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आवरण कथाः टीका संकट

कोविड की घातक दूसरी लहर ने लगता है भारत की उत्साही वैक्सीन रणनीति की पोल खोलकर रख दी है. आखिर कमी कहां रह गई और इसे वापस पटरी पर कैसे लाया जाए.

आस्था और राजनीति हरिद्वार में कुंभ मेले के दौरान एक शाम पूजा के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ आस्था और राजनीति हरिद्वार में कुंभ मेले के दौरान एक शाम पूजा के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़

सोनाली आचार्जी

साथ में, पी.बी. जयकुमार

कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर देश में एक भीषण ज्वार की तरह उभरी है. दो हफ्तों के भीतर प्रतिदिन के संक्रमण के मामले एक लाख के आंकड़े को पार कर गए जो पहली लहर की तुलना में लगभग पांच गुना तेज गति है. एक अन्य डरावनी चीज प्रमुख महानगरों के अस्पतालों में दिख रही है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के 50 अस्पतालों में आइसीयू और वेंटिलेटर बेड पिछले सप्ताह ही भर गए थे.

नए मामलों में 40 फीसदी से ज्यादा का योगदान करने वाले महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लोगों के घूमने-फिरने और आर्थिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के लिए ‘जनता लॉकडाउन’ लगाना पड़ा. इस बीच नौ अन्य प्रमुख राज्यों में संक्रमण में खतरनाक वृद्धि दिखी है और देश भर में मिनी लॉकडाउन का खतरा मंडराने लगा है. इससे नाजुक स्थिति से गुजरने के बाद हाल के महीनों में कुछ सुधार की ओर बढ़ी देश की आर्थिक गतिविधियों पर फिर से संकट के बादल मंडराने लगे हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला कहती हैं, ‘‘यह लहर शहरों में दौड़ रही है. अफरातफरी मची है और दहशत का माहौल है.’’ इस हालत के लिए पूरी तरह भारत ही जिम्मेदार है. 2020 के अंत तक संक्रमण के मामलों में भारी गिरावट के कारण, केंद्र और राज्य सरकारों ने अपनी निगरानी कम कर दी और जनता भी लापरवाह हो गई.

हरिद्वार में कुंभ जैसे बड़े स्तर के सार्वजनिक समारोहों और चुनावी राज्यों में बड़ी चुनावी रैलियों को अनुमति देने के अलावा, पहली लहर के सुस्त पडऩे के संकेत मिलने के बाद प्रतिबंधों में दी गई ढील के बाद कोविड-सतर्क व्यवहार को लेकर लोगों में बहुत लापरवाही दिखने लगी. महामारी को लेकर लोगों की लापरवाही का आलम यह था कि मास्क उतार फेंकने समेत सारी सावधानियों को हवा में इस तरह उड़ा दिया मानों महामारी अब पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हो. यह सब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की दूसरी और यहां तक कि तीसरी लहरों के प्रत्यक्ष प्रमाणों, जो पहले की तुलना में अधिक घातक थे, के बावजूद हो रहा था.

आवरण कथाः टीका संकट
आवरण कथाः टीका संकट

लगता है कि मौजूदा उछाल के दौरान भारत में वायरस मजबूत और ज्यादा घातक स्ट्रेन में बदल गया है. उदाहरण के लिए, पुणे में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआइवी) की ओर से जनवरी से मार्च तक महाराष्ट्र से लिए गए 361 नमूनों में से 61 प्रतिशत में डबल म्यूटेंट (क्च.1.617) स्ट्रेन पाया गया. दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया बताते हैं, ‘‘ये नए स्ट्रेन पिछले साल के मुकाबले कहीं संक्रामक हैं.’’

संक्रमण के विस्फोट के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने अल्पकालिक उपाय शुरू किए, जिसमें मरीजों के उपचार के अलावा वायरस के लिए ट्रैकिंग और परीक्षण शामिल हैं. लेकिन दूसरी लहर ने इस बात की पोल खोल दी कि टीके के विकास और उत्पादन में अच्छी शुरुआत के बावजूद अपनी टीकाकरण रणनीति को लेकर देश ने भारी अदूरअर्शिता का परिचय दिया है.

कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण एक व्यक्ति को संक्रमित होने से रोक सकता हो या नहीं, लेकिन कई अध्ययनों से पता चला है कि यह वायरस के हमले की तीव्रता को कम कर देता है जिससे अस्पतालों में भर्ती होने की नौबत और मृत्यु की आशंका कम हो सकती है. टीके संक्रमण की लहरों को धीमा करने के लिए आबादी के बीच हर्ड इम्यूनिटी (सामूहिक रोग प्रतिरोधक शक्ति) बनाने में महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये लहरें लौट सकती हैं.

भारतः टीका लगाने में अपेक्षित तेजी नहीं
भारतः टीका लगाने में अपेक्षित तेजी नहीं

केंद्र सरकार का दावा है कि 16 जनवरी को टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद से 11 करोड़ से ज्यादा लोगों को टीका लगाया जा चुका है, लेकिन तथ्य यह भी है हमारी आबादी के 7.9 प्रतिशत से कम का टीकाकरण किया गया है जबकि अमेरिका में यह औसत 57 प्रतिशत और ब्रिटेन में 60 प्रतिशत है. इससे भी बुरी बात यह है कि महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने टीकों की कमी की शिकायत की, केंद्र ने भी आंकड़े दिए कि स्टॉक में 3 करोड़ से अधिक खुराक थी और राज्यों को ही उनकी खराब योजना और वितरण के लिए दोषी ठहराया.

एक दूसरे पर दोषारोपण को अगर परे कर दें तो इसमें कोई शक नहीं है कि भारत एक टीका आपातकाल का सामना कर रहा है. देश को हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के लिए 75 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण करना होगा. टीकाकरण की वर्तमान दर को देखते हुए यह लक्ष्य 2022 की गर्मियों तक ही पूरा हो पाएगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि आदर्श स्थिति के लिए अगले तीन महीनों में ऐसा कर दिखाना होगा. इसका मतलब है कि भारत को प्रतिदिन 40 लाख लोगों के टीकाकरण की मौजूदा क्षमता को बढ़ाकर 2 करोड़ प्रतिदिन करना होगा, यानी पांच गुणा वृद्धि की जरूरत है. अगर हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो निश्चित रूप से मौजूदा लहर के बाद एक तीसरी लहर आएगी.

कुछ महीने पहले की आरामदेह स्थिति से हम इस भयावह स्थिति तक कैसे पहुंच गए? टीकाकरण की गति बढ़ाने और वायरस का प्रसार रोकने के लिए हमें क्या करने की आवश्यकता है?

टीकाकरण में राज्यों का हाल
टीकाकरण में राज्यों का हाल

हम कहां चूके?
एक ऐसे देश के लिए, जिसके पास विश्वस्तर पर टीके बनाने की सबसे बड़ी क्षमता के अलावा दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण कार्यक्रम को चलाने का अनुभव है, उसे कोविड टीके के उत्पादन और इसे लोगों को लगाने के बड़े कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए प्रबंधन के स्तर पर बेहतर प्रदर्शन की जरूरत थी. हमारे पास एक अतिरिक्त फायदा भी था.

पिछले साल के अंत तक जब दुनिया भर में लगभग एक दर्जन टीकों के लिए अंतिम चरण का नैदानिक परीक्षण अभी चल ही रहा था, भारत के पास पहले से ही कोविड के दो टीके—कोविशील्ड और कोवैक्सीन—निर्माण की प्रक्रिया में पहुंच चुके थे. भारत सरकार को इस का श्रेय जाता है कि एनआइवी ने एक निजी फार्मा दिग्गज भारत बायोटेक के सहयोग से कोवैक्सीन को विकसित किया.

दूसरी ओर कोविशील्ड को ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी ने फार्मा की दिग्गज कंपनी एस्ट्राजेनेका के सहयोग से विकसित किया था और उन्होंने भारत सहित दुनियाभर के देशों में आपूर्ति के लिए विश्व की सबसे बड़ी टीका निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआइआइ) के साथ शुरुआत में एक अरब खुराक के निर्माण के लिए करार किया. 

टीकाकरण में धीमी गति
टीकाकरण में धीमी गति

यहीं पर भारतीय स्वास्थ्य रणनीतिकार गच्चा खा गए. 50 संगठनों के गठबंधन पीपुल्स वैक्सीन एलायंस के अनुसार, दुनिया की आबादी के सिर्फ 14 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करने वाले अमीर देशों ने कोविशील्ड सहित सभी सबसे अच्छे टीकों की आधे से अधिक (53 प्रतिशत) खुराक खरीद ली. फाइजर के बायोएनटेक के साथ साझेदारी करने के बाद ट्रंप प्रशासन ने 10 करोड़ खुराकों के लिए लगभग 2 अरब डॉलर का भुगतान किया और उन्हें एक विकल्प यह भी दिया यदि यह टीका सफल रहा तो 50 करोड़ और खुराक देनी होगी.

आज, अमेरिका के पास अपनी पूरी आबादी के दो बार टीकाकरण लायक पर्याप्त खुराक है. इजराइल ने अपनी पूरी आबादी का टीकाकरण करने के लिए पर्याप्त खुराक मुहैया कराने के एवज में अपने नागरिकों के मेडिकल रिकॉर्ड तक फाइजर को पहुंच देने की पेशकश करने जैसा कदम उठाया. इजरायल अपनी 75 प्रतिशत आबादी को टीका देने के लक्ष्य को प्राप्त करने के काफी करीब पहुंच चुका है.

दूसरी ओर, भारत सरकार ने शुरुआती चरण में दोनों वैक्सीन निर्माताओं, एसआइआइ और भारत बायोटेक को केवल 11 करोड़ टीकों का एक सीमित ऑर्डर दिया. नीति आयोग के सदस्य और कोविड-19 के लिए टीकाकरण पर राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह (एनईजीवीएसी) के सह-अध्यक्ष डॉ. वी.के. पॉल, कहते हैं, ''हमारी प्राथमिकता अति संवेदनशील समूहों के टीकाकरण की थी.

स्वास्थ्यकर्मियों, फ्रंटलाइन वर्कर्स, 65 साल से ऊपर के लोगों और पूर्व में रोगों से ग्रस्त 30 करोड़ लोगों के जुलाई तक टीकाकरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. इस समूह को कोविड-19 से सबसे अधिक खतरा है इसलिए उनकी रक्षा करना महत्वपूर्ण था. निजी बिक्री की इजाजत इसलिए नहीं दी गई ताकि प्राथमिकता वाले समूहों के लिए पर्याप्त टीके की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके.’’

सरकार इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए आश्वस्त थी इसलिए उसने मिशन मैत्री के हिस्से के रूप में दुनिया भर के जरूरतमंद देशों को 6.5 करोड़ खुराक का निर्यात किया. इस बीच, भ्रामक चर्चा से वैक्सीन को लेकर लोगों में हिचकिचाहट पैदा हो गई और शुरुआती छह हफ्तों में लक्ष्य समूह के केवल 40 प्रतिशत ने ही अपने टीके लगवाए और टीके की शीशियों के बेकार होने की खबरें भी आईं.

कुछ विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं कि सरकार का लक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण, जिसे कुछ लोग भारत के मौजूदा संकट का कारण मानते हैं, अभियान की शुरुआत के लिए सबसे अच्छा तरीका था. मेडिसिन सैंन्ज फ्रंटियर्स की भारत की डायरेक्टर लीना मेंघाने कहती हैं, ''जहां तक मांग-आपूर्ति का प्रश्न है, भारत में सफल होने के लिए किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप को लक्ष्य-आधारित रखा जाना जरूरी था. आप एक बार में इतने बड़े देश का टीकाकरण नहीं कर सकते.’’

टीके की आपूर्ति में कमी
टीके की आपूर्ति में कमी

लेकिन वे यह भी कहती हैं, ‘‘भारत ने उतना निवेश नहीं किया जितना कि उसे अनुसंधान में या विनिर्माण में या देश के भीतर लक्षित लक्ष्यों के लिए टीका सुनिश्चित कराने के लिए करना चाहिए.’’ योजनाकार इस बात का भी अनुमान नहीं लगा सके कि कोरोना की दूसरी लहर भी जल्द ही आने वाली है जो युवाओं के बड़े वर्ग को निशाना बनाएगी इसलिए टीकाकरण की रणनीति में तेजी से बदलाव करते हुए सभी आयु समूहों को शामिल करने की आवश्यकता होगी.

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक पूर्व नौकरशाह, जो अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते, के अनुसार सबसे बड़ी चूक कोवैक्सीन के लिए विनिर्माण प्रबंधों में हुई और सरकार इसके उत्पादन के स्तर को बढ़ाने में विफल रही. भारत बायोटेक की हैदराबाद में तीन और बेंगलूरू में एक विनिर्माण सुविधा है. राज्यसभा की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी एक महीने में 1.25 करोड़ तक खुराक का उत्पादन कर सकती है.

हालांकि वर्तमान में यह एक महीने में 40-50 लाख खुराक का उत्पादन कर रही है और पिछले नवंबर से इसने लगभग 2.5 करोड़ खुराक का उत्पादन किया. चूंकि इसे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों की साझेदारी में विकसित किया गया इसलिए केंद्र सरकार अन्य कंपनियों को भी वैक्सीन के निर्माण का लाइसेंस दे सकती थी और उत्पादन बढ़ाया जा सकता था.

टीके की आपूर्ति में कमी
टीके की आपूर्ति में कमी

कोवैक्सीन की सीमित आपूर्ति का मतलब है कि एसआइआइ पर उत्पादन दबाव बढ़ेगा जो एस्ट्राजेनेका के साथ अपने समझौते में दुनिया के लिए अन्य कोविड टीकों के निर्माण के लिए भी वचनबद्ध है. भारत में अभी तक के टीकाकरण में बड़ा हिस्सा—लगभग 9 करोड़ खुराक—कोविशील्ड का रहा है जबकि कोवैक्सीन की 96 लाख खुराक का उपयोग किया गया है.

एसआइआइ पहले ही सरकार को 10 करोड़ खुराक दे चुकी है और मार्च के अंत में 10 करोड़ और खुराक के लिए एक नया ऑर्डर मिला है. इसके विपरीत, भारत बायोटेक ने 1 करोड़ खुराक वितरित की हैं और उसे 2 करोड़ खुराक के लिए नया ऑर्डर मिला है.

इसकी तुलना में रूस की ओर से विकसित स्पुतनिक-1 (स्पुतनिक फाइव) जिसे भारत में उपयोग के लिए अभी-अभी मंजूरी मिली है, ने टीके के उत्पादन के लिए छह भारतीय निर्माताओं के साथ करार कर लिया है और इसके बहुत जल्द एक महीने में 85-95 करोड़ खुराक की उत्पादन दर हासिल करने की उम्मीद है.

ऐसोला कहती हैं, ‘‘इस स्तर की आपूर्ति से ही हमें सामूहिक टीकाकरण में मदद मिलेगी. हम भारत में सालाना 2 अरब से अधिक खुराक का उत्पादन करने की क्षमता रखते हैं. हम उस क्षमता का लाभ क्यों नहीं लेते? हमने कोवैक्सीन के निर्माण के लिए इकाइयों की क्षमता क्यों नहीं बढ़ाई?’’ 

टीके की आपूर्ति में कमी
टीके की आपूर्ति में कमी

अपर्याप्त वित्त पोषण 
भारत ने टीकों के विकास के लिए वित्त पोषण तो किया है लेकिन शिकायत है कि इसके लिए रखी गई रकम विशाल लक्ष्य को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है. नवंबर में सरकार ने 5-6 टीकों के विकास में तेजी लाने के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक कोविड-19 टीका विकास मिशन के लिए 900 करोड़ (12.0 करोड़ डॉलर) के मिशन कोविड सुरक्षा की घोषणा की.

कोवैक्सीन के निर्माता भारत बायोटेक ने भी हैदराबाद और बेंगलूरू के अपने केंद्रों के विकास के लिए क्रमश: 150 करोड़ रुपये और 75 करोड़ रुपये की मांग की है. एसआइआइ ने इस साल मई तक प्रतिदिन मौजूदा 6 करोड़ खुराक निर्माण क्षमता को बढ़ाकर 10 करोड़ तक करने के लिए इस फंड से वित्तीय सहायता के लिए आवेदन किया है और बैंकों से भी कर्ज मांगा है.

एसआइआइ के सीईओ आदर पूनावाला कहते हैं, ''हमें मोटे तौर पर 3,000 करोड़ रुपये चाहिए जो छोटी रकम नहीं है, खासकर यह देखते हुए कि हमने पहले ही हजारों करोड़ रुपये इसके लिए खर्च किए हैं.’’ पूनावाला का यह भी कहना है कि वे मुनाफे को पूरी तरह से त्यागने और अत्यधिक रियायती मूल्य पर खुराक देने के लिए सहमत हो गए थे. कोविशील्ड, जिसकी कीमत प्रति खुराक 210 रुपये थी अब भारत को 150 रुपये प्रति खुराक की नई दर पर दी जा रही है.

अमेरिका से तुलना करें तो सरकार के एक सार्वजनिक-निजी साझेदारी कार्यक्रम ऑपरेशन वार्प स्पीड (ओडब्ल्यूएस) के तहत कोविड-19 टीकों के विकास, निर्माण और वितरण में तेजी लाने के लिए अमेरिकी सरकार अक्तूबर तक के लिए 18 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता दे रही है. यूएस बायोमेडिकल एडवांस्ड रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ने एस्ट्राजेनेका को टीका विकसित करने के लिए 1 अरब डॉलर से अधिक दिए.

जर्मन सरकार ने बायोएनटेक को अपने टीके को नैदानिक चरण में ले जाने के लिए सहयोग के लिए 44.5 करोड़ डॉलर दिए. बाद में फाइजर ने एक टीके के विकास के लिए इसके साथ समझौता भी किया. ब्रिटेन की सरकार ने कोविड-19 टीकों पर लगभग 1.7 अरब डॉलर खर्च किए हैं, जिसमें टीका विकसित करने के लिए चल रहे वैश्विक प्रयासों के लिए 82.6 करोड़ डॉलर तक का योगदान और एक नई वैश्विक टीका-साझाकरण योजना में 69.0 करोड़ डॉलर का योगदान शामिल है.

विशेषज्ञों का कहना है कि मामूली निवेश, मुनाफे के लिए निजी बाजार में बेचने का कोई लाइसेंस नहीं होना और सरकार के कम कीमत पर खरीदने के कारण, एसआइआइ और अन्य भारतीय निजी फार्मा कंपनियां विनिर्माण में अधिक पैसा लगाने के लिए अनिच्छुक दिखती हैं और इसमें हैरानी की कोई बात नहीं. निजी उद्योग से भारी आपूर्ति प्राप्त करने के लिए सरकार की तरफ से प्रोत्साहन देने की जरूरत थी.

वर्तमान में, निर्माताओं ने खुद बड़े निवेश किए हैं. एसआइआइ ने अपने 3,000 करोड़ रु. और भारत बायोटेक ने 500 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. मेंघाने कहती हैं, ''कोविशील्ड भारत में बना हो सकता है, लेकिन भारत का इस पर कोई अधिकार नहीं है. इसके विकास के लिए 92 अन्य देशों ने वित्त पोषण किया था. भारत ने विकास के स्तर पर अधिक निवेश क्यों नहीं किया?’’

बदतर तो यह है जो लोग भारत में बेचने या निर्माण करने के इच्छुक थे, वे हाल तक धीमी और बोझिल प्रक्रिया के शिकार थे और इससे बाजार में टीका देर से आया. कोविशील्ड और कोवैक्सीन को जनवरी के अंत में मंजूरी मिली थी. डेवलपर के दो राउंड डेटा जमा करने और तीसरे चरण के परिणामों का इंतजार होने के बावजूद, तीसरे टीके-रूस के स्पुतनिक V को मंजूरी देने में तीन माह लग गए. देश में अध्ययन के लिए निर्धारित जरूरतों से भी कई खिलाड़ी यहां आने से बचते रहे—एस्ट्राजेनेका और जॉनसन ऐंड जॉनसन सहमत हुए, लेकिन फाइजऱ ने अपनी बोली वापस ले ली. 

हम यहां से कहां जाएंगे?
भारतीय स्वास्थ्य योजनाकारों को संदेश मिल गया है और वे अपने तरीके बदल रहे हैं. भारत में कोविड की सकारात्मकता दर 5.4 प्रतिशत हो गई है जो डब्ल्यूएचओ की अनुशंसित 5 प्रतिशत की सीमा से अधिक है. इसलिए हमें सभी दिशाओं में प्रयास करने की जरूरत है और विशेष रूप से टीकाकरण को लेकर. नीति में महत्वपूर्ण बदलाव के बाद, सरकार ने 13 अप्रैल को विदेशी टीकों के लिए अनुमोदन प्रक्रिया तेज की है.

ब्रिजिंग स्टडी की आवश्यकता से भी छूट दे दी गई. हालांकि यह स्वागत योग्य कदम है लेकिन विशेषज्ञों को लगता है कि बहुत देर हो चुकी है. असोला का कहना है, ''हां, हम अधिक टीकों के लिए दरवाजे खोल रहे हैं. लेकिन क्या कंपनियां अभी भी रुचि रखती हैं? मुझे लगता है कि फिलहाल हमारे सामने मुख्य सवाल है कि निर्माताओं को कैसे प्रोत्साहित किया जाए और साथ ही टीके का समान वितरण कैसे सुनिश्चित किया जाए.’’ 

अधिकांश दांव हाल ही में अनुमोदित स्पुतनिक-V पर लगाए जा रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि सभी टीकों को मुफ्त रखने की जरूरत नहीं है; यदि समाज का कोई वर्ग भुगतान करने को तैयार है तो उसे बाजार के लिए खोलने में कोई बुराई नहीं है. दरअसल, पूनावाला खुद साल की शुरुआत में अपने टीके को 1,000 रुपये में बेचने के लिए तैयार थे. लेकिन सरकार ने अभी तक इसकी अनुमति नहीं दी है.

भारत में, निजी अस्पतालों के माध्यम से केवल 27 प्रतिशत खुराक दी की गई है; शेष—लगभग 7 करोड़ खुराक- मुफ्त दी गई है. विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी का अनुमान था कि अगर सरकार निजी क्षेत्र को भी टीके के काम में लगाती है तो भारत दो महीने में 50 करोड़ लोगों का टीकाकरण कर सकता है. निजी खिलाडिय़ों को सूचीबद्ध करने से न केवल एक व्यापक पहुंच तय होगी, बल्कि टीका लगाने वालों का भी हित होगा, भंडारण और वितरण क्षमताओं में सुधार होगा, अधिक केंद्र इस प्रणाली से जुड़ेंगे.

इसी तरह, टीका वितरण को भी सुव्यवस्थित किया जा सकता है. खरीद और वितरण के लिए केंद्रीकृत प्रणाली ईविन सिस्टम और टीके को ट्रैक करने और आवंटित करने के लिए कॉविन ऐप पर निर्भर करती है. लेकिन इस बात का अब तक कोई उचित कारण नहीं दिया गया है कि टीकाकरण के लिए कम पात्र आबादी वाले राज्यों को, अधिक योग्य आबादी वाले राज्यों की तुलना में ज्यादा खुराक क्यों मिली. इसके अलावा, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे कोरोना के उच्च सक्रिय मामलों वाले राज्यों को कम मामले वाले राज्यों की तुलना में कम खुराक मिली.

टीका विशेषज्ञ गगनदीप कंग की सलाह है कि वायरस फैलने से रोकने के लिए उच्च मामलों या अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में टीकाकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए. राज्य स्तर पर भी ऐसा नहीं हो रहा है. उदाहरण के लिए, जिन जिलों ने अपनी आबादी के उच्चतम प्रतिशत का टीकाकरण किया है, वहां भारत के बहुत कम ही मामले थे. जिन जिलों में मामले बढ़ रहे हैं वे आबादी का टीकाकरण कराने में बहुत पीछे हैं.

अच्छी खबर यह है कि हमें अक्तूबर से पहले कम से कम तीन और टीके मिलने की संभावना है. अहमदाबाद स्थित जाएडस कैडिला के कोविड-19 वैक्सीन कैंडिडेट जायकोव-डी का तीसरे चरण का परीक्षण चल रहा है जिसके मई में पूरा हो जाने की संभावना है. फाइजर-बायोएनटेक और मॉडर्ना जैसी कंपनियों की वैक्सीन भी मई-जून में आने की उम्मीद है.

जायडस ने सालाना 10 करोड़ खुराक की इन-हाउस विनिर्माण क्षमता बनाई है और प्रति वर्ष लगभग 15 करोड़ खुराक की अतिरिक्त क्षमता के लिए कॉन्ट्रैक्ट निर्माताओं को भी काम पर लगाया है. एसआइआइ और अमेरिकी टीका विकासकर्ता कंपनी नोवावैक्स मिलकर कोवावैक्स विकसित कर रहे हैं, जिसके सितंबर तक आने की संभावना है. दावा है कि कोवावैक्स का कोविड-19 के अफ्रीकी और यूके वेरिएंट पर परीक्षण किया गया है और यह 89 प्रतिशत प्रभावी है.

हैदराबाद स्थित बायोलॉजिकल-ई का जॉनसन ऐंड जॉनसन की कोविड-19 वैक्सीन की सालाना 60 लाख खुराक बनाने का एक अनुबंध-निर्माण सौदा है. अमेरिका में एक शॉट वाले टीके को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है और कंपनी भारत में 1,000 वॉलेंटियर्स पर ब्रिजिंग ट्रायल शुरू करने की तैयारी कर रही है. इस बीच, यूएस ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने टीकाकरण के कुछ मामलों में रक्त के थक्के जमने की घटनाओं की रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए जेएंडजे की वैक्सीन पर अस्थायी रोक लगाई है.

भारत बायोटेक भी नाक से दिए जाने वाले कोविड-19 के अपने टीका का परीक्षण कर रहा है. इसके अध्यक्ष कृष्णा एला ने पहले कहा था कि यदि सरकार नैदानिक परीक्षणों के सभी चरणों के लिए प्रोटोकॉल विकसित कर सकी, तो कंपनी जून 2021 तक टीका बाजार में ला सकती है. वे कहते हैं, ‘‘उत्पादन बहुत आसान है. सुविधा पहले से ही मौजूद है. यह वेक्टर-आधारित टीका है. सफल होने पर मैं 1 अरब से अधिक खुराक बना सकता हूं.’’

हालांकि, किसी को पता नहीं है कि टीकों से मिली प्रतिरक्षा कितने समय तक टिकेगी. वर्तमान अनुमान 8-12 महीने का है. वायरस के म्यूटेंट स्ट्रेन्स को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. स्पष्ट है कि टीका अनुसंधान को जारी रखना होगा और भारत सहित सभी देशों को लगातार टीकाकरण रणनीतियां मजबूत करनी होंगी. लोगों को नियमित फ्लू शॉट की तरह हर साल कोविड के बूस्टर शॉट्स लेने के लिए भी वापस आना होगा.

वायरोलॉजिस्ट टी. जैकब जॉन कहते हैं, ''कोविड खत्म नहीं होने जा रहा. हो सकता है कि समय के साथ यह मंद पड़ जाए. कुछ महीनों में, दूसरे महीनों की तुलना में अधिक मामले देखने को मिल सकते हैं.’’ ऐसे में लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करने वाले टीकों को ही कोविड-19 के खिलाफ हमारे शस्त्रागार का हिस्सा बनाना होगा. वैक्सीन 2.0 के लिए काम पहले से ही शुरू हो चुका है.

इस दौड़ में सीरम की अपनी कोविवैक्स, युनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग का एसआइआइ-कोवैक्स, कोडाजेनिक्स के कोवी-वैक के साथ और नोवियोवैक्स के साथ कोवैक्स हैं; जाएड्स की डीएनए वैक्सीन जायकोव-डी, वाशिंगटन युनिवॢसटी के साथ भारत बायोटेक का इंट्रा-नेजल वैक्सीन और जेननोवा की एमआरएनए वैक्सीन और रिलयांस लाइफ साइंस की पुन:संयोजक वैक्सीन शमिल है. बस, भारतीय स्वास्थ्य योजनाकारों को अतीत से सबक लेते हुए अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने से बचने की जरूरत है. 


—साथ में राहुल नरोन्हा, किरण डी. तारे, रोहित परिहार, आशीष मिश्र, जीमोन जैकब और अरविंद गौड़ा

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