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आवरण कथाः खुलकर खर्च करने का वक्त

2021 के बजट पर टिकी हैं भारी उम्मीदें—सरकार को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को गिरते ग्रोथ, मांग और निवेश की दलदल से उबारे.

आर्थिक झटका ग्रेटर नोएडा में ठप पड़ा रियल एस्टेट का एक प्रोजेन्न्ट आर्थिक झटका ग्रेटर नोएडा में ठप पड़ा रियल एस्टेट का एक प्रोजेन्न्ट

जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को 2021 का केंद्रीय बजट पेश करेंगी, तब वे बेशक असाधारण परिस्थितियों में इस काम को अंजाम दे रही होंगी. पिछले साल कोविड-19 की वजह से लगाया गया लॉकडाउन एक किस्म का आर्थिक जलजला था, जिसकी तुलना सितंबर 2008 में लीमन ब्रदर्स के ढहने से पैदा वैश्विक वित्तीय संकट से ही की जा सकती है. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं, ''कोई भी दूसरा बजट इस आने वाले वजट के उतने करीब नहीं ठहरता जितना लीमन ब्रदर्स से जुड़े संकट के बाद पेश किया गया बजट ठहरता है.’’

2008-09 में लाए गए वित्तीय प्रोत्साहन उपायों की बदौलत भारत उस संकट से भला-चंगा निकल आया था. अलबत्ता उस वक्त किए गए भारी-भरकम खर्च ने दूसरी परेशानियों के बीज रोप दिए, जिनमें बाद के वर्षों में कई सारी कॉर्पोरेट कंपनियों का दिवालिया होना और खोटे कर्जों (बैड लोन) का बढ़ता अंबार भी शामिल है. 

सीतारमण का बजट 2021 आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि में आ रहा है, जब लगातार दो तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि रसातल में चली गई है (वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में -23.9 फीसद और दूसरी तिमाही में -7.5 फीसद). 2020 के वित्त वर्ष में समग्र तौर पर अर्थव्यवस्था का नकारात्मक वृद्धि, अनुमानित तौर पर -7.7 फीसद, दर्ज करना तय है.

1960 के दशक के बाद यह स्थिति—जब बजट संकुचन की पृष्ठभूमि में पेश किया जा रहा है—केवल तीन बार आई, 1966-67, 1973-74 और 1980-81 में. पिछले साल मई में गड्ढे में समाती अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए केंद्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान और भारत के जीडीपी के 10 फीसद हिस्से के बराबर 20 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन पैकेज (धन प्रवाह बढ़ाने और कारोबारों को सहारा देने के लिए आरबीआइ के 8 लाख करोड़ रुपए के हस्तक्षेपों सहित) का ऐलान किया था.

अलबत्ता, विशेषज्ञों का कहना है कि और भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है. साथ ही, सीतारमण को बहुत ज्यादा बढ़ते राजकोषीय घाटे से भी जूझना होगा. महामारी की जो अप्रत्याशित कीमत चुकानी पड़ेगी, उसके नतीजतन इस साल के लिए घाटा छलांग लगाकर जीडीपी के 3.5 फीसद के लक्ष्य से बहुत ऊपर पहुंच जाएगा. कुछ अनुमानों के मुताबिक, यह जीडीपी के 7 फीसद तक ऊंचा जा सकता है. इससे आने वाले बजट में बढ़-चढ़कर खर्च कर पाना और भी मुश्किल हो जाएगा.

नई दिशा
अगर अर्थव्यवस्था को 2022-23 तक 5-6 फीसद वृद्धि दर के उसके रुझान पर वापस लाना है और फिर आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित उपायों के लंबे वक्त के फायदों के सामने आने के साथ और भी ऊंची वृद्धि दर पर छलांग लगाने के लिए सहारे के तौर पर इसका इस्तेमाल करना है, तो सीतारमण को खर्च तो करना ही होगा. बीते वर्षों में कई सरकारों ने केंद्रीय बजट के बाहर बड़े खर्चों की घोषणाएं की हैं. फिर भी बजट सरकार के लिए एक दिशासूचक, एक मौका भी है जब वह भारत को और ऊंची वृद्धि के रास्ते पर लाने की अपनी आर्थिक योजनाओं का संकेत दे सकती है.

मुंबई में रहने वाले एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ‘‘अच्छा बजट भारत की दिशा में बड़ा बदलाव भी अपने में समाहित करेगा, क्योंकि यह ऐसे ही एक बदलाव का मौका है.’’ अतीत के कुछ बजट, जैसे 1991 का बजट जो भारत को बाजार संचालित अर्थव्यवस्था की तरफ लाया, या 1977 का बजट जिसने राजस्व बढ़ाने की खातिर उत्पाद शुल्क के जाल का विस्तार किया, दिशा बदलने वाले बजट माने गए हैं.

इस साल जिस परिस्थिति में बजट पेश किया जा रहा है, उसकी आर्थिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि अहम है. भारत की अर्थव्यवस्था कई लोगों की उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से उबर रही है. जीएसटी (माल और सेवा कर) संग्रह लॉकडाउन के महीनों की जबरदस्त गिरावट के बाद फिर से नई ऊंचाई पर लौट आया है. दिसंबर में इसका संग्रह जुलाई 2017 में इसे लागू किए जाने के बाद अब तक का सबसे ज्यादा संग्रह था—1.15 लाख करोड़ रुपए. विदेशी मुद्रा भंडार जनवरी के पहले हफ्ते में 585.3 अरब डॉलर (करीब 42 लाख करोड़ रुपए) के अपने अब तक के सबसे ऊंचे मुकाम पर है.

बिजली की खपत कोविड के पहले के स्तर पर लौट आई है और कोविड-19 के सक्रिय मामले करीब 80 फीसद नीचे आ गए हैं. हालांकि, अर्थव्यवस्था अब भी खतरों और मुश्किलों से पूरी तरह उबरी नहीं है. सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के मुताबिक, शहरी बेरोजगारी नवंबर के 7 फीसद से छलांग लगाकर दिसंबर में 8.8 फीसद पर पहुंच गई, वहीं ग्रामीण बेरोजगारी 6.2 फीसद से और भी ऊंची छलांग लगाकर 9.2 फीसद पर पहुंच गई.

मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) के तहत काम की मांग कोविड से पहले के स्तर से भी ज्यादा है. एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) क्षेत्र को अब भी सहारे की जरूरत है, और अगर संक्रमण की नई लहर आती है तो स्वास्थ्य सेवाओं के बजट और बुनियादी ढांचे पर दबाव और बढ़ जाएगा. सीमा पर चीनी आक्रामकता का बोझ बजट पर आएगा, तो किसान आंदोलन का भी जिसने नई दिल्ली के इर्दगिर्द घेरा डाला है. इस मोड़ पर सरकार शायद कॉर्पोरेट समर्थक दिखाई देना नहीं चाहेगी.

सही प्राथमिकताएं 
इन परिस्थितियों में इस बजट में सरकार की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए और इस पर व्यय के लिए धन का प्रबंध कहां से होगा? इंडिया टुडे ने कई अर्थशास्त्रियों (देखें: विशेषज्ञों की राय) और उद्योग जगत के नेताओं (देखें: क्षेत्रवार विश्लेषण) से बात करके उनकी उम्मीदों और भविष्यवाणियों को समझने की कोशिश की. इस बात को लेकर एक आम सहमति देखी गई कि सरकार को अपना व्यय बढ़ाना चाहिए, और अपने एफआरबीएम (राजकोषीय जबावदेही और बजट प्रबंधन) लक्ष्यों के आगे विवश नहीं होना चाहिए.

अधिकतर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि सरकार को अगले वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5-7 फीसद के बीच लक्षित करना चाहिए, वैसे कुछ ने ज्यादा खर्च को लेकर सावधान भी किया है. (भारत की जीडीपी लगभग 200 लाख करोड़ रुपए की है, और राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में हर एक फीसद की छूट 2 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की अनुमति देती है.) महामारी के मद्देनजर स्वास्थ्य क्षेत्र सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में उभरा है. बेहतर स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के निर्माण और कुशल टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को एक उच्च बजटीय समर्थन की विशेष रूप से जरूरत है.

सरकार ने पहले ही दो टीकों को आपातकालीन मंजूरी दे दी है—ऑक्सफोर्ड और ऐस्ट्राजेनेका की ओर से विकसित और भारत के सीरम इंस्टीट्यूट से निर्मित कोविशील्ड तथा भारत बायोटेक से विकसित कोवैक्सीन.16 जनवरी से टीकाकरण अभियान भी शुरू हुआ है. भारत में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार अहम है क्योंकि यहां प्रति 10,000 की आबादी पर केवल पांच बेड उपलब्ध हैं, जबकि विकासशील देशों के लिए 21 बेड और दुनिया के लिए 27 बेड का बेंचमार्क है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं पर अपना खर्च जीडीपी के मौजूदा 1.5 फीसद से बढ़ाकर 2.5 फीसद करना चाहिए.

लॉकडाउन ने व्यवसायों को पंगु कर दिया था पर कई उद्योगों ने बिक्री में लगभग सामान्य स्थिति फिर से प्राप्त कर ली है. फिर भी लॉकडाउन में पड़ी मार का असर दिख जाता है. निर्माण क्षेत्र में एक सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई है, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल क्षेत्र में, वैसे बिक्री संख्या अभी भी 2018-19 जैसे अच्छे वर्षों से काफी पीछे है. होटल, यात्रा और पर्यटन सहित सेवा क्षेत्र पर सबसे बुरी मार पड़ी और वह स्थिति अब भी है. जोशी कहते हैं, ''निर्माण क्षेत्र के कुछ हिस्से अभी विकासोन्मुख हुए हैं और यह उनकी मदद का सबसे सही समय है. इसके अलावा, हमें सेवा जैसे उन क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जिनमें कोई सुधार नहीं देखा गया है.’’

वित्तीय वर्ष 2021-22 में वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि में दोहरे अंकों की छलांग दिखाई देगी, लेकिन इसमें से अधिकांश वृद्धि की वजह पिछले वित्त वर्ष की धीमी गति के कारण दिखेगी. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार सकारात्मक भावना का उपयोग निर्माण क्षेत्र में बड़े सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कर सकती है. कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के एमडी नीलेश शाह कहते हैं, ‘‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एक बड़ा खिलाड़ी बनने का अवसर है. हमारे सभी प्रतियोगी बुनियादी ढांचे और निर्णय लेने के लिहाज से हमसे बेहतर स्थिति में तो हैं, पर उनके पास हमारे जैसा बड़ा घरेलू बाजार नहीं है.’’

उनका कहना है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआइ) या उत्पादन आधारित प्रोत्साहन खेल बदलने वाला कदम साबित हो सकता है. पीएलआइ योजना कंपनियों को घरेलू इकाइयों में निर्मित उत्पादों की वृद्धिशील बिक्री पर प्रोत्साहन देती है. शाह कहते हैं, ''अगर इस योजना को अच्छी तरह से क्रियान्वित किया जाता है, तो यह जीडीपी में 1.2-1.5 फीसद तक वृद्धि कर सकता है.’’

आधारभूत ढांचे पर जोर
एक और बड़ा क्षेत्र जिस पर सरकार को ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, वह इन्फ्रास्ट्रक्चर है. पिछले बजट में, इसने नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआइपी) लॉन्च किया था, जिसमें 2020-25 की अवधि में 111 लाख करोड़ रुपए की 7,300 परियोजनाओं को पूरा करने की परिकल्पना की गई थी. इन परियोजनाओं के लिए हर साल 20 लाख करोड़ रुपए जुटाना काफी चुनौतीपूर्ण होगा.

इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना के लिए धन का प्रबंध करने के लिए एक डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूट (डीएफआइ) की स्थापना के केंद्र के कदम को बहुत उम्मीद के साथ देखा गया है, और इस बारे में एक घोषणा बजट में अपेक्षित है. आवास, निर्माण और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में निवेश का कई गुणा प्रभाव होगा. निर्माण एक प्रमुख रोजगार सृजक भी है.

रियल एस्टेट क्षेत्र लंबे वक्त से उच्च स्टॉक और कमजोर मांग से दुखी है और इसने भी बड़ी आस लगा रखी है. यह प्रवृत्ति विशेष रूप से महाराष्ट्र में दिखाई देती है, जहां राज्य सरकार ने अगस्त में, 1 सितंबर से 31 दिसंबर, 2020 के बीच लेनदेन पर स्टांप शुल्क को तीन फीसद और 1 जनवरी से 31 मार्च, 2021 के बीच हुए लेनदेन के लिए दो फीसद घटाया था. राज्य सरकार ने हाल ही में 31 दिसंबर, 2021 तक लागू सभी आवास परियोजनाओं के निर्माण के लिए एकत्रित विभिन्न प्रीमियमों पर 50 फीसद छूट की घोषणा की.

विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ते शेयर बाजार से आने वाली संपत्ति भी रियल एस्टेट क्षेत्र को कुछ बहुत जरूरी गति दे रही है. यह क्षेत्र को आगे और अधिक मदद देने का एक अच्छा अवसर प्रदान करता है. उद्योग के खिलाड़ी, मांग को बढ़ावा देने के लिए कुछ प्रयासों की आस लगाए बैठे हैं. इनमें घर के लिए कर्ज के ब्याज भुगतान (कोई ऊपरी सीमा नहीं) को आयकर कटौती की अनुमति देना, पूंजीगत लाभ कर को घटाकर 10 फीसद तक करना, सबवेंशन स्कीम पर प्रतिबंध को हटाना और क्षेत्र को बाहरी वाणिज्यिक उधार लेने की अनुमति देने जैसे कुछ कदम शामिल हैं.

एक अर्थशास्त्री, सरकार की ओर से सामाजिक आवास निर्माण में बढ़-चढ़कर प्रयास करने के विचार का यह कहते हुए समर्थन करते हैं कि इससे आर्थिक और राजनैतिक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति हो सकती है. वैसे, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाएं लाभार्थियों को घर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पहले से ही मौजूद हैं, पर चीन जैसे देशों में, सरकार ने सामाजिक आवास परियोजनाओं के निर्माण में प्रवेश किया है.

यह अकेले आर्थिक उत्पादन पर कई गुणा असरदार हो सकता है. एक अर्थशास्त्री का कहना है, ''मुझे नहीं लगता कि यह सरकार शुद्ध मांग को बढ़ावा देने में विश्वास करती है, इसलिए ऐसा लगता है कि सरकार बुनियादी ढांचे के खर्च पर ध्यान केंद्रित कर सकती है. सरकार किसी भी राजस्व कमी की भरपाई के लिए राज्यों की ओर से लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपए का ऋण ले सकती है.’’

मांग और निवेश को प्रोत्साहन 
विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोग व्यय को प्रोत्साहन, एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर सरकार को विशेष जोर देने की जरूरत है. कई कारक हैं जो इसे नीचे लेकर जा रहे हैं—मसलन, निर्माण क्षेत्र मंह सुधार नौकरी और वेतन में भारी कटौती के बीच हुआ है जो उपभोग को घटाता है. अधिकतर अर्थशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं कि कम कर दरें मांग को बढ़ावा देती हैं, क्योंकि लाभार्थी वे हो सकते हैं जो वैसे भी भुगतान में सक्षम हो सकते हैं. जीएसटी संग्रह में हालिया उछाल को एक स्वागत योग्य विकास के रूप में देखा जा रहा है.

अप्रत्यक्ष करों के साथ छेड़छाड़ को भी एक विकल्प के रूप में नहीं देखा जा रहा है. लेकिन मनरेगा का एक शहरी समकक्ष जो रोजगार पैदा कर सकता है और आबादी के एक बड़े हिस्से को सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और बुनियादी ढांचे में बढ़ाए गए सार्वजनिक निवेश को, कई लोग मांग को बढ़ाने वाले कारकों के रूप देखते हैं.

जमीन पर अधिक निवेश को प्रोत्साहित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. सीएमआइई के आंकड़ों के अनुसार, भारत में नई परियोजना की घोषणा जून, 2020 में समाप्त तिमाही में 16 साल के निचले स्तर पर आ गई. इसका मतलब है कि सरकार को निजी निवेशकों के बीच अधिक भरोसे और आत्मविश्वास का निर्माण करते हुए सार्वजनिक व्यय को बढ़ावा देने की जरूरत होगी.

केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि सरकार पूंजीगत व्यय को पिछले साल के 4.3 लाख करोड़ रुपए से बढ़ाकर 4.6 लाख करोड़ रुपए कर सकती है. उनका कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि मनरेगा, सड़क, रेलवे और शहरी विकास पर खर्च का जोर रहेगा.

व्यय के लिए धन का प्रबंध
व्यय में वृद्धि के लिए धन कहां से जुटाया जा सकता है? पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम) का विनिवेश एक रास्ता हो सकता है. 2020-21 में, केंद्र ने विनिवेश के जरिए 2.14 लाख करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा था, पर सरकार इससे बहुत पीछे रह गई. वैसे, इसने एयर इंडिया, बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड) और शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के विनिवेश के साथ इस साल बड़ी तैयारियां कर रखी हैं. विशेषज्ञ स्पष्ट समयसीमा में और राजस्व पूर्वानुमान के साथ, उनके विनिवेश की एक मध्यम अवधि की योजना की उम्मीद करते हैं.

रक्षा और गैर-रक्षा क्षेत्रों में सरकारी स्वामित्व वाली परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण और 4जी तथा 5जी स्पेक्ट्रम की ताजा नीलामी को भी विशेषज्ञ एक संभावना मानते हैं. जोशी का कहना है कि सरकार को और अधिक उधार का सहारा लेना होगा. साथ ही, इसे बुनियादी ढांचे में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने की जरूरत है.

शाह कहते हैं, ''संसाधन बढ़ाएं, पर कर बढ़ाकर नहीं. आपको निवेशकों को उत्साहित करना होगा, और उसके लिए सार्वजनिक उपक्रमों को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने की जरूरत है. सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी होल्डिंग का मूल्य तब दोगुना हो सकता है.’’ एक अन्य विचार यह है कि सरकार व्यवसायीकरण करे और कुछ सफल योजनाओं में निजी साझेदारों को ले आए.

जुए को वैध बनाना एक और सुझाव है जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा गया है. शाह का कहना है कि कर व्यवस्था की कमियों को दूर करके भी सरकार अतिरिक्त राजस्व का जुगाड़ कर सकती है. संपत्ति का मुद्रीकरण—उदाहरण के लिए, सरकारी भूमि का मुद्रीकरण—एक और विचार है जिसे पेश किया गया है.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान संदर्भ मंय संसाधनों को बढ़ाने का एक बेहतर तरीका यह होगा कि वे घाटे की भरपाई करें (अतिरिक्त व्यय के लिए धन जुटाएं, और ऋण न लें). उनका तर्क है कि ऐसा करने के लिए, आरबीआइ को बाजार में सरकारी बॉन्ड को खरीद के लिए उतारने के विकल्प का सहारा लेना चाहिए. इसके अलावा, छोटी बचत योजनाओं के जरिये सभी बचतकर्ताओं को उच्च ब्याज दर की पेशकश करना भी एक उपयोगी कदम होगा.

अक्सर कहा जाता है कि संकट में भी अवसर होता है. केंद्र को इस वक्त का उपयोग देश को पुनरुत्थान की एक स्पष्ट राह पर ले जाने के लिए करना चाहिए—न सिर्फ महामारी के जख्मों को भरने के लिए, बल्कि देश को उच्च विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए भी. बजट इसके लिए सही माहौल तैयार कर सकता है. 

विशेषज्ञ की राय

निरंजन हीरानंदानी
संस्थापक और एमडी, हीरानंदानी ग्रुप

बीते दो महीनों में बिक्री में थोड़ी-सी बढ़ोतरी क्या मांग में नई जान आने का संकेत है?
➜ मिशन अनलॉक शुरू होने के साथ आर्थिक गतिविधि धीरे-धीरे शुरू हुई. ढांचागत हस्तक्षेप हुए. मसलन, महाराष्ट्र सरकार ने स्टॉम्प ड्यूटी घटा दी, बैंकों ने ब्याज दरें कम कर दीं और कुछ डेवलपर लचीली भुगतान योजनाएं लेकर आए. ये सब बिक्री में थोड़ी बढ़ोतरी के कारण थे.

बाजार की अनुकूल परिस्थितियों के नतीजतन उपभोक्ता का भरोसा फिर कायम होगा और सुरक्षा तथा स्थिरता के लिहाज से अपना घर खरीदने की अहमियत बढ़ेगी और इससे 2021 में मांग में तेजी आएगी. आखिर में, डीसीपीआर 2020 (डेवलपमेंट कंट्रोल ऐंड प्रमोशन रेग्यूलेशंस) के तहत मौजूदा और नई परियोजनाओं के लिए 31 दिसंबर, 2021 तक विभिन्न प्रीमियमों में कमी की बदौलत ग्रोथ को बढ़ावा मिलेगा.

रियल एस्टेट सेक्टर के लिए बजट में आप किन उपायों की उक्वमीद करते हैं?
➜ सबवेंशन स्कीमों पर पाबंदी हटाना और लोन-टू-वैल्यू रेशो को सभी के लिए समान रूप से 90 फीसद तक बढ़ाना खरीदार की धारणा पर अच्छा असर डालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

➜ घर के लिए कर्ज पर चुकाए गए ब्याज के लिए आयकर कटौतियों की इजाजत देने (किसी भी ऊपरी सीमा के बगैर) लंबे वक्त के पूंजीगत लाभ कर को घटाकर 10 फीसद पर लाने और घर खरीदारों के लिए अपनी संपत्ति यों को लंबे वक्त की पूंजीगत संप‌त्ति बनाने के लिए मिल्कियत कायम रखने की अनिवार्य अवधि को घटाने (12 महीने) से खरीदारों को मदद मिलेगी.

➜ इंडस्ट्री के नजरिए से, एक बार कर्ज चुकाने का नए ढांचा तय करने की अनुमति देने, इकाइयों के ‘मानक इकाई’ होने की जरूरत हटाने और फाइनेंसर तथा कर्ज लेने वाले के बीच आपसी सहमति के मुताबिक विभिन्न इकाइयों का नया ढांचा बनाने की इजाजत देने से मदद मिलेगी.

➜ सेन्न्टर के मुताबिक बाहरी व्यावसायिक कर्ज लेने की इजाजत देने, विशेष आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े  सुधारों, मसलन, अधिसूचना की तारीखें बढ़ाने और न्यूनतम वैकल्पिक कर वापस लेने से भी मदद मिलेगी.

➜ फाइनेंस की बात करें तो डेवलपर के लिए कर्ज के जोखिम का आकलन दूसरे उद्योगों के समान ही होना चाहिए. बैंकों को जमीन, प्रीमियम, मंजूरियों और निर्माण लागत सहित रियल एस्टेट परियोजनाओं के विभिन्न पहलुओं के लिए धन मुहैया करना चाहिए.

क्या आप दो उपाय बता सकते हैं जो अर्थव्यवस्था को ऊंची वृद्धि की राह पर लाने के लिए केंद्र सरकार को लागू करने चाहिए?

अर्थव्यवस्था को वृद्धि के रास्ते पर लाने वाले दो हस्तक्षेप होंगे—करों को तर्कसंगत बनाना, और यह सुनिश्चित करना कि कारोबार करने में आसानी के लिए नियामकीय पहलू पूरे साल 2021 के दौरान नरम बने रहे.—एम. जी. अरुण

 

विशेषज्ञ की राय

आर.सी. भार्गव
चेयरमैन, मारुति सुजुकी

पिछले कुछ वक्त में ऑटो इंडस्ट्री के कामकाज को आप कैसे आंकते हैं?
इंडस्ट्री मुश्किल दौर से गुजर रही है और इसकी वृद्धि दर में गिरावट आई है. साल 2005 से 2010 तक इंडस्ट्री 12.9 फीसद की चकवृद्धि सालाना वृद्धि दर से बढ़ी. साल 2010 से 2015 तक वृद्धि दर घटकर 5.9 फीसद पर आ गई. उसके बाद के पांच साल में वृद्धि 1.3 फीसद जितने नीचे थी.

2019-20 बुरा साल था—नियामकीय बदलावों की वजह से कीमतें बढ़ीं, मांग पर असर पड़ा और ऐसे और भी बदलाव अभी होने वाले हैं. साल 2021-22 तक ही हम वृद्धि की वह दर पकड़ पाएंगे जो हमने 2018-19 में देखी थी. निजी उद्यमशीलता के प्रति हमारा नजरिया बदलना जरूरी है.

बजट से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
जहां तक मारुति की बात है, हमारे पास इससे ज्यादा कुछ कर पाने की क्षमता नहीं है. मांग पैदा करने से कहीं ज्यादा इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि निवेश क्यों गिर रहे हैं. उम्मीद के मुताबिक, क्षमता निर्माण के लिए निवेश कम से कम दो साल पहले करने पड़ते हैं. सवाल यह है कि सरकार इंडस्ट्री में निवेश करने का भरोसा कैसे पैदा कर सकती है.

क्या कोई एक प्रमुख मसला है जिससे व्यापक अर्थव्यवस्था की खातिर निपटने की जरूरत है?
भारतीय मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण) को और ज्यादा प्रतिस्पर्धी होने की जरूरत है. इसके लिए उद्योग और सरकार को मिलकर काम करना होगा. अगर मैन्युफैक्चरिंग ज्यादा तेजी से बढ़ती है तो अर्थव्यवस्था भी उसी के मुताबिक बढ़ेगी. रोजगार का मुख्य चालक, यहां तक कि सेवा क्षेत्र में भी, मैन्युफैक्चरिंग ही है, और इसकी वजह है कलपुर्जों का विशाल बाजार. उद्योग रफ्तार पकड़ रहा है, मगर तीन साल पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा फर्क नहीं है.
—एम.जी. अरुण

विशेषज्ञ की राय
विनायक चटर्जी, चेयरमैन, फीडबैक इंफ्रा

सरकार के फोकस और अमल के लिहाज से इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट किस मुकाम पर हैं?
केंद्र ने अपना ध्यान राजमार्गों सरीखी भारी निर्माण वाली परियोजनाओं से बढ़ाकर ज्यादा व्यापक परियोजनाओं पर केंद्रित किया है. बीते तीन साल में घरों के लिए चौबीसों घंटे बिजली और पानी के कनेक्शन पर बड़ा खर्च किया गया है. इसके अलावा रेलवे, मसलन शहरों के लिए मेट्रो रेल, समर्पित मालढुलाई गलियारा, बुलेट ट्रेन वगैरह, पर असल जोर दिया गया है.

क्या आप एनआइपी (नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन) की प्रगति से संतुष्ट हैं?
पिछले बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए आवंटन 4.12 लाख करोड़ रुपए था, मगर पहले छह महीनों में पूंजीगत खर्च 27 फीसद कम हुआ. हालांकि, अक्तूबर-नवंबर की अवधि में इसमें अच्छी बढ़ोतरी हुई, लेकिन मुझे शक है कि 31 मार्च तक हम लक्ष्य से कम ही खर्च कर पाएंगे. बजट को इस कमी की भरपाई करनी पड़ेगी.

इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए आप बजट में किन उपायों की उम्मीद करते हैं?
मुझे उम्मीद है कि वित्त मंत्री राजकोषीय घाटे में दो फीसद का इजाफा करेंगी और स्वास्थ्य सेवाओं सहित लोक कार्यों तथा बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए धन आवंटित करेंगी. राजकोषीय घाटे में दो फीसद की ढील से अतिरिक्त 4 लाख करोड़ रुपए की रकम हाथ में आ जाती है. पिछले साल के आवंटन में इसे जोड़ दें तो इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कुल संभव खर्च 8 लाख करोड़ रुपए हो जाता है.

अलबत्ता सवाल यह है कि चूंकि एनआइपी हर साल 20 लाख करोड़ रुपए के खर्च की परिकल्पना करती है, मगर एनआइपी में पैसा लगाने के लिए केंद्रीय बजट की कुल क्षमता 8 लाख करोड़ रुपए है, तो बाकी 12 लाख करोड़ रुपए कहां से आएंगे? निजी निवेशक तो पैसा लगाने से रहे. नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन, कोल इंडिया और दूसरे पीएसयू मिलकर 3 से 4 लाख करोड़ रुपए लगा सकते हैं. राज्य सरकारों के वित्तीय हालत जर्जर हैं तथा हो सकता है कि वे और 2 लाख करोड़ रुपए लगा पाएं.

क्या बजट में विकास वित्त संस्था (डीएफआइ) पर अमल होगा?
सरकार ने एनआइपी में पैसा लगाने के लिए डीएफआइ के विचार को सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार कर लिया है. यह बजट में बड़ा ऐलान हो सकता है और प्रारूप विधेयक भी है जो तैयार किया जा रहा है.
मगर हमें शॉवेल-रेडी (इस हद तक तैयार कि बस लोगों को रखकर काम शुरू करने भर की देर हो) परियोजनाओं की जरूरत है. इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का विकास चक्र आम तौर पर चार साल का होता है. भारत को अगले तीन-चार साल में 80 लाख करोड़ रुपए की शॉवेल-रेडी परियोजनाओं की जरूरत है.
—एम.जी. अरुण

 

विशेषज्ञ की राय
अनिल भारद्वाज,
सेक्रेटरी जनरल, फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो ऐंड स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज

एमएसएमई क्षेत्र में उत्पादन के मुद्दे कितने गंभीर हैं?
लॉकडाउन की वजह से कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं. परिवहन के चालू नहीं होने और भुगतानों के फंस जाने सरीखे मुद्दों की वजह से उत्पादन और बिक्री में तेज गिरावट आई है. हम सामान्य स्थिति से मीलों दूर हैं; 2021-22 में हम एमएसएमई के लिए हल्की वृद्धि की ही उम्मीद करते हैं. यह क्षेत्र उत्पादन के सामान्य स्तर से अब भी बहुत दूर है और इसे विशेष लचीलेपन की दरकार है.

किस किस्म का लचीलापन?
हम कर्ज मंजूर करने में बैंकों को लचीलापन देने का प्रस्ताव करते हैं. बासेल नियमों (बैंकिंग क्षेत्र में देख-रेख के मानक) को मजबूत वृद्धि के वर्षों के दौरान अंतिम रूप दिया गया था. वे अब अड़चन बन गए हैं. सरकार और आरबीआइ को इन्हें कुछ वर्षों के लिए स्थगित करने पर विचार करना चाहिए. हमारी समस्या एनपीए की पहचान का तरीका है—यह पूरी तरह स्वचालित है. अगर भुगतान में 30 दिन की देर हो जाती है, तो खाते को अपने आप 'विशेष उल्लेख’ खाते के तौर पर वर्गीकृत कर दिया जाता है.

सरकार की कर्ज योजना का क्या असर पड़ा है?
कर्ज योजना का फायदा उन कंपनियों को मिला है जिन्होंने कर्ज ले रखे थे, मगर केवल दस फीसद एमएसएमई के पास संस्थागत धन है. उद्योग ने ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम पर अच्छी प्रतिक्रिया दी है. यह प्रणाली आम तौर पर नकदी के संकट से दोचार एमएसएमई को अपनी व्यापार प्राप्तियों को बेचकर कॉर्पोरेट कंपनियों से धन उगाहने की सुविधा देती है.

एमएसएमई क्षेत्र को रफ्तार देने के लिए बजट से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
ऋणशोधन अक्षमता और दिवालिया संहिता में केवल बड़ी फर्मों के लिए प्रावधान हैं—एमएसएमई के लिए कोई निश्चित प्रावधान इसमें नहीं हैं. यह एक बदलाव हम देखने की उम्मीद करते हैं. हम यह भी उम्मीद करते हैं कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून में कुछ ढील दी जाए और बैंकों को कर्ज देने में और ज्यादा लचीलापन दिया जाए.
—श्वेता पुंज

 

रजनीश कुमार 
पूर्व चेयरमैन, भारतीय स्टेट बैंक
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नई पूंजी लगाने की कितनी तत्काल जरूरत है?

आरबीआइ की नवीनतम वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में बैंकिंग क्षेत्र में कैपिटल बफर बनाने की जरूरत बताई गई है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बाजार से पूंजी उगाहने में मुश्किलें पेश आएंगी. लिहाजा, सरकार को बजट में पूंजी मुहैया करने के प्रावधान लाजिमी तौर पर करने होंगे.

पिछले बजट में विकास वित्त संस्था की स्थापना की चर्चा की गई थी. क्या इस बार इस पर अमल होगा?
इन्फ्रास्ट्रक्चर में पैसा लगाने पर बड़ा जोर देने की जरूरत है और न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारें नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन में पैसा लगा सकती हैं. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी यह नहीं कर सकते. भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिग की अगुआई करने के लिए विकास वित्त संस्थान की जरूरत है जिसका ढांचा भी अच्छा हो और जिसके पास पूंजी भी अच्छी हो.

क्या बजट 'बैड बैंक’ (दूसरे बैंकों की बैलेंस शीट से बैड लोन लेने के लिए) की स्थापना का रास्ता खोल देगा?
बैड बैंक की स्थापना के लिए इससे बेहतर मौजूं वन्न्त कोई दूसरा नहीं हो सकता है. इससे गैर-निष्पादित संपत्तिायां एक ही संस्था में एक जगह इकट्ठा की जा सकेंगी, जिससे बैड लोन के समाधान में और ज्यादा तेजी आएगी.

वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए बजट में आप कौन-से प्रमुख उपाय देखना चाहेंगे, खासकर जब अर्थव्यवस्था मंदी से गुजर रही है?
यह बजट सबसे ज्यादा चुनौतियों से भरे बजटों में से एक होगा. सरकार को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए अपनी कोशिशों में कोई कसर न छोड़े. मांग में तत्काल तेजी लाने वाले तीन अहम उपाय हैं—उपभोग खर्च बढ़ाने के लिए निजी आयकर की दरों में कमी, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च में बढ़ोतरी और पर्यटन तथा निर्माण सरीखे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों के लिए सहायता, जो रोजगार के मौके पैदा करेगी. सरकार को वित्तीय क्षेत्र को मजबूत करने के उपायों को भी लागू करने की जरूरत है.
—अनिलेश एस. महाजन

 

नौशाद फोर्ब्स,
सह-चेयरमैन, फोर्ब्स मार्शल और पूर्व प्रेसिडेंट सीआइआइ

क्या मैन्युफैक्चरिंग में बहाली दिखाई दे रही है? और क्या करने की जरूरत है?
मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था की समग्र सेहत पर निर्भर करती है—हमें केवल मैन्युफैक्चरिंग के बजाए इस पर ध्यान देने की जरूरत है. दूसरी तिमाही में हमने अच्छी-खासी बहाली देखी, इसमें एफएमसीजी, फार्मा और केमिकल्स में आई बहाली भी शामिल है. तीसरी तिमाही में बहाली ज्यादा व्यापक थी, जिसमें इंजीनियरिंग और ऑटोमोटिव भी शामिल थे. अलबत्ता तनख्वाहों में जबरदस्त गिरावट आई है—यह परेशानी की बात हो सकती है क्योंकि बीते 30 वर्षों में हमारी 60 फीसद ग्रोथ खपत से आई है.

बजट से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
आत्मनिर्भर भारत अभियान और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना का मकसद मैन्युफैक्चरिंग में गहराई बढ़ाना है. हमें इससे ज्यादा की जरूरत नहीं है, लेकिन इसकी रही-सही कमी पूरी करने के लिए कुछ न कुछ होना चाहिए. हमें नीतियों को लेकर भी लंबे वक्त की स्पष्टता की जरूरत है. पिछले चार साल में हजारों उत्पादों के लिए लाए गए शुल्क संरक्षण कब खत्म होंगे? उद्योग को जानने की जरूरत है कि क्या उम्मीद करें. केवल तभी वे ठीक से निवेश कर सकते हैं.

अर्थव्यवस्था को जिलाने के लिए आप बजट में किन उपायों की सिफारिश करेंगे?
उपायों का विश्लेषण करके यह देखने की जरूरत है कि कारोबार करने में आसानी पर उनका क्या असर पड़ेगा. निजी भागीदारी वाला समीक्षा का तंत्र होना चाहिए. सरकार को उद्यमियों का भरोसा जीतने की जररूत है ताकि वह निवेश होना सुनिश्चित कर सके.
—एम.जी. अरुण

रियल एस्टेट
क्षेत्र का आकार

8.8 लाख करोड़ रु.

जीडीपी में योगदान
4.3 फीसद
रोजगार
5.2
करोड़

प्रमुख मुद्दे
➜ साल 2020 में सात प्रमुख मेट्रो शहरों (दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलूरू, चेन्नै और कोलकाता) में मकानों की बिक्री पिछले साल की तुलना में 47 फीसद गिरकर 1,38,000 इकाइयों पर आ गए
➜ इस साल इन्हीं मेट्रो शहरों में नए मकानों की सप्लाई 46 फीसद गिर कर 1,28,000 इकाइयों तक पहुंच सकती है

आशा की किरण
➜ होम लोन की ब्याज दरों में कमी और डेवलपर्स की ओर से छूट देने की वजह से 2020 की तीसरी और चौथी तिमाही में बिक्री बढ़ी. मुंबई और बेंगलूरू में सर्वाधिक बिक्री हुई

सहायता के मुक्चय उपाय

❶ कोविड-19 से संबंधित खलल रेरा के तहत ‘प्राकृतिक या अप्रत्याशित आपदा’ मानी जाएंगी. रजिस्ट्रेशन और परियोजना को पूरा करने की समयसीमा क्रमश: छह तथा नौ महीने बढ़ा दी गई
➋ मध्यम-आय वर्ग के परिवारों (सालाना आय 6 लाख रुपए से 18 लाख रूपए के बीच) के लिए कर्ज से जुड़ी सब्सिडी स्कीम 31 मार्च, 2021 तक बढ़ाई जाएगी
➌ केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (पीएमएवाइ-यू) के लिए 18,000 करोड़ रु. की अतिरिक्त रकम अलग रख दी गई है
❹ 30 जून, 2021 तक के लिए एग्रीमेंट वैल्यू और सर्किल रेट के बीच मान्य अंतर को 10 फीसद से बढ़ाकर 20 फीसद कर दिया गया है. इससे पहली बार के खरीदारों और विक्रेताओं को राहत मिलेगी


ऑटोमोटिव
चौतरफा असर
क्षेत्र का आकार

8.7 लाख करोड़ रु.

जीडीपी में योगदान
4.2 फीसद

रोजगार
1.91 करोड़


प्रमुख मुद्दे
➜ लॉकडाउन से पहले ही यह क्षेत्र संकट से जूझ रहा था. अर्थव्यवस्था में आ रही मंदी और नए नियमों के बाद बढ़ी कीमतों की वजह से साल 2019 में ही इसमें 18 फीसद की गिरावट देखी गई थी 
➜ पूरे भारत में अप्रैल 2020 में एक भी गाड़ी नहीं बिकी
➜ इस वित्त वर्ष में कार की बिक्री 2018-19 के मुकाबले 25 फीसद कम होने का अनुमान

आशा की किरण
➜ साल 2020 का त्योहारी मौसम (अक्तूबर-दिसंबर) राहत की तरह आया. पिछले साल की तुलना में इस दिसंबर में अधिकतर निर्माताओं की थोक बिक्री बढ़ी. मारुति सुजुकी की सवारी गाडिय़ों की बिक्री 14.6 फीसद और हुंडई की 25 फीसद बढ़ी

इन्फ्रास्ट्रक्चर
क्षेत्र का आकार

नहीं उपलब्ध

जीडीपी में योगदान
नहीं उपलब्ध
रोजगार
पिछले 4 साल में सड़कों के काम में 50 करोड़ व्यक्ति-दिवस

प्रमुख मुद्दे
➜ सीएमआइई के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2020 में खत्म हुई तिमाही में नई परियोजनाओं में बीते 16 साल की सबसे बड़ी गिरावट
➜ बहुत विशाल मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को सरकार किस तरह फंड करेगी, इसको लेकर कोई स्पष्टता नहीं हैं.
➜ कई सारी परियोजनाएं लालफीताशाही में फंसी पड़ी हैं और भूमि अधिग्रहण में दिक्कतों के नतीजतन उनमें देरी हो रही है

आशा की किरण
➜ अपने पिछले बजट में केंद्र सरकार ने नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन को लॉन्च किया था. इसने 2020-25 से 111 लाख करोड़ रुपए की कुल लागत से 7,300 इन्फ्रा परियोजनाओं की परिकल्पना की
➜ इन इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को फंड करने के लिए सरकार एक डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (विकास वित्त संस्था) की स्थापना पर विचार कर रही है

एमएसएमई
क्षेत्र का आकार

6.34 करोड़ इकाइयां

जीडीपी में योगदान
29 फीसद
रोजगार
11 करोड़

प्रमुख मुद्दे
➜ धन की उपलब्धता को लेकर समस्या है. ब्याज के भुगतान पर मोरेटोरियम से मदद मिली, वहीं कई एमएसएमई अब भी भुगतान करने की जद्दोजहद से गुजर रहे हैं

➜ एनपीए की सूचना के नए नियमों—जिनके तहत भुगतान में 30 दिन की देरी होने पर ऋण खाते को 'विशेष उल्लेख’ खाते के तौर पर वर्गीकृत कर दिया जाता है—की वजह से एमएसएमई को दिए गए कई कर्जों की जांच-पड़ताल में बढ़ोतरी हो सकती है

आशा की किरण
➜ इस क्षेत्र की सहायता के लिए सरकार ने एमएसएमई से खरीद बढ़ाने की कोशिश की है; जनवरी और अक्तूबर, 2020 के बीच ऐसी फर्मों से सरकारी खरीद में 25 फीसद का इजाफा हुआ

सहायता के मुख्य उपाय

❶ सरकार ने इस क्षेत्र के लिए कुल 3 लाख करोड़ रुपए की आपातकालीन कर्ज सहायता योजना लागू की है. 29 फरवरी, 2020 तक के आंकड़ों के मुताबिक, उपलब्ध कर्ज बकाया कर्ज का 20 फीसद है
❶ इसी से मिलता-जुलता एक उपाय एमएसएमई के लिए 20,000 करोड़ रुपए के छोटे कर्ज की योजना है. इसके तहत प्रमोटरों को बैंक कर्ज जारी करता है, जो फिर फर्म में प्रमोटर की अंश पूंजी के तौर पर डाले जाते हैं
❶ अतिरिक्त पूंजी डालने के लिए सरकार ने 50,000 करोड़ रुपए के ‘फंड ऑफ फंड्स’ की स्थापना भी की है
❶ घरेलू खरीद को बढ़ावा देने के लिए 200 करोड़ रुपए तक की खरीद के लिए वैश्विक निविदाओं को नामंजूर कर दिया गया है
❶ वृद्धि को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने एमएसएमई के लिए वर्गीकरण की नई प्रणाली लागू की है

बैंकिंग
प्रमुख मुद्दे
➜ कोविड-19 लॉकडाउन की जटिलताओं—जैसे ब्याज के भुगतान पर मोरेटोरियम और आपातकालीन कर्ज गारंटी योजना—की वजह से मौजूदा परेशानियों में इजाफा होगा
➜ आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट कहती है कि सकल गैर-निष्पादित संपत्तियों में सितंबर 2021 तक 13.5 फीसद बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, जबकि पिछले साल के इसी महीने में यह बढ़ोतरी 7.5 फीसद हुई थी
➜ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नए सिरे से पूंजी लगाने की तत्काल जरूरत है, बावजूद इसके कि 2016-2020 से 3.16 लाख करोड़ रुपए की पूंजी पहले ही डाली जा रही है
➜ कुशासन और धोखाधड़ी की समस्याएं लगातार कायम हैं; 2019-20 में भारतीय बैंकों ने धोखाधड़ी में 1.85 लाख करोड़ रुपए गंवाए

आशा की किरण
➜ सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों के चार में विलय को मंजूरी दी है और उसका कहना है कि इससे प्रतिस्पर्धी फलक पर आमूलचूल बदलाव आएगा
➜ 2015-16 और 2019-20 के बीच डिजिटल भुगतान की मात्रा 55 फीसद से ज्यादा चक्रवृद्धि सालाना वृद्धि दर से बढ़ी है

कुल संपत्ति
182 लाख करोड़ रु.

जीडीपी में योगदान
उपलब्ध नहीं
रोजगार
14 लाख
 

मैन्युफैक्चरिंग
उद्योग का आकार 

32.5 लाख करोड़ रू.

जीडीपी में योगदान
16 फीसद

रोजगार
12 करोड़

प्रमुख मुद्दे
➜ एक के बाद एक सरकारों की कोशिशों के बावजूद जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी अब पिछले कुछ वर्षों से 16 फीसद पर अटकी हुई है
➜ कोविड-19 के कारण अधिकांश मैन्युफैक्चरिंग ठप पड़ गई. दबी हुई और त्योहारी मांगी की वजह से अक्तूबर-दिसंबर की अवधि में गतिविधि में उछाल आया, लेकिन यह टिकाऊ नहीं भी हो सकता है

आशा की किरण
➜ उत्पादन बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना सरीखे कई कार्यक्रमों का ऐलान किया गया
➜ कर्ज चुकाने पर भारतीय रिजर्व बैंक के छह महीने के मोरेटोरियम ने इस क्षेत्र को सांस लेने की मोहलत दी, क्योंकि जमा धनराशि खत्म हो चुकी थी.

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