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वैश्विक अर्थव्यवस्थाः वक्त बदल रहा है...

वैश्विक अर्थव्यवस्था की रिकवरी मजबूत है लेकिन वह असमान और अधूरी है, और 2022 में कई नई चुनौतियां हैं.

वैश्विक अर्थव्यवस्था वैश्विक अर्थव्यवस्था

जहांगीर अज़ीज़

महामारी शुरू हुए करीब दो साल होने को हैं और अभी तक हम मुसीबतों-खतरों से उबरे नहीं हैं. ओमिक्रॉन वैरिएंट अब भी फैल रहा है जबकि डेल्टा लहर अभी थमी नहीं है. लेकिन यह 2020 नहीं है. तब के मुकाबले हमारे पास आज कई वैक्सीन हैं और इलाज के लिए कम से कम दो दवाओं का निर्माण हो रहा है और कई का फॉर्मूला तैयार हो रहा है.

हालांकि दुनियाभर में टीकाकरण की दरें अलग-अलग हैं लेकिन लॉकडाउन और सामाजिक दूरी बनाने के दूसरे बेहद कठोर उपाय बीते दिनों की बात हो सकती है. ऐसे में हम शायद कुछ झटकों के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था की मजबूत रिकवरी जारी रहने की उक्वमीद कर सकते हैं. 2021 में वैश्विक अर्थव्यवस्था संभवत: करीब 5.8 फीसद की दर से बढ़ी, जो 2020 में -3.3 फीसद पहुंच गई थी.

हम 2022 में 4.3 फीसद की दर से ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं. लेकिन यह रिकवरी असमान और अधूरी ही रहेगी. विकसित अर्थव्यवस्थाएं उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा मजबूती से पटरी पर आई है. उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में महामारी से पहले के मुकाबले रिकवरी 2022 के आखिर तक अधूरी रहेगी. इसमें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए.

महामारी बुनियादी तौर पर ऐसा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट था जिसके आर्थिक नतीजों को दूर करने के लिए भरपूर वित्तीय मदद की जरूरत थी. विकसित देशों में दूसरे देशों के मुकाबले सार्वजनिक स्वास्थ्य की कहीं बेहतर व्यवस्था है और उनके पास ज्यादा वित्तीय गुंजाइश भी है. ये अंतर असमान रफ्तार और रिकवरी की पूर्णता में जाहिर हो रहे हैं.

रिकवरी के व्यापक होने के साथ ही असाधारण नीतिगत समर्थन भी अपने अंत को पहुंच रहा है. मौद्रिक और वित्तीय नीतियां सामान्य हो रही हैं, अलबत्ता विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं में उनकी अतिरिक्त क्षमताओं और उनके सामने मौजूद महंगाई के दबावों के आधार पर ऐसा हो रहा है. हमें उम्मीद है कि आपूर्ति शृंखला के सामान्य होने के साथ ही महंगाई का दबाव कम हो जाएगा लेकिन यह महामारी के पहले के मुकाबले बहुम स्तर पर जाकर सामान्य होगा.

नीतियां सामान्य होने के साथ ही यह सवाल लाजमी है कि क्या सामान्य स्थिति के प्रति अर्थव्यवस्थाएं लचीली हो सकती हैं. कुछेक को छोड़कर अमेरिका समेत ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं इस इम्तिहान को पास कर जाएंगी क्योंकि निकासी धीमी होगी और प्राइवेट सेक्टर की बैलेंस शीट 2016-18 के मुकाबले ज्यादा मजबूत स्थिति में हैं. लेकिन सारी अर्थव्यवस्थाएं अछूती नहीं रहेंगी.

ब्राजील और चिली को नीतिगत समर्थन की वापसी से पहले ही चुनौती मिल रही है और मुमकिन है कि भारत जैसे दूसरे देशों में घर और एसएमई की बैलेंस शीट को व्यापक नुक्सान पहुंचे, जिससे आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है. इन देशों में जितनी वित्तीय मदद मिलनी चाहिए थी, उतनी नहीं मिली. मजबूत लेकिन असमान रिकवरी तथा महामारी की अनिश्चितताओं के बीच पांच विकास के मामलों पर नजर रखना चाहिए.

कोविड-19 बन जाएगी स्थानीय बीमारी
हालांकि डेल्टा के अब भी गंभीर होने और ओमिक्रॉन के प्रसार के मद्देनजर इसकी कल्पना करना मुश्किल है लेकिन टीकाकरण, दवाइयों और बेहतर चिकित्सीय प्रबंधन के साथ ही यह महामारी स्थानीय होती जा रही है. इस वायरस के कम खतरनाक रूप हमारे साथ बने रहेंगे. ज्यादा सचेत सामाजिक मेलजोल के साथ ही टीकाकरण सामान्य बन जाएगा.

आर्थिक प्रभाव के मामलों में इसका यह मतलब हुआ कि स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ जाएगा—उसी तरह से जैसे इन्फ्लुएंजा की वजह से उत्पादकता लागत  बढ़ जाती है—अनुपस्थिति और कामगारों की हिस्सेदारी कम होने के साथ ही कामगारों के काम की अवधि और पूंजी सिकड़ जाएगी. इन सबकी वजह से दुनियाभर में जीडीपी का कुछ हिस्सा गायब हो जाएगा लेकिन उसका ग्रोथ रेट पर खास असर नहीं पड़ेगा.

कॉप26 की प्रतिबद्धताएं
कार्बन न्यूट्रलिटी हासिल करने के लिए कॉप26 की प्रतिबद्धताओं से न केवल भविष्य के ऊर्जा स्रोत बल्कि जिंसों की कीमत भी प्रभावित होंगे. कार्बन न्यूट्रलिटी की राह तय कर पाना आसान नहीं होगा, खासकर जब आपका देश पर्याप्त विकल्पों के बिना जीवाश्म ईंधन के उपभोग को कम करने की कोशिश करने वाला है.

इस साल हमने पहले ही देख लिया है कि यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतें तेजी से बढ़ गईं क्योंकि टिकाऊ विकल्पों की व्यवस्था किए बगैर जीवाश्म ईंधन वाली ऊर्जा के स्रोतों में कटौती कर दी गई. इसी तरह, चीन के कार्बन खत्म करने के प्रयासों की वजह से दुनियाभर में जिंसों की कीमत बढ़ गई. स्थाई और ज्यादा सक्षम हरित ऊर्जा के लिए व्यापक वैश्विक प्रयास वक्त के साथ ही सफल होंगे. इस बीच वैश्विक जिंस बाजार छोटे चक्रों के साथ ज्यादा संवेदनशील हो जाएंगे.

चीन का व्यवस्था परिवर्तन
हालांकि हमें चीन की धीमी ग्रोथ से 2021 में पटरी पर लौटने की उम्मीद थी, जबकि नीतिगत व्यवस्था परिवर्तन अभी जारी है. इस बदलाव के दो पहलू महत्वपूर्ण हैं. पहला, ग्रोथ के प्रभुत्व वाले लक्ष्य से बहु-उद्देश्यीय फ्रेमवर्क की ओर स्थानांतरण का मतलब है कि मध्यम अवधि में कम ग्रोथ के लिए ज्यादा तैयार रहना होगा. एक ओर जहां नीतियों से इनोवेशन को प्रोत्साहन और अधिक मूल्य संवर्धित उद्योगों (ग्रीन टेक, बायोटेक, कंप्यूटिंग) को मदद मिलेगी, जिससे ग्रोथ को बढ़ावा मिलना चाहिए, वहीं दूसरी नीतियों से दीर्घकालिक फायदों की उम्मीद में अल्पकालिक ग्रोथ की संभावनाएं निरुत्साहित हो सकती हैं (फाइनेंशियल डिलीवरेजिंग, डिकार्बनाइजेशन, और क्षेत्रीय तथा आय की समानता में कमी).

दूसरा, अतीत में आवास और औद्योगिक नीतियों को मैक्रोइकोनॉमिक नीतियों के साथ प्रतिचक्रीय आधार पर आगे बढ़ाया गया. इसका मकसद मैक्रोइकोनॉमिक नीतियों की प्रभाविता बढ़ाना और उनके संचरण अंतराल को कम करना था. औद्योगिक और आवास नीतियों के अब चक्रीय विकल्पों के बजाए दीर्घकालिक उद्देश्यों पर केंद्रित होने की वजह से मैक्रोइकोनॉमिक नीति के बदलाव कमजोर पड़ गए हैं और उनका संचरण अंतराल लंबा हो गया है.

मुमकिन है कि नीतियों को पहले की तरह प्रभावी बनाने के लिए उनमें संशोधन की जरूरत हो. यह सीखने वाली प्रक्रिया है और इसमें वक्त लग सकता है, जिससे अधिकारियों के लिए पर्याप्त से कम नीतिगत मदद देने का जोखिम बढ़ जाता है. चीन के ग्रोथ इंजन में ढांचागत मंदी और बदलाव का यह भी मतलब है कि इससे चीन से जुड़ी अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी. चीन को जिंस और पारंपरिक उत्पाद निर्यात करने वालों को इस बदलाव की आंच महसूस होगी जबकि महंगे उत्पादों के निर्यातकों को फायदा हो सकता है.

कोविड से स्थायी नुक्सान
हमारा अनुमान है कि यह महामारी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मध्य समय के ग्रोथ का स्थायी नुक्सान कर जाएगी. यह उनके श्रम बाजारों, घरों और एसएमई बैलेंस शीट को पर्याप्त दागदार बना देगी. एक ओर जहां डिजिटाइजेशन के छलांग लगाने समेत इसकी यादें ताजा करने वाली कहानियां हैं कि उत्पादकता नए स्वर्णिम युग में कैसे पहुंच रही है, वहीं हमारा अनुमान है कि इन अर्थव्यवस्थाओं में उत्पादकता वृद्धि के चालक उत्पादकता में निरंतर दबे रुझान की ओर संकेत करते हैं. चीन के मध्यकालिक ग्रोथ में मंदी पहले से मौजूद बाधाओं, जैसे बुढ़ाती आबादी, आर्थिक राष्ट्रवाद और व्यापार संरक्षण में इजाफा करेगी. 

आ रहे चुनावी चक्र
उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाएं इस मामले में खुशकिस्मत रहीं कि महामारी और उसके बाद के दिनों में कोई बड़े चुनावी बदलाव नहीं हुए. लेकिन आने वाले दो-तीन वर्षों में इन सभी अर्थव्यवस्थाओं में चुनाव होने वाले हैं. महामारी के साये में होने वाले कुछ चुनावों (ज्यादातर दक्षिण अमेरिका) में साफ तौर पर लोकलुभावनवाद की ओर झुकाव दिखा है.

इस बदलाव से वित्तीय अनुशासन को नुक्सान पहुंचा है और बाजार सहम गए हैं. महामारी से पहले के वर्षों में कम ग्रोथ और (खासकर निम्न एवं मध्य आय वर्ग वाले) परिवारों और एसएमई की बैलेंस शीट दक्षिण अमेरिका में राजनैकि झुकाव की प्रमुख वजहें थीं. चुनाव के समय दूसरी उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं की भी परीक्षा होनी है.

 जहांगीर अजीज जे.पी. मॉर्गन के चीफ इमर्जिंग मार्केट्स इकोनॉमिस्ट हैं.

डेल्टा के अब भी गंभीर होने और ओमिक्रॉन के प्रसार के मद्देनजर इसकी कल्पना करना मुश्किल है लेकिन टीकाकरण, दवाइयों और बेहतर चिकित्सीय प्रबंधन के साथ ही यह महामारी स्थानीय होती जा रही है.

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