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आवरण कथाः कमजोर प्रदर्शन

भारतीय तीरअंदाजों, निशानेबाजों और मुक्केबाजों को लेकर उम्मीदें ऊंची थीं, लेकिन लचर प्रदर्शनों और जल्दी बाहर होने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो पाया.

दीपिका कुमारी दीपिका कुमारी

तीरअंदाजी

दीपिका कुमारी तोक्यो में नंबर एक रैंकिंग के साथ पहुंची लेकिन उनकी यात्रा क्वार्टर फाइनल तक ही रही, जो तीन ओलंपिक में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. वे दक्षिण कोरिया की आन सान से हार गईं, जो अंतत: चैंपियन बनीं.

अतनु दास ने रोमांचक मुकाबले में 2012 के ओलंपिक चैंपियन ओह जिन-हाएक को हरा दिया लेकिन उसके बाद वे टोक्यो के कांस्य विजेता ताकाहारू फुरूकावा से प्री-क्वार्टर फाइनल में हार गए. मिक्स्ड टीम के लिए कुमारी और दास की जोड़ी काम नहीं आई. दास निजी रैंकिग में प्रवीण जाधव से पिछड़ गए.

निशानेबाजी
उम्मीद थी कि भारत के निशानेबाज लंदन 2012 के प्रदर्शन से बेहतर नहीं, तो वैसा प्रदर्शन जरूर करेंगे, जहां भारतीय दल ने दो पदक जीते थे. ऐसा नहीं हो पाया. केवल सौरभ चौधरी ही फाइनल में पहुंचे. बाकी खिलाड़ी दबाव में बिखर गए, जिसमें मनु भाकर और अभिषेक वर्मा सहित कई अंतिम दौर में लक्ष्य को हिट करने में विफल रहे.

निशानेबाजी के खिलाडिय़ों को हर सुविधा मुहैया है. फिर भी  एनआरएआइ की एक गोपनीय रिपोर्ट के मुताबिक 70 फीसद खिलाड़ी हर बड़ी स्पर्धा में इसलिए पिछड़ जाते हैं क्योंकि वे दबाव में आ जाते हैं या आत्म-नियंत्रण नहीं रख पाते

पुरुष मुक्केबाजी

बॉक्सिंग टीम में भारत के पुरुष मुक्केबाजी दल के लिए उम्मीदें अधिक थीं, जिसमें फ्लाइवेट में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी अमित पंघाल शामिल थे. पंघाल, मनीष कौशिक और विकास कृष्ण पहले दौर में ही हार गए. सतीश कुमार एक मैच जीतने वाले अकेले योद्धा थे. अभी भी 2008 बीजिंग में विजेंदर सिंह ओलंपिक पदक जीतने वाले एकमात्र पुरुष मुक्केबाज हैं.     

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