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आवरण कथाः फिर से आंकने का वक्त

कक्षा 10 और 12 की बोर्ड परीक्षाएं रद्द होने या टाल दिए जाने से परेशान छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने भविष्य की योजनाओं की खातिर विभिन्न शिक्षा बोर्ड की ओर उम्मीद भरी नजर लगाई .

श्रीनगर के एक प्राथमिक स्कूल की बिल्डिंग में प्रवेश से पहले तापमान की जांच करवाते पंक्ति में खड़े बच्चे श्रीनगर के एक प्राथमिक स्कूल की बिल्डिंग में प्रवेश से पहले तापमान की जांच करवाते पंक्ति में खड़े बच्चे

अब देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर से पस्त होने लगा, तब 14 अप्रैल को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा को रद्द करने और बारहवीं कक्षा की परीक्षा को टाल देने का फैसला किया, जो 4 मई से 10 जून के बीच होने वाली थी. यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की मौजूदगी में एक बैठक में किया गया.

एक अन्य अखिल भारतीय बोर्ड, भारतीय विद्यालय प्रमाणन परीक्षा परिषद  
(सीआइएससीई) ने भी कक्षा दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं रद्द कर दीं और 12वीं परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं. द इंटरनेशनल बैकलॉरिएट (आइबी) बोर्ड ने एक कदम आगे बढ़कर अपनी 12वीं की परीक्षाएं भी रद्द कर दीं और ऐलान किया कि वह भारत में बगैर परीक्षा वाला तरीका अपनाएगा. कई राज्य बोर्ड भी अपनी परीक्षाएं रद्द कर चुके हैं या फिर उस प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे हैं.

हालांकि, ये कदम उन अभिभावकों के लिए राहत की तरह हैं, जिन्हें अपने बच्चों के लिए इस वायरस के संक्रमण का डर सता रहा था, लेकिन 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा को लेकर अनिश्चितता ने छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों की परेशानी बढ़ा दी है. कई लोगों को लगता है कि इस बार भी पिछली बार जैसी स्थिति दोहराई जाएगी, जब दसवीं और बारहवीं के छात्र परीक्षा सत्र के बीच में थे और तभी देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई थी.

जून, 2020 में, सीबीएसई ने घोषणा की थी कि बोर्ड बाकी बचे प्रश्न-पत्रों के लिए परीक्षा का आयोजन नहीं करेगा और छात्रों का मूल्यांकन वैकल्पिक अंक प्रणाली के जरिए किया जाएगा. दिल्ली के प्रुडेंस स्कूल की 12वीं के छात्र अद्वित बजाज कहते हैं, ‘‘साफ-साफ किसी फैसले के अभाव में हमें भ्रम और घबराहट हो रही है.’’

अनिश्चित भविष्य

हालांकि, इस पर सबकी सहमति है कि परीक्षाएं रद्द करना सही दिशा में उठाया गया कदम है, अभिभावक और छात्र अधिकारियों की तरफ से एक निश्चित रोडमैप की उम्मीद कर रहे हैं. बेंगलूरू में दसवीं कक्षा के एक छात्र के पिता को लगता है कि इस कदम से कड़ी मेहनत करने वाले कई बच्चों का दिल टूट गया है क्योंकि स्कूल की आंतरिक परीक्षाओं में भेदभाव मुमकिन है.

नाम न छापने की शर्त पर एक अभिभावक कहते हैं, ‘‘कई छात्रों के लिए आंतरिक परीक्षाएं बस तैयारी का हिस्सा थीं, जिसका नतीजा उन्हें बोर्ड परीक्षा में दिखाना था.’’ कुछ लोग तो ऐसी परिस्थिति का अनुमान लगा पाने में नाकाम रहने के लिए, खासतौर पर पिछले साल के तजुर्बे के बाद, बोर्ड पर तोहमत लगा रहे हैं. एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जे.एस. राजपूत कहते हैं, ''सीबीएसई को वैकल्पिक योजना तैयार रखनी चाहिए थी.’’ यही नहीं, बारहवीं की कक्षा के लिए भी आंतरिक परीक्षा के आधार पर मूल्यांकन की संभावना से कइयों में बेचैनी है. 

बहरहाल, शिक्षा मंत्री के मुताबिक, ‘‘अगर कोई छात्र मूल्यांकन से संतुष्ट नहीं है, तो वह स्थिति के सामान्य होने के बाद परीक्षा में बैठ सकता है.’’ शिक्षा मंत्री ने कहा कि दसवीं कक्षा के नतीजे बोर्ड की ओर से ‘वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर’ तैयार किए जाएंगे.

दिल्ली के रहने वाले रूपेश कपूर, जिनकी दो बेटियां दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं में बैठने वाली थीं, को लगता है कि अंतिम परिणाम तैयार करने के लिए आंतरिक मूल्यांकन का इस्तेमाल करने से हमेशा एक ‘कमी का अंदेशा’ बना रहेगा. कई शिक्षकों को भी लगता है कि शायद छात्रों के प्रदर्शन का संपूर्ण मूल्यांकन संभव न हो पाए. पिछले अकादमिक सत्र में शिक्षकों और छात्रों के बीच संपर्क की संभावना भी सीमित ही रही.

कपूर कहते हैं, ‘‘स्कूलों को अब बस प्रमाणपत्रों पर पास या फेल लिखना चाहिए क्योंकि कक्षा 10 के अंक शायद ही कहीं उपयोगी साबित होते हैं.’’ कई विशेषज्ञ भी कपूर की बातों से सहमत दिखते हैं और कहते हैं कि कक्षा 10 की परीक्षाओं की अहमियत को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी पूछती हैं, ''आखिर दसवीं के लिए बोर्ड परीक्षा की जरूरत ही क्या है?

नौवीं या ग्यारहवीं में क्यों नहीं?’’ दिल्ली के वसंत वैली स्कूल की प्रिंसिपल रेखा कृष्णन इस बात से सहमत हैं और इसे सीबीएसई और दूसरे बोर्ड के लिए एक अवसर के मौके पर देख रही हैं कि वे दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं खत्म ही कर दे. वे कहती हैं, ‘‘चीजें बदल गई हैं और स्कूल तथा छात्रों को अब तीसरे पक्ष की (बोर्ड परीक्षाएं) जरूरत नहीं है कि उन्हें बताए कि वह विज्ञान, वाणिज्य या मानविकी पढ़ें.’’

बारहवीं की परीक्षा के लिए, 1 जून को समीक्षा कर फैसला लिया जाएगा. पिछले साल, सीबीएसई ने उन विषयों के लिए एक वैकल्पिक अंक प्रणाली निकाली थी, जिसकी परीक्षा में छात्र नहीं शामिल हो पाए थे—बाकी बचे हर विषय के अंक छात्रों के अन्य विषयों के अंकों के आधार पर निकाले गए थे.

इसमें जिन छात्रों ने चार विषयों की परीक्षा दी थी, उनके तीन सबसे अच्छे विषयों में हासिल अंकों का औसत निकाला गया था, जो तीन विषयों की परीक्षा दे चुके थे उनके सर्वश्रेष्ठ दो विषयों का औसत निकाला गया था. जिन छात्रों ने दो या कम विषयों की परीक्षा दी थी उनके लिए आंतरिक अंक भी शामिल किए गए थे. बाद में, सितंबर 2020 में, बोर्ड ने वैकल्पिक ‘सुधार परीक्षाएं’ आयोजित की थीं.

इस साल, अभी तक कोई परीक्षा नहीं हो पाई है. ऐसे में, कक्षा 12 के छात्र मूल्यांकन के एक नए तरीके की संभावना को लेकर चिंतित हैं. वे सरकार से इस बात का आश्वासन चाहते हैं कि परीक्षाएं हों, चाहे बाद ही में क्यों न हो. दिल्ली के राजकमल सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल की 12वीं की कॉमर्स की छात्रा निमिरा फातिमा कहती हैं, ‘‘हम तैयारी करते रहेंगे, लेकिन बाद में जाकर हमसे यह न कह जाए कि परीक्षाएं नहीं होंगी.’’

दिल्ली के जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल की बारहवीं की कॉमर्स की छात्रा सिया मल्होत्रा फातिमा के सामान्य बोर्ड परीक्षाओं के उत्साह से सहमत नहीं हैं. मल्होत्रा कहती हैं, ‘‘हम लोग मार्च, 2020 से ऑनलाइन कक्षाएं कर रहे हैं. एकाउंटेंसी जैसे विषयों में ऑनलाइन तरीके से उसके व्यावहारिक तौर-तरीकों को समझना बेहद मुश्किल है. यही नहीं, आंतरिक मूल्यांकन में हमें गूगल फॉर्म्स पर जाकर विषयनिष्ठ सवाल हल करने होते हैं. अब बिना अभ्यास के हमसे लंबे प्रश्नों के जवाब लिखने की उक्वमीद की जा रही है.’’ 

शिक्षा क्षेत्र के कई विशेषज्ञ उनकी चिंता से सहमत हैं. हालांकि कुछ लोग इशारा करते हैं कि वे अभी भी सरकारी स्कूलों और ग्रामीण इलाके के बच्चों की तुलना में बेहतर स्थिति में है. जम्मू-कश्मीर के स्कूली शिक्षा विभाग के प्रशासनिक सचिव और नवोदय विद्यालय समिति के पूर्व कमिश्नर विश्वजीत कुमार सिंह कहते हैं, ‘‘दूरदराज के इलाकों के छात्रों के पास तो ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच ही नहीं है. इसलिए, अधिकतर तो नियमित परीक्षाओं के लिए भी तैयार नहीं हैं.’’

राजपूत के लिए, छात्रों की शिक्षा के साथ समझौता करना गंभीर मसला है. हालांकि, सीबीएसई ने 2020-21 के अकादमिक सत्र के लिए सिलेबस को 30 फीसद कम कर दिया है, तो भी इस घटे हुए सिलेबस को पूरा करना कइयों के लिए चुनौती बना हुआ है. वे कहते हैं, ''अगर किसी चमत्कार के जरिए कोविड दुनिया से गायब भी हो जाए, तो भी अधिकतर छात्र परीक्षाओं के लिए तैयार नहीं हैं.’’ परीक्षाओं को लेकर अनिश्चितता का असर कॉलेजों, खासकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, में दाखिले पर भी पड़ा है.

इस बीच, स्कूल और अधिकारी स्थिति को सहज बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और निष्पक्ष और साफ-सुथरी मूल्यांकन प्रणाली का वादा कर रहे हैं. लखनऊ में सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल कुंवर्स ग्लोबल स्कूल के संस्थापक और प्रबंध निदेशक राजेश कुंवर सिंह कहते हैं, ‘‘मुझे भरोसा है कि चाहे बोर्ड कोई भी हो, सभी छात्रों के लिए सर्वश्रेष्ठ रास्ता निकाला जाएगा. अधिक संभावना इस बात की है कि छात्रों को ऑनलाइन मूल्यांकनों, पूर्व की परीक्षाओं, कक्षा में सहभागिता और उनके आंतरिक काम के जरिए अंक दिए जाएंगे.’’

आगे की राह

शिक्षाविदों और प्रशासकों का मानना है कि यह संकट शिक्षा के मूल्यांकन और सुधारों की दिशा में तेज कदम बढ़ाने का अच्छा मौका है. कृष्णन कहते हैं, ‘‘हमें इन बोर्ड परीक्षाओं को अहम मानने की आदत हो गई है. लेकिन अब स्कूली शिक्षा से कॉलेज में दाखिले के लिए ये कोई बेंचमार्क नहीं रह गए हैं.’’

केंद्रीय उच्च शिक्षा के सचिव अमित खरे भी यह मानते हैं कि तीन घंटे की परीक्षा में किसी छात्र के स्कूल में सीखी बातों का मूल्यांकन नहीं हो सकता, लेकिन वे आश्वासन देते हैं कि जुलाई, 2020 में लागू की गई नई शिक्षा नीति परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार की बात करती है. खरे कहते हैं, ‘‘यह महामारी इस दिशा में उत्प्रेरक का काम कर सकती है.’’

प्रथम की बनर्जी ने तो 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की प्रासंगिकता पर भी सवाल किए हैं क्योंकि पेशेवर पाठ्यक्रमों में शामिल होने वाले छात्रों को तो हर हालत में प्रवेश परीक्षा में बैठना ही होता है. खरे बताते हैं कि नई शिक्षा नीति के मुताबिक, केंद्रीय विश्वविद्यालय भी अगले साल से अंडर-ग्रेजुएट कोर्स में दाखिले के लिए कॉमन टेस्ट आयोजित करेंगे.

बनर्जी कहती हैं, ''अन्य विश्वविद्यालय और संस्थान भी इस प्रक्रिया को शुरू कर सकते हैं. स्कूल के स्तर पर, इस मूल्यांकन का यही सही वक्त है कि हम क्यों और कैसी बोर्ड परीक्षाएं चाहते हैं.’’ वे एक और क्रांतिकारी विचार पेश करती हैं—ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित करने की बजाए, हर शिक्षक कम से कम 10 छात्रों को एक दिन में फोन करे और उनके साथ विस्तार से बात करे और उन्हें काम दें और उनका अंतिम मूल्यांकन के लिए तैयार करे. इस बात की भी मांग उठी थी कि बोर्ड परीक्षाएं ऑन-डिमांड ऑनलाइन टेस्टों के आधार पर आयोजित की जाएं. 

बहरहाल, भारत में डिजिटल खाई एक बहुत बड़ी समस्या है. भारत की टेलिकॉम स्टेटिस्टिक्स इंडिया रिपोर्ट, 2019 के मुताबिक, ग्रामीण भारत में हर 100 व्यक्तियों पर 25.36 इंटरनेट उपभोक्ता हैं. जबकि शहरों में यह संख्या 97.94 है. लेकिन राजपूत के पास एक कार्ययोजना तैयार है. वे कहते हैं, ''2003 में, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग ने मांग के आधार पर परीक्षाओं की अवधारणा को मजबूत किया, जिसमें छात्र ऑनलाइन परीक्षा और केंद्र का चयन अपने हिसाब से कर सकता है.

अगर अधिकारियों ने पिछले वर्षों में क्षमता का विकास कर लिया होता, तो हमें उस बाधा का सामना नहीं करना होता, जिसका हम अभी कर रहे हैं.’’ बनर्जी उनकी बात से सहमत हैं, ''अगर हम इतनी बड़ी आबादी का तयशुदा समय और स्थान पर टीकाकरण कर सकते हैं, तो हम उसी तरीके से छात्रों की परीक्षाएं क्यों नहीं करवा सकते?’’

शिक्षाविद् इस बात पर एकमत हैं कि मूल्यांकन के विकेंद्रीकृत मॉडल की जरूरत है जिसमें स्कूलों को बड़ी भूमिका निभानी होगी. विश्वजीत कुमार सिंह कहते हैं, ''हमें अपने स्कूलों को वह आजादी देनी होगी कि वे प्रौद्योगिकी का अपने मन मुताबिक इस्तेमाल कर पाएं और मूल्यांकन के अपने मॉड्यूल तैयार कर सकें. यह चीज ऊपर से थोपी नहीं जानी चाहिए क्योंकि हर स्कूल को अलग किस्म के मसले पेश आते हैं और स्कूल वाले खुद जानते हैं कि उन्हें कैसे सुलझाया जाए.’’

असल में, कुछ बोर्ड पहले से ही स्कूल आधारित वैकल्पिक मूल्यांकन प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं, मसलन आइबी, जो मूल्यांकन जारी करता है इसमें सिर्फ फाइनल परीक्षाओं पर ध्यान नहीं दे रहा है. कैंब्रिज इंटरनेशनल एग्जामिनेशन से मान्यता प्राप्त मुंबई की आइबी स्कूल आदित्य बिड़ला वर्ल्ड एकाडेमी की प्रिंसिपल राधिका सिंह कहती हैं, ''इससे यह तय होता है कि छात्रों को वह ग्रेड मिलता है जिसके वे लायक होते हैं.’’

बेंगलूरू के आइबी स्कूल नींव एकाडेमी की संस्थापक और प्रमुख कविता गुप्ता सभरवाल कहती हैं, ''आइबी जैसे बोर्ड पढ़ाई का मूल्यांकन करते हैं, जो लंबे समय में यानी एक-दो साल में संपन्न होता है. और उसके बाद इसकी देखरेख और ग्रेड बोर्ड तय करता है. पढ़ाई का मूल्यांकन जैसी चीज भारत में अधिक चलन में नहीं है और इसकी जरूरत आगे सीखने की योजना के लिए होती है.’’

हालांकि, एक अच्छी खबर है कि नई शिक्षा नीति का मकसद मूल्यांकन की एक व्यवस्था तय करने का है. खरे कहते हैं, ''हालांकि, दीर्घकालिक योजना पाठ्यक्रमों पर है, हम छात्रों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने की विभिन्न विधियों पर भी विचार कर रहे हैं, जबकि हम उनकी सेहत को सबसे अधिक प्राथमिकता पर रख रहे हैं. जून में जब परिस्थितियों की समीक्षा करते हुए आखिरी योजना तैयार की जाएगी तब सभी पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखा जाएगा.’’ फिलहाल तो छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों की दुविधा मिटाने की दरकार है. 

‘‘नई शिक्षा नीति ने पहले ही परीक्षा प्रक्रिया में व्यापक सुधारों का प्रस्ताव रखा है. उसे लागू करते हुए हमें दीर्घकालिक योजना की जरूरत होगी और यह महामारी इस दिशा में उत्प्रेरक का काम कर सकती है.’’
अमित खरे, सचिव, उच्च शिक्षा, शिक्षा मंत्रालय

‘‘चीजें बदल गई हैं. छात्रों को अब विज्ञान, कॉमर्स या आर्ट्स चुनने के लिए सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं की जरूरत नहीं है.’’
रेखा कृष्णन, प्रिंसिपल, वसंत वैली स्कूल, दिल्ली

‘‘अगर हम इतनी बड़ी आबादी का तयशुदा समय और स्थान पर टीकाकरण कर सकते हैं तो फिर हम उसी तरीके से परीक्षाएं न्न्यों नहीं आयोजित कर सकते?’’
रुक्मिणी बनर्जी, सीईओ, प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन

अब क्या होगा?

दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों का क्या होगा?
●सीबीएसई ने 2021 में होने वाली दसवीं की बोर्ड परीक्षा रद्द कर दी है और बारहवीं की परीक्षा स्थगित कर दी है

●शिक्षा बोर्ड ने कहा है कि दसवीं के छात्रों को आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर ग्रेड दिए जाएंगे लेकिन इसके वस्तुनिष्ठ मानक सीबीएसई की ओर से तय किए जाएंगे

●बारहवीं की परीक्षा के लिए 1 जून को परिस्थितियों की समीक्षा के बाद निर्णय लिया जाएगा

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