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आवरण कथाः जरूरत मरहम की

महामारी से तहस-नहस दो सालों के बाद और विधानसभा चुनावों के बीच आने से केंट्रीय बजट 2022-23 के खुशगवार होने की उम्मीद.

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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

आवरण कथा । ओमिक्रॉन बजट

2022 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अहम साल होना था. बीते करीब दो साल तमाम किस्म की चिंताओं, बढ़ती कीमतों, आपूर्ति शृंखलाओं में टूट-फूट, गिरते निवेश और मांग में ठहराव के बाद इस साल अर्थव्यवस्था में स्थिरता-संतुलन की उम्मीद थी. मगर ओमिक्रॉन के तेज फैलाव ने उलटे दुश्वारियां और बढ़ा दीं.

भारत के कुछ अहम राज्यों में चुनाव होने हैं, इनमें सबसे ज्यादा आबादी वाला उत्तर प्रदेश भी है. ऐसे में बजट के लोकलुभावन होने की ही संभावना है. मगर बढ़ते कर राजस्व और विनिवेश का स्वप्निल दौर खत्म हुआ और इसके अलावा भी कई कारकों के मनचाहे नतीजे नहीं मिले, जिससे बजट में खर्च सीमित ही होगा. खाद्य और खाद सब्सिडी जारी रहेंगी और नरेगा या राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून सरीखी योजनाओं के लिए ज्यादा धन दिया जाएगा. दो क्रूर वर्षों के बाद बजट 2022-23 ’अच्छा महसूस करवाने वाला’ बजट हो सकता है.

वृद्धि के लिए खुलकर खर्च
देश की अर्थव्यवस्था की सेहत देशवासियों की सेहत पर निर्भर करेगी. पिछले बजट में टीके लगाने के लिए 35,000 करोड़ रुपए रखे गए थे. इस बजट में बूस्टर डोज और स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे के लिए अच्छी-खासी रकम के प्रावधान की संभावना है. खाद्य और खाद सब्सिडी के अलावा नरेगा के लिए भी बड़े खर्च की उम्मीद है. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग खाद्य सब्सिडी में और बढ़ोतरी का अनुमान जताते हैं.

सरकार ने मनरेगा पर इस साल करीब 6 लाख करोड़ रुपए खर्च किए, जो बजट में तय रकम से 2 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा हैं. सरकार के ध्वजवाहक जल जीवन मिशन पर भी फोकस बना रहेगा. 1.86 करोड़ घरों में नल का जल पहुंचाने की इस परियोजना के लिए पिछले बजट में 50,000 करोड़ रुपए का प्रावधान था.

आवरण कथाः जरूरत मरहम की
आवरण कथाः जरूरत मरहम की

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुनियादी ढांचे पर कुल खर्च 26 फीसद बढ़ाकर 4.39 लाख करोड़ रुपए किया था. इस बार इसके बढ़कर 7 लाख करोड़ रुपए होने की उम्मीद है. सकल स्थिर पूंजी निर्माण या निवेश ही अभी तक घाटे में नहीं है, तब भी यह वित्त वर्ष 2019-20 के स्तर से बस 2.6 फीसद ही ऊपर है. क्रिसिल के विश्लेषण के अनुसार, यह वृद्धि मोटे तौर पर सरकार के बुनियादी ढांचा निर्माण कार्यक्रमों की बदौलत हुई.

निर्माण का अप्रत्यक्ष प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ा, जिससे लाखों भारतीयों के लिए नौकरियों और आजीविकाओं का सृजन हुआ. कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के एमडी नीलेश शाह कहते हैं, ''निर्माण उद्योग को सहारा देना बेहद जरूरी है. 2004-05 में निर्माण जीडीपी का 15 फीसद था, जो घटकर 6.7 फीसद पर आ गया है.’’

असल चुनौती निजी क्षेत्र से निर्माण में निवेश करवाना है. सेवा-उन्मुख क्षेत्रों ने निवेश आकर्षित किया है. इनमें स्टार्ट-अप और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र भी हैं. नए पैकेज आने के बाद टेलीकॉम भी शायद आकर्षक हो गया हो. मगर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का स्वरूप, रोकड़े की सुलभता और नियमों की जटिलताएं रुकावट बनी हुई हैं. योजनाओं को जमीन पर उतारने में देरी और इसकी वजह से समय और लागत का बढ़ना भी परेशानी का सबब है. सरकार की 145 लाख करोड़ रुपए की नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन भी लक्ष्यों से पिछड़ रही है.

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने 30 नवंबर को शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय हालत पर रिपोर्ट जारी की, जिससे महामारी की वजह से उनके ऊपर जबरदस्त दबाव का पता चला. इससे भारत के कस्बों और शहरों की बुनियादी ढांचा खड़ा करने की क्षमता पर असर पड़ा है. बुनियादी ढांचे पर जोर देते हुए सरकार उसके हिस्से के तौर पर म्यूनिसिपल बॉन्ड को प्रोत्साहित करने के सिलसिलेवार उपायों की घोषणा पर विचार कर सकती थी. 

ऐसे बॉन्ड अमेरिकी कस्बों और शहरों में फंडिंग का सबसे बड़ा स्रोत हैं. बैंक गारंटियों की जगह श्योरिटी बॉन्ड लाने की सिफारिश भी की गई है, जो किसी भी कारोबारी का हौसला तोड़ने के लिए काफी हैं. साथ ही, पानी के बाद सबसे ज्यादा खपत की जानी वाली वस्तु सीमेंट पर भी कर का हिस्सा, जो अभी 28 फीसद है, कम करने की सिफारिश की गई है.

बुनियादी ढांचा विशेषज्ञ और सीआइआइ की नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर काउंसिल के चेयरमैन विनायक चटर्जी कहते हैं, ''करीब 65 फीसद सीमेंट लोग खरीदते हैं. दीवारें और घर बनाने के लिए यह आम आदमी की वस्तु है और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भी इसका बड़ा इस्तेमाल होता है.’’

शहरी गरीबों की मदद
ओमिक्रॉन की तीव्रता उसके पूर्ववर्ती जितनी भले न हो, पर शहरी गरीब और कमजोर लोग नई पाबंदियों के आगे डटे रहने की हालत में नहीं हैं. अपनी तकरीबन तमाम बचत वे पहली दो लहरों में पहले ही खर्च कर चुके हैं. दक्षिण दिल्ली की 54 वर्षीया घरेलू नौकरानी डॉली रानी दास इसका मौजूं उदाहरण हैं. उनके पति स्कूल बस ड्राइवर हैं और दोनों मिलकर 35,000 रुपए महीना कमाते थे.

फिर महामारी ने उनकी जिंदगी पूरी तरह उलट-पुलट दी. स्कूल बंद होने से उनके पति अपनी आमदनी से हाथ धो बैठे. बीते दो सालों से दास कर्ज और बचत के भरोसे गुजर-बसर कर रही हैं. अब फिर ओमिक्रॉन के फन काढ़ने के साथ उनके लिए बेहतरी की संभावना धूमिल ही दिखाई देती है.

शहरी नरेगा पर विचार तो काफी समय से चल रहा है, पर शहरी गरीबों की पहचान और आंकड़ों की कमी खासी असंतोषजनक है. नई योजना का खाका बनाने और उसे जमीन पर उतारने में वक्त लगेगा, इसलिए सरकार कुछ शहरों में पायलट योजना लाने और मौजूदा योजनाओं पर आवंटन बढ़ाने का विकल्प चुन सकती है.

सरकार अपने कार्यक्रमों के लिए धन कैसे जुटाएगी? हालांकि कर राजस्व में मौजूदा वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में ऊंची वृद्धि और उछाल दिखा, लेकिन कर राजस्व में वृद्धि मासिक 60 फीसद से घटकर 18 फीसद पर आ गई. ईवाइ इंडिया के चीफ पॉलिसी एडवाइजर डी.के. श्रीवास्तव इसके इस वित्त वर्ष के बाकी महीनों में और घटकर 15 फीसद पर आ जाने की उम्मीद करते हैं.

कर राजस्व में सालाना वृद्धि 30 से 35 फीसद की सीमा में होने की उम्मीद है. मगर पूरी आशंका है कि सरकार 1.75 लाख करोड़ रुपए के विनिवेश का लक्ष्य चूक सकती है. ओमिक्रॉन की वजह से ग्रामीण और शहरी मांग पर और भी बुरा असर पड़ने की संभावना है. श्रीवास्तव कहते हैं, ''कोविड मध्यम वक्त की कहानी है और इसका आर्थिक असर पड़ना जारी रहेगा. लिहाजा राजकोषीय मजबूती को थोड़ा टाल भी दें, पर बुनियादी ढांचे पर खर्च नहीं टाला जाना चाहिए.’’

सरकार ने अभी तक व्यापार, होटल और संचार सरीखे क्षेत्रों की सीधी सहायता से परहेज किया है, बावजूद इसके कि ये क्षेत्र लगातार महामारी से पैदा आर्थिक सुस्ती की मार झेल रहे हैं. सरकार को शायद उम्मीद है कि आर्थिक बहाली लाखों भारतीयों को नौकरियां देने वाले इनमें से कुछ क्षेत्रों को उबार लेगी. ओमिक्रॉन ने अलबत्ता ऐसे गुणा-भाग को उलट-पुलट दिया है.

आरबीआइ ब्याज दरें कम ही बनाए रखेगी और ऐसे में सरकार को ब्याज की आमदनी के बारे में सोचना होगा, खासकर पेंशनधारियों और वित्तीय तौर पर कम कुशल उन लोगों के लिए जो ब्याज की आमदनी पर निर्भर हैं. महंगाई भी बढ़ ही रही है. दिसंबर में इसके छह माह के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच जाने की आशंका है. अर्थव्यवस्था की तात्कालिक जरूरतों और देश को और ऊंची वृद्धि की राह पर ले जाने वाले बड़े उपायों के बीच संतुलन बिठाने की महती जिम्मेदारी बजट 2022 के कंधों पर है.

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