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जनजातियों की जय

द्रौपदी मुर्मू का रायरंगपुर से रायसीना पहाड़ियों का सफर देश के उपेक्षित-शोषित समुदायों के लिए लंबी छलांग है और देश के इतिहास में यह बेहद महत्वपूर्ण घड़ी है.

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महामहिम राष्ट्रपति : संसद के सेंट्रल हॉल में 25 जुलाई को देश के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद राजनैतिक हस्तियों का अभिवादन करतीं द्रौपदी मुर्मू महामहिम राष्ट्रपति : संसद के सेंट्रल हॉल में 25 जुलाई को देश के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद राजनैतिक हस्तियों का अभिवादन करतीं द्रौपदी मुर्मू

पच्चीस जुलाई को जब द्रौपदी मुर्मू प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमना की जुबानी दिलवाई गई राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के लिए खड़ी हुईं, तो प्रधानमंत्री और दर्जन भर मुख्यमंत्रियों सहित रसूखदारों के उस जमावड़े में सहसा खामोशी छा गई जो इतिहास के इस विरले लम्हे का गवाह बनने के लिए संसद के सेंट्रल हॉल में इकट्ठा हुआ था.

अलबत्ता भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में उनके शपथ लेने के बाद वह हॉल, जिसमें राष्ट्रीय विभूतियों, पूर्व राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों की आदमकद तस्वीरें अपलक निहारती रहती हैं, एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट और 'भारत माता की जय’ के उद्घो ष से गूंजने लगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाद में इसे ''भारत और खासकर गरीबों, वंचितों और दबे-कुचले लोगों के लिए ऐतिहासिक घटना’’ कहा.

वाकई, यह ऐतिहासिक घटना थी. एक शांत और संकोची संथाली लड़की का ओडिशा के रायरंगपुर के देहाती परिवेश से रायसीना हिल पर राष्ट्रपति के विशाल प्रासाद तक पहुंचने का यह सफर महज रंक से राष्ट्रपति भवन की कहानी भर नहीं, उससे कहीं ज्यादा है.

यह प्रेरक अफसाना है जो बताता है कि समाज के हाशिए पर जन्मे एक व्यक्ति ने अपने अथक और अदम्य जज्बे के बूते तमाम बाधाओं और संघर्षों पर विजय पाकर किस तरह देश के इतिहास में जगह हासिल की. राष्ट्रपति बनने के फौरन बाद संसद को अपने पहले संबोधन में मुर्मू ने कहा भी, ''यह हमारे लोकतंत्र की ही शक्ति है कि एक गरीब घर में पैदा हुई बेटी, दूर-सुदूर आदिवासी क्षेत्र में पैदा हुई बेटी, भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंच सकती है.’’

उनकी उपलब्धि की प्रतीकात्मकता अत्यंत विराट है. मुर्मू देश की राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी, दूसरी महिला और, 64 वर्ष की उम्र में, अब तक की सबसे युवतम शख्सियत भी हैं. देश में  आदिवासी कुल तकरीबन 11 करोड़ लोग या आबादी के 9 फीसद के करीब हैं. उनमें से 80 फीसद कुल 28 में से नौ राज्यों में फैले झुरमुटों में रहते हैं. वैसे तो 700 से ज्यादा मान्यता प्राप्त जनजातियां हैं, पर उनमें से केवल दो—भील और गोंड—की आबादी 1 करोड़ से ज्यादा और 30 अन्य जनजातियों में से हरेक की तादाद पांच लाख के आसपास है.

उनमें से ज्यादातर तो देश के मध्य भूभाग में बसे हैं, पर उत्तर में कश्मीर, दक्षिण में कन्याकुमारी, पश्चिम में डांग, पूरब में मयूरभंज और पूर्वोत्तर में इम्फाल जितनी दूर-दराज की जगहों तक भी फैले हैं. अनुसूचित जातियों की तरह, जो आबादी के लिहाज से आकार में उनसे दोगुनी हैं, देश के आदिवासियों या जनजातियों को भी संसद और विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों के अलावा सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं और नौकरियों में आरक्षण हासिल है. मगर दलितों के विपरीत, जिन्होंने खुद को ताकतवर राजनैतिक समूहों के रूप में गोलबंद लिया है, आदिवासी अब भी कहीं ज्यादा साधनहीन अवस्था में ही जी रहे हैं.

उनमें से नब्बे फीसद ग्रामीण इलाकों में रहते हैं. त्रासदी यह है कि वे आज भी सबसे ज्यादा वंचित समुदायों में हैं, खासकर जब गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर मुख्यधारा के भारत से उनकी तुलना की जाती है. देश ने 2011 में जो आखिरी जनगणना की, उसमें 45 फीसद आदिवासियों को गरीबी की रेखा के नीचे दिखाया गया, जबकि उनके मुकाबले बाकी ग्रामीण भारत के 26 फीसद लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे.

जब स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु दर, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर और कम वजन के बच्चों की बात आती है, तब भी सामान्य आबादी के मुकाबले उनकी हालत कहीं बदतर है. साक्षरता दर भी कम है—केवल 59 फीसद आदिवासी साक्षर हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 74 फीसद है. एक नतीजा तो यह है कि एक भी आदिवासी ऊंचा उठकर अब तक सुप्रीम कोर्ट के जज की कुर्सी तक नहीं पहुंचा.

आदिवासियों की दुर्दशा

उनकी माली हालत भी रसातल में बनी हुई है. आदिवासियों की आजीविका के लिए जल, जंगल और जमीन बेहद अहम हैं. मगर अपनी जमीन की मिल्कियत पर ही उन्हें अधिकतम दबाव झेलना पड़ता है क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा खनन और खनिज संसाधनों के अलावा पनबिजली परियोजनाओं और उद्योगों के लिए हड़पा जाता रहा है.

इसने उन्हें भूमिहीन मजदूरों में बदल दिया और काम की तलाश में दूर-दराज के कस्बों और शहरों में पलायन के लिए मजबूर कर दिया है. आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ और खुद आदिवासी प्रोफेसर वर्जिनियस शाशा ने हाल ही में मीडिया से बातचीत में बताया, ''आदिवासियों ने औपनिवेशिक काल के दौरान जिस किस्म का शोषण भुगता, वही आज विकास के नाम पर ज्यादा व्यवस्थित और आक्रामक तरीकों से दोहराया जा रहा है.’’

मुर्मू खुद अभाव और वंचना की इसी पृष्ठभूमि से आईं. उनके पिता बिरंची नारायण टुडु सीमांत किसान थे, जिन्होंने केवल कक्षा 2 तक पढ़ाई की थी. मुर्मू खुशकिस्मत थीं कि वे पुरुष बहुल परिवार में अकेली लड़की थीं और इसलिए अपने पिता की लाडली थीं. हालांकि वे खुद ज्यादा नहीं पढ़ पाए थे, पर चाहते थे कि उनकी बेटी ऊंची पढ़ाई करके अच्छी नौकरी हासिल करे. प्राथमिक स्कूल में मुर्मू के शिक्षक बासुदेव बेहरा कहते हैं, ''वे अक्सर कहते कि अपनी बेटी को कॉलेज और यूनिवर्सिटी भेजने के लिए वे अपनी जमीन बेचने से भी नहीं हिचकेंगे. उन्हें भुवनेश्वर भेजने के लिए उन्होंने अपनी जमीन वाकई गिरवी रख दी थी.’’

मुर्मू ने कक्षा 8 तक अपने गांव के जिस स्कूल में पढ़ाई की, वहां उन्हें नंगे पैर चलकर और एक नहर पार करके जाना पड़ता था. यह नहर भी बरसात में भरपूर नदी बन जाती थी. बेहरा कहते हैं, ''पढ़ाई के प्रति उनका समर्पण ऐसा था कि वे नियमित कक्षाओं में आतीं—न तो मूसलाधार बारिश और न ही बाढ़ से भरी नहर उन्हें डिगा पाती.’’ सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुर्मू के सामने दो विकल्प थे—सात किलोमीटर दूर हाइस्कूल जाएं या भुवनेश्वर चली जाएं. उन्होंने भुवनेश्वर जाने का विकल्प चुना, क्योंकि उन्होंने ठान लिया था कि मेहनत से पढ़कर और नौकरी हासिल करके अपने परिवार की तकदीर संवारना है.

बाधाओं को लांघना

उन्नीस सौ सत्तर के दशक के शुरुआती वर्षों में भुवनेश्वर के कैपिटल गवर्नमेंट हाइस्कूल की जिंदगी एक और तजुर्बा थी. वे बस उतने ही पैर फैला सकती थीं जितना हर महीने उनके पिता के भेजे 10 रुपए इजाजत देते थे. स्कूल की उनकी दोस्त सुचित्रा सामल कहती हैं, ''वे कभी स्कूल की कैंटीन नहीं गईं, बावजूद इसके कि हम उन्हें घुघनी, आलू चाप और दूसरे चीजों की दावत देने को हमेशा तैयार रहते थे. आदिवासी हॉस्टल में मुफ्त मिलने वाले खाने से ही वे गुजारा कर लेती थीं. स्कूल और कॉलेज की पूरी जिंदगी में वे एक बार सिनेमा गईं.’’ कक्षा में भी शायद अपनी पहचान के एहसास से वे पांच अन्य आदिवासी लड़कियों के साथ पीछे बैठतीं.

1970 के दशक में ग्रेजुएट होने के बाद मुर्मू को सिंचाई महकमे के भुवनेश्वर स्थित राज्य मुख्यालय में जूनियर असिस्टेंट की नौकरी मिली. तकरीबन इसी वक्त उन्होंने रायरंगपुर के बैंक अफसर श्याम चरण मुर्मू से विवाह किया. भुवनेश्वर में रह रहे दंपती अपनी सात साल की बेटी की मृत्यु के बाद रायरंगपुर लौट आए. मुर्मू स्थानीय स्कूल में पढ़ाने लगीं, जहां उन्होंने तनख्वाह के बजाए मानदेय स्वीकार किया और नाम कमाया.

भाजपा के स्थानीय नेता राजकिशोर दास की उन पर नजर पड़ी और वे उन्हें राजनीति में ले आए. दास याद करते हैं, ''वे सामाजिक कार्य से अपने ढंग से लोगों की मदद कर रही थीं, तो मैंने कहा कि राजनीति में आ जाएं तो ज्यादा बड़े कार्यक्षेत्र में भलाई के काम कर सकेंगी.’’ वे राजी हो गईं और 1997 में स्थानीय परिषद का चुनाव जीतकर सियासत में पहला कदम रखा. उसी साल वे रायरंगपुर नगरपालिका की उपाध्यक्ष बनीं.

फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. सदी के करवट बदलते वक्त उन्होंने ओडिशा विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीतीं. फिर वे नवीन पटनायक की अगुआई वाली बीजद-भाजपा की गठबंधन सरकार में परिवहन और वाणिज्य मंत्री बनीं. उनके सहयोगी उन्हें मेहनती और ईमानदार शख्स के रूप में याद करते हैं और ऐसे शख्स के रूप में भी जो अपनी जड़ों को कभी नहीं भूला. इसी कार्यकाल के दौरान उन्होंने पक्का किया कि प्रादेशिक राजमार्ग पर कदौनी से ऊपरबेड़ा स्थित उनके घर तक पांच किमी की पट्टी पर पक्की सड़क बन जाए.

मगर मुर्मू की जिंदगी की राह तब बदल गई जब उन्होंने एक के बाद एक अपने दो बेटे और उसके बाद पति को खो दिया. उन्होंने सुध-बुध गंवा दी और गहरे अवसाद में चली गईं. ब्रह्मकुमारी की शाखा से जुड़ने के बाद ही वे अपने आप पर और अपने आसपास पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर सकीं.

उन्होंने अपने बेटों और पति की याद में स्कूल खोला और उसे जनसेवा के तौर पर चलाया. खुद को सामाजिक कल्याण और आदिवासियों के उत्थान में झोंक दिया. उनके काम पर आरएसएस और भाजपा दोनों की नजर पड़ी और 2015 में मुर्मू को झारखंड का राज्यपाल बनाया गया. यह पद उन्होंने जुलाई 2021 में अपना कार्यकाल खत्म होने तक विनम्रता और गरिमा के साथ दृढ़ता से संभाला.

भारत के राष्ट्रपति के रूप में मुर्मू के अधिकार और शक्तियां मोटे तौर पर रस्मी होंगे. वे प्रधानमंत्री की अगुआई वाली केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह और सक्वमति से बंधी होंगी. संविधान के तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों की नियुक्ति करता है और वह सशस्त्र बलों का सुप्रीम कमांडर भी होता या होती है. ये शक्तियां जहां केवल आनुष्ठानिक हैं, राष्ट्रपति के दफ्तर में काम कर चुके अफसरों का कहना है कि हरेक राष्ट्रपति इस पद पर अपनी छाप छोड़ता या छोड़ती है.

कलाम अगर 'जनता के राष्ट्रपति’ थे, तो प्रणब मुखर्जी ने अग्रज राजनेता की भूमिका निभाई. कोविंद ने राष्ट्रपति के पद को रहस्यों से आजाद करने की कलाम की विरासत को जारी रखा, तो मुर्मू से आदिवासी जागरूकता और चेतना बढ़ाने के उम्मीद की जाती है, हालांकि राष्ट्रपति जाति या समुदाय से जोड़े जाने को अच्छा नहीं मानते; यह पद सभी नागरिकों की नुमांइदगी के लिए है. मसलन, कोविंद दलित राष्ट्रपति कहलाया जाना पसंद नहीं करते थे.

राष्ट्रपति मुर्मू की भूमिका

आम चुनाव में त्रिशंकु संसद आने पर राष्ट्रपति जरूरी बेहद अहम भूमिका अदा करते हैं. तब राष्ट्रपति को वह जैसा उपयुक्त समझे उसके हिसाब से काम करने का विवेकाधिकार हासिल है. 1989 के चुनाव में जब किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो तब के राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाने के सिद्धांत पर चले.

राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस ने 197 सीटें जीती थीं और उसे पहला मौका दिया गया. उसने इनकार कर दिया तो वेंकटरमण ने जनता दल के नेता वी.पी. सिंह को बुलाया, जिन्होंने स्वीकार कर लिया. फिर उन्होंने वी.पी. सिंह से बहुमत साबित करने को कहा. के.आर. नारायणन ने चुनाव पूर्व गठबंधन के संख्याबल पर विचार करने को तरजीह दी और किसी भी दावेदार को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने से पहले सबूत के तौर पर समर्थन का पत्र चाहते थे, जो 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी को देना पड़ा.

राष्ट्रपति संसद में पारित किसी विधेयक को वापस भेजकर उस पर अपनी नाखुशी जाहिर कर सकता है, पर संसद अगर उसे उन्हें वापस कर देती है तो वह उस पर दस्तखत करने को बाध्य है. मगर विधेयक पर राष्ट्रपति के दस्तखत करने की कोई समय सीमा नहीं है. मसलन, जैल सिंह ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरफ से संसद में पारित पोस्टल विधेयक पर दस्तखत करने में इसलिए देरी की क्योंकि उन्हें यह कठोर लगा. ऐसा करके उन्होंने इसे बेमतलब और बेकार बना दिया.

जो लोग मानते हैं कि मुर्मू आज्ञाकारी और रबड़ स्टांप राष्ट्रपति होंगी, उन्हें झारखंड के राज्यपाल का उनका कार्यकाल देखना चाहिए, जब भाजपा के रघुबर दास मुख्यमंत्री थे. जून 2017 में मुर्मू ने दो काश्तकारी कानूनों—छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम और संथाल परगना काश्तकारी (एसपीटी) अधिनियम—में संशोधन के लिए पारित विधेयक इसलिए लौटा दिया था क्योंकि यह आदिवासियों को अपनी जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल का अधिकार और सरकार को सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए उस जमीन के इस्तेमाल की इजाजत देता था.

मुर्मू ने विधेयक पर अपनी स्वीकृति देने से इनकार कर दिया और दास सरकार को बाद में उसे वापस लेना पड़ा. मुर्मू मानती थीं कि प्रस्तावित संशोधनों से आदिवासी लाचारगी की हालत में आ जाएंगे क्योंकि उनकी जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल की इजाजत के चलते वे स्वार्थी लोगों के रहमो-करम पर होंगे और यह उन्हें अपनी जमीन से उखाड़ देगा.

भाजपा की आदिवासी रणनीति

मोदी ने देश की आजादी के 75वें वर्ष के मौके पर 'आजादी का अमृत महोत्सव’ मनाने के लिए राष्ट्र को आदिवासी राष्ट्रपति का तोहफा देना चुना, तो इसमें प्रतीकात्मकता से ज्यादा कुछ था. इसमें सधे हुए राजनैतिक गुणा-भाग का एक बड़ा तत्व भी था. भाजपा जब भी केंद्र की सत्ता में रही है, उसने हमेशा राष्ट्रपति के चयन का इस्तेमाल तगड़ा राजनैतिक संदेश देने और अपने चुनावी संभावनाओं में चार चांद लगाने के लिए किया है.

जब वाजपेयी गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री थे, उन्होंने प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. कलाम को राष्ट्रपति के तौर पर चुना, कुछ तो इसलिए कि वे मुसलमान थे और पार्टी के सहयोगी दलों को यह सुहाता. जब मोदी प्रधानमंत्री बने रामनाथ कोविंद का मनोनयन किया, क्योंकि वे दलित समुदाय से थे और इससे पार्टी को अनुसूचित जातियों के ताकतवर राजनैतिक मतदाता मंडल का समर्थन हासिल करने में मदद मिलती.

यह सीख उन्होंने कांग्रेस की ही किताब से ली है, जिसने पूर्व कूटनीतिक के.आर. नारायणन को देश का पहला दलित राष्ट्रपति बनाया और बाद में प्रतिभा पाटील को नियुक्त किया था, जो देश के ऊंचे पद पर पहुंचने वाली पहली महिला बनीं. इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान एक सिख जैल सिंह और दो मुसलमानों—जाकिर हुसैन और फखरुद्दीन अली अहमद—को राष्ट्रपति बनाया.

कुछ लोग मुर्मू की पदोन्नति को मोदी और भाजपा की तरफ से आदिवासियों की देशज धार्मिक पहचान को हिंदुत्व की व्यापक छतरी के तहत लाने की कोशिश के रूप में देखते हैं. दक्षिणपंथ अलबत्ता अपने खिलाफ विभाजनकारी राजनीति के आरोपों का प्रतिकार करने के लिए इसे समावेशी भारत के निर्माण की कोशिश के तौर पर पेश कर रहा है.

उनका कहना है कि यह जाति और वर्ग की बाधाओं को मिटाने और हाशिया-मुख्यधारा, आदिवासी-गैर-आदिवासी सरीखे विभेदों को खत्म करने की दिशा में एक शुरुआत है. एक महिला को और वह भी मयूरभंज—जहां मानव विकास सूचकांक (एचडीआइ) देश में सबसे कम महज 0.15 फीसद है—की एक आदिवासी पृष्ठभूमि की महिला को देश के सबसे ऊंचे पद पर बिठाना राजनैतिक मास्टरस्ट्रोक है. ओडिशा के बीजद और झारखंड के झामुमो सहित कई विपक्षी पार्टियों ने भी विपक्ष की पसंद यशवंत सिन्हा के खिलाफ जाकर राष्ट्रपति पद के लिए मुर्मू की उम्मीदवारी का समर्थन किया, जिससे वे और भी अच्छे बहुमत से जीतीं.

यह सब भाजपा की आदिवासियों और महिलाओं को रिझाने की व्यापक और लंबे वक्त की योजना के मुआफिक बैठता है. हालांकि आरएसएस का वनवासी कल्याण आश्रमों के माध्यम से आदिवासियों के साथ काम करने का लंबा इतिहास रहा है, भले ही वह ईसाई मिशनरियों के प्रभाव का प्रतिकार करने के लिए था, पर कांग्रेस ने चुनावों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया है. भाजपा-आरएसएस की मिली-जुली कोशिशों के नतीजे तो अभी हाल ही में मिले हैं.

द न्यू बीजेपी के लेखक नलिन मेहता बताते हैं कि 2014 में भाजपा ने 47 एसटी सीटों में 26 जीती थीं. मगर 2019 में पार्टी इन सीटों की संख्या बढ़ाकर 31 तक ले आई, जबकि कांग्रेस ने केवल चार सीटें जीतीं. यहां तक कि 55 अन्य लोकसभा सीटों पर जहां आदिवासी वोटों का दबदबा था, भाजपा ने 2019 में 46 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ बड़ी तादाद में 36 सीटें जीतीं. मेहता कहते हैं, अजीब है कि भाजपा मध्य भारत में कामयाबी नहीं दोहरा सकी और 2018 में आदिवासियों के दबदबे वाले राज्य मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ कांग्रेस से और 2019 में झारखंड झामुमो गठबंधन से हार गई.

अलबत्ता आदिवासियों के दिल जीतने की भाजपा की कोशिशें जारी हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में बताया कि आदिवासी उपयोजना का बजट चार गुना बढ़कर 2013-14 के 21,000 करोड़ रुपए से 2021-22 में 86,000 करोड़ रुपए हो गया. विशेष पहलों में 1.28 करोड़ आदिवासी घरों में नल का जल पहुंचाना और उनके लिए 38 लाख पक्के घरों का निर्माण करना शामिल है.

आदिवासियों के लिए विशेष रूप से विकसित एकलव्य मॉडल स्कूलों का बजट छह गुना बढ़कर 1,418 करोड़ रुपए हो गया है. मोदी सरकार ने जिला मिनरल फाउंडेशन भी बनाए हैं ताकि खनन के कामों से होने वाली 30 फीसद कमाई आदिवासी कल्याण पर खर्च की जा सके. साथ ही, वह आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित करके आदिवासी नायकों को श्रद्धासुमन अर्पित कर रही है.

अन्य आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के संग्रहालय बनाने के लिए भी 200 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं. विशेषज्ञ हालांकि आगाह करते हैं कि भाजपा को पता होना चाहिए कि सांस्कृतिक एकजुटता और राजनैतिक प्रतीकवाद उन्हें बस इतनी ही दूरी तक ले जा सकता है. आदिवासी अपने को भारत का अंग तभी महसूस करेंगे जब उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में वास्तविक बदलाव आएगी, जो अभी बहुत बुरी है. यह नाजुक रस्सी है जिस पर भारत को चलना ही होगा. राष्ट्रपति मुर्मू ने रास्ता दिखा ही दिया है.

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