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आवरण कथाः नौजवान और होशियार

धरती के नए वारिस बता रहे हैं कि इसे बचाने के कदम तत्काल उठाने की जरूरत क्यों है

महक आनंद, 16 वर्ष, छात्रा, वसंत वैली स्कूल, दिल्ली महक आनंद, 16 वर्ष, छात्रा, वसंत वैली स्कूल, दिल्ली

महक आनंद, 16 वर्ष, छात्रा, वसंत वैली स्कूल, दिल्ली

जलवायु परिवर्तन का गूढ़ इलाज हमेशा 'कम उपभोग' है. कइयों को यह बेतुका लगता है—तो हमसे मितव्ययी, गांधीवादी जिंदगी जीने की उम्मीद की जा रही है? मैं मानती हूं कि कुछ भी खरीदने से पहले हमें याद रखना चाहिए कि 'ध्यान से उपभोग करें'.

बात घूम-फिरकर फिर वही जागरूकता और सतर्कता पर आ जाती है. छात्र-छात्राओं को अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है. उन्हें अपने परिवारों को समझाना होगा कि व्यक्ति की सेहत और पृथ्वी की सेहत एक-दूसरे के पर्याय हैं. कदम उठाने का वक्त अभी है. कल कहना बंद करो. आज ही से शुरू करो.

जैनब हबीब, 20 वर्ष, छात्र, बी.टेक. कंप्यूटर साइंस ऐंड कम्युनिकेशंस इंजीनियरिंग, भुवनेश्वर

उत्साह के साथ सृजन का पालना धरती के मूल में है... यह हमारी मां और हमारा आशियाना है. हमेशा के लिए और हर दिन हमारे एकमात्र घर पर कहर बरपाने वाले लालच और दंभ को त्यागो. कमरे से बाहर निकलने पर बत्ती बंद करने और कूड़ा-कर्कट कचरापेटी में डालने की शपथ लो. चीजों को बेशर्मी से इधर-उधर फेंकने के बजाए रिसाइकिल करने की भी कसम खाओ. जो बच गया है उसे थाम लो. इससे पहले कि हमारे बच्चों का भविष्य छिन्न-भिन्न हो, सचेत और जिम्मेदार बनो. कल के टिकाऊ भविष्य के लिए आज ही कदम उठाओ.

तनिष्का बेदी, 17 वर्ष, छात्रा, हेरिटेज एक्पेरिएंशल स्कूल, गुरुग्राम

 सबसे नुक्सानदेह कारक इस वक्त अत्यधिक आबादी है. बीते 100 वर्षों में यह चौगुनी बढ़ी है. संसाधनों की आपूर्ति मांग से कम है और यह बिल्कुल सिर पर आन पड़ी समस्या है, जो विभिन्न किस्म के संघर्षों, असंतुलन और गैरबराबरियों के लिए जिम्मेदार है. हमें अपनी पीढ़ी में ही इसे उलटना और काबू करना होगा. स्थानीय उपजों और उत्पादों की खपत की तरफ लौटकर जाना होगा, क्योंकि इससे संसाधनों की कम बर्बादी होगी और यह लंबे वक्त में टिकाऊ भी है.

वरदा गुप्ता, 19 वर्ष, छात्रा, प्रथम वर्ष, कंप्यूटर इंजीनियरिंग, थापर कॉलेज ऑफइंजीनियरिंग, पटियाला

''मैं जिस राज्य से ताल्लुक रखती हूं वह हिमालय का भाग है—हिमाचल प्रदेश. पर्यावरण कैसा हो यह यहां समझा जा सकता है कि आसमान बिल्कुल नीला कैसा दिखता है, शायद दिल्ली में इसका एहसास न हो. कॉप 26 सम्मेलन का चिंतन उन देशों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो देश विकास की राह में आगे बढ़ रहे हैं. यह तेजी कहीं मानव-जीवन के अस्तित्व का खतरा न बन जाए क्योंकि क्लाइमेट वॉच वर्ल्ड रीसोर्स इंस्टीट्यूट रिपोर्ट के अनुसार, भारत, चीन और अमेरिका जैस देश सबसे ज्यादा पर्यावरण बिगाड़ रहे हैं. हिमालय में बढ़ रही अप्राकृतिक झीलें बता रहीं है कि अगर हम न संभले तो आने वाला समय प्रलयंकारी हो सकता है.''

आरण्यक घोष मजूमदार, 15 वर्ष, छात्र, साउथ पॉइंट हाइस्कूल, कोलकाता
कार्बन उत्सर्जन—यह शब्द फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलते काले धुएं और धुंध की चादर में लिपटे शहरों की याद दिलाता है. यह अच्छा नजारा तो नहीं है, है क्या? कार्बन उत्सर्जन को कम और काबू करना वैश्विक चुनौती के रूप में स्वीकार किया गया है...हां, हम समझते हैं कि समस्या रातोरात हल नहीं की जा सकती.

कई मामलों में जागरूकता की कमी शैतान की भूमिका निभाती है, क्योंकि अल्पविकसित इलाकों में कार्बन उत्सर्जन कम करने में और भी बहुत ज्यादा वक्त लगेगा. कार्बन उत्सर्जन कम करने का एक तरीका यह है कि ऊर्जा हासिल करने के वैकल्पिक तरीकों और इस ऊर्जा से चलने वाली मशीनें बनाने में निवेश करें. मैंने सहारा रेगिस्तान का इस्तेमाल सौर पैनलों की चादरें बिछाने के लिए करने की संभावना के बारे में भी सुना है. मगर आखिर में सब कुछ तेजी से बढ़ते कार्बन पदचिन्हों को कम करने की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है.

सुमेधा घोष, 21 वर्ष, पोस्ट-ग्रेजुएट छात्र, इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट, कोलकाता

 क्या जलवायु संकट लाजिमी है? हम कैसे बचेंगे? अभी सारी उम्मीदें हार जाने की नौबत नहीं आई है. सीओपी26 जोरशोर से चल रहा है. युवाओं की लामबंदी वैश्विक सहयोग को रफ्तार दे रही है. दुनिया भर के युवा राष्ट्रीय नेताओं से यह जिम्मेदारी लेने का आग्रह कर रहे हैं. महामारी ने हमें यह समझने के लिए मजबूर कर दिया है कि सच्चा संतोष असल में क्या है. जलवायु संकट हमारी मनोदशा से पेचीदा ढंग से जुड़ा है और अनवरत चलने वाले इस चक्र को जीतने के लिए हमें पूरा जोर लगाना चाहिए.''

अनुष्का देशपांडे, 12 वर्ष, छात्रा, ठाकुर पब्लिक स्कूल, मुंबई

''अंग्रेजी के तीन 'आर'—रिड्यूस, रीयूज, रीसाइकिल—के सिद्धांत का पालन करके हम बच्चे पृथ्वी को बचाने में मदद कर सकते हैं. मैं हाथ धोने के बाद नल ठीक से बंद करके पानी की बर्बादी कम करती हूं. हमें चीजों का पुन: उपयोग करना चाहिए, इसलिए मैं सिंगल-यूज प्लास्टिक के बजाए धातु की बोतलों और कपड़े की थैलियों का इस्तेमाल करती हूं. हमें कागज और प्लास्टिक की चीजों को कचरे में बदलने के बजाए उन्हें रिसाइकिल करके उपयोगी चीजें बनानी चाहिए.''

उत्सब गांगुली, 21 वर्ष, एमबीबीएस के छात्र, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, भुवनेश्वर

स्वास्थ्यकर्मी पर्यावरण के स्थायित्व और व्यवहारों में बदलाव की वकालत करने की अनूठी भूमिका में हैं. सजग पेशेवर होने के नाते मैं दवाइयों/उपकरणों के लिए पर्यावरण के अनुकूल और सुरक्षा मानदंडों से समझौता न करने वाली पैकेजिंग की जरूरत को सामने लाने के लिए प्रेरित होता हूं. मान लें कि कोई एक परिवार एक हफ्ते में दवाइयों की पांच फॉयल/पैकेज खाली छोड़ता है, तो भी स्वास्थ्य से जुड़ा प्लास्टिक कचरा भारी तादाद में जमा हो जाता है.

बहुत ज्यादा या अनावश्यक गंभीर दवाइयां लेने से बचने जैसे सीधे-सादे उपाय ऐसी बुनियादी अतियों का प्रभावी मुकाबला कर सकते हैं. देखभाल करने वाले लोग जिस तरह अंधाधुंध और फिर भी अनदेखे ढंग से पैकेजिंग छोड़ देते हैं, उससे भी नियमित रूप से जबरदस्त कचरा निकलता है. यह आत्मनिरीक्षण और टिकाऊ पैकेजिंग के लिए रिसर्च की मांग करता है.

निहारिका सिंह, 12 वर्ष, कक्षा 7, सरयू इंटनेशनल स्कूल, अयोध्या

चलो मिलकर पेड़ लगाएं, धरती को हम स्वर्ग बनाएं. पानी न बेवजह बहाएं, ऊर्जा स्रोतों को भी बचाएं.'' यह नारा मैंने अपने स्कूल के कार्यक्रमों में सीखा है और जैसे-जैसे इसके संदेश को मैंने समझा पर्यावरण को बचाने में मेरी रुचि बढ़ती गई. 2019 में जब मैं कक्षा पांच में पढ़ती थी तब मुझे अपने मोहल्ले, अयोध्या जिले में उर्दू बाजार में पानी की पाइप से लगातार बहते पानी को देखकर बुरा लगता था. मैंने अपने पापा से इसकी शिकायत की तो उन्होंने नगर निगम के कंट्रोल रूम में शिकायत की, पर पाइप से बहते पानी को रोकने कोई नहीं पहुंचा.

फिर मैंने स्टेशनरी की दुकान से टैप खरीदा और खुद पाइपलाइन पर टैप लगाकर बहते पानी को रोका. फिर मैंने अपनी कक्षा के दूसरे साथियों को भी ऐसा करने को कहा. अब मुझे कहीं भी पाइप से पानी बहता दिखता है तो मैं न सिर्फ कंट्रोल रूम में फोन कर इसकी जानकारी देती हूं बल्कि कर्मचारियों के आने से पहले खुद ही पाइप पर टैप लगाकर 'लीकेज' को अस्थाई रूप से बंद भी कर देती हूं. इससे मुझे संतुष्टि मिलती है.

प्रगति भट्ट , 15 वर्ष, सेंट मेरीज कॉन्वेंट कॉलेज, रामनी पार्क तल्लीताल, नैनीताल

पृथ्वी पर मंडराते तिहरे संकट—जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता, प्रदूषण—से निपटने के लिए सभी को जागरूक होना जरूरी है. नैनीताल जैसी जगह पर बाढ़ के रौद्र रूप से हमें रू ब रू कराकर प्रकृति ने एक चेतावनी जारी कर दी है. अब हम सबका यह कर्तव्य है कि हम इसके प्रति अपनी सोच बदलें. अपने आसपास के पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ प्रदूषण बढ़ाने वाली चीजों से भी बचें. आपदा के दौरान जिस तरह पूरे हिमालय क्षेत्र में भू-क्षरण हुआ उससे जैव विविधता को भी खतरा पैदा हो गया है.''

कार्तिका जैन, 17 वर्ष, छात्रा, बॉम्बे इंटरनेशनल स्कूल, मुंबई

पृथ्वी को बचाना हमारी सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. मनुष्य होने के नाते हम भूल जाते हैं कि हम अपराजेय नहीं हैं. अगर हम साथ मिलकर उन जक्चमों को भरना शुरू नहीं करते, जो हमसे पहले की पीढ़ियों ने दिए थे, तो हमारी प्रजातियों का कोई भविष्य नहीं है. हम ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां नुक्सान को अब उलटा नहीं जा सकता, केवल नियंत्रित किया जा सकता है. अपने ग्रह को प्राथमिकता देने का समय आ गया है.

मैं उन व्यवसायों से कपड़े और दूसरी चीजें खरीदने की कोशिश करती हूं जो टिकाऊ, पर्यावरण के अनुकूल या निरामिष हैं. जब मुझे पृथ्वी पर मीट और डेयरी उद्योग के प्रभावों का पता चला, तो मैं कुछ वक्त के लिए शाकाहारी हो गई. मैं अक्सर स्वेच्छा से समुद्रतटों की सफाई अभियानों में जाती हूं. मैं आकांक्षा फाउंडेशन और बड्स ऑफ होप सरीखे एनजीओ के साथ स्वेच्छा से काम करती हूं ताकि बच्चों के बीच प्लास्टिक के जिम्मेदार इस्तेमाल, गीले और सूखे कचरे आदि के बारे में जागरूकता फैला सकूं.''

वेदिका श्रीखंडे, 17 वर्ष, छात्रा और एनवायरनमेंट काउंसिल की प्रमुख, वसंत वैली स्कूल, दिल्ली

''सिकुड़ते ग्लेशियर, बढ़ता समुद्री स्तर और स्थायी तुषार भूमियों का पिघलना कोई काल्पनिक या यहां तक कि भविष्य के मुद्दे भी नहीं हैं. ये अत्यंत ज्वलंत समस्याएं बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन का सीधा नतीजा हैं. व्यक्तिगत बदलाव समस्या का बहुत छोटा हिस्सा है. हमारे कार्बन पदचिन्हों में अच्छी-खासी कमी लाने वाली नीतियां दुनिया भर में लागू करने की जरूरत है. हमें सरकारी सब्सिडी की मदद से अक्षत ऊर्जा स्रोतों की ओर जाना होगा, जलवायु शरणार्थियों को आश्रय देना होगा और विकसित देशों से इस बदलाव को आसान बनाने का आग्रह करना होगा. हम सिर्फ एक दूसरे से ही मदद की उम्मीद कर सकते हैं, सो आइए ज्यादा रहने लायक ग्रह की राह प्रशस्त करें.''

शैली आनंद,अदिति पै, डी.डी. गुप्ता और अखिलेश पांडे

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