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आवरण कथाः विशेषज्ञों की चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया गया

वायरस का म्यूटेंट स्वरूप दूसरी लहर की वजह बन रहा है, इन चिंताओं के बावजूद जीनोम सीक्वेंसिंग को प्राथमिकता में नहीं रखा गया.

वायरस का म्यूटेंट स्वरूप दूसरी लहर की वजह बन रहा है, इन चिंताओं के बावजूद जीनोम सीक्वेंसिंग को प्राथमिकता में नहीं रखा गया. वायरस का म्यूटेंट स्वरूप दूसरी लहर की वजह बन रहा है, इन चिंताओं के बावजूद जीनोम सीक्वेंसिंग को प्राथमिकता में नहीं रखा गया.

सोनाली आचार्जी

जो सजग है, वह सबल है. यह कहावत दुनिया भर के लिए खतरा बनी कोविड-19 की लहरों का मुकाबला करने के इच्छुक देशों पर सटीक बैठती है. फिर भी, पहली लहर के दौरान तत्परता से काम करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार आश्चर्यजनक रूप से निष्क्रिय बनी रही है और बीमारी की दूसरी लहर फैला रहे वायरस के म्यूटेशन का ध्यान नहीं रख सकी, जो अमेरिका तथा ब्रिटेन के बाद अब भारत में कहर ढा रहे हैं.

पहली लहर जब उफान पर थी तब दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स ऐंड इंटीग्रेटिव बॉयोलॉजी (आइजीआइबी) और हैदराबाद की सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मॉलिक्यूलर बॉयोलॉजी (सीसीएमबी) को छोड़ कर अन्य स्थानों पर कोविड के नमूनों की सीक्वेंसिंग करके उसके सबसे प्रमुख प्रतिरूप का पता लगाने का कोई समन्वित राष्ट्रीय प्रयास नहीं किया गया और न ही यह जानने की कोशिश की गई कि क्या वायरस के स्वरूप में कोई गंभीर बदलाव हो रहा है. 

पिछले 21 दिसंबर को इंग्लैंड में ब्रिटिश स्ट्रैन का पता चलने के बाद ही स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इन जानकारियों के लिए भारतीय सार्स-कोव-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम (इन्साकॉग) का गठन किया. इसके तहत 10 प्रयोगशालाओं के एक समूह को वित्तपोषण प्रदान करके उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय को रिपोर्ट करने वाले राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के अधीन लाया गया. इन्साकॉग का काम देश में विभिन्न कोविड प्रतिरूपों की निगरानी करना है

और खास तौर पर यह ध्यान रखना है कि क्या ब्रिटेन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में तबाही मचाने वाले प्रतिरूपों में से कोई भारत तो नहीं पहुंच गया. उसे अक्तूबर 2020 में सीसीएमबी की तरफ से खोजे गए कोविड वायरस के भारतीय स्वरूप बी.1.617 के बदलावों की निगरानी भी करनी थी. 

इन्साकॉग को स्थापना के बाद से ही बड़ी बाधाओं से जूझना पड़ा. पहली बड़ी अड़चन बना केंद्रीय वित्त मंत्रालय का मई 2020 को जारी 200 करोड़ रुपये से कम के सामान के आयात पर रोक संबंधी आदेश. प्रयोगशालाओं के उपयोग में आने वाले कई रिएजेंट और प्लास्टिक विदेशी निर्माताओं से आते हैं और उनका कोई भारतीय विकल्प नहीं है. आयात के लिए प्रयोगशालाओं को अधिकारियों के सामने बाजार मूल्यांकन के माध्यम से साबित करना होता है कि उनका कोई भारतीय विकल्प मौजूद नहीं है.

रिएजेंटों पर लगी यह रोक जनवरी में हटाई गई. दूसरी समस्या धन की थी. इन्साकॉग को शुरू में छह महीने की अवधि के लिए 115 करोड़ रु. आवंटित किए गए, जो जैव प्रौद्योगिकी विभाग से मिलने थे. लेकिन पहली किश्त बहुत देर से 31 मार्च, 2021 में जारी हुई तथा आवंटन भी घटाकर 80 करोड़ रु. कर दिया गया. तब तक लैब को अपने संसाधानों से काम चलाना था.

तीसरी और सबसे बड़ी समस्या थी राज्यों से नमूनों के संग्रह की, ताकि लैब वायरस के स्वरूपों की निगरानी कर सकें. केरल को छोड़कर अधिकांश राज्यों का रवैया लापरवाही भरा रहा. राज्यों में कोविड-19 परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाओं को रोगियों के पॉजिटिव नमूने संरक्षित करना चाहिए और यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे एक तय संख्या में नमूनों को हर हक्रते 10 इन्साकॉग प्रयोगशालाओं तक पहुंचाएं.

एक प्रयोगशाला के एक अधिकारी ने बताया कि समस्या यह है कि अधिकांश राज्यों ने लैब से नमूनों का संग्रह और लैब में भेजने के लिए नोडल अधिकारी ही नियुक्त नहीं किए. कुछ राज्यों में नमूनों को इकट्ठा करने और उनकी ढुलाई के दौरान उन्हें सही-सलामत रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं. परिणामस्वरूप, इन्साकॉग फरवरी 2021 तक लगभग 80,000 नमूनों की ही सीक्वेंसिंग के लक्ष्य से बहुत पीछे रहा. वह 3,500 नमूनों की ही सीक्वेंसिंग कर पाया. 

यह भी एक कारण था कि इन्साकॉग मार्च में ही यह रिपोर्ट कर सका कि वायरस प्रतिरूप बी.1.617 की महाराष्ट्र के 20 प्रतिशत नमूनों में ऊंची उपस्थिति दर थी जबकि उसका पता महीनों पहले लग चुका था. पिछले 10 मार्च को समूह ने अपने निष्कर्ष एनसीडीसी के साथ साझा किए जिसने उसे आगे स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तक पहुंचाया. जारी नहीं हुए एक मसौदा बयान में इन्साकॉग ने लिखा था कि वायरस के बी.1.617 रूप से हुए म्यूटेशन ‘बेहद चिंता’ का कारण हैं.

24 मार्च को स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस प्रकार के विषाणु के प्रसार की घोषणा तो की लेकिन जनता में भय फैलने से रोकने के लिए इससे जुड़ी चिंताओं पर चर्चा को दबा दिया. कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना महंगा पड़ा. सीसीएमबी के निदेशक राकेश मिश्रा कहते हैं, ''इस तरह का वायरस फैल रहा था और पहले से ज्यादा तेजी से फैलने वाला था लेकिन खतरे की घंटी बहुत देर से बजाई गई. इस दौरान लोग बगैर मास्क लगाए और एक-दूसरे से दूरी का ध्यान किए बिना समूहों में इकट्ठा होते रहे.’’
 
चेतावनी देने में चूक 
केंद्र का दावा है कि उसने इन्साकॉग की चेतावनियों पर ध्यान दिया था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव आशुतोष शर्मा का कहना है कि अप्रैल के शुरू में कोविड पर राष्ट्रीय कार्य बल के 21 सदस्यों के साथ वायरस के बी.1.167 प्रतिरूप पर चर्चा हुई थी. सरकार को वैज्ञानिक और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए डॉ. वी.के. पॉल के नेतृत्व में कार्यबल का गठन अप्रैल 2020 में किया गया था. इसके सदस्यों में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव और, एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया के साथ राष्ट्रीय रोग नियंत्रण परिषद (एनसीडीसी) के निदेशक सुजीत कुमार सिंह शामिल हैं.

बैठक में अप्रैल के अंत में दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने के साथ रोज लगभग 100,000 नए मामलों की भविष्यवाणी की गई थी. फिर भी, लगता है कि विशेषज्ञों ने बदले वायरस की प्रचंडता को बहुत कम करके आंका. बैठक के बाद 20 दिनों के भीतर, भारत रोज 300,000 नए मामलों के स्तर पर पहुंच गया.

पिछले 19 अप्रैल को एनसीडीसी के निदेशक सिंह ने कोविड पर राष्ट्रीय कार्य बल के अन्य सदस्यों से मुलाकात की. सोशल मीडिया पर घूम रहे इस बैठक के विवरणों में बताया जा रहा है कि बैठक में सिंह ने कहा कि लॉकडाउन की घोषणा 15 दिन पहले ही कर देनी चाहिए थी. बैठक में भाग लेने वाले कार्यबल के एक अन्य सदस्य का कहना है कि दूसरी लहर की गंभीरता पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया. वे कहते हैं, ''भविष्यवाणियां पहली लहर की संक्रामकता पर आधारित थीं और दूसरी लहर के लिए की गई मॉडलिंग पहली लहर का प्रतिबिंब थी. दूसरी लहर के प्रकोप की प्रचंडता का अनुमान लगाने में इस तथ्य पर गौर नहीं किया गया कि भारतीय प्रतिरूप ने डेढ़ महीने में पूरे महाराष्ट्र में मूल वायरस की जगह ले ली.
 
ब्रिटेन से सीख
इस बीच जब बी.1.167 विषाणु प्रतिरूप पश्चिम बंगाल में तीसरे म्यूटेशन का संकेत दे रहा है और आंध्र प्रदेश में इसके नए प्रतिरूप एन440 का पता चला है, तब बहुत तेज और व्यापक जीनोम सीक्वेंसिंग की आवश्यकता है. भारत ब्रिटेन के अनुसंधान समूह, सीओजी-यूके, से सीख ले सकता है. ब्रिटेन के अनुसंधान समूह का गठन मार्च 2020 में महामारी शुरू होते ही किया गया था. इसे भारत में इस कार्य के लिए दिए गए धन का चार गुना 3.20 करोड़ पाउंड (329 करोड़ रु.) आवंटित किया गया है.

पहली लहर में ही समूह को पता चल गया था कि ब्रिटेन में कोविड का आगमन फ्रांस और स्पेन से हुआ है, न कि इटली या चीन से. यह पता लगाने के लिए कि क्या वायरस के कुछ स्वरूपों का संबंध गंभीर बीमारियों से है, सीओजी-यूके अपने वायरस जीनोम सीक्वेंस को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के मरीजों के डेटा और जीनोमिक्स इंग्लैंड के साथ चल रही मानव जीनोम सीक्वेंसिंग परियोजना से जोड़ रहा है. उनका काम इतना सटीक है कि कैम्ब्रिज स्थित एडेनब्रुक अस्पताल में यह तक पता कर लिया गया कि विषाणु का प्रसार डायलिसिस रोगियों के परिवहन में प्रयुक्त बस के कारण हुआ था.

वैज्ञानिकों का कहना है कि जीनोम सीक्वेंसिंग से एक क्षेत्र के रोगियों की कड़ी का पता लगाकर करीब दो सप्ताह पहले वायरस के प्रसार को जाना जा सकता है. किसी क्षेत्र के सभी पांच मामलों में कोई संबंध हैं, तो संभव है कि वहां संक्रमण तेजी से फैल रहा हो, यानी उस इलाके को कंटेनमेंट जोन घोषित कर देना चाहिए.

भारत में भी यह करने की क्षमता है. सीसीएमबी में वायरस के रूप की पहचान 24 घंटे में हो सकती है. लेकिन कई लैब को राज्यों से नमूने जल्दी नहीं मिल रहे हैं. गोवा जैसे कुछ राज्य अपनी सीक्वेंसिंग सुविधाएं स्थापित कर रहे हैं. तीसरी लहर से बचाव का एकमात्र रास्ता है कि वायरस के स्ट्रेन पर निगरानी रखी जाए और रोकथाम के उपाय फौरन किए जाएं.
—सोनाली अचार्जी

क्या करने की जरूरत
तेजी से जीनोम सीक्वेंसिंग करने के लिए और रकम दी जाए. ब्रिटेन के जीनोम सीक्वेंसिंग निकाय को 329 करोड़ रु. दिए गए जो भारत में इन्साकॉग को मिली राशि का चार गुना है 

नमूने जल्दी उपलब्ध कराएं. सभी लैब अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रही हैं क्योंकि राज्य पर्याप्त नमूने नहीं भेज रहे हैं

कच्चे माल का संकट हल करें. कई लैब अभी भी जरूरी कच्चा माल आयात नहीं कर सकतीं जबकि उनका कोई भारतीय विकल्प नहीं है.

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