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‘‘हमने सिफर से शुरुआत की थी और अब अपने जैसी कई औरतों को आजाद रहन-सहन में मदद करने का इरादा है’’

घाटी में खैरुन्निसा ऐसी महिलाओं की बढ़ती तादाद का प्रतिनिधित्व करती हैं जो गुर्बत और स्त्री-पुरुष के भेद की बेड़ियां तोड़ने के साथ अपने लिए आर्थिक आजादी का रास्ता तैयार करने पर आमादा हैं.

खैरुन्निसा खैरुन्निसा

कश्मीर की आवाज
‘‘हमने सिफर से शुरुआत की थी और अब अपने जैसी कई औरतों को आजाद रहन-सहन में मदद करने का इरादा है’’

खैरुन्निसा 22 वर्ष

कश्मीर के संवेदनशील इलाके पुलवामा के गोंगू गांव की 22 वर्षीया खैरुननिसा को अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों की तरह निकाह की अभी कोई फिक्र नहीं है. इसकी बजाए वे आसपास के गांवों में तेजी से फैल रही सहकारी डेयरी चांदनी पर ध्यान लगा रही हैं. खैरुन्निसा महिलाओं के इस उद्यमशील स्वसहायता समूह (एसएचजी) की प्रमुख हैं, जिसे वे 10 दूसरी महिलाओं के साथ चलाती हैं.

आत्मविश्वास से भरे चेहरे के साथ वे बताती हैं कि ''हमने सिफर से शुरुआत की थी और अब अपनी जैसी कई औरतों को गुर्बत से निकलकर आजाद रहन-सहन में मदद करने का पक्का इरादा है. अब हम दूध के उत्पादों की फैक्टरी लगाना और अमूल जैसी छोटी क्रांति पैदा करना चाहते हैं. ऐसा कर लेने के बाद ही हम निकाह के बारे में गौर करेंगे.’’

घाटी में खैरुन्निसा ऐसी महिलाओं की बढ़ती तादाद का प्रतिनिधित्व करती हैं जो गुर्बत और स्त्री-पुरुष के भेद की बेड़ियां तोड़ने के साथ अपने लिए आर्थिक आजादी का रास्ता तैयार करने पर आमादा हैं. डेयरी उत्पादन में अब 46,720 एसएचजी शामिल हैं, जिनमें घाटी की पांच लाख से ज्यादा महिलाएं काम कर रही हैं.

इन समूहों ने इस केंद्र शासित प्रदेश में श्वेत क्रांति पैदा कर दी है. फिलहाल यहां दूध की पैदावार 50,000 लीटर प्रति दिन है, जिसके अगले पांच साल में पांच गुना हो जाने की संभावना है.

खैरुन्निसा के वालदैन छोटी जोत के जरिए जीविकोपार्जन कर रहे थे. खैरुन्निसा ने चार साल पहले हाइ स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक एसएचजी में लैब असिस्टेंट की नौकरी कर ली. उसी वक्त उनकी एक खाला ने एसएचजी में शामिल होने की सलाह दी. वे बताती हैं, ‘‘मैंने हुकूमत की सब्सिडी स्कीम के तहत गाय खरीदने के लिए एक मकामी बैंक से 15,000 रुपए कर्ज लेने की हिम्मत जुटाई.’’

शुरू में बैंक के अफसरों ने भी बेरुखी दिखाई और गांव के लड़के फब्तियां कसते थे. स्थानीय दूध सप्लायरों ने उन्हें धमकी भी दी. पर उन्होंने एक सहेली को गाय खरीदने में निवेश करने के लिए राजी किया. गांववालों को जल्दी ही समझ आ गया कि ये लड़कियां कर क्या रही हैं. खैरुन्निसा बताती हैं, ''जब दूध की क्वालिटी सुधरी और हमने पैसा कमाना शुरू कर दिया तो उन्होंने हमारा एहतराम करना शुरू कर दिया.’’

खैरुन्निसा अब औसतन 40,000 रुपए महीने से ज्यादा कमाती हैं और उन्होंने गल्ले की दुकान भी खोल ली है. उनके पास 20 से ज्यादा गाय हैं. उन्हें हाल ही अपनी एसएचजी का लीडर चुना गया है. उन्होंने बैंक से 1.5 लाख रुपए कर्ज लिया है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि वे उसे चुका देंगी.

खैरुन्निसा के दिन की शुरुआत तड़के होती है, सुबह 5 बजे गायों को दुह कर दूध को वे साइकिल से दो किलोमीटर दूर ऑटोमेटिक मिल्क कलेक्शन (एएमसी) सेंटर तक ले जाती हैं. वहां खैरुन्निसा और उनकी सहकर्मी दूध की गुणवत्ता परखती हैं, उसे कैन में पलटी हैं और उसे ले जाने के लिए वैन के आने का इंतजार करती हैं. दोपहर बाद भी वे ऐसा ही करती हैं.

लेकिन सियासत और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म किए जाने जैसे मुद्दों पर वे सतर्क हो जाती हैं. वे कहती हैं, ''हुकूमत ने वही किया जो वह करना चाहती थी. उन्होंने हमसे नहीं पूछा. लेकिन हम उनसे उम्मीद करते हैं कि वे हमारी बेहतरी के लिए काम करेंगे.’’

अब प्रशासन के रवैए में भी उन्हें बदलाव दिखता है. ''पहले कर्ज के लिए जाने पर वे हमें हिकारत से देखते थे और बहुत वक्त लगाते थे. अब चीजें बड़ी तेजी से हो रही हैं और हम इसके लिए शुक्रगुजार हैं.’’ वे कहती हैं, ''अब हमें आगे बढऩे में ही दिलचस्पी है, बस.’’

46,720
स्वयं सहायता समूह पूरी कश्मीर घाटी में करीब पांच लाख महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाते हैं.

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