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विनोद राय: खबरदार! वे देख रहे हैं

तमाम विवादों के बावजूद वे सच को सच कहने से रत्ती भर भी नहीं हिचके हैं. गुडग़ांव में नवंबर माह में आयोजित विश्व आर्थिक मंच कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने सीबीआइ और सीवीसी को ‘‘सरकार के हाथ का खिलौना” बताते हुए उन्हें संवैधानिक दर्जा दिए जाने की मांग की.

विनोद राय विनोद राय

यह बात है 9 अक्तूबर की. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम देश की राजधानी के मध्य में स्थित नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) के भव्य मुख्यालय में महालेखाकारों के एक सम्मेलन को संबोधित करने वाले थे. कार्यक्रम से पहले अपने और सीएजी विनोद राय के बीच हंसी-मजाक के अनौपचारिक क्षणों में वित्त मंत्री ने कहा कि वे जनवरी 2008 में राय को देश के शीर्ष ऑडिटर के पद के लिए चुनकर पछता रहे हैं. इस नियुक्ति को मंजूरी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दी थी. इसी सम्मेलन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि राय ने ‘‘रूटीन की तरह चल रहे ऑडिट की जगह उसे ज्यादा बड़े नजरिए” तक ले जाने का बदलाव किया है, लेकिन उन्होंने सीएजी को हद से आगे बढऩे के लिए चेताया भी. इस पर राय की सारगर्भित टिप्पणी थीरू ‘‘हम सरकार के लिए चीयर लीडर (ताली बजाने वाले) की भूमिका नहीं निभा सकते.”

इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री को भी न्यौता गया था पर उन्होंने न जाना ही मुनासिब समझा. 11 नवंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने संकेत दिया कि सरकार सीएजी को कई सदस्यों वाली संस्था बनाकर इसके पर कतरना चाहती है. अब यह बात साफ हो चुकी थी कि 1972 बैच के केरल काडर के इस आइएएस अफसर ने सरकार की नाक में दम करके रख दिया है. न्यायिक सक्रियता के एक दौर के बाद यह सीएजी की सक्रियता का दौर था.

राय ने 2012 में खजाने को चूना लगाने वाले घोटालों की कई रिपोर्टें जारी करके जनता के पैसे को बर्बाद करने पर सवाल उठाकर और कुशासन के कई मामलों को दर्ज करसरकार को सांसत में डाला है. सीएजी ने 17 अगस्त को संसद के पटल पर अपनी तीन रिपोर्टें रखीं—कोयला ब्लॉक के आवंटन पर, दिल्ली हवाईअड्डे के बारे में और अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट्स के बारे में. कोयला ब्लॉक आवंटन वाली रिपोर्ट में कहा गया कि इसमें बड़ा घोटाला हुआ है, जिससे सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रु. का चूना लगा है. इस मामले में प्रधानमंत्री तक आरोपों के दायरे में आ गए क्योंकि आवंटन के समय कोयला मंत्रालय का प्रभार उन्हीं के पास था.

मनमोहन ने घाटे के इस आंकड़े को ‘‘साफ तौर से विवादास्पद” बताया और इस रिपोर्ट में ‘‘कई बिंदुओं पर खामियां” पाईं. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े राय आंकड़ों के बारे में उसी अंदाज में जवाब दे सकते थे पर वे इस विवाद में नहीं उलझे. दिल्ली हवाईअड्डे के बारे में पेश रिपोर्ट में कहा गया कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बोली की शर्तों का उल्लंघन कर जीएमआर के नेतृत्व वाले डेल्ही इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड को 3,415 करोड़ रु. का फायदा पहुंचाया है. तीसरी रिपोर्ट में रिलायंस पावर को बोली के बाद दी जाने वाली रियायतों की जानकारी दी गई थी और इसमें कहा गया था कि अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली इस कंपनी को 29,033 करोड़ रु. का अनुचित फायदा मिला है.

यानी सीएजी का ऑडिट तंत्र प्राइवेट सेक्टर में घुस गया और उसने देश के कॉर्पोरेट वल्र्ड को हिला दिया. राय सितंबर, 2009 से ही ऑडिट एक्ट, 1971 में बदलाव की मांग कर रहे हैं ताकि सीएजी को किसी भी ऐसी संस्था की जांच करने का अधिकार मिले जिसमें जनता के धन के इस्तेमाल का मामला जुड़ा हो. हालांकि, सरकार ने राय की बात की अनदेखी कर दी लेकिन वे आंशिक रूप से ही सही, अपने तरीके से कंपनियों की ऑडिट भी करने लगे. मसलन दिल्ली एयरपोर्ट जीएमआर और एयरपोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआइ) के बीच एक स्पेशल परपज व्हीकल (एसपीवी) है. सीएजी ने एएआइ के सौदों की जांच कर इसके ऑडिट का तरीका निकाल लिया.

सरकार 23 मई, 2013 का इंतजार कर रही है जब राय 65 वर्ष के हो जाएंगे और उनका कार्यकाल पूरा हो जाएगा. उनके बाद किसी दब्बू व्यक्ति की नियुक्ति की जा सकती है. लेकिन राय का मानना है कि संस्था की छवि में निखार आया है. उनका कहना है कि यह अधिकारियों पर निर्भर होगा कि व्यवस्था सुचारू तरीके से चलती रहे, मुखिया चाहे कोई भी हो. वे एकाउंटिंग वाली अपनी भूमिका के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि अपने टेनिस जूतों और माउंटेनियरिंग बूट को पहन सकें—ये दोनों उनकी पसंदीदा गतिविधियां हैं.

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