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आवरण कथाः जीते पर  बेचैन

छह बार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शायद अपनी उम्मीद के मुताबिक विजयी धूम-धड़ाके के साथ सत्ता में नहीं लौट पाए. उनकी गद्दी के पीछे भाजपा बड़े भाई के तौर पर हो सकती है असल ताकत 

बड़े भाई सासाराम में एक रैली को संबोधित करते सीएम नीतीश कुमार और उनके पीछे पीएम मोदी की तस्वीर बड़े भाई सासाराम में एक रैली को संबोधित करते सीएम नीतीश कुमार और उनके पीछे पीएम मोदी की तस्वीर

अमिताभ श्रीवास्तव

नीतीश कुमार को खुश होना चाहिए. उन्होंने उन जनमत सर्वेक्षणों को गलत साबित कर दिया जिन्होंने दबी-छिपी सत्ता विरोधी लहरों के बहाव में उनका सूपड़ा साफ होने की भविष्यवाणी की थी. पूरे जी-जान से लड़े गए बिहार विधानसभा चुनाव के जब नतीजे आए तो नीतीश की अगुआई में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने साधारण-सा बहुमत हासिल कर लिया और उस महागठबंधन (एमजीबी) की पक्की चुनौती को नाकाम कर दिया जिसकी अगुआई उनके पुराने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद यादव के नौजवान

किसको कितने वोट
किसको कितने वोट

बेटे तेजस्वी यादव कर रहे थे. इसके साथ ही यह पक्का हो गया कि नीतीश लगातार चौथे कार्यकाल के लिए (कुल सातवीं बार) बिहार के मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे.

मगर, जीत के घंटों बाद भी, अपनी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) के आधिकारिक हैंडल से मतदाताओं के प्रति धन्यवाद के एक ट्वीट के अलावा, नीतिश ने चुनाव नतीजों को लेकर चुप्पी ओढ़ ली. यह इसलिए और भी अजीब था क्योंकि उनके गठबंधन के दूसरे भागीदार, खासकर भारतीय जनता पार्टी, बड़ी धूमधाम से जीत का जश्न मना रहे थे. इशारा था कि नीतीश चिराग पासवान के जरिए एनडीए मतों के विभाजन और जद (यू) को नुक्सान पहुंचाए जाने से नाखुश हैं, साथ ही चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने कुछ मुद्दों को जिस तरह संभाला उसे लेकर मन ही मन नाराजगी भी है. लगता यह है कि नीतीश नई एनडीए सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने को राजी होने से पहले अपने सातवें कार्यकाल के कुछ बुनियादी नियम तय कर लेना चाहते हैं.

भाजपा, बड़ा भाई
चुनाव नतीजों से नीतीश के परेशान होने के बहुत-से कारण हैं. एक तो उनकी पार्टी की सीटों की संख्या 2015 की 71 सीटों से घटकर 43 पर (28 का नुक्सान) आ गई है जबकि सहयोगी दल भाजपा 53 से बढ़कर 74 पर (21 का फायदा) पहुंच गई है. इससे राष्ट्रीय पार्टी नई सरकार में बड़ी भागीदार बन गई है. 2020 के चुनाव में भाजपा दबदबे वाली पार्टी बनकर उभरी है. उसने कुल 19.5 फीसद वोट हासिल किए और जद (यू) को 15.4 फीसद वोटों के साथ पीछे छोड़ दिया. तेजस्वी यादव का राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अकेला था जिसने 23.1 फीसद के साथ ज्यादा वोट हासिल किए. तो असल में, नीतीश भगवा ताज पहनेंगे और इसे पहनकर सहज भी महसूस नहीं कर पाएंगे. जद (यू) प्रमुख पहले भी गठबंधन सरकारों का हिस्सा रहे हैं लेकिन ये सरकारें उन्होंने अपनी शर्तों पर चलाई हैं. उन्हें चौकन्ना रहना होगा कि भाजपा राजकाज में कहीं ‘बड़े भाई’ का रवैया न अख्तियार कर ले.

बिहारः तब और अब
बिहारः तब और अब

दूसरा बड़ी चिंता की बात है नई सरकार को दो बेभरोसेमंद सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा. ये हैं पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की अगुआई वाला हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) या एचएएम (एस) और सियासी तौर पर चंचल मुकेश सहनी की अगुआई वाली विकासशील इनसान पार्टी (वीआइपी). दोनों पार्टियों ने चार-चार सीटें हासिल कर एनडीए को आखिरकार 243 सीटों की विधानसभा में बहुमत के लिए 122 का निशान पार करने में मदद की. दोनों पहले भी मनमाने ढंग से पाला बदलती रही हैं और पूरी संभावना है कि समर्थन जारी रखने के बदले अपने हक से ज्यादा कीमत वसूलने से गुरेज नहीं करेंगी.

इन मुश्किल सहयोगियों के अलावा, नीतीश इससे भी परेशान हैं कि भाजपा ने लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को केंद्र में गठबंधन के भागीदार दल के तौर पर बनाए रखा है, बावजूद इसके कि इसके अध्यक्ष चिराग पासवान ने उनके खिलाफ निंदा-भर्त्सना का अभियान चलाते हुए विधानसभा चुनाव में खेल बिगाडऩे का काम किया. लोजपा ने 135 सीटों पर चुनाव लड़ा और महज एक सीट जीती, लेकिन कहा जाता है कि उसने 36 जितनी बड़ी तादाद में सीटों पर जद (यू) की जीत की संभावनाओं को पलीता लगाया. नतीजों के बाद भी चिराग ने साफ कर दिया कि वे राज्य में कभी नीतीश का समर्थन नहीं करेंगे. बताया जाता है कि नीतीश ने भाजपा नेताओं को संदेश भेज दिया है कि अगर वे राज्य में एनडीए को सुचारू ढंग से चलाना चाहते हैं तो लोजपा को लेकर यह दोहरापन खत्म करें.

नीतीश को नेता विपक्ष के तौर पर नई ताकत के साथ उभरकर आए तेजस्वी का मुकाबला भी करना होगा. राजद 75 सीटों के साथ (एमजीबी ने कुल 110 सीटें जीतीं) राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, ऐसे में नीतीश को मुख्यमंत्री के तौर पर कामकाज संभालते हुए विधानसभा में और उससे बाहर भी एकजुट, मजबूत और मुखर विपक्ष से निपटना होगा. 2017 में नीतीश के राजद से रिश्ता तोड़कर भाजपा के साथ जाने से पहले उनके उपमुख्यमंत्री रहे तेजस्वी इस चुनाव में अपने दम पर निखरकर आए हैं. उन्होंने साबित किया है कि वे करिश्माई नेता हैं, जिन्हें राज्य के युवाओं का व्यापक समर्थन हासिल है.ट

जदयू की बदली हैसियत
जदयू की बदली हैसियत

नीतीश ने चुनाव अभियान के आखिरी दिन यह घोषणा की थी कि यह उनका आखिरी चुनाव होगा लेकिन 12 नवंबर को जद (यू) प्रमुख ने यह साफ किया कि वैसे, उनका व्यन्न्तिगत कोई चॉएस नहीं है लेकिन ‘‘अगर हमें काम करने का मौका मिलेगा तो उसी मेहनत से हम काम करेंगे.’’ इसके पहले 5 नवंबर को पूर्णिया के धमदाहा की रैली में उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर भीड़ में मौजूद महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा, ''अब देखिए, बहनों को हम कहेंगे, आप ही के लिए तो सबसे ज्यादा काम किया है, तो आपसे आग्रह है, परसों सुबह पहले वोट दे दीजिएगा.’’

एनडीए क्यों जीता
महिलाओं से यह अपील बहुत माकूल वक्त पर की गई थी, क्योंकि नतीजों से पता चलता है, यह उन्हीं का समर्थन था जिसने नीतीश की अगुआई वाले एनडीए को एक बार फिर सत्ता में पहुंचाया. चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक, आखिरी दौर में 65.5 फीसद वोटर महिलाएं थीं और उन्होंने 54.9 फीसद पुरुष मतदाताओं को भारी अंतर से पीछे छोड़ दिया था. बिहार के इस चुनाव में कुल मिलाकर 59.7 फीसद महिलाओं ने जबकि 54.7 फीसद पुरुषों ने वोट डाले. महिला मतदाताओं पर नीतीश का हमेशा ध्यान रहा है और इसीलिए वे उनके लिए कई योजनाएं लेकर आए. इनमें लड़कियों को साइकिल बांटना और पंचायत के पदों पर 50 फीसद आरक्षण शामिल है. यहां तक कि नशाबंदी भी उन्हीं के फायदे के लिए थी. जनतम सर्वेक्षणों से यह भी पता चला कि प्रधानमंत्री की उज्ज्वला (मुफ्त गैस कनेक्शन), स्वच्छ भारत (मुफ्त शौचालय) और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, जिसे छठ पूजा तक बढ़ाया जा रहा है, सरीखी योजनाओं का भी बड़ा असर पड़ा.

महिला मतदाताओं के साथ-साथ, लगता है सुशासन के उनके पिछले रिकॉर्ड से कमाई गई सद्भावना और भाजपा के साथ गठबंधन जारी रखना भी नीतीश के हक में गया है. असल में, यह दूसरे और तीसरे चरण के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तूफानी चुनाव अभियान ही था जिसने गठबंधन को हार की कगार से पीछे खींच लिया. प्रधानमंत्री की भारी लोकप्रियता कायम है और अपनी हरेक जनसभा में उन्होंने नीतीश का जबरदस्त समर्थन किया. इसने ''डबल इंजन’’, यानी बिहार और केंद्र दोनों जगह एनडीए की सरकार, का अफसाना रचा जिसने आखिर नीतीश को सत्ता में बनाए रखने में मदद की.

हालांकि जद (यू) के एक बड़े नेता ने स्वीकार किया कि कोई विकल्प न होने के कारक पर बहुत ज्यादा भरोसा, आत्मसंतोष, नीतीश की सद्भावना पर अतिनिर्भरता और तेजस्वी को मामूली मानकर खारिज कर देने की वजह से पार्टी की सीटें कम हुई हो सकती हैं. भाजपा के एक बड़े नेता कहते हैं, ''ऐसे राज्य में जहां 3.93 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और 6.21 करोड़ मोबाइल फोन हैं, सोशल मीडिया पर जद (यू) की मौजूदगी ढीली-ढाली है जबकि विरोधी राजद ने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए इसका आक्रामक ढंग से इस्तेमाल किया. यही नहीं, जिन्हें जद (यू) के चुनाव अभियान को बढ़ाने और ब्रांड नीतीश को मजबूत करने का काम सौंपा गया था, वे बेअसर रहे.’’ 

 

भविष्य के खतरे
राजद की तरह जद (यू) भी मूल जनता दल से टूटकर बनी पार्टी है, राजद 1997 में बनी तो जद (यू) 2003 में अस्तित्व में आई. दोनों ही समाजवादी विचारधारा को मानती हैं लेकिन लालू प्रसाद और नीतीश के बीच जो फर्क है, उसने पक्का कर दिया कि दोनों ने केवल एक बार साथ चुनाव लड़ा, वह भी 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए. नीतीश ने अपना उत्तराधिकारी नामजद नहीं किया है लेकिन अशोक चौधरी, संजय झा, वीरेंद्र यादव और श्रवण कुमार सरीखे जद (यू) के बड़े नेता उनकी सहायता करते हैं. 

फिर भी ऐसा नहीं है कि नीतीश के हाथ में अपने कुछेक अच्छे पत्ते नहीं हैं. अपने संख्याबल के बावजूद भाजपा जानती है कि नीतीश पर एक सीमा से आगे दबाव नहीं डाला जा सकता. मुख्यमंत्री के करीबी सूत्रों ने इंडिया टुडे से कहा कि नीतीश हमेशा ऐसे राजनेता रहे हैं जो अपनी छवि पर पूरा ख्याल रखते हैं और सीटों की संख्या कम होने की वजह से उनके कामकाज के इस तरीके में कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है.

एक सूत्र ने कहा, ''यह जानने के लिए कि कोई सामने मौजूद काम किस तरह करने जा रहा है, आपको उस शख्स का ट्रैक रिकॉर्ड और व्यवहार का पैटर्न देखने चाहिए. नीतीश ने लालू के परिवार की छवि का बचाव करने के बजाए राजद गठबंधन को तिलांजलि दे दी थी. एनआरसी के मामले में उन्होंने भाजपा को अपनी हिंदुत्व की ताकत नहीं दिखाने दी. और यह बात भाजपा बहुत अच्छी तरह जानती है.’’

इस बीच, जद (यू) के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि ''वोट के आंकड़ों को अलग-अलग नहीं देखना चाहिए क्योंकि जीती गई कुल 125 सीटें नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बने रहना पक्का करेंगी.’’ नीतीश ने अति पिछड़ी जातियों और तमाम जातियों की महिलाओं का रंग-बिरंगा गठबंधन भी जोड़ा, जिसने सत्ता कायम रखने में एनडीए की मदद की है. हालांकि इन नतीजों के बाद विधानसभा में उनकी ताकत कम हो गई है, लेकिन जद (यू) इस बात से तसल्ली कर सकता है कि उसके वोट जस के तस हैं (बल्कि थोड़े बढ़े ही हैं और 2015 के 60.41 लाख से बढ़कर 64.8 लाख हो गए हैं). भाजपा की वोट हिस्सेदारी 93 लाख से घटकर 82 लाख पर आ गई है जबकि राजद ने 70 लाख से 97 लाख की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की है.

तेजस्वी का धावा
भाजपा ने बिहार के इस चुनाव में भले ही अच्छा प्रदर्शन किया हो, लेकिन यह तेजस्वी ही हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के लिए 75 सीटें जीतकर समर्थकों और विरोधियों दोनों को हैरत में डाल दिया है. इस नौजवान नेता ने चारा घोटले के मामलों में जेल की सजा काट रहे अपने पिता लालू प्रसाद की गैरमौजूदगी में जानदार चुनाव अभियान की अगुआई की. राजद और तेजस्वी ने पुराने 'जंगल राज’ के तमगे से पिंड छुड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रहने दी. ''दस लाख सरकारी नौकरियां’’ देने के उनके वादे ने बिहार के युवाओं को जबरदस्त ढंग से लुभाया, खासकर तब जब इस चुनाव में 18-29 साल के आयु समूह के 1.67 करोड़ या 23.6 फीसद यानी कुल मतदाताओं के करीब एक चौथाई मतदाता थे. तेजस्वी ने उनके दिल को छुआ और तब और भी ज्यादा जब कोविड-19 ने राज्य में चौतरफा बेरोजगारी पैदा की है.

तेजस्वी एक विकास कार्यक्रम भी लेकर आए और उसे 'कमाई, पढ़ाई, सिंचाई, दवाई, सुनवाई और कार्रवाई’ सरीखा आकर्षक नारा दिया. तेजस्वी के कंधों पर पिता की मिली-जुली विरासत थी, क्योंकि लालू को जहां बिहार में कभी पिछड़ी जातियों को ताकतवर बनाने का श्रेय दिया जाता था, वहीं उनका शासनकाल अराजकता और कुशासन के लिए भी जाना जाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने तेजस्वी को जिस तरह ‘जंगलराज का युवराज’ बताया, उसका मकसद वाकई इसी हकीकत को उभारकर सामने रखना था.

राजद को अपने गठबंधन के भागीदार दलों की कीमत भी चुकानी पड़ी. राजद नेतृत्व का एक हिस्सा मानता है कि पार्टी ने उसी क्षण पहल गंवा दी थी जब तेजस्वी ने 70 सीटें कांग्रेस की झोली में डाल दी. अंतत: कांग्रेस महज 19 सीटें जीत सकी, जो 2015 में उसकी जीती सीटों से आठ कम हैं. जहां भाजपा की संगत से नीतीश को फायदा हुआ, वहीं राजद देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी के लचर प्रदर्शन की वजह से जोश और रफ्तार गंवा बैठा.

तेजस्वी के चुनाव अभियान का केंद्रीय मकसद यह था कि पार्टी का समर्थन आधार और व्यापक किया जाए और एम-वाइ (मुस्लिम-यादव) समीकरण की सीमा से आगे बढ़ा जाए. करीब 30 फीसदी वोटों के साथ यह एम-वाइ समीकरण मजबूत होते हुए इतना ताकतवर नहीं है कि सीधे मुकाबलों में सीटें जितवा सके. उन्होंने हरेक तक पहुंचने की भरपूर कोशिश की, राजद को ए से जेड तक की पार्टी बताया और यहां तक कि नीतीश के साथ जुड़ी अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के 24 उम्मीदवार भी मैदान में उतारे. मगर आखिर में राजद को मिले 23.1 फीसद वोट इशारा करते हैं कि तेजस्वी की अपील पर ध्यान भले दिया गया हो लेकिन वह उसे वोटों में बदलने में नाकाम रही.

राजद की अगुआई वाले महागठबंधन को मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में नुक्सान उठाना पड़ा जहां असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन) ने पांच सीटें जीतीं. अल्पसंख्यक समुदाय ने पारंपरिक तौर पर हालांकि कांग्रेस और राजद को वोट दिया, लेकिन इन सीटों पर उसने एआइएमआइएम को तरजीह दी. इस पार्टी ने जो पांच सीटें जीतीं, उनमें से दो पर जद (यू) और एक-एक पर राजद, कांग्रेस और भाजपा को हराया. एआइएमआइएम ने 5,23,000 वोट हासिल किए और कहा जाता है कि इसने महागठबंधन की जीत की संभावनाओं को नुक्सान पहुंचाया.

मोदी-नीतीश की जोड़ी 
आने वाले दिनों में, इस बात के लिए मोदी और नीतीश पर नजर रहेगी कि वे दोनों दलों के बीच भविष्य में पैदा होने वाले मतभेदों को किस प्रकार दूर करते हैं. जुलाई 2017 के बाद जब नीतीश ने एनडीए में शामिल होने के लिए राजद का साथ छोड़ दिया था, दोनों ही एक टीम जैसे बन गए. इससे पहले, उनके बीच संबंध कभी नरम, कभी गरम थे. वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में नीतीश जब मंत्री थे तब उन्होंने गुजरात में विकास के मोदी के रिकॉर्ड की प्रशंसा की थी लेकिन 2013 में जब मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित किया गया तो नीतीश ने एनडीए छोड़ दिया.

लेकिन 2017 के बाद से, मोदी और नीतीश ने अपनी दुश्मनी दफन कर दी और दोनों के बीच शानदार तालमेल दिखा. नीतीश न केवल पीएम की 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान बिहार में संबोधित की गई सभी रैलियों में उपस्थित रहे बल्कि पीएम के नामांकन के लिए वाराणसी भी गए थे. इस साल, बिहार चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले, मोदी ने 18 सितंबर को नीतीश का जोरदार समर्थन करते हुए कहा था, ‘‘नीतीशजी जैसा सहयोगी हो तो क्या कुछ संभव नहीं.’’ बाद में जद (यू) ने अपने चुनावी पोस्टरों में प्रधानमंत्री की यह बात लिखी थी. 

नीतीश ने 23, 28 अक्तूबर और 3 नवंबर को हुई मोदी की रैलियों में भी भाग लिया, जहां सीएम ने अपने भाषणों को छोटा रखा और प्रधानमंत्री को ही मुख्य भूमिका निभाने दी. पीएम जहां भी बोले वहां भीड़ की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और रैलियां बड़ी हिट थीं. एनडीए की जीत के बाद, 11 नवंबर को दिल्ली में हुई भाजपा की विजय रैली में प्रधानमंत्री के भाषण ने सभी संदेहों को दूर करते हुए साफ किया कि नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे. उन्होंने कहा, ''नीतीशजी के नेतृत्व में, हम बिहार के लोगों से किए गए वादों को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.’’ 

अंत भला तो सब भला
69 साल के हो चुके नीतीश एक ऐसे नेता हैं, जिन्होंने अपने राजनैतिक कौशल से अक्सर चुनौतियों को मात दी है. निवर्तमान सरकार के 33 सदस्यीय बिहार मंत्रिमंडल में, नीतीश के जद (यू) के कोटे से 23 और भाजपा के 10 मंत्री थे. अब, जब नई सरकार सत्ता संभालेगी तो सत्ता का समीकरण भले ही न बदले पर संख्याबल तो बदल ही जाएगा; मंत्रिमंडल में भाजपा के अधिक सदस्य हो सकते हैं.

हालांकि कैबिनेट में भाजपा की बढ़ी संख्या को लेकर चिंताएं हैं, लेकिन सुशील मोदी का फिर से उपमुख्यमंत्री बनना नीतीश के लिए कुछ राहत देने वाला होगा. एनडीए की दो सरकारों में 11 साल एक साथ बिताने के बाद, नीतीश और सुशील ने दोनों के बीच समय-सीमा में काम पूरा करने को लेकर एक गहरी समझ विकसित हुई है. भाजपा के सुशील मोदी कहते हैं, ''बिहार के लोगों ने भ्रष्टाचारियों को राज्य को फिर से लूटने के अवसर से वंचित कर दिया. हम आभारी हैं कि वे एनडीए पर भरोसा करते हैं.’’ 

नीतीश और भाजपा के लिए बड़ी चिंता बेरोजगारी के मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया होगी. पिछली सरकार में भाजपा के एक वरिष्ठ मंत्री कहते हैं, ''सरकार तेजस्वी के उठाए मुद्दों की अनदेखी नहीं कर सकती है. हमारा आकलन है कि वे राजद के मुस्लिम-यादव आधार में नए वोटर जोडऩे में सफल नहीं हो पाए हैं, लेकिन अगर हम बिहार में उनकी ओर से तैयार की गई नौकरियों की एक नई चुनाव कथा पर काम करने में असमर्थ रहते हैं, तो हम उन्हें एक नया वोट बैंक सौंप देंगे.’’

2015 में सत्ता में बनाए रखने में मददगार रहे ‘सुशासन’ के विजयी मंत्र 'सात निश्चय’ की अगली कड़ी के रूप में नीतीश सात निश्चय-पार्ट 2 का वादा पहले ही कर चुके हैं. साथ निश्चय पार्ट-1 में बिजली, शौचालय और हर घर को नल से पीने का जल देना और गांवों पक्की सड़कों का निर्माण उनके स्पष्ट लक्ष्य थे. लगभग सभी कार्यक्रमों ने अपने लक्ष्यों को पूरा किया है. नीतीश के नए सात संकल्पों में युवाओं के कौशल को बढ़ाने, महिलाओं के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देने, खेतों तक सिंचाई की सुविधा प्रदान करने और लोगों के लिए अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के कार्यक्रम शामिल हैं.

वे काम की प्रगति की निगरानी के लिए एक तंत्र स्थापित करने के अलावा, अलग कौशल और उद्यमशीलता विभाग, व्यावसायिक उद्यम शुरू करने वाली महिलाओं को 10 लाख रुपए की सहायता प्रदान करने का भी वादा करते हैं. एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ‘‘सरकार युवाओं की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए कौशल वृद्धि लक्ष्य का विस्तार कर सकती है. छात्र ऋणों की माफी भी हो सकती है.’’ 

नई सरकार को कौशल विकास से परे भी देखना होगा. समय की मांग है कि बिहार में रोजगार सृजन के लिए परिस्थितियां बनें. मैन्युफैक्चरिंग या औद्योगिकीकरण के क्षेत्र मंु बहुत कुछ नहीं होने के कारण, बिहार अन्य राज्यों में प्रवास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. सरकार को इस ओर कदम बढ़ाने और रोजगार के लिए बाहर जाने की इस प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश करने की जरूरत है.

बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 कहता है कि ग्रामीण बिहार में पुरुष श्रमिकों के लिए श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) 64 प्रतिशत था जो अखिल भारतीय औसत से लगभग 8 प्रतिशत कम है. राज्य की प्रति व्यक्ति आय 2018-19 में 30,617 रुपए थी जो 2019-20 में बढ़कर 43,000 रुपए हो गई है. लेकिन, यह अब भी राष्ट्रीय औसत से आधे से भी कम है. नीतीश को रोजगार देने, आय बढ़ाने के लिए सेवाओं और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए.

सीएम के रूप में, नीतीश ड्राइवर सीट पर हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन उन्हें रास्ता दिखा रहा है या कौन पीछे बैठा है, गाड़ी उनके नियंत्रण में रहेगी और वे राज्य को कठिन समय से बाहर निकालने में मुख्य भूमिका निभा सकते हैं. अगर इतिहास को खंगालें तो उनको कुछ वास्तविक काम करके दिखाने वाले बिहार के मुख्यमंत्रियों में सबसे ऊपर रखा जाएगा. ठ्ठ

कभी नीतीश के डिप्टी सीएम रहे तेजस्वी इस चुनाव को अपने दम पर लड़े और उन्होंने खुद को एक करिश्माई नेता साबित कर दिया. उन्हें युवाओं का व्यापक समर्थन हासिल हुआ

नीतीश को अपने विधायकों के प्रति लगातार चौकन्ना रहना होगा क्योंकि खतरा जितना राजद से है उतना ही सहयोगी दल भाजपा से भी है
सीएम नीतीश ड्राइवर सीट पर हैं. इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन उन्हें रास्ता दिखा रहा है, कौन पीछे बैठा है. उनका नियंत्रण स्टीयरिंग पर रहेगा और वे राज्य को मुश्किल दौर से बाहर निकाल लेंगे


राजद ऐसे पिछड़ा
हालांकि राजद ने चुनाव के पहले चरण में मजबूत शुरुआत की थी लेकिन भाजपा और जद (यू) ने जल्दी ही बराबरी कर ली और दूसरे चरण व तीसरे चरण में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की

पहला चरण: 28 अक्तूबर को 71 सीटों पर मतदान हुआ. राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन बेहतरीन शुरुआत करते हुए इस चरण में 46 सीटें जीत लीं (राजद-31, कांग्रेस- 8 और वामपंथी पार्टियां-7) जबकि एनडीए को केवल 22 सीटें (भाजपा-11, जद (यू) -7 और हम-4) ही मिलीं. तीन सीटें अन्य के हाथ लगीं.

दूसरा चरण: 3 नवंबर को हुए इस चरण में 94 सीटों पर मतदान हुआ. इसमें एनडीए ने जोरदार वापसी करते हुए 54 सीटें हासिल कर लीं (भाजपा-34, जद (यू)-17 और वीआइपी-3) जबकि राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को महज 39 सीटें ही मिल पाईं (राजद-28, कांग्रेस-4 और वामपंथी पार्टियां-7). अन्य के खाते में केवल 1 सीट रही.

तीसरा चरण: 7 नवंबर को 78 सीटों पर हुए तीसरे चरण के मतदान, जिसके दो दिन पहले नीतीश ने घोषणा की थी कि यह उनका आखिरी चुनाव होगा, में एनडीए ने 52 सीटें जीत लीं और उसकी सफलता की दर 67 प्रतिशत रही. राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को केवल 21 सीटें ही मिल पाईं (राजद-13, कांग्रेस-6 और वामपंथी पार्टियां-2) जबकि एआइएमआइएम ने बाकी की 5 सीटें जीत लीं.

चरण-I
चरण-II
चरण-III
बहुत करीब, अब भी...
आरजेडी नेता तेजस्वी 
यादव 1 नवंबर को दीघा में एक रैली के दौरान

 

बड़े काम के छोटे खिलाड़ी

एनडीए सरकार वीआइपी और एचएएम (एस) पार्टियों के आठ विधायकों पर निर्भर है. इस चुनाव में छोटी पार्टियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है

1. जीतन राम मांझी
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और दलित नेता जीतन राम मांझी को जब पद से हटा दिया गया था तो उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ बगावत कर दी थी. जद (यू) से निकाले जाने के बाद उन्होंने 2015 में अपनी अलग पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) या एचएएम (एस) का गठन कर लिया था. इसके बाद 2019 में लोकसभा का चुनाव हारने के बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ा और फिर लोकसभा चुनाव में राजद का हाथ थामा. अगस्त में वे फिर से नीतीश के खेमे में वापस आ गए.

2. चिराग पासवान
हालांकि लोजपा ने केवल एक सीट जीती लेकिन उसे लगभग 24 लाख वोट मिले. इसके अलावा इस पार्टी ने करीब 36 सीटों पर जद (यू) को नुक्सान पहुंचाया.

3. कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां
कभी एक बड़ी पार्टी रह चुकी कांग्रेस को केवल 19 विधायकों पर संतोष करना पड़ा है. वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा, जिसमें सीपीआइ-एमएल ने 12 सीटें हासिल कीं और सीपीआइ व सीपीएम को दो-दो सीटें मिलीं.

4. असदुद्दीन औवैसी
उनकी पार्टी एआइएमआइएम ने बिहार के सीमांचल में पांच विधानसभा सीटें जीत ली हैं. इसके अलावा इस पार्टी ने राज्य में 5,23,000 से ज्यादा वोट हासिल करते हुए राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को उसके मजबूत समझे जाने वाले गढ़ में काफी नुक्सान पहुंचाया. उनके पांच विधायक भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

5. मुकेश सहनी
खुद को ‘मल्लाह का बेटा’ बताने वाले मुकेश ने 2015 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करके अपना राजनैतिक सफर शुरू किया था. उनकी विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना चुनावी शुभारंभ किया था लेकिन उसे एक भी सीट नहीं मिली थी. वह अक्तूबर में एनडीए में शामिल हो गई. वीआइपी ने चार सीटें जीत लीं लेकिन खुद साहनी हार गए.

—अमिताभ श्रीवास्तव

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