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''नया कश्मीर बनाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलने वाला''

विजय धर मानते हैं कि राज्य के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद केंद्र ने सड़कों और पुलों का काम तेजी से किया है और आतंकी घटनाओं में कमी आई है

विजय धर 80 वर्ष, कश्मीरी पंडित और शिक्षाविद्, श्रीनगर विजय धर 80 वर्ष, कश्मीरी पंडित और शिक्षाविद्, श्रीनगर

विजय धर के दिमाग में एक बात साफ है कि वे घाटी के आखिरी कश्मीरी पंडित नहीं होना चाहते. 70 बरस के धर जम्मू-कश्मीर के अशांत इतिहास के जितने गवाह रहे हैं उतने ही शिकार भी. उन्होंने 1990 के दशक का वह खौफनाक दौर भी जिया, जब करीब 40,000 पंडित परिवारों को घाटी से निकाल फेंका गया था.

धर का परिवार मजबूर होकर दिल्ली आ गया. बीमार पड़ने पर मां ने जब लौटने की जिद ठानी तो काफी समझाने-बुझाने के बाद गृह मंत्रालय ने कहा कि घर देखने जा तो सकते हो पर नाम बदलकर जाना होगा. अलबत्ता वे ज्यों ही वहां पहुंचे, सभी ने उन्हें पहचान लिया और उनके मुस्लिम दोस्तों ने पक्का किया कि वे महफूज महसूस करें.

धर का पूरी तरह से घाटी में लौटना तो सदी के बदलने पर ही हुआ ताकि श्रीनगर की गुपकर रोड से लगे अपने आलीशान खानदानी बंगले में रह सकें. उन्होंने डीपीएस की स्थापना की, जिसमें अब 5,000 छात्र हैं. अपने लंबे-चौड़े बगीचे में बैठे शाम का चाय-नाश्ता करते हुए धर कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य की कुंजी शिक्षा पर ध्यान देना है. वे नाराज हैं कि सुविधाएं न होने से घाटी के 800 छात्र बांग्लादेश में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं.

धर कहते हैं कि किसी भी गद्दीनशीन निजाम को नौजवानों पर ध्यान देना चाहिए: ''वे अब और ज्यादा जंग या उग्रवाद या अलगाववाद नहीं चाहते. वे नौकरियां चाहते हैं. वे उद्यमी बनना चाहते हैं और हमें उन्हें जमीन और रकम मुहैया करनी चाहिए. वे ही नया कश्मीर हैं. हम उन्हें इस तरह न देखें कि वे नाराज हैं और हिंसा से जुड़ना चाहते हैं. केंद्र ने उनसे विकास के जो वादे किए हैं, उसे उन्हें पूरा करना ही चाहिए.''

धर मोदी सरकार से नाखुश हैं कि वह उन्हें घाटी में पूरी तरह फिर से बसाने में नाकाम रही. वे सवाल करते हैं, ''नब्बे के दशक में घाटी छोड़ने को मजबूर कर दिए गए 40,000 परिवारों के लिए हमने क्या किया है?'' और कहते हैं, ''अगर आप चाहते हैं कि वे लौटें तो उन्हें नौकरियां दीजिए. उन्हें प्रोत्साहन और सुरक्षा के एहसास की जरूरत है, लफ्फाजियों की नहीं.'' गृह मंत्रालय ने मार्च 2021 में संसद में एक बयान में माना कि 1990 में 39,782 हिंदू प्रवासी परिवारों ने सरकार के राहत दफ्तर में अपने नाम दर्ज करवाए थे.

उसने कहा कि प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेजों के तहत कश्मीरी प्रवासियों के लिए घाटी में विशेष नौकरियों के ऐलान के बाद 2008 से 2015 के बीच करीब 3,800 प्रवासियों को यहां नौकरियां मिलीं, जबकि 520 को 2019 में अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद रोजगार मिले. धर मानते हैं कि राज्य के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद केंद्र ने सड़कों और पुलों का काम तेजी से किया है और आतंकी घटनाओं में कमी आई है.

मगर वे यह भी कहते हैं कि ये कोशिशें राज्य के कायापलट के सरकार के वादे से कहीं कम हैं. वे कहते हैं, ''आगे के महीनों की योजनाओं को लेकर स्पष्टता की जरूरत है. यह भी अहम है कि जितना जल्द मुमकिन हो, हम फिर राज्य बनाएं.'' यह विवेक की आवाज है, जिसे सुनना सरकार के लिए अच्छा होगा.

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