं चल सकता. लेकिन पार्टी को अपने में नई जान फूंकने के लिए लंबे समय का विजन और मिशन तैयार करना चाहिए, जिसमें वह गांधी परिवार के नेतृत्व पर निर्भर न रहे. फिलहाल कांग्रेस पार्टी के लिए नेहरू-गांधी परिवार कमजोरी और ताकत दोनों है. परिवार पार्टी के लिए बेहद जरूरी है. लेकिन देश के लिए यह गैर-जरूरी हो चुका है.

मनीष तिवारी

कांग्रेस का यह आंतरिक यथार्थ है और टीका-टिप्पणी बाहरी है. आंतरिक यथार्थ यह है कि देश भर में कांग्रेस के कार्यकर्ता आज भी गांधी परिवार के साथ खुद को जोड़ पाते हैं. वे टीका-टिप्पणियां करने वाले बाहरी हैं जिनकी राय है कि कांग्रेस को परिवार से आगे बढऩा ही चाहिए. 1991 और 1998 के दौरान कोई गांधी कांग्रेस का हिस्सा नहीं था. पिछले 21 साल में कोई गांधी किसी सरकार का हिस्सा नहीं रहा.

1998 में सीताराम केसरी की अध्यक्षता के दौरान, जब कांग्रेस ध्वस्त होने लगी और नेता थोक के भाव रुखसत होने लगे, केवल तभी सोनिया गांधी ने पार्टी का कमान संभाली. उनकी अगुआई में हमने दो बार केंद्र में सरकार बनाई. 2019 में अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस के सामने तीन विकल्प हैं. पहला, पार्टी पूर्णकालिक अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी की तस्दीक कर सकती है; दूसरे, राहुल गांधी वापस आ सकते हैं क्योंकि वे पांच साल (2022 तक) के लिए चुने गए थे; तीसरे, कांग्रेस अध्यक्ष पद और कांग्रेस कार्यकारिणी का चुनाव करवा सकती है.

इस अनिश्चितता को खत्म होना ही होगा. पार्टी संविधान के अनुच्छेद 18 (एच) के मुताबिक, अब गेंद एआइसीसी के पाले में है. अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद कार्यकारिणी का मैंडेट खत्म हो गया. समाधान नेहरू-गांधी की अध्यक्षता, कार्यकारिणी के चुनाव, कांग्रेस संसदीय बोर्ड की बहाली और संगठन के गहरे सुधारों में है. यह ऐसा शख्स कह रहा है जो पिछले 39 साल से पार्टी में सक्रिय तौर पर जुड़ा रहा है.

महेश रंगराजन

यह विशाल पर्वत पर चढऩे की तरह मालूम देता है. करीब 2011-12 तक परिवार का एक प्रमुख सदस्य मुख्य सहारे की भूमिका अदा करता था और इस नाते पार्टी और उसकी भूमिका को नए सिरे से ईजाद करता, नए सिरे से उसकी स्थिति तय करता था. 1971 में यह इंदिरा गांधी ने किया, गरीबों की पार्टी के तौर पर, और फिर 1980 में, ऐसी पार्टी के तौर पर जो स्थिरता की नुमाइंदगी करती थी. नेताओं की नई पीढ़ी विकसित करने वाले आखिरी शख्स संजय गांधी थे, गौर कीजिए कितने सारे प्रमुख नेता उनके दिनों के हैं.

आज भाई-बहन राहुल और पहली बार प्रियंका की एक साथ मौजूदगी नई प्रतिभाओं का गला घोंट रही है. पार्टी बच सकती है, यहां तक कि फल-फूल भी सकती है, लेकिन साफ-सुथरा बदलवा बेहद अहम है. उसे खुद अपने किस्म का राष्ट्रवाद और आर्थिक एजेंडा गढऩा होगा. मोदी ने 'भारत के मजबूत रक्षक’ का तमगा छीन लिया है और 2016 से ही लक्ष्यबद्ध कल्याण योजनाएं भी हड़प ली हैं. ये दोनों—देशभक्ति और दबे-कुचलों की परवाह—इंदिरा गांधी के नेतृत्व की बानगी हुआ करते थे. 1967 के बाद वे अकेली नेता थीं जिन्होंने तीन आम चुनाव जीते.

अतीत में अहम क्षणों में राजनैतिक समीकरणों के नए सिरे से गढऩे में परिवार का कोई सदस्य बेहद अहम हुआ करता था. हालिया वक्त में 2003-4 में राज्यों में खुद अपने मुख्यमंत्रियों और दूसरी ताकतों से मेलजोल के साथ यह सोनिया गांधी थीं. अगर परिवार का कोई व्यक्ति इसमें माहिर न हो, तो क्या दूसरे को मौका दिया जाएगा? ईमानदारी से कहें तो हम नहीं जानते.

अधीर रंजन चौधरी

जो लोग हमें गांधी परिवार से आगे बढऩे की सलाह देते हैं, उन्हें यह हमें उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त योग्य विकल्प भी बताना चाहिए. कटु सत्य यह है कि हमारे पास ऐसा कोई भी नहीं है जो उनकी जगह ले सके. और यह सभी पार्टियों के बारे में सच है—क्या भाजपा मोदी और उनके डिप्टी शाह को बदल सकती है? शख्सियत राजनीति में हमेशा बेहद अहम भूमिका अदा करती है. हमारी पार्टी में सबसे करिश्माई नेता गांधी परिवार से आते हैं.

जोया हसन

एक के बाद एक दो पराजयों ने चुनाव जीतने की गांधी परिवार की क्षमता को लेकर गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं, जिससे सुझाव दिए जाने लगे हैं कि कांग्रेस को नए चेहरे की दरकार है. इस मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर सर्वसम्मत राय नहीं है, लेकिन मीडिया में सर्वसम्मत राय है कि नेहरू-गांधी परिवार को कांग्रेस की जगह खाली कर ही देनी चाहिए और जब तक ऐसा नहीं होता भाजपा के खिलाफ लड़ाई परवान नहीं चढ़ सकेगी.

गांधी परिवार की सीमाओं पर नजर डालना एक फंतासी जैसा है. हकीकत यह है कि उनकी जगह लेने के लिए नए नेता उभरकर नहीं आए हैं. कुछेक मुख्यमंत्रियों को छोड़कर दूसरी कतार का नेतृत्व पूरी तरह नामजद है. यह तब भी साफ था जब 2019 में पार्टी की शिकस्त की जिम्मेदारी स्वीकार करके राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया था. किसी भी नेता में इतना आत्मविश्वास या पार्टी में समर्थन हासिल नहीं था कि अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी तक पेश कर पाता. अगर वे गांधी परिवार से मुकाबला नहीं कर सकते तो हम उनसे नरेंद्र मोदी और आरएसएस की राजनैतिक मशीन की ताकत का मुकाबला करने की उक्वमीद कैसे कर सकते हैं.

रणदीप सुरजेवाला

गांधी परिवार के सदस्य देश के लोगों के लोकप्रिय समर्थन के बल पर सत्ता में आए. इसे परिवार की हुकूमत कहना उन लाखों मतदाताओं का अपमान है जिन्होंने उन्हें चुना. अगर गांधी परिवार बुनियाद का पत्थर है, जो 99 फीसद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के जबरदस्त समर्थन की बदौलत पार्टी को एकजुट रखता है, तो कांग्रेस में भाजपा के घुसाए लोग, जो लुटियंस दिल्ली के उदारवादी होने का दावा करते हैं, पार्टी की दिशा, नीति या नेतृत्व तय नहीं कर सकते.

सुहास पलशिकर

फिलहाल पार्टी के पास राष्ट्रीय पहुंच और बहुत-से राज्यों में जनाधार वाला कोई नेता नहीं है. लिहाजा, गांधी परिवार अपरिहार्य नजर आता है. हालांकि यह सच है कि गांधी परिवार के एक न एक सदस्य के अगुआ होने के चलते दूसरे नेताओं का बढऩा रुक गया और यह पार्टी के ऊपर परिवार के नियंत्रण का सचमुच बुरा पहलू है. साथ ही, शीर्ष पद पर गांधी परिवार के सदस्य के पैराशूट से उतरकर बैठ जाने की प्रवृत्ति भी पार्टी की मदद नहीं करती.

सोनिया गांधी को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष बनने के लिए कतई राजी नहीं होना चाहिए था—और अब भी उनकी तरफ से साफ संकेत दिया जाना जरूरी है कि वे गठबंधन की संयोजक बनने के लिए तो तैयार हैं लेकिन पार्टी की अध्यक्ष नहीं. राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष थे और नाकाम रहे. इस लिहाज से तो उन्हें पार्टी के कई नेताओं में से एक होना चाहिए, जबकि अभी तक वे अकेले कांग्रेस नेता हैं जो अखिल भारतीय समर्थन और छवि का आभास देते हैं और अगर वे अध्यक्ष नहीं भी रहे तब भी उनकी भूमिका प्रमुख होगी.

इन दो संभावनाओं के मंद पडऩे के बाद प्रियंका की तरफ मुडऩे से परिवार की हताश जी-हुजूरी का संकेत मिलता है. खुद गांधी परिवार की तरफ से यह नियंत्रण बनाए रखने की पहले से तय त्वरित प्रतिक्रिया का संकेत है. इसके बाद भी कांग्रेस के बाहर के लोग नेतृत्व के सवाल को बहुत आदर्शवादी ढंग से देखते हैं; आखिरकार यह पार्टी ही है जिसे इस पहेली को हल करना है और अच्छा तो यह हो कि खुली बहस के जरिए तय करे. यहां पार्टी का वजूद ही दांव पर लगा है और उन्हें वह सब करना चाहिए जिससे पार्टी फिर उतनी ही ताकत से उभरकर आ सके. लेकिन यह करना तो कांग्रेसियों को ही पड़ेगा.

प्र. (क) क्या आपकी राय में देश में भाजपा के विरुद्ध वैचारिक मोर्चे की दरकार है?

(ख) ऐसे विरोधी मोर्चे का अगर कांग्रेस नहीं, तो कौन-सी पार्टी सूत्रधार बन सकती है?

शशि थरूर

हमारी विचारधारा कोई समस्या नहीं है. मेरा पक्का मानना है कि कांग्रेस के जो मूल्य हैं और देश के सामने जो विचार वह रखती है, वह देश के भविष्य के लिए बुनियादी जरूरत है. हम भारत-विचार के वैकल्पिक नजरिए का प्रतिनिधित्व करते हैं, ऐसा समावेशी और बहुलतावादी नजरिया, जिसमें देश की आत्मा की सच्ची भावना बोलती है. हम अपने सिद्धांतों और मूल्यों को छोडऩा बर्दाश्त नहीं कर सकते. मैं पहले भी कह चुका हूं कि 'भाजपा जैसी’ बनने की कोशश में सिर्फ 'कांग्रेस शून्य’ ही हाथ लगेगा.

अगर ढंग से प्रचार-प्रसार किया जाए तो आज भी किसी समावेशी और प्रगतिशील पार्टी की विचारधारा की अपील व्यापक असरकारी है, जो अपनी बुनावट में उदार और मध्यमार्गी हो, जो सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध हो, जो राष्ट्रीय सुरक्षा की रखवाली और इनसानी सुरक्षा को प्रश्रय देने के प्रति पन्न्की देशभक्त हो. हम यह संदेश पहुंचाने में केरल, पंजाब, छत्तीसगढ़ और अन्य जगहों पर कामयाब रहे हैं. हमें भाजपा के विकृत, धर्मांध और तंग नजरिए वाले भारत-विचार के लिए मैदान खुला नहीं छोड़ देना चाहिए.

क्रिस्टोफ जैफरलो

लोकतंत्र में विपक्ष की जरूरत है. और महज वही विपक्ष मायने रखता है, जिसका आधार विचार हो. इकलौती कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है, जिसके राष्ट्रीय नेताओं ने कभी जनसंघ और भाजपा के साथ काम नहीं किया है. अब सवाल है कि भारत में लोकतंत्र के लिए कैसे वैचारिक विपक्ष की दरकार है? यकीनन, भाजपा का उलटा ही सबसे भरोसेमंद होगा, यानी धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, बहुसांस्कृतिक भाषाई नीतियां, किसानों की रक्षा, मुट्ठी भर सरमाएदारों के बरअक्स छोटे-मझोले (एसएमई) उद्योगों को बढ़ावा, गरीबों के हक में कराधान (ताकि पेट्रोल की कीमतें मुनासिब हों) वगैरह जैसी नीतियां और कार्यक्रम जरूरी हैं. ये कार्यक्रम कुछ हद तक 2019 के कांग्रेस के चुनाव घोषणा-पत्र में थे भी, जिसे किसी ने नहीं पढ़ा.

आज भी कांग्रेस ही इकलौती वाजिब देशव्यापी विकल्प है. आम आदमी पार्टी भी हो सकती थी, लेकिन केजरीवाल ने हाल के दिल्ली दंगों के दौरान भाजपा के साथ अपनी वैचारिक नजदीकी जाहिर की है. दरअसल, कांग्रेस पहले ही हाशिए की ताकतों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों को इकट्ठा करके साझा विपक्ष का मिलन-बिंदु बन चुकी है. समस्या यह है कि कांग्रेस के नेता इस गठजोड़ को विस्तार देने में नाकाम हैं.

एक तो, भारत की राजनीति का सांप्रदायिक तथा सत्तावादी रुझान और धमकाने के तौर-तरीके विपक्षी ताकतों को बेदम कर रहे हैं और उन्हें 'देशद्रोही’ बताकर बदनाम करते हैं. दूसरे, लोकतंत्र के पैरोकार आपस में तर्क-वितर्क करने में तभी तक माहिर हैं, जब तक उन्हें एहसास न हो कि वे साथ-साथ जेल जा सकते हैं. तीसरे, कांग्रेस को किसानों और दलितों के पैरोकारों के प्रिय मुद्दों पर अपना रुख साफ करने की दरकार है. चौथे, पार्टी को सामान्य जन को पार्टी में ज्यादा जगह देने का तंत्र कायम करने की जरूरत है. नई जमात के आने से कांग्रेस की दलितों, आदिवासियों, किसानों वगैरह में साख बढ़ेगी. यही तरीका है, जिससे कांग्रेस में जान फूंकी जा सकती है.

पवन कुमार वर्मा

लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है कि एक भरोसेमंद विपक्ष हो. उसका असलियत में अलग वैचारिक नजरिए का प्रतिनिधि होना भी जरूरी है. फिर उसे उसके प्रचार-प्रसार और उस पर अमल करने के काबिल होना चाहिए. अगर कांग्रेस मानती है कि वह अधिक लोकतांत्रिक, समावेशी और उदार विचारधारा रखती है, तो उसे बताना चाहिए कि कैसे. महज नारे दोहराने भर से मामला साफ नहीं होगा. महज विरोध के लिए विपक्ष कहलाने से बात नहीं बनेगी. उसे आगे बढ़कर अपना पक्ष रखना होगा.

यह सही है कि कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है, जिसकी देश भर में पहुंच है. जाहिर है, उसे ही राष्ट्रीय विपक्ष की छतरी होना चाहिए. ऐसी भूमिका अदा करने की संभावना वाली दूसरी एकमात्र आम आदमी पार्टी है. लेकिन लगता है कि उसने अपने को दिल्ली तक सीमित रखने का ठान लिया है और अपनी महत्वाकांक्षाएं सिकोड़ ली हैं.

सुधींद्र कुलकर्णी

वैचारिक मोर्चे पर कांग्रेस भारतीय संविधान के पांच स्तंभों-समावेशी राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, लोकतंत्र और सुशासन—की नई रचनात्मक व्याख्या करके अभी तक भाजपा की काट पेश करने में नाकाम रही है. वह इस मामले में भी कोई नया विचार नहीं पेश कर पाई है कि विदेश नीति के मोर्चे पर दो सबसे अहम समस्याओं—कश्मीर मुद्दे का समाधान करके पाकिस्तान से रिश्ते कैसे सामान्य किए जाएं और चीन से सीमा विवाद का हल कैसे ढूंढा जाए. पार्टी को देश के व्यापक राष्ट्रीय उत्थान के लिए अहम मुद्दों पर सकारात्मक एजेंडा तैयार करने की दरकार है. यह नई पेशकश के लिए बेहद जरूरी है.

कोई और दूसरी पार्टी ऐसी नहीं है जिसके इर्दगिर्द भाजपा का राष्ट्रीय विकल्प तैयार करने के लिए विपक्ष गोलबंद हो सकता है. कांग्रेस ही इकलौती पार्टी है जो भाजपा का पतन शुरू होने पर उसकी जगह ले सकती है. हमारा लोकतंत्र शासन के केंद्र में किसी राष्ट्रीय पार्टी के बगैर स्थायी नहीं हो सकता.

मनीष तिवारी

यकीनन, मगर मौजूदा हालात में कांग्रेस के लिए विचारधारा संबंधी चुनौतियां भी है, जिसे हल करने की जरूरत है. एक तो, हमें धर्मनिरपेक्षता पर ही अपना रुख साफ करने की जरूरत है. धर्मनिरपेक्षता संविधान निर्माताओं की देश के सामाजिक-राजनैतिक महौल में नायाब पेशबंदी है, जिन्हें यह एहसास शिद्दत से था कि खासकर भारत जैसे धार्मिक भावनाओं की प्रमुखता वाले देश में धर्मतंत्र और राज्य को अलग करना अनिवार्य है. कालक्रम में उनके वैचारिक वारिसों ने उसका अर्थ कुछ संकीर्ण से ''सर्व धर्म सम भाव’’ के रूप में किया.

पिछले कुछ दशकों ने हमें सिखाया है कि हम धर्मनिरपेक्षता को सभी धर्मों के पैरोकार की तरह परिभाषित करते हैं तो हम ऐसी फिसलन भरी उतराई में ढुलकने लगते हैं जहां ''उस वक्त के सत्ताधारी’’ अपनी पसंद के धर्म के मुताबिक राज्य की नीतियों और प्राथमिकताओं को ढालने लगते हैं. कांग्रेस को राष्ट्रवाद की अपनी अवधारणा की भी व्याख्या करनी चाहिए. पिछले छह साल से राष्ट्रवाद की हमारी परिभाषा यही रही है कि हम भाजपा के नजरिए के साथ नहीं हैं, जो राष्ट्रवाद का संकीर्ण, कट्टर और पितृसत्तात्मक नजरिया है.

बदकिस्मती से, आजादी की लड़ाई की अगुआ पार्टी राष्ट्रवाद के अपने ठोस नजरिए को साफ करने में सफल नहीं हो पाई है. आखिरी चुनौती हमें अपने सड़क पर मोर्चा लेने वाले तेवर और कार्यक्रमों की ओर लौटने की है. दुर्भाग्य से, 1991 के बाद से देश में जनांदोलन की राजनीति का अवसान होता गया है, अगर आरएसएस के समर्थन से 2011 के टीवी ड्रामे को नकार दें, जिसे आम बोलचाल में 'इंडिया एगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन कहा गया.

महेश रंगराजन

इसमें कतई संदेह नहीं कि खासकर मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भारत की समूची राजनीति और संस्कृति बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. हर लोकतंत्र में विपक्षी ताकत की दरकार होती है, जो महज एकाध सुधार या उसकी जगह लेने के लिए नहीं होती, बल्कि विकल्प भी मुहैया कराती है. कांग्रेस अपनी देश भर में मौजूदगी के इतिहास, अपने आकार और पिछले रिकॉर्ड से ऐसी भूमिका निभाने की नायाब स्थिति में है.

लेकिन उसे सिर्फ अपने तोतारटंत से आगे बढऩा होगा और लोगों के दैनिक जीवन को सांस्कृतिक और विचार संबंधी चुनौतियों से जोडऩा होगा. 'भारत पहले’ का विचार तो ठीक है लेकिन देश में वंचित या वंचित-सा महसूस करने वाले लोगों को सिर्फ समस्या समाधान नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें मुकम्मल सपना भी चाहिए, जिसकी बदौलत वे अपने विकास की परिभाषा गढ़ सकें. देश की विविधता, भाषाई और सांस्कृतिक तथा धार्मिक बहुलता और उसके संघीय चरित्र को किसी अव्वल पैरोकार की दरकार है. इसी तरह उसके लोकतांत्रिक संतुलन और मर्यादाओं का झंडा बुलंद करने वाले की भी जरूरत है, जो मौजूदा वन्न्त में बेहद असंतुलित है.

1990 के दशक के शुरू और आखिर में तीसरे मोर्चे का एक दौर था, लेकिन वह जिन खंभों पर खड़ा था, अब उनका अस्तित्व नहीं है. संघीय चरित्र की क्षेत्रीय ताकतें या वामपंथी और मंडल पार्टियां साथ आई थीं. कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार के एक दशक और मोदी के नेतृत्व में भाजपा के उभार ने उनकी जगह छोटी कर दी. कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय ताकतों का ढीलाढाला गठजोड़ ही आगे का रास्ता है.

विडंबना देखिए कि हम 1989 के पहले वाले दौर में लौट गए हैं, जब कोई बड़ी प्रभावी पार्टी नहीं थी. कहावत है कि एकाध शेर हाथी से नहीं टकरा सकता लेकिन शेरों का झुंड हाथी को पस्त कर सकता है. यह ध्यान में रखकर जब नए तरह की राजनैतिक गोलबंदी का माहौल तैयार होगा, तभी कोई बात बनेगी. ऐसी गोलबंदी की ऐतिहासिक कमजोरी नेतृत्व की रही है. वी.पी. सिंह और एच.डी. देवेगौड़ा ने कोशिश की थी, लेकिन अब नए ढांचे के नेता की दरकार है, जो आर्थिक सुधारों के दौर की नाकामियों और मंदी का रचनात्मक हल तलाशे. मैदान खुला है मगर कोई आगे बढ़कर मोर्चा लेने वाला जाहिर खिलाड़ी फिलहाल तो दिखाई नहीं देता है.

जोया हसन

पिछले छह साल से देश को निरंकुश सत्तावादी, हिंदू राष्ट्रवादी ढांचे में ढालने की सुनियोजित कोशिश चल रही है. संवैधानिक सरकार पर अंकुश रखने वाला संस्थागत तंत्र काफी कमजोर हो चुका है, उदार नियम-कायदे घटते गए हैं या कहें उन्हें कमजोरी की निशानी माना जाने लगा है और लोकतंत्र की बड़ी संस्थाओं में गहरी दलगत भावना प्रवेश कर गई है. राजनैतिक तौर पर भारतीय गणराज्य की बुनियाद पर बहुसंख्यकवादी राजनीति चोट कर रही है.

नागरिक (संशोधन) कानून, 2019, अयोध्या फैसला, अनुच्छेद 370 को निरस्त करना और जम्मू-कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में बांटकर केंद्रशासित प्रदेश बना देना, उस दिशा का साफ संकेत है कि भारत के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणतांत्रिक व्यवस्था को बहुसंख्यकवादी दिशा में मोड़ा जा रहा है. देश को इस एजेंडे की मजबूत वैचारिक आलोचना की जरूरत है. लेकिन एकजुटता, रणनीति और नेतृत्व के अभाव में विपक्ष वह वैचारिक काट पेश करने में सक्षम नहीं है, जिसकी आज शिद्दत से जरूरत है. यह नहीं कर पाने से ही मौजूदा सत्ता लगातार निरंकुश होती जा रही है.

इसमें दो राय नहीं कि भाजपा का मजबूती से विरोध करने वाली इकलौती पार्टी कांग्रेस है लेकिन जरूरी पैमाने पर वह विरोध नहीं कर पा रही है. हिंदुत्व के एजेंडे को चुनौती देने के लिए व्यापक राष्ट्रीय अफसाने की जरूरत है. कांग्रेस के पास चुनावी तंत्र इतना बड़ा नहीं है कि वह अकेले दम पर ऐसा कर पाए.

वह अपनी कमजोरियों से सिर्फ एक ही तरीके से पार पा सकती है कि वह दूसरे दलों के नेताओं को एक मंच पर लाए. यह भी तय है कि कांग्रेस की धुरी के बिना विपक्ष की एकजुटता संभव नहीं है. विपक्ष बुरी तरह बंटा हुआ है. हिंदी पट्टी में राज्यस्तरीय पार्टियों की जमीन खिसक गई है, 2019 के चुनावों में उनकी हार से साफ है कि मतदाताओं पर उनकी पकड़ ढीली हो गई है और ज्यादा से ज्यादा निचले तबके भाजपा के साथ जुड़ते जा रहे हैं. राज्यस्तरीय पार्टियां भाजपा का ठोस विकल्प नहीं हो सकती हैं. विपक्ष को कांग्रेस के इर्दगिर्द जुटना होगा क्योंकि वही इकलौती पार्टी है जिसकी देश भर में मौजूदगी है और अभी भी देश भर में 20 फीसद वोट रखती है.

रणदीप सुरजेवाला

मोदी-शाह जोड़ी के निरंकुश सत्तावादी हमले से सिर्फ संगठित और ठोस विचारधारा ही लड़ सकती है, जिसकी जड़ें कांग्रेस या उससे मिलती-जुलती विचारधारा की पार्टियों के भीतर विविध रूप में मौजूद है. बिना कांग्रेस के देश में किसी विचार, नजरिया या राजनैतिक ताकत के बारे में सोच पानाअसंभव है.

सुहास पलशिकर

जिस तरह प्रभावी ताकत के रूप में भाजपा का उभार हुआ, उससे यह बेहद जरूरी है कि उसके विरोध की राजनीति के नेतृत्व के लिए देशव्यापी विकल्प हो.

अगर कांग्रेस ऐसा नेतृत्व देने में नाकाम रहती है तो कोई राज्यस्तरीय पार्टी नेतृत्व कर सकती है और दूसरे उसकी कोशिश में सहयोग दें. राजनीति में शून्य नहीं रहता, और कांग्रेस अगर वह भूमिका निभाने में पीछे दिखती है तो नया राजनैतिक समीकरण उभरेगा.

प्र. क्या सिंधिया और पायलट जैसे युवा नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने/मोहभंग में कांग्रेस के लिए कोई सबक है?

शशि थरूर

बिल्कुल हैं, पर इन दो खास मामले से कोई सामान्य निष्कर्ष निकालना गलत होगा, जहां उनकी खास परिस्थितियों से जुड़ी वजहें प्रमुख रही होंगी. मीडिया ने इसे पूरी पार्टी में मोहभंग जैसी स्थिति का संकेत मान लिया. जो मैं अपने रोजाना की बातचीत में देख-सुन पा रहा हूं, मामला ऐसा नहीं है. फिर भी, सहयोग और परामर्श को बढ़ावा देने की जरूरत ऐसा सबक है, जो हमें सीखना होगा.

क्रिस्टोफ जैफरलो

सिंधिया परिवार हमेशा कांग्रेस और हिंदुत्ववादी ताकतों के बीच झूलता रहा है. कांग्रेस पहला सबक यही सीख रही है कि रजवाड़े खानदानों का अपना वोट बैंक है—हालांकि यह छीज रहा है—और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद पार्टियों के साथ सौदेबादी चलती है. कांग्रेस को अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करने की जरूरत है जो महज सत्ता के लिए नहीं, बल्कि किन्हीं और वजहों से सियासत में हैं. लेकिन एक सबक और है: बुजुर्ग नेताओं को युवा नेतृत्व के लिए जगह बनानी होगी—चाहे वे ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की तरह खानदानी हों या नहीं. इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ युवाओं को कुर्सी दी जाए, पर उनकी बात सुनी जाए और उनका सम्मान हो. यह अभी-अभी गुजरात में हुआ, जहां हार्दिक पटेल को महज 26 साल की उम्र में प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है!

सलमान खुर्शीद

यह युवा नेताओं का जाना नहीं है. यह बाहर जाने वालों का जाना है. इसका उम्र से कोई लेना-देना नहीं है. संजय सिंह और रीता बहुगुणा जैसे कई पुराने नेताओं ने भाजपा में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ी. उनमें कांग्रेस की विचारधारा को लेकर उत्साह नहीं था. सुविधा चली जाती है, विचारधारा भी गायब हो जाती है.

पवन कुमार वर्मा

हां, बिल्कुल है. पार्टी को टकरावों के प्रबंधन में थोड़ा बेहतर तरीका सीखना होगा. आलाकमान, जो बुनियादी तौर पर परिवार ही है, को इतना अधिक अलग-थलग और दूर नहीं होना चाहिए और अधिक सक्रिय होना चाहिए. जब पार्टी में युवा प्रतिभाओं के लिए उक्वमीद की किरणें कम हों, उनके ऊपर चढऩे या चुनावी कामयाबी का कोई रास्ता न हो, तो उक्वमीद भी खत्म हो जाती है. कांग्रेस खुद को नहीं गढ़ सकती तो अधिकाधिक प्रतिभाएं दूसरे विकल्पों की तलाश करेंगी.

तरुण गोगोई

सिंधिया जैसे नेताओं के बाहर जाने के पीछे प्रतिबद्धता की कमी रही है. इन युवाओं, जिनमें मेरा बेटा गौरव भी शामिल है, की वह रगड़ाई नहीं हुई है, कठिनाइयों से उनका वैसा सामना नहीं हुआ है, जैसा जमीनी कार्यकर्ताओं का होता है. फिर भी, उन्हें सरकार और पार्टी में महत्वपूर्ण पद दिए गए. इसलिए वे लोग राजनीति में धीरज की अहमियत नहीं समझते. उनकी अधीरता और वरिष्ठ नेताओं के प्रति उनके गुस्से से अधिक, मेरे लिए बड़ा झटका यह रहा कि वे भाजपा में चले गए, जो कांग्रेस के विचारों से उलट है.

मैं इससे भी इत्तफाक नहीं रखता कि यह कांग्रेस में बुजुर्ग बनाम युवा का मामला है. हेमंत बिस्वा सरमा की मिसाल लीजिए, मैंने उन्हें तब मंत्री बनाया था जब वे महज 33 साल के थे और मैंने वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी मोल लेकर भी हमेशा उनका साथ दिया. अब शायद वे भाजपा के बड़े नेता होंगे, लेकिन वे इससे इनकार नहीं कर सकते कि वे मेरे संरक्षण में फूले-फले. उन्हें बाकी युवा नेताओं की तरह अपनी बारी का इंतजार करना चाहिए था.

सुधींद्र कुलकर्णी

बेशक, कांग्रेस को फौरन अपने संकट प्रबंधन की क्षमता को दुरुस्त करना होगा.

मनीष तिवारी

पायलट मेरे मित्र हैं, लेकिन मुझे दुख है कि उन्होंने बचकाना बरताव किया है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ उनकी जो भी निजी दिन्न्कतें थीं, पर उसे सामने लाने के लिए उन्होंने गलत समय का चुनाव किया. जब चीन हमारे क्षेत्र में घुसा आ रहा है, देश एक महामारी से त्रस्त है और अर्थव्यवस्था ध्वस्त है, यह अपनी निजी आकांक्षाओं और पूर्वाग्रहों का वक्त नहीं था. पार्टी छोडऩे वाले लोग ऐसे हैं जिन्हें चीजें बहुत आसानी से हासिल हुई.

उन्हें कभी संगठन की चक्की में पिसने का कठोर अनुभव नहीं मिला. इसी वजह से उनके अंदर यह वैचारिक प्रतिबद्धता विकसित नहीं हो पाई जिससे आप हर रोज सुबह उठकर खुद से सवाल करते है: मैं कांग्रेस में क्यों हूं? अगर कोई कांग्रेस में कुर्सी के लोभ-लालच में है, तो पार्टी उसके बिना ही बेहतर है. सिंधिया, पायलट, प्रियंका चतुर्वेदी, अजय कुमार और प्रद्योत देवबर्मा इसकी मिसालें हैं. फिर भी, पार्टी को अपने अंदर झांकना होगा. अगर ऐसे लोग, जो बार-बार चुनाव हार रहे हैं और अपनी जमानत भी नहीं बचा पा रहे हैं और जिन राज्यों में वे पार्टी के चेहरे हैं वहां पार्टी को बरबाद कर रहे हैं, उन्हें ही आगे बढ़ाया जाएगा, तो इससे वैसे लोग हतोत्साहित होंगे जो यह मानते हैं कि पार्टी के पुनरुत्थान की कुंजी प्रतिभा है.

जोया हसन

कांग्रेस से लोकप्रिय नेताओं का जाना चिंता का विषय है. इन बगावतों के पीछे एक सामान्य किस्सा यह है कि पार्टी अब इन युवा नेताओं को बांधकर रखने में सक्षम नहीं है और इसका ठीकरा केंद्रीय नेतृत्व पर फोड़ दिया जाता है. जाहिर है, यह कहानी का एक हिस्सा है. लेकिन इनमें से कुछ युवा नेताओं को कांग्रेस ने ऊंचे पद दिए और फिर भी उन्होंने बगावत करने का रास्ता चुना, तो यह कहानी का दूसरा पहलू है जिसको नजरअंदाज कर दिया गया.

दरअसल जब कांग्रेस सत्ता में थी तब यह हितों के टकराव और महत्वाकांक्षाओं को संतुलित कर सकती थी लेकिन यह करना बेहद मुश्किल हो जाता है जब पार्टी विपक्ष में होती है. बहरहाल, राजस्थान संकट से जो एक सबक कांग्रेस सीख सकती है कि भाजपा निर्वाचित सरकार अस्थिर करने का कोई मौका नहीं चूकेगी, इसलिए आगे ऐसे मामलों से बचने के लिए अपना घर मजबूत करना होगा.

रणदीप सुरजेवाला

विपदा में लोग कम होते हैं और जीत बांटने वाले कई लोग होते हैं. किसी विचारधारा के साथ प्रतिबद्धता और सत्ता की भूख का अंतर देश में दिख रहा है. महत्वाकांक्षा ठीक है, लेकिन आगे बढऩे की इच्छा एक अतृप्त लालसा नहीं होनी चाहिए, जो उसी पेड़ को नुक्सान पहुंचाए जिस पर आप बैठे हैं. पार्टी मां की तरह होती है, और कई बार यह बलिदान मांगती है.

सुहास पलशिकर

पार्टी को या तो अखिल भारतीय कद का लोकप्रिय नेता पेश करना चाहिए जिससे पार्टी कार्यकर्ता जुड़ सकें या संघीय व्यवस्था की ओर मुडऩा चाहिए जिसमें प्रदेश इकाइयों को पर्याप्त स्वायत्ता मिले.

प्र. क्या कांग्रेस अपना लोकतंत्रीकरण कर सकती है? किस कीमत पर हो सकेगा ऐसा?

शशि थरूर

बिल्कुल कर सकती है. आज पार्टी का नेतृत्व करने वालों में कई लोग एक दौर में युवा कार्यकर्ता रहे हैं जो पार्टी में उपलब्ध लोकतांत्रिक रास्तों से ही ऊपर पहुंचे हैं. वही बात नई पीढ़ी के साथ हो सकती है. थोड़े-बहुत संस्थागत सुधार उपयोगी होंगे लेकिन उनके बारे में बात करने की सबसे अच्छी जगह पार्टी के भीतर है, मीडिया में नहीं.

क्रिस्टोफ जैफरलो

यह सवाल कांग्रेस के बारे में ही क्यों पूछें? कांग्रेस को अपना लोकतंत्रीकरण करना चाहिए, और पार्टी में चुनाव होना चाहिए. लेकिन यह चुनाव कैडर-आधारित पार्टियों जैसे कम्युनिस्ट पार्टियां और भाजपा की तरह नहीं होना चाहिए जहां एक पद के लिए एक ही उम्मीदवार होता है. प्रतिस्पर्धात्मक चुनावों से कांग्रेस उन सभी दलों से अलग बन सकेगी जो 'चापलूसों की भीड़ या 'पारिवारिक मामला’ बन गए हैं.

सलमान खुर्शीद

क्या भाजपा को लोकतंत्रीकरण की जरूरत नहीं है? शायद हम सभी को इसकी जरूरत है. हो सकता है कि समाजवादी पार्टी को एक ऐसे नेता की जरूरत हो जो मुलायम सिंह के परिवार से न हो. सीमित लोकतंत्र भारतीय राजनीति का स्वभाव है. लोग मुझे वोट नहीं देते, इसलिए नहीं कि उन्हें मेरी योग्यता पर भरोसा नहीं है, बल्कि इसलिए कि मैं उनके समुदाय का नहीं हूं. यही भारतीय राजनीति है. ऐसे लोग हैं जो इस बाधा को पार करते हैं और आशा की किरण इसी में निहित है. लेकिन कांग्रेस का विश्लेषण करने और दूसरों पर वही मापदंड न लागू करने से वास्तविकता नहीं लिखी जा सकती.

पवन कुमार वर्मा

कोई भी राजनैतिक दल ऐसा नहीं है जिसे सुधार की जरूरत न हो. कांग्रेस में तो है ही. उसमें लोकतंत्रीकरण का पहला कदम यह है कि गांधी परिवार के परंपरागत नेतृत्व पर सवाल उठाया जाए. बाकी सारी बातें इसके बाद आएंगी. ऐसा करने पर संक्रमणकालीन अव्यवस्था, यहां तक कि अराजकता भी हो सकती है, लेकिन एक प्रक्रिया शुरू हो जाएगी जो पार्टी को मजबूती की ओर ले जाएगी.

सुधींद्र कुलकर्णी

हां, अस्तित्व बनाए रखने और भविष्य के विकास के लिए, कांग्रेस को अपना लोकतंत्रीकरण करना होगा. हालांकि नेहरू-गांधी परिवार के साथ घनिष्ठ संबंध के बिना इसका लोकतंत्रीकरण संभव नहीं है. सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका वो गोंद हैं जो पार्टी को एक साथ बांधते हैं. मुझे स्पष्ट दिखता है कि राहुल जल्द ही फिर पार्टी अध्यक्ष बन जाएंगे. उन्हें दोहरी चुनौतियों का सामना करना होगा. एक, उन्हें कांग्रेस को मोदी और शाह के नेतृत्व वाली भाजपा का विश्वसनीय विकल्प बनाना होगा.

यह तभी हो सकता है जब मोदी सरकार की अनेक विफलताओं से देश को बचाने के आकर्षक कार्यक्रम के साथ कांग्रेस एक व्यापक नए राष्ट्रीय गठबंधन का मजबूत केंद्रीय हिस्सा बने. दूसरे, उन्हें खुद समेत सभी को यह समझाते हुए पार्टी का लोकतंत्रीकरण भी करना होगा कि कांग्रेस गांधी परिवार से बड़ी है. और, राहुल को यह सोचने की गलती भी नहीं करनी चाहिए कि इन दो कामों को करने के लिए उनके पास बहुत ज्यादा समय है. उन्हें यकीनन बड़ी चुनौती से मुकाबिल होना होगा.

जोया हसन

कांग्रेस को वंशवादी मॉडल से लोकतांत्रिक मॉडल में बदलने की जरूरत है. इसका एक रास्ता पार्टी चुनाव के माध्यम से निकलता है. कांग्रेस में 23 साल से चुनाव नहीं हुए हैं. भाजपा में भी अध्यक्ष पद के लिए या अन्य पदों के लिए दो या अधिक दावेदारों के साथ चुनाव नहीं हुए हैं, लेकिन भाजपा इस सवाल से बच सकती है क्योंकि उससे कोई जवाब नहीं मांगता. भाजपा के चुनाव हों या न हों, कांग्रेस के लिए अध्यक्ष, कांग्रेस कार्यसमिति, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के चुनाव कराना महत्वपूर्ण है. चुनाव इस पार्टी के 'पारिवारिक उद्यम’ होने की धारणा को बदलकर पार्टी को ताकत दे सकते हैं.

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