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आवरण कथाः सबक सीखने से साफ इन्कार

क्या इस प्राकृतिक आपदा से कोई सबक लिया जाएगा, या विकास का लालच और आपदाएं लाएगा?

बाढ़ में बर्बाद धौलीगंगा के किनारे तबाह मकान बाढ़ में बर्बाद धौलीगंगा के किनारे तबाह मकान

उत्तराखंड का रैणी गांव. 7 फरवरी को आई आपदा का ग्राउंड जीरो. रैणी गांव के नीचे ही ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना थी, जिसका अब नामोनिशान मिट चुका है. लेकिन, कुदरत के कहर से दो-चार होने से पहले रैणी की पहचान गौरा देवी से थी. गौरा देवी ने 26 मार्च 1974 की सुबह चंद महिलाओं के साथ जंगल काटने पहुंचे ठेकेदारों से लोहा लिया था. ठेकेदार के आदमियों ने डराने-धमकाने केलिए बंदूक निकाली तो गौरा देवी महिलाओं समेत पेड़ से चिपक गईं और बोलीं, ''मारो गोली. पेड़ नहीं कटने देंगे.'' गांव में उनकी वीरता के सम्मान में बना स्मृतिद्वार बरबस ध्यान खींचता है.

लेकिन गांव के लोगों की आंखों में सवालों की ज्वाला फिर धधकने लगी है. गांव के बचन सिंह कहते हैं, ''हमने पावर प्लांट के खिलाफ कई शिकायतें दीं, आंदोलन चलाया. हमारी बात किसी ने नहीं सुनी. 1971 में हमने ऋषिगंगा में बाढ़ देखी थी, लेकिन इस बार हालात भयंकर थे.'' गौरादेवी के साथ चिपको आंदोलन में हिस्सा ले चुकीं कली देवी कहती हैं, ''कंपनी की वजह से बहुत नुक्सान हुआ है. अजीब-सा डर है. जाने कब क्या हो जाए. हमारी शिकायतों का कोई मतलब नहीं.''

उत्तराखंड के चमोली में 7 फरवरी को हुए भयानक हादसे ने विकास बनाम विनाश के द्वंद्व को फिर ताजा कर दिया है. हालांकि, राज्य में यह कोई पहला विनाशकारी हादसा नहीं था. उत्तराखंड में तो आपदाओं का लंबा इतिहास है. 1803 में आए 'गढ़वाल भूकंप' ने पूरे उत्तर भारत को हिला दिया था. आजादी के बाद 1951 में सतपुली में नयार नदी की बाढ़, 1979 में रूद्रप्रयाग के कौंथा में बादल फटने की घटना, 1991 में उत्तरकाशी में भूकंप, 1998 में रूद्रप्रयाग तथा मालपा में भू-स्खलन, 1999 में चमोली तथा रूद्रप्रयाग में भूकंप, 2010 में बागेश्वर के सुमगढ़ में भू-स्खलन, 2012 में उत्तरकाशी तथा रूद्रप्रयाग में बादल फटने और भू-स्खलन जैसी घटनाएं प्रमुख हैं. 2013 की केदारनाथ त्रासदी ने तो प्राकृतिक आपदाओं के साए में उत्तराखंड के अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े कर दिए.

इन सबके बावजूद कमेटी और सिफारिशों के अलावा कुछ खास नहीं हुआ. उत्तराखंड की पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक और केदारनाथ त्रासदी के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी एक्सपर्ट कमेटी के अध्यक्ष रवि चोपड़ा कहते हैं, ''मैंने तमाम रिसर्च के बाद सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी थी. एक सिफारिश यह भी थी कि जिन घाटियों का तल 2,000 मीटर से ज्यादा गहरा है, वहां बांध नहीं बनना चाहिए, इसलिए 23 बांध रद्द कर दिए जाएं. इनमें तपोवन विष्णुगाड वाला बांध भी था. लेकिन, हमारी रिपोर्ट के खिलाफ निर्माण कंपनियां कोर्ट में चली गईं और मामला लंबित है.''

केदारनाथ त्रासदी के बाद तो सुझावों का अंतहीन सिलसिला चला था. अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लेबोरेट्री के पूर्व वैज्ञानिक नवीन जुयाल कहते हैं, ''भूगर्भ संरचना को लेकर जो चिंता होनी चाहिए, वह नदारद है. 2013 केदारनाथ हादसे के बाद हम लोगों की एक कमेटी बनी थी, जिसका अहम उद्देश्य यह जानना था कि आपदा में पनबिजली परियोजनाओं की क्या कोई भूमिका थी? हमने शोध में पाया था कि नदियों के भीतर बंपर टू बंपर पावर प्लांट की शृंखला नहीं होती तो उस बाढ़ की तीव्रता इतनी मारक नहीं होती.''

लेकिन, आशंका के बावजूद विकास बनाम विनाश के बीच संतुलन की कोई ठोस रणनीति नहीं बन सकी. केदारनाथ त्रासदी को लेकर 4 सितंबर 2013 को लोकसभा में चर्चा के दौरान भाजपा की वरिष्ठ नेता दिवंगत सुषमा स्वराज ने कहा था, ''मैं मांग करती हूं कि गंगा मैया पर बनने वाले सारे बांध निरस्त करिए.  जितना भी पैसा उन पर खर्च हो चुका होगा, जो पैसा राहत और पुनर्वास पर खर्च होने वाला है, वह उससे कहीं कम होगा.'' इतना ही नहीं, उन्होंने केदारनाथ त्रासदी के बाद आपदा से निबटने में विफल रहने पर राज्य सरकार की लानत-मलामत की और कई सुझाव दिए थे.

उन्होंने कहा था, ''एक तो पूरे उत्तराखंड की जीआइएस मैपिंग करवाइए. हर यात्री का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य रूप से करवाइए. उसको एक माइक्रो चिप दीजिए ताकि उसकी लोकेशन का पता लग सके. सभी गांवों में पक्के हेलीपैड बनवा दीजिए. हर जिला अधिकारी के पास सैटेलाइट फोन उपलब्ध कराइए. वहां ऑल-वेदर रोड्स बनाइए.''

कहने की आवश्यकता नहीं है कि भाजपा अब केंद्र और राज्य में सत्ता में है, लेकिन न तो गंगा पर बनने वाले सारे बांध निरस्त हुए हैं और न सभी गांवों में हेलीपैड हैं. हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कहते हैं, ''केदार हादसे के बाद हमने हिमालय सब मिशन बनाया था, जो बहुत महत्वपूर्ण था. लेकिन, उस पर काम आगे नहीं बढ़ सका.''

योजना आयोग ने 17 मार्च 1992 को डॉ. जे.एस. कासिम की अध्यक्षता मं  विशेषज्ञों का एक दल बनाया, जिसने पूरे हिमालय का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला था कि हिमालयी राज्यों का एक अलग मंत्रालय होना चाहिए. इस कमेटी की सिफारिशें अभी भी लंबित हैं. वर्तमान शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी 2014 में संसद में हिमालय नीति और अलग मंत्रालय की मांग की थी.

निशंक अब केंद्र में मंत्री हैं और मांग ठंडे बस्ते में है. वाडिया इंस्टीट्यूट, देहरादून के पूर्व ग्लैशियोलॉजिस्ट डॉ. डी.पी. डोभाल कहते हैं, ''नीति जब बनेगी, तब बनेगी. लेकिन अब कम से कम ग्लेशियर के अध्ययन को लेकर कोई अच्छा संस्थान बने. अब यह जानना बहुत जरूरी हो गया है कि जहां भी हाइड्रो प्रोजेक्ट बन रहे हैं, वहां ग्लेशियर की क्या स्थिति है.''

जुयाल चेताते हैं, ''पनबिजली परियोजनाओं की भूख बढ़ती ही गई. बड़े-बड़े बांध बनाकर नदियों के स्वाभाविक बहाव को रोक दिया गया. फिर छोटे बांध बनाने लगे. जंगल तो काटा ही जाता है. ऊपरी हिमालय में नदियों का बहाव रोकना, आज नहीं तो कल तबाही का कारण बनेगा.''

इस वक्त उत्तराखंड में 41 हाइड्रो पावर प्रोजक्ट निर्माणाधीन हैं, जबकि 150 से ज्यादा प्रस्तावित हैं. लेकिन क्या चमोली में आई आपदा से हम चेतने को तैयार हैं? या फिर कुछ नई कमेटियां और उनकी सिफारिशों के बीच इस आपदा को भुला दिया जाएगा?

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