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उत्तराखंडः मोदी ने भाजपा जिताई हरदा ने हराई कांग्रेस

नेताओं वाली कांग्रेस के पास कार्यकर्ता होते तो उन्हें जमीन पर कुछ दिखता. करप्शन, घोटाला जैसे शब्दों का अब कहीं असर नहीं होता.

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विधानसभा चुनाव 2022 । उत्तराखंड

दिनेश जुयाल

जब हरीश रावत की कांग्रेस हारना ही चाहती थी तो नरेंद्र मोदी भी क्या कर सकते थे, उन्हें तो भाजपा को जिताना ही था. उत्तराखंड में पिछली सरकार के सारे अवगुण हर की पैड़ी में धुल गए हैं. कुछ लापरवाह क्षत्रपों की वजह से केसरिया खेमे की तरफ बढ़ रही हार को वक्त रहते थामने में भाजपा सफल रही.

आखिरी दांव में अपने ही मुख्यमंत्रियों की चूलें हिलाने वाले हरक सिंह रावत को भाजपा ने खेल-खेल में कांग्रेस के बुजुर्ग हरीश रावत उर्फ हरदा के कंधे पर लाद दिया. इस तरह भाजपा ने घर की सफाई भी कर दी. नितिन गडकरी के काम उत्तराखंड में मोदी के खूब काम आए. लोकल कनेक्ट भी खूब ढूंढ़े. एक हाथ में गरीबों के लिए राशन की थैली, दूसरे में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का मिक्स्चर, जुबान पर देवभूमि की आराधना के मंत्र...और चल गया मोदी मैजिक.

उत्तराखंड का विनम्र जनादेश यही है कि जब कांग्रेसी राजा अपने जर्जर हो रहे किलों में झपकी लेने लगे, तो भाजपा के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. इसलिए 'बारी-बारी, सत्ता तुम्हारी’ का मिथक तोड़ना पड़ा. कुछ बड़े लोगों का गुरूर तोड़ कर जनता ने यह भी फैसला सुनाया कि हवा में न चलें, जमीन संभालें और जमीन बनाएं. आम आदमी पार्टी (आप) के अरविंद केजरीवाल के लिए संदेश है कि उत्तराखंड को अभी ठीक से समझ लें तो अगला चुनाव तिकोना बना सकते हैं.

भाजपा और कांग्रेस की तरफ टकटकी लगाकर पार्टी को कब्जाए बैठे तीन-चार बूढ़े नेताओं की सजा यूकेडी को फिर मिली है. पहाड़ों में गिरता मतदान प्रतिशत क्षेत्रीय अपेक्षाओं के मरते जाने का संकेत भी है. जनादेश ने पुष्कर धामी को शायद समझाया है कि भगत सिंह कोश्यारी के अलावा दूसरे गुरु भी तलाश लें और यह भी समझ लें कि बड़ी कुर्सी पर बने रहने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं.

राजगद्दी पर बिठाए गए महानुभावों के बेतुके फैसलों की वजह से सत्ता विरोधी रुझान तो जबरदस्त था. इसी वजह से भाजपा को एक टर्म में तीन मुख्यमंत्री आजमाने पड़े. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेना का असर देखिए कि गांव-गांव के महिला मंगल दलों के कीर्तन बुजुर्गों ही नहीं बच्चों के मन में भी अलग किस्म का श्रद्धाभाव जगाने लगे. फौजी परिवारों पर तो पहले ही जादू चल चुका था.

नेताओं वाली कांग्रेस के पास कार्यकर्ता होते तो उन्हें जमीन पर कुछ दिखता. करप्शन, घोटाला जैसे शब्दों का अब कहीं असर नहीं होता. एक बार फिर सीएम बनने का सपना लिए कांग्रेस के बुजुर्ग क्षत्रप हरीश रावत की हरकतों से आजिज दिल्ली ने कुमुक भी नहीं भेजी. राहुल गांधी एक फेरी लगा कर शांत हो गए. हरदा अपनों को ही हराने का खेल खेल रहे थे. रामनगर से रणजीत सिंह को सल्ट भगा कर ही माने और खुद लालकुआं के कुएं में जा डूबे. एक फैसले से तीनों सीटें चली गईं.

नैनीताल सीट भाजपा से लौटे यशपाल आर्य के बेटे के नाम कर उसे भी गंवा दिया. हरक सिंह को आखिरी वक्त में एंट्री तो दे दी लेकिन चुनाव नहीं लड़ने दिया. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय और महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सरिता आर्य को भाजपा को सौंप दिया. इस तरह दो सीटें वे ले गए. यही नहीं, कथित तौर पर मुस्लिम युनिवर्सिटी खोलने जैसी घोषणा कर बैठे. अब भाजपा की इससे अधिक क्या मदद क्या करते!

भाजपा इस बात को लगातार समझा रही है कि जीतने के लिए पार्टी को चुनावी मशीन बनाना पड़ता है, जिसमें हर वक्त आयलिंग भी करनी पड़ती है. मेंटिनेंस की हैसियत बनानी पड़ती है. जिसका जितना शोर, उसमें उतना जोर. जैसे फ्लेवर बनाने पड़ते हैं, ब्रांडिंग करनी पड़ती है. यह फार्मूला सब जगह की तरह उत्तराखंड में चला और खूब चला.

सीएम फेस तो कांग्रेस और आप का ही नहीं, भाजपा का भी पिट गया. वैसे, यहां सीएम फेस लेकर लड़ने की परंपरा भी नहीं है. सब दिल्ली तय करती है. मुख्यमंत्री धामी की हार के कारण अंदर-बाहर तलाशे जा रहे हैं. मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए यहां की सदाबहार म्युजिकल चेयर प्रतियोगिता एक बार फिर होगी.

21 साल में 11 मुख्यमंत्री देने वाले उत्तराखंड की नई विधानसभा में मदन कौशिक और सतपाल महाराज के अलावा कितने सीएम फेस हैं, अभी पता नहीं. दिल्ली में बैठे अनिल बलूनी लंबे समय से जुगाड़ भिड़ा रहे हैं. हार के बावजूद धामी इस रेस से बाहर नहीं हैं. हां, हरक सिंह के कांग्रेस में जाने से कुर्सी खींच वाले खेल की रौनक कुछ कम रहेगी.

-दिनेश जुयाल वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखंड के राजनैतिक मामलों के जानकार हैं

नई विधानसभा में मदन कौशिक और सतपाल महाराज के अलावा कितने सीएम फेस हैं, अभी पता नहीं. दिल्ली में बैठे अनिल बलूनी लंबे समय से जुगाड़ भिड़ा रहे हैं.

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