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आवरण कथाः इंसाफ की गुहार

दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित तीन नेता राज चेंगप्पा के साथ बातचीत में बता रहे हैं कि हिरासत में कैसा बीता उनका एक साल, केंद्र के साथ रिश्तों में नई पहल के मायने क्या हैं और कैसे कश्मीर के लिए कुछ मामलों में समझौता नहीं हो सकता.

उमर अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष

कश्मीर की आवाज 

दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित तीन नेता राज चेंगप्पा के साथ बातचीत में बता रहे हैं कि हिरासत में कैसा बीता उनका एक साल, केंद्र के साथ रिश्तों में नई पहल के मायने क्या हैं और कैसे कश्मीर के लिए कुछ मामलों में समझौता नहीं हो सकता.

महीनों लंबी हिरासत से आप क्या लेकर लौटे?

●  उमर अब्दुल्ला
आपको सोचने के लिए इतना सारा वक्त मिलता है और खुशकिस्मती से मैं उन लोगों में हूं, जो खुद अपनी संगत में बेहद सहज रहते हैं. बिल्कुल शुरुआत में ही मैंने अपने लिए एक रूटीन बना लिया, जो मुझे दिमागी रूप से चंगा बने रहने का सबसे अच्छा तरीका लगा. मैंने बहुत सारा वक्त टहलने और यह समझने तथा स्वीकार करने में बिताया कि क्या हुआ है और मुझे इसके बारे में क्या लगता है.

वहां ऐसा तो कोई होता नहीं जिससे अपने विचारों पर प्रतिक्रिया जान सकें, तो यह खालिस वही होता है जो आप समझते हैं. मैंने ढेर सारा पढ़ा और जब हमारे पास केबल था, क्लासिक फिल्में दिखाने वाले एक टीवी चैनल पर पुरानी हिंदी फिल्मों के प्रति मेरी मुहब्बत फिर जाग उठी.

● महबूबा मुफ्ती
मैं अकेली थी और परिवार भी साथ नहीं था. और कोई भी इस हालात में होना पसंद नहीं करता. मैं यह भी सोच रही थी कि बाहर क्या हो रहा है. यह सचमुच मुझे परेशान कर रहा था, ये सख्त कार्रवाइयां. फिर मेरे दिमाग में सारे वक्त यह बात भी थी कि मेरे वालिद (मरहूम मुफ्ती मुहम्मद सईद) ने कश्मीर समस्या के हल के लिए भाजपा के साथ जाने का गलत फैसला कैसे ले लिया.

● सज्जाद लोन
यह संजीदा बनाने वाला तजुर्बा था, पर मैं नाराज भी था. बाद में यह एहसास हुआ कि हमारे साथ क्या हुआ है. मैं हिरासत से बाहर आया, तो मन में यही था कि हमारे साथ गलत हुआ है, लेकिन हम बेहतर कर सकते थे. नेतृत्व को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि हमने ऐसे बर्ताव किया जिससे इस कदर अलग-थलग हो गए कि 5 अगस्त को (जब अनुच्छेद 370 हटाया गया) बहुत कम लोगों की हमदर्दी मिली.

प्रधानमंत्री के साथ बातचीत के बारे में आपकी राय क्या है?

● उमर अब्दुल्ला
कश्मीर की मुख्यधारा के सियासतदानों को बदनाम करने की संगठित कोशिशों के बाद मुझे उम्मीद नहीं थी कि 'इस किस्म के नेताओं’ को प्रधानमंत्री से मिलने के लिए बुलाया जाएगा. इसके बावजूद, प्रधानमंत्री सच्चे नजर आए, जब उन्होंने कहा कि यह बैठक क्षणिक दिमागी सूझ नहीं थी और वे पिछले साल से ही हम सबसे मिलना चाहते थे. जो लोग यह मानते हैं कि यह 'दूसरी कई घटनाओं’ के आधार पर अचानक उठाया गया कदम था, तो यह कुछ ऐसा है जिसके बारे में अटकल ही लगाई जा सकती है.

●  महबूबा मुफ्ती
सच कहूं तो मैं बहुत ज्यादा उम्मीद के साथ नहीं गई थी. मुझे बस इतनी उम्मीद थी कि वे विश्वास बहाली के कुछ कदम उठाएंगे. मसलन राजनैतिक कैदियों की रिहाई, दिल्ली से जारी मूर्खतापूर्ण फरमानों पर रोक और 2019 से ही तकलीफ उठा रहे लोगों के लिए किसी किस्म का पैकेज. मैं बताना चाहती थी कि लोग कितने मायूस हैं. हमें जज्बाती, आर्थिक और सामाजिक तौर पर टुकड़ों में बांट दिया गया. अच्छी बात यह थी कि उन्होंने सब्र और गौर से सुना.

● सज्जाद लोन
जम्हूरियत की खूबसूरती यह है कि जिस सरकार ने हमें (हिरासत में लेने का) फरमान दिया, ठीक उसी सरकार ने हमें मिलने को बुलाया. जम्मू-कश्मीर के नेताओं को इसका श्रेय देना होगा कि नाराजगी के बावजूद उन्होंने संजीदा तरीके से अपनी मजबूत राय रखी. मुझे इससे ज्यादा कोई उम्मीद नहीं थी—बैठक बर्फ पिघलाने, सुलह का दौर शुरू करने के लिए थी. मैं बस इतनी उम्मीद करता हूं कि वे इस पहल को आगे बढ़ाएं और यह प्रक्रिया ठोस ऊंचाई पर पहुंचे.

आप सरकार के इस 'क्रम’ के बारे में क्या सोचते हैं कि पहले परिसीमन, फिर चुनाव और आखिर में राज्य का दर्जा?

●  उमर अब्दुल्ला
उन्होंने कहा कि 5 अगस्त, 2019 (का फैसला) जम्मू-कश्मीर को बाकी देश के बराबर लाने के लिए किया गया. आपके फैसले के पीछे की अगर यह वजह है, तो कम से कम अपना वादा तो पूरा कीजिए. ऐसा क्यों है कि जम्मू-कश्मीर में अभी परिसीमन हो रहा है, जबकि दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2026 में, और वह भी 2021 की जनगणना के आधार पर होगा. जहां तक राज्य की बात है, तो फिर चुनाव उससे पहले क्यों होने चाहिए? अगर जम्मू-कश्मीर राज्य होगा, तो उसे राज्य के तौर पर चुनाव में जाने दीजिए. यहां केंद्र शासित प्रदेश सरकार क्यों होनी चाहिए?

● महबूबा मुफ्ती
भाजपा चतुराई से गोलपोस्ट बदलने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उसके लोग कश्मीर का मुद्दा लोगों की नजरों में नहीं आने देना चाहते. तो अनुच्छेद 370 से हम राज्य के दर्जे पर आ गए हैं. जहां तक परिसीमन की बात है, तो खासकर घाटी के लोगों को इसे लेकर आशंकाएं हैं. उन्हें लगता है कि उनकी ताकत और छीन ली जाएगी.

● सज्जाद लोन
मैं चाहता हूं कि नई दिल्ली हालात को उस तरह देखे जैसे हम देखते हैं—कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को राज्य से वंचित कर दिया गया है. यह जम्हूरियत के खिलाफ पाप है, संघवाद के खिलाफ पाप है. चुनाव कभी भी करवाएं, लेकिन जम्मू-कश्मीर को उसका राज्य का दर्जा (जल्द से जल्द) वापस दें. ऐसा नहीं है कि हम अपने लिए सत्ता मांग रहे हैं—सत्ता उप-राज्यपाल को दीजिए, उन्हें राज्यपाल बना दीजिए. मगर अवाम की ताकत के सर्वोपरि होने की झलक तो बनी रहने दीजिए.
 
अगर विधानसभा चुनाव होते हैं तो क्या आप और आपकी पार्टी चुनाव लड़ेंगे?

● उमर अब्दुल्ला 
मैं अपनी पार्टी (नेशनल कॉन्फ्रेंस) के बारे में नहीं कह सकता. यह वास्तव में इस बात पर निर्भर करता है कि केंद्र सरकार किस हद तक चुनाव के बाद ही जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे को फिर से बहाल करने के लिए अड़ी है और मेरे सहयोगी इसको लेकर क्या सोच रखते हैं. फिलहाल मेरी चुनाव लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं इससे अलग रहते हुए, चुनावों के इतर राजनीति में काफी खुश हूं.

● महबूबा मुफ्ती 
पीडीपी हर चुनाव को लोकतांत्रिक तरीके से लड़ेगी क्योंकि हम ऐसी कोई खाली जगह नहीं छोड़ सकते कि प्रतिक्रियावादी शक्तियां आकर उस पर कब्जा जमा लें और हमारे अपने लोगों को और अधिक कमजोर कर दें. सियासी पार्टी के तौर पर और क्षेत्रीय विकल्प के रूप में यही हमारा रुख रहेगा. पर जहां तक मेरी अपनी बात है, मैं तब तक कोई चुनाव नहीं लड़ने जा रही जब तक अनुच्छेद 370 और 35ए को फिर से बहाल नहीं किया जाता. साथ ही, जब मैंने चुनाव जीता था, मैंने जम्मू-कश्मीर के संविधान और भारतीय संविधान की शपथ ली थी, इसलिए यह मेरे लिए एक जज्बाती मामला भी है. 

● सज्जाद लोन 
मैं चुनावों से दूर रहना और उसका विरोध करना ही पसंद करता लेकिन मुझे ऐसा कोई नहीं नजर आता जो हमारे संदेहों को दूर करेगा. मुझे समझ नहीं आता, हमारे कुछ नेता कैसे कह रहे हैं कि वे तो चुनाव नहीं लड़ेंगे लेकिन उनकी पार्टियां लड़ेंगी. अगर कुछ मेरे लिए हलाल है, तो क्या यह मेरे सभी नेताओं के लिए हलाल नहीं होनी चाहिए?

जम्मू-कश्मीर को किस प्रकार के राज्य का दर्जा मिलना चाहिए?

●  उमर अब्दुल्ला 
हम उस राज्य को स्वीकार नहीं करेंगे जो किसी भी लिहाज से 5 अगस्त, 2019 से पहले की तुलना में कमतर हो. हम दूसरों के बराबर होना चाहते हैं, तो हम कम अधिकारों वाला राज्य क्यों मंजूर करें? ‘एक विधान, एक निशान, एक प्रधान’ यानी पूरे देश के लिए एक मॉडल तो खुद भाजपा का अपना एजेंडा रहा है. अगर देश के लिए आपके पास एक मॉडल है, तो हमारे साथ अलग तरह का व्यवहार करना शुरू न करें. अगर आप हमारे साथ अलग व्यवहार करना शुरू करते हैं, तो आप जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली की मांगों के दूसरे दरवाजे खोल देते हैं; फिर हमें अधिकार है कि हम हर चीज को अलग मांगें. 

● महबूबा मुफ्ती 
वे अब राज्य के दर्जे को जम्मू-कश्मीर की हर समस्या के समाधान के रूप में पेश करना चाहते हैं. यह वही बात हुई कि किसी को आप 10वीं कक्षा से निकालकर केजी में डाल दो, फिर उसका दर्जा बढ़ाकर दूसरी कक्षा में भेज दो. 
 
● सज्जाद लोन 
जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए. मैं पूर्ण राज्य के दर्जे की बात कहता हूं उसके पीछे खास वजह है क्योंकि लोगों ने इसे एक अलग अर्थ दे दिया है. इस बात को लेकर अलग-अलग राय है कि क्या हम संविधान के तहत एक पूर्ण राज्य थे.

अनुच्छेद 370 की बहाली के बारे में राय? क्या इसके लिए संघर्ष जारी रखेंगे?

● उमर अब्दुल्ला
अनुच्छेद 370 वह बुनियाद थी, जिस पर जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ था. मैं मानता हूं कि राष्ट्रपति के आदेशों के जरिए केंद्र में कांग्रेस की सरकारों ने निरंतर इसे कमजोर किया. लेकिन फिर मैं यह भी कहूंगा—कि अगर अनुच्छेद 370 इतना कमजोर हो ही चुका था, तो इसे हटाने की क्या जरूरत थी, जैसा था कम से कम वैसा ही बने रहने देते. आपको इससे इतनी परेशान क्यों हो रही थी?

अगर यह जम्मू-कश्मीर का सांकेतिक संविधान और झंडा मात्र बचा था, तो उसका अर्थ कुछ न था. लेकिन उसमें कुछ तो जरूर रहा होगा कि आप उससे छुटकारा पाने के लिए इतने बेचैन थे. या तो आप मुझसे कहें कि यह पूरी तरह अप्रासंगिक था, तब मैं आपसे पूछूंगा कि अगर ऐसा था तो इसे हटाने की जहमत क्यों उठाई? लेकिन आपने इसे हटा दिया, तो इसका मतलब है कि इसमें कुछ तो था. दो अलग-अलग तरह के तर्क से आप अपनी बात को जायज नहीं ठहरा सकते.

● महबूबा मुफ्ती
अनुच्छेद 370 न केवल हमारी पहचान की रक्षा कर रहा था—जो सबसे अहम चीज है—बल्कि हमारी जमीन और हमारी नौकरियों की भी रक्षा कर रहा था ताकि हम एक समृद्ध राज्य बनें. मुझे लगता है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और हमारे पास राजनैतिक प्रक्रियाएं हैं और हमारे पास एक सुप्रीम कोर्ट है. लेकिन अदालत के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए मैं यह भी कहूंगी कि करीब डेढ़ साल से उसने अनुच्छेद 370 पर सुनवाई के लिए समय तक नहीं निकाला है.

● सज्जाद लोन 
अनुच्छेद 370 को हटाना 70 वर्षों से भाजपा का एक वैचारिक मुद्दा रहा है. इस सरकार से इसे बहाल करने की मुझे कोई उक्वमीद नहीं है. लेकिन हमारे पास इसके लिए अदालत में लड़ने या इसे बहाल करने के लिए अधिक उदार सरकार की प्रतीक्षा के विकल्प खुले हैं. क्या देश की जनता कभी ऐसी उदार सरकार चुनेगी जो 370 को बहाल कर दे? 

●  क्या हमें पाकिस्तान से बातचीत की जरूरत है?

●  उमर अब्दुल्ला 
जम्मू-कश्मीर पर बातचीत के लिए हमेशा दो ट्रैक होंगे, एक आंतरिक और एक बाहरी. ऐसी स्थितियां कभी नहीं रही हैं कि पाकिस्तान के साथ बातचीत हो रही हो लेकिन आंतरिक स्तर पर कुछ भी न चल रहा हो या आंतरिक स्तर पर कोई घटना हो रही हो और पाकिस्तान एकदम खामोश हो. खुद भाजपा के एजेंडे के नजरिए से देखा जाए तो जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा अभी भी पाकिस्तान के नियंत्रण में है. आप इसके बारे में क्या करने जा रहे हैं?
 
 महबूबा मुफ्ती
हम इस क्षेत्र में शांति चाहते हैं, तो हमें उसे शामिल करना होगा. जरा इसके बारे में भी सोचें कि आप क्वाड का हिस्सा हैं जहां हमारा कोई लेना-देना नहीं है (अन्य सदस्य ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका हैं) लेकिन हमारे अपने सार्क पड़ोसियों के साथ आप कुछ नहीं कर रहे. यहां हम पूरी तरह से अलग-थलग हैं, लेकिन वहां हम अपना सीना ठोक रहे हैं. इससे हमारे उद्देश्यों की पूर्ति कैसे होगी? 

● सज्जाद लोन
यह मेरे मतलब और मेरे राज्य के दायरे से बाहर की बात है. भारत को किसी देश से बातचीत करनी चाहिए या नहीं, इस पर केंद्र का विदेश मंत्रालय फैसला करता है. हो सकता है कि बातचीत करने की जरूरत हो, लेकिन मुझे पाकिस्तान को लेकर बेवजह शोर मचाने का कोई तुक नजर नहीं आता क्योंकि देश के बाकी हिस्सों को गलत संकेत जाएगा और वे कश्मीर को लेकर हमारी वाजिब मांगों को भी गलत समझ सकते हैं.
 
आपकी राय में घाटी में मूड कैसा है?

●  उमर अब्दुल्ला
लोग डरे हुए हैं कि न जाने उन्हें किस बात के लिए और कब हिरासत में ले लिया जाएगा या जेल में डाल दिया जाएगा. किसी भी प्रकार की असहमति के लिए बहुत कम गुंजाइश दिखती है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि सारी असहमतियां राष्ट्र विरोधी नहीं होतीं. 
 
● महबूबा मुक्रती
लोग हताश हैं, क्योंकि उन्हें अलग-थलग कर दिया गया है और उन्हें मानसिक रूप से अलगाववादी भावना की ओर धकेल दिया गया है. बहुसंख्यक आबादी का पहल मुख्यधारा के नेताओं के साथ बड़ा करीबी रिश्ता हुआ करता था. अब, मैं इतने यकीन से यह नहीं कह सकती.

●  सज्जाद लोन
लोग चुप रहने में ही भलाई समझते हैं. साफ दिखता है कि वे अंदर से गुस्से में हैं. अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म करने और राज्य का दर्जा छीन लिए जाने जैसे मुद्दों को लेकर बड़ी नाराजगी है और ये बड़े मसले हैं. कुछ छोटे मसले भी हैं जिनमें नए नौकरशाहों और ऐसे नए शासकों की नियुक्ति है, जिन्हें लोग जानते तक नहीं. बावजूद इसके घाटी के लोगों की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने उस तरीके से विरोध नहीं जताया है जैसे वे किया करते थे. पर इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने इसे स्वीकार लिया है—उनकी खामोशी को उनकी रजामंदी मानने की भूल नहीं करनी चाहिए.

उमर अब्दुल्ला, 51 वर्ष
पूर्व मुख्यमंत्री, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष
''हम दूसरों के बराबर रहना चाहते हैं, इसलिए कम अधिकारों वाला राज्य हमें क्यों मंजूर करना चाहिए?’’

''राज्य के दर्जे को हर समस्या के हल की तरह देखा जा रहा है. यह ठीक वैसा है, जैसे किसी को दसवीं क्लास से केजी में भेज दिया जाए फिर दूसरी क्लास में प्रमोट कर दिया जाए.’’

महबूबा मुफ्ती, 62 वर्ष
पूर्व मुख्यमंत्री, पीडीपी की मुखिया

सज्जाद लोन, 64वर्ष
पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन
‘‘कुछ लीडर कहते हैं वे चुनाव नहीं लड़ेंगे, उनकी पार्टियां लड़ेंगी. जो मेरे लिए हलाल है, वह मेरे सभी लीडरों के लिए हलाल नहीं होना चाहिए?’’
 

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