scorecardresearch
 

आवरण कथाः इस पार्टी को आखिर हुआ क्या है?

पार्टी लगातार रसातल की तरफ जा रही है, न गांधी परिवार के साथ कोई युक्ति काम कर पा रही है और न उनके बगैर. केंद्रीय नेतृत्व को कमजोर देख राज्यों के क्षत्रपों की हिम्मत बढ़ गई है, पार्टी का संगठन तहस-नहस है, उसके पास न तो भाजपा के चुनावी पैंतरों का जवाब है, न विभाजनकारी सियासी विमर्श का. भारत की सबसे पुरानी पार्टी के लिए तो क्या कोई उम्मीद बाकी है?

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी  सीडब्ल्यूसी के सदस्य राहुल और प्रियंका के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सीडब्ल्यूसी के सदस्य राहुल और प्रियंका के साथ

जरा सोचिए. मौजूदा लोकसभा में भाजपा के 303 सांसदों में से कम से कम 31 कांग्रेसी रहे हैं. 2015 और 2020 के बीच कोई 120 चुने हुए कांग्रेस विधायक पाला बदलकर भाजपा में चले गए. 2014 में मोदी की सुनामी ने पार्टी को 44 लोकसभा सदस्यों के अपने अब तक के सबसे निचले आंकड़े पर धकेल दिया; 2019 में वह इसमें महज आठ सीटों का मामूली इजाफा कर सकी.

2018 में उसने हिंदी पट्टी के जो तीन राज्य जीते, उनमें से मध्य प्रदेश ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उसके हाथ से निकल गया, राजस्थान और सचिन पायलट भी बाहर जाने के रास्ते पर कदमताल कर रहे हैं. 2019 में पार्टी कर्नाटक में अपने 13 विधायकों को इस्तीफा देने और कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) की सरकार गिरने से नहीं रोक पाई. 2017 में गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनावों में दोनों राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बाद भी पार्टी के आला नेताओं की हीलाहवाली और हिचकिचाहट के चलते भाजपा ने हार के जबड़ों से भी जीत निकाल ली.

बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने वाले महागठबंधन की धज्जियां उड़ चुकी हैं और नीतीश कुमार भाजपा खेमे में मजबूती से कायम हैं. 543 सदस्यीय लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें जिन पांच राज्यों—उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु—से आती हैं, उनमें कांग्रेस ने कुल 249 में से महज 12 सीटें जीतीं. इन पांच राज्यों की 1,462 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के पास महज 130 हैं. आंध्र प्रदेश, दिल्ली, त्रिपुरा, सिक्किम और नगालैंड में पार्टी का एक भी विधायक नहीं है.

फिर भी देश की यह सबसे पुरानी पार्टी किसी तरह घिसट रही है, मानो मूर्छा की हालत में हो. महाराष्ट्र में शरद पवार ने उसे उद्धव ठाकरे का समर्थन करने के लिए मनाया; राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बचाने के लिए वह अशोक गहलोत की राजनैतिक सूझबूझ के आसरे है. पार्टी अजीबोगरीब बेडिय़ों में जकड़ी हुई है: अगुआई के लिए वह गांधी परिवार से आगे नहीं देख पाती और वे हैं कि उसे नेतृत्व दे नहीं पा रहे.

पार्टी की केंद्रीय कमान सोनिया गांधी के पुराने नेताओं और टीम राहुल के युवा तुर्कों की रस्साकशी में फंसी है. आलाकमान दखल दे पाने की हालत में नहीं है तो राज्य इकाइयां क्षेत्रीय क्षत्रपों की जागीर बन गई हैं, या जहां मजबूत नेता नहीं है, वहां अंतर्कलह बेलगाम हो गई है. पार्टी में कोई भविष्य न देखकर कई नेताओं ने अपनी गाड़ी भाजपा के जिताऊ घोड़े के पीछे बांधने का रास्ता चुना.

एआइसीसी के अंतरंग और परिवार के वफादार रहे और 2019 में भाजपा में आए टॉम वडक्कन कहते हैं, ''अगर आपका नेता आपको सत्ता नहीं दिला सकता तो स्वाभाविक है कि राजनीतिज्ञ कहीं और इसकी तलाश करेंगे.’’ पार्टी के पास भाजपा के जोरदार विमर्श का जवाब देने के लिए कोई नैरेटिव नहीं है और न ही नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी की ताकत का मुकाबला करने के लिए एकजुट संगठन है.

तो क्या पार्टी रसातल की तरफ जा रही है? क्या भाजपा कांग्रेस-मुक्त भारत का अपना मंसूबा पूरा करने के नजदीक पहुंच गई है, जिसमें उसकी ज्यादा मदद खुद कांग्रेस ने ही की है? पार्टी के साथ आखिर गड़बड़ी क्या है? और क्या उसमें नई जान फूंकना मुमकिन है? मौजूदा संकट की थाह लेने के लिए अतीत में कुछ पीछे, ठीक-ठीक कहें तो 2003 में जाना होगा.

नेतृत्व का संकट

उस साल जुलाई में शिमला में आयोजित कांग्रेस के तीन दिनों के चिंतन शिविर में, गांधी परिवार से नजदीकी के लिए जाने जाते रहे एक कांग्रेस महासचिव घूम-घूमकर शिविर में शामिल लोगों से कह रहे थे कि वे उन युवा कांग्रेसजनों के नाम लिखकर दें, जिन्हें पार्टी भावी नेताओं के तौर पर तैयार कर सकती है.

शिविर के आखिरी दिन 9 जुलाई को कागज के टुकड़े पर आड़े-तिरछे ढंग से जो कुछेक नाम लिखे गए, उनमें सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा और आर.पी.एन. सिंह थे. आर.पी.एन. सिंह को छोड़कर जो पहले ही उत्तर प्रदेश में विधायक थे, सभी को अगले साल लोकसभा चुनाव के टिकट दिए गए. साथ ही एक और युवा शख्स ने चुनावी राजनीति में पहला कदम रखा और वे थे राहुल गांधी, जो उस वक्त 33 साल के थे. यह टीम राहुल की शुरुआत थी.

अगले 10 साल जब कांग्रेस की अगुआई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्ता में थी, पायलट, सिंधिया, प्रसाद, देवड़ा और आर.पी.एन. सिंह को मंत्री बनाया गया. अन्य युवा (यानी भारतीय राजनीति के मानक के लिहाज से युवा)—के.सी. वेणुगोपाल, जितेंद्र सिंह और अजय माकन—भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए. राहुल, मंत्री पद की जिम्मेदारी से दूर रहे, लेकिन कई पायदान ऊपर चढ़कर पार्टी के उपाध्यक्ष बन गए. टीम राहुल तैयार थी, दिग्गजों से पार्टी की बागडोर अपने हाथ में लेने का मंच सज गया था.

जल्द ही पायलट को राजस्थान कांग्रेस

का जिम्मा सौंपा गया, जहां अशोक गहलोत और सी.पी. जोशी सरीखे कद्दावर नेता थे. फरवरी 2014 में उन्होंने युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष 34 वर्षीय अशोक तंवर को हरियाणा कांग्रेस का प्रमुख बना दिया, जहां दिग्गज नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार चला रहे थे. इन बदलावों से यह संकेत मिला था कि राहुल काम को लेकर गंभीर और संकल्प से भरे थे और कांग्रेस लंबे समय से टलते आ रहे कायाकल्प की तरफ बढ़ रही है.

पर हुआ यह कि राहुल पहले ही इम्तिहान में फेल हो गए. मोदी की आंधी ने 2014 में कांग्रेस को धूल चटा दी. उस समय पार्टी के उपाध्यक्ष पद पर विराजित राहुल के ऊपर कोई तोहमत नहीं आने दी गई. अलबत्ता पार्टी संगठन के कायाकल्प की जो थोड़ी-बहुत नेक इच्छा उनके मन में रही होगी, उस पर विराम लग गया. उनकी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के दिग्गज नेताओं ने कांग्रेस में जान फूंकने का राहुल का ब्लूप्रिंट नामंजूर कर दिया, क्योंकि वे मानते थे कि जब पार्टी सत्ता से बाहर है, संगठन के साथ छेड़छाड़ उसके खत्म होने की रफ्तार को तेज ही करेगी.

फिर राहुल ने खुद को ‘लंबी लड़ाई की राजनीति’ के लिए समर्पित कर दिया, जो चुनावी रणभूमि में कम और नैतिकता की ऊंची जमीन पर ज्यादा लड़ी गई. इसीलिए ‘सूट-बूट की सरकार’ का तंज कसा गया और सोशल मीडिया पर तमाम दूसरी गोलियां दागी गईं. इस बीच कुछ चुनावी कामयाबियां भी मिलीं—2015 में बिहार की आंशिक जीत, 2017 में पंजाब की चुनावी जीत, 2017 के अंत के नजदीक गुजरात में करीब-करीब जीत और दिसंबर 2018 में हिंदी पट्टी के तीन राज्य. हालांकि ये सभी राहुल के किसी अहम योगदान की बजाए दूसरों की कोशिशों का नतीजा ज्यादा थे.

इस बीच भाजपा और उसकी ट्रोल सेनाओं ने राहुल को जो ‘पप्पू’ का तमगा दिया था, वह जनधारणा में उनके ऊपर चस्पां होने लगा. इसमें उनकी भूल-चूकों और उनके बार-बार गायब हो जाने ने भी खासा बड़ा योगदान दिया. राहुल पर आरोप लगाया गया कि वे पार्टीजनों से मिलने के लिए उपलब्ध नहीं होते. युवा हेमंत बिस्व सरमा मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन उन्हें राहुल से मिलने ही नहीं दिया गया. 2015 में वे पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए. विरोधी खेमे में आकर उन्होंने पूर्वोत्तर के सभी सातों राज्यों में या तो सीधे चुनाव में हराकर या दलबदल करवाकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया.

इधर खुद टीम राहुल ही तितर-बितर होने लगी. हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष तंवर, त्रिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष प्रद्योत देवबर्मा और झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार सरीखे राहुल के नियुक्त लोग पार्टी छोड़कर चले गए. पुराने नेताओं ने उन्हें अपमानित किया और राहुल ने मझधार में छोड़ दिया, लिहाजा उन्होंने देखा कि पार्टी में उनकी जगह लगातार सिकुड़ रही है. राहुल के एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''उन्हें रेफरी बनना सक्चत नापसंद है.’’

मगर उनकी ओर खड़े होने से इनकार करके और सिंधियाओं तथा पायलटों की महत्वाकांक्षाओं को पार्टी की मजबूरियों पर बलि चढ़ाकर राहुल ने क्या किया? यही कि ठीक उन्हीं लोगों को दूर और पराया किया जिन्हें उनका सिपहसालार बनने के लिए तैयार किया गया था. सिंधिया मार्च में छोड़कर चले गए, तो पायलट का मुद्दा अब भी अधर में है. उधर मणिपुर में पूर्व शाही खानदान के वारिस और तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी 41 वर्षीय राजकुमार इमो सिंह पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ बगावत करते हुए नौ विधायकों के साथ पार्टी छोडऩे को तैयार खड़े हैं.

2019 की उस हार ने, जिसमें राहुल को अपने परिवार की मजबूत सीट अमेठी तक से पराजय का मुंह देखना पड़ा, पार्टी की भीतरी चाल-ढाल को पूरी तरह बदल दिया. चुनाव में टीम राहुल ने भी अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. पुराने नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा की अगुआई में हरियाणा की करीब-करीब जीत ने पार्टी के भीतर दिग्गजों की आवाज को और मजबूत कर दिया.

राहुल ने जिम्मेदारी लेने की बजाए अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का रास्ता चुना और वह भी बड़े नेताओं पर अभद्र ढंग से यह आरोप लगाते हुए कि वे नरेंद्र मोदी से लडऩे में मदद करने की बजाए बेटों को टिकट दिलवाने की पैरोकारी में लगे थे. साथ ही उन्होंने खुद अपने आदमियों को बेसहारा छोड़ दिया. सोनिया गांधी की वापसी ने पलड़े को फिर पुराने नेताओं की तरफ झुका दिया. यह गहलोत के उन तौर-तरीकों से और जाहिर हो गया जिनसे उन्होंने मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पालने के लिए युवा पायलट को दंडित किया है.

शीर्ष पर नेतृत्व के कमजोर होने के साथ ही पार्टी के भीतर असंतोष और नाराजगियां लगातार खदबदा रही हैं. राहुल की बेरुखी कायम है, वहीं सोनिया को फैसले लेने में वक्त लग रहा है. असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं, ‘‘वे फैसले लेने में लंबा वक्त इसलिए लेती हैं क्योंकि वे सर्वानुमति हासिल करना पसंद करती हैं.’’

तो क्या अब वक्त आ गया है जब कांग्रेस को गांधी परिवार से आगे देखना चाहिए? कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते वक्त राहुल ने अगले अध्यक्ष का फैसला कांग्रेस कार्यसमिति पर छोड़ दिया था. शशि थरूर और मनीष तिवारी सरीखे कई अपेक्षाकृत युवा नेताओं ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की मांग की थी. लेकिन कार्यसमिति ने यह जिम्मेदारी संभालने के लिए सोनिया गांधी को मना लिया.

यही वह मुकाम था जहां चीजें ठीक वहीं लौट आईं जहां से शुरू हुई थीं. इसे ही नौ दिन चले अढ़ाई कोस कहा जाता है. गांधी परिवार अब भी पार्टी का आसरा और विकल्प बना हुआ है. घर को एकजुट रखने की नाकामी और वोट जुटाने की घटती ताकत के बावजूद पार्टी नेता एक राय से मानते हैं कि केवल गांधी परिवार ही उन्हें उबार सकता है.

राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के गुजरात प्रभारी राजीव सातव कहते हैं, ‘‘दूसरे अधिकांश कांग्रेस नेताओं की क्षेत्रीय पहचान है जबकि गांधी परिवार ही है जो पूरे भारत का है और उसके साथ जुड़ाव कायम कर पाता है. वह ऐसा साझा धागा है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हरेक कांग्रेस कार्यकर्ता को जोड़ता है. उन्होंने यह रातोरात हासिल नहीं किया है. कश्मीर से लेकर, जहां नेहरू-गांधी परिवार की जड़ें हैं, भारत के हृदय प्रदेश में इलाहाबाद तक, कर्नाटक में चिकमंगलूर से लेकर केरल में वायनाड तक गांधी परिवार के लोगों के भीतर भारत के हरेक हिस्से का एक कतरा है.’’

दूसरे नेता उस दौर की तरफ इशारा करते हैं जब पार्टी की अगुआई नरसिंह राव और सीताराम केसरी के हाथों में थी और पार्टी कई कद्दावर नेताओं की विदाई तथा कटु अंतर्कलह का गवाह बनी थी. 1998 में सोनिया के कमान संभालने के बाद ही थोड़ी स्थिरता आई और आठ साल बाद पार्टी फिर सत्ता में लौटी. राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की राय में नेतृत्व कतई दोफांक नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘कांग्रेस कार्यसमिति ने उन्हें अंतरिम अध्यक्ष नहीं, अध्यक्ष नियुक्त किया है. कांग्रेस के अधिवेशन में इस फैसले का अनुमोदन होना है. बदकिस्मती से कोविड-19 की वजह से उस अधिवेशन में देरी हुई. बस हम अधिवेशन बुला भर लें, फिर फैसले का अनुमोदन हो जाएगा.’’

राहुल के समर्थक हालांकि उनकी वापसी के लिए हाय-तौबा मचा रहे हैं. वे मानते हैं कि कांग्रेस में वही अकेले हैं जो भाजपा खेमे में घबराहट पैदा कर देते हैं. सातव कहते हैं, ‘‘ऐसा क्यों है कि उनके बोले हरेक शब्द और सोशल मीडिया में डाली गई उनकी हरेक पोस्ट पर प्रतिक्रिया करने और उसे खारिज कर देने के लिए भाजपा रोज दर्जन भर प्रवक्ताओं और केंद्रीय मंत्रियों को मैदान में उतार देती है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सचाई सामने रखकर उनकी धज्जियां उड़ा देते हैं.

उनकी बातों का जवाब देने का अकेला तरीका उनके पास यही है कि उन पर तंज कसें और उनका मजाक उड़ाएं.’’ वहीं, 2019 में पाला बदलकर तृणमूल कांग्रेस में चली गईं और बाद में राज्यसभा सांसद बनीं मौसम नूर कहती हैं, ‘‘राहुल को वह इज्जत हासिल नहीं है जो सोनिया गांधी को है. उनकी बातों और कामों में कोई सिलसिला नहीं होता. नेता उन पर भरोसा नहीं करते.’’ कांग्रेस फिर से उठ खड़ी होने को लेकर वाकई गंभीर है, तो उसे गांधी परिवार से आगे देखने की जरूरत है.

कांग्रेसजनों का एक छोटा-सा तबका नया अध्यक्ष चुनने के हक में है, फिर भले ही वह गांधी परिवार से बाहर का कोई शख्स ही क्यों न हो. कांग्रेस कार्यसमिति के एक सदस्य कहते हैं, ‘‘हो सकता है कि कुछ महत्वाकांक्षा से प्रेरित हों और दूसरे सच्चे सरोकार के चलते ऐसा कहें, पर यह मांग करने में कोई बुराई नहीं है कि पार्टी अध्यक्ष का चुनाव करवाया जाए और मामले को एकबारगी हमेशा के लिए सुलटा लिया जाए.’’

संगठन की शक्ति की दरकार

कांग्रेस के लिए एक नया अध्यक्ष खोजना अनिवार्य हो गया है क्योंकि पार्टी को अपनी खोई जमीन हासिल करने के लिए तेजी से फिर से संगठित होने की जरूरत है. कांग्रेस के एक महासचिव का कहना है, ‘‘संगठनात्मक नेटवर्क जर्जर स्थिति में है. केंद्र और राज्य के नेताओं की ओर से इसे ठीक करने के लिए कोई समन्वित प्रयास नहीं हुआ है.’’

वर्षों से कांग्रेस में संगठनात्मक पुनर्गठन केंद्रीय नेतृत्व की पसंद से होने वाली नियुन्न्तियों तक सीमित रहा है; पार्टी व्यापक सुधार से कन्नी काटती रही है. कांग्रेस शासित राज्यों में जहां पार्टी के पास स्थापित चेहरे हैं, सरकार की बागडोर एक नेता और पार्टी इकाई की कमान दूसरे को सौंपकर शक्ति संतुलन बनाया जाता रहा है.

लेकिन यह तरीका अक्सर आत्मघाती भी हो जाता है, जैसा कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुआ. शीर्ष नेतृत्व इसे साफगोई से देखने से भी कतराता रहा है. मसलन, असम में राज्य इकाई के प्रमुख रिपुन बोरा या पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई में से बॉस कौन है. बोरा को बदलने की मांग के बीच, आलाकमान तय नहीं कर पाया कि अगले साल विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा.

राहुल ने कांग्रेस सेवादल के पुनर्गठन और इसे पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक अंग के रूप में व्यवस्थित करने का प्रयास किया था—जो भूमिका आरएसएस की भाजपा के लिए होती है.

उनके अध्यक्ष पद छोडऩे के बाद से उस दिशा में रत्ती भर प्रयास नहीं हुआ है. शीर्ष पर संगठनात्मक दृढ़ता भी नहीं दिखती. मसलन, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का सत्र, जो सालाना हुआ करता था, अब कभी-कभार ही होता है. निर्णय लेने वाली पार्टी की सर्वोच्च संस्था कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक केवल संकट के समय या फिर गंभीर मुद्दों पर चर्चा करने की जरूरत पैदा होने पर होती है. और उधर! भाजपा की कार्यकारी परिषद नियमित बैठकें करती है. आरएसएस एक प्रतिक्रिया तंत्र के रूप में कार्य करता है, जो जमीनी स्तर से प्राप्त प्रतिक्रियाएं पार्टी को भेजता रहता है.

कांग्रेस में राज्यों से प्रतिक्रिया उन कांग्रेस महासचिवों के माध्यम से केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचती है, जिनके पास एक या अधिक राज्यों का जिम्मा होता है. हालांकि किसी राज्य के नेताओं की ही नियुक्ति दूसरे राज्यों के कांग्रेस प्रभारियों के रूप में इसलिए की जाती है ताकि निष्पक्ष प्रतिक्रिया प्राप्त हो, लेकिन पार्टी में बहुत-से लोग बढ़ती गुटबाजी और राज्यों में पार्टी के मामलों में हाइकमान की कमजोर पकड़ के लिए, इसी प्रणाली को जिम्मेदार ठहराते हैं.

सामान्य आरोप यह है कि कांग्रेस प्रभारी अपने राज्यों में शायद ही कभी समय बिताते हैं और राज्यों में अपने खासमखासों के ही भरोसे रहना पसंद करते हैं. सरमा बताते हैं कि कैसे फीडबैक तंत्र दोनों पार्टियों में भिन्न है. वे बताते हैं, ‘‘कांग्रेस में जब प्रभारी राज्य के दौरे पर आता है तो मुख्यमंत्री या पार्टी प्रमुख से मिलता है और एक-दो दिन बिताने के बाद लौट जाता है. भाजपा में राज्य प्रभारी पार्टी कार्यकर्ताओं के अलावा आरएसएस नेताओं से मिलते हैं और पारदर्शी संवाद करते हैं इसलिए आलाकमान को असली तस्वीर मिलती है.’’

फीडबैक लेने के तंत्र को सुव्यवस्थित करने के लिए राहुल ने या तो युवा नेताओं को कांग्रेस प्रभारियों के रूप में नियुक्त किया या फिर उन्हें इस पद पर आसीन वरिष्ठों के साथ उनके डिप्टी के रूप में नियुक्त करके उन्हें भूमिका सौंपी. पर इससे शायद ही कोई फर्क पड़ा, क्योंकि अधिकांश सदस्यों ने काम नहीं मिलने की शिकायत की; कुछ अन्य में उतनी क्षमता ही नहीं थी कि कुछ बदलाव ला सकें.

कांग्रेस को अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाने की जरूरत है. कांग्रेस का एक कैडर-आधारित पार्टी नहीं होना, भाजपा और आरएसएस की संगठनात्मक ताकत के सामने उसके लिए एक बड़ा नुक्सान है.

दिग्विजय और गोगोई दोनों का मानना है कि कांग्रेस को खुद को कैडर-आधारित इकाई में ढालना चाहिए और नेताओं के लिए नियमित प्रशिक्षण होना चाहिए. दिग्विजय कहते हैं, ''कांग्रेस जनांदोलन की पार्टी रही है. यह कभी भी कैडर-आधारित नहीं थी और जब पार्टी सत्ता में थी तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. लेकिन अब हमें कैडर-आधारित नेतृत्व और सभी नेताओं के लिए निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रम की जरूरत है.

कांग्रेस के संविधान का पालन नहीं किया जा रहा है, यही वजह है कि पार्टी के संगठनात्मक कामकाज को सभी स्तरों पर दुरुस्त करने की आवश्यकता है.’’ दूसरे नेताओं का कहना है कि एक संगठनात्मक संरचना धीरे-धीरे जमीनी स्तर पर आकार ले रही है. राज्यसभा सदस्य और बिहार के कांग्रेस प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल के अनुसार, कांग्रेस के पास अब 80 प्रतिशत पंचायतों में अध्यक्ष और कार्यकर्ता हैं.

विचारधारा की तलाश

कांग्रेस की सबसे बड़ी असफलता, भाजपा के प्रचार का मुकाबला करने के लिए एक ऐसा नैरेटिव सामने रखने में असमर्थता रही है जो विश्वसनीय हो और जिससे लोग जुड़ते हों. पार्टी केवल आलोचना कर देती है, यह किसी भी मुद्दे का रचनात्मक विकल्प प्रदान नहीं करती. विचार-विमर्श और सावधानीपूर्वक हर पहलू पर चर्चा के माध्यम से निर्धारित एक सामूहिक प्रतिक्रिया की बजाए पार्टी राहुल के विचारों को पार्टी के विचारों के रूप में पेश करने लग जाती है.

इसलिए जब राहुल ने 12 फरवरी की शुरुआत में आसन्न कोरोनो वायरस महामारी की चेतावनी दी तो पार्टी यह बताने में विफल रही कि इससे कैसे निबटा जाना चाहिए. इसने लॉकडाउन की आलोचना की, प्रवासियों की दुर्दशा की निंदा की, लेकिन अर्थव्यवस्था पर कुछ पुरानी टिप्पणियों के अलावा और कुछ सामने नहीं रखा. इंडिया टुडे की ओर से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछे जाने पर कि कोविड-19 महामारी पर विकेंद्रीकृत प्रतिक्रिया का उनका मॉडल क्या है, जवाब में राहुल केवल इतना कह पाए कि इस काम को विशेषज्ञों के हवाले किया जाना सबसे अच्छा होगा.

हालांकि, विशेषज्ञों की यह निर्भरता, जो रघुराम राजन और अभिजीत बनर्जी जैसे अर्थशास्त्रियों के साथ वीडियो के जरिए बातचीत में दिखाई गई, उसका उल्टा असर हुआ. ये राहुल को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाते हैं जिनके पास खुद का दिमाग नहीं है और उन्हें हर सुझाव या दृष्टिकोण के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है.

इसी तरह लद्दाख में चीन के साथ सीमा संघर्ष के मुद्दे पर कांग्रेस ने कोई वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पेश किया है. राहुल ने इस अवसर का इस्तेमाल केवल प्रधानमंत्री की ‘मजबूत नेता की छवि’ और '56 इंच की छाती’ पर कटाक्ष करने और ‘चीन की विश्व व्यवस्था को बदलने की रणनीति’ के एक अस्पष्ट संदर्भ देने भर के लिए किया. इससे भी बुरी स्थिति उस वक्त दिखी जब भाजपा ने पलटवार करते हुए सोनिया गांधी की अगुआई वाले राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से चंदा लेने की बात को उछाला तो कांग्रेस रक्षात्मक होने लगी.

अनुच्छेद 370 हटाने, एनआरसी (नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर) और सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) जैसे विवादास्पद मुद्दों पर भी कांग्रेस के रुख में वैचारिक अस्पष्टता बनी रही. पार्टी इन मुद्दों पर अपना गूढ़ नजरिया देने के लिए संघर्षरत ही नजर आई, भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे नेता जो भाजपा के लोकप्रिय राष्ट्रवाद के खिलाफ जाने को तैयार नहीं हुए और उन्होंने 370 को खत्म किए जाने का समर्थन किया. एनआरसी और सीएए के विरोध ने भी कांग्रेस को और अलग-थलग कर दिया.

महत्वपूर्ण मुद्दों पर पार्टी के दोहरे रुख अपनाने के आरोप भी लगे हैं. त्रिपुरा में हिंदू बंगाली मतदाताओं के विरोध से बचने के लिए कांग्रेस की राज्य इकाई के तत्कालीन प्रमुख प्रद्योत देवबर्मा को सीएए का विरोध करने से रोका गया, जबकि असम में एनआरसी प्रक्रिया शुरू करने का श्रेय लिया गया. देवबर्मा कहते हैं, ''कांग्रेस वीर सावरकर की आलोचना करती है, लेकिन सरकार बनाने के लिए शिवसेना से हाथ मिला लेती है.’’

दिग्विजय इसका बचाव करते हैं. वे कहते हैं कि महाराष्ट्र में साझा न्यूनतम कार्यक्रम के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होकर कांग्रेस ने मूल विचारधारा के साथ कोई समझौता नहीं किया है.

कई नेता निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि हिंदू बहुसंख्यक देश में भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति लोगों को रास आ रही है जबकि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी विचारधारा के लिए लगाव तेजी से घट रहा है. हाल के वर्षों में हुए चुनावों में पार्टी को ‘नरम हिंदुत्व’ अवतार में भाजपा को चुनौती देने के प्रयास करते देखा गया है—चुनाव प्रचार के दौरान नेता मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते रहे, खुद राहुल को 'जनेऊधारी शिवभक्त’ के रूप में पेश किया गया और पार्टी वार्षिक इफ्तार पार्टियों से बचती रही. 2014 और 2019 में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस भाजपा की घटिया नकल करती ही नजर आई.

ऐसी स्थिति में, जैसा कि थरूर कहते हैं, पार्टी को अपने मूल आदर्शों में निवेश करने की आवश्यकता है. वे कहते हैं, ''समावेशी और प्रगतिशील पार्टी की विचारधारा—जो दृष्टिकोण में उदार और मध्यमार्गी, सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा और मानव सुरक्षा को बढ़ावा देने को देशभक्ति समझती है—को अगर ठीक तरीके से पेश किया जाए तो अभी भी यह लोगों को बहुत लुभाएगी.’’

मनीष तिवारी का भी मानना है कि कांग्रेस के लिए धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर अपने सिद्धांतों को स्पष्ट तरीके से रखने का यह सबसे उपयुक्त अवसर है. कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि पार्टी को लोगों के साथ जुडऩे के लिए ''किस्सागोई की कला’’ में महारत हासिल करने की जरूरत है. वे कहते हैं, ''अगर आप अच्छी कहानी सुनाने में नाकाम हैं, तो दूसरे अपनी कहानी से लोगों का मन मोह लेंगे. यदि आपकी कहानी बेहतर है—मैं समझता हूं कि देश के लिए कांग्रेस के पास सबसे अच्छे विचार हैं—तो आप लोगों के दिल और दिमाग में बस जाएंगे.’’

राहुल फिलहाल इसकी कोशिश कर रहे हैं. वे हर घर में कांग्रेस की विचारधारा और दृष्टि को ले जाने का प्रयास कर रहे हैं. हाल ही में जारी किए गए वीडियो में उन्हें वैश्विक विशेषज्ञों के साथ बातचीत करते हुए या राष्ट्रीय चिंता के मुद्दों को समझाते हुए देखा जा सकता है. उसका दोहरा उद्देश्य है—जनता को कांग्रेस की कहानी बताना और एक गंभीर लेकिन दयालु नेता के रूप में अपनी छवि बनाना.

कांग्रेस के कोषाध्यक्ष और कार्यसमिति सदस्य अहमद पटेल कहते हैं, ‘‘कांग्रेस के लिए यह विचारधारा के साथ और मजबूती से डटे रहने का समय है. केवल तभी पार्टी उस भाजपा का मुकाबला कर सकती है, जो देश में संसदीय लोकतंत्र को नष्ट करने पर आमादा है.’’ देश के शीर्ष बुद्धिजीवियों और वरिष्ठ कांग्रेसियों के साथ इंडिया टुडे की चर्चा, जो आगे के पन्नों पर देखी जा सकती है, का निष्कर्ष यही है कि अगर पार्टी को प्रासंगिक बने रहना है और यहां तक कि केंद्र में सत्ता में वापसी के बारे में सोचना है तो उसे नेतृत्व, संगठन और विचारधारा के संकट को सुलझाना होगा.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें