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आवरण कथाः दूसरी लहर खौफनाक कहर और बचाव

कोरोना वायरस के ज्यादा संक्रामक रूप में लौटने के साथ चौतरफा घिरा देश चुनौतियों से निपटने और किसी तरह लड़ाई जारी रखने में जुटा.

अहमदाबाद के एक अस्पताल के बाहर एंबुलेंस में मरीज का ऑक्सीजन मास्क ठीक करता स्वास्थ्यकर्मी अहमदाबाद के एक अस्पताल के बाहर एंबुलेंस में मरीज का ऑक्सीजन मास्क ठीक करता स्वास्थ्यकर्मी

सोनाली आचार्जी

लखनऊ के गोमतीनगर के बाशिंदे पूर्व जिला जज रमेश चंद्रा और उनकी पत्नी मधु ने 13 अप्रैल को बुखार और गले में तकलीफ महसूस की. फटाफट कोविड-19 टेस्ट करवाए. दोनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई. अगले दो दिनों में जब मधु की हालत बिगड़ गई तो पूर्व जज ने शहर के अस्पतालों को एंबुलेंस के लिए ताबड़तोड़ फोन किए. एंबुलेंस नहीं आई तो उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट और मुख्यमंत्री दफ्तर के अफसरों को भी फोन करके गुहार लगाई.

कोई नतीजा नहीं निकला. उनकी पत्नी 15 अप्रैल को परलोक सिधार गईं. मगर उनकी मुश्किल घड़ी का यहीं अंत नहीं हुआ. पत्नी की देह को शमशान ले जाने के लिए शववाहन के इंतजाम में चंद्रा को जमीन-आसमान एक करने पड़े. रोते हुए चंद्रा कहते हैं कि चार घंटे तक ऊंचे पदों पर बैठे अपने दोस्तों को फोन करता रहा और तब कहीं जाकर एक गाड़ी भेजी गई जिससे वे उनका अंतिम संस्कार कर सके. 

स्वास्थ्य सेवा ढांचे के ढह जाने के इस दु:स्वप्न से गुजरने वाले चंद्रा अकेले नहीं हैं. और यह सिर्फ लखनऊ में ही नहीं, देश के हर मेट्रो, हर शहर, कस्बे में कोविड-19 के संक्रमण की दूसरी दानवी लहर के प्रकोप के आगे चिकित्सा ढांचे के ध्वस्त होने का कहर बरपा है. वायरस इतनी तेजी से फैल रहा है कि 18 अप्रैल को खत्म सप्ताह में औसतन रोज 2,60,000 लोग संक्रमित हो रहे थे, जो सितंबर 2020 में कोविड की पहली लहर के शिखर की तुलना में 2.5 गुना थे.

बदतर यह कि इसके घटने के आसार दिखाई नहीं देते. सक्रिय मामलों के दोगुने होने की दर पहली लहर की चोटी के करीब 49 दिनों के मुकाबले 11 दिन है, जो बेहद चिंताजनक है. महामारी के तेज ज्वार को रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन जहां पांच फीसद से कम टेस्ट पॉजिटिव दर की सिफारिश करता है, वहीं हमारा राष्ट्रीय औसत 13.5 फीसद है और 20 अप्रैल को दिल्ली में यह खौफनाक हद तक 33 फीसद था.

हमारे अस्सी फीसद सक्रिय मामले 10 राज्यों में हैं (देखें साथ की रिपोर्ट दहशत और नाउम्मीदी)—महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, गुजरात, छत्तीसगढ़, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान—जहां इलाज की मांग चिकित्सा व्यवस्था पर भारी पड़ रही है.

कोई शक नहीं कि देश केंद्र और राज्य सरकारों की लापरवाही की भारी कीमत चुका रहा है. सरकार ने इस साल की शुरुआत में कोविड पर बेमौके फतह का ऐलान करके कोविड-19 पर नियंत्रण और रोकथाम के उपायों में कटौती करना शुरू कर दिया. इसने लोगों को भी इस हद तक गुमराह कर दिया कि उन्होंने कोविड के मुआफिक बर्तावों को घूरे के ढेर में डाल दिया, मास्क को तिलांजलि दे दी और हरिद्वार के कुंभ मेले और विधानसभा चुनाव से गुजर रहे पांच राज्यों की चुनाव रैलियों सरीखे भीड़ भरे आयोजनों में हिस्सा लेने लगे.

कोविड विस्फोट
कोविड विस्फोट

दिल्ली के आइसीजीईबी (इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग ऐंड बॉयोटेक्नोलॉजी) के डायरेक्टर डॉ. वीरेंदर सिंह चौहान कहते हैं, ‘‘एक अरब लोगों के देश से महामारी इतनी तेजी से रुखसत नहीं हो सकती. अगर हम सावधान न रहें तो दूसरी लहर की आशंका हमेशा होती है. हम खुशकिस्मत थे कि 3-4 महीने शांति रही, हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए था.’’

दूसरी लहर की चुनौतियां संक्रमणों की भारी-भरकम तादाद से निपटने तक सीमित नहीं हैं. वायरस के नए, ज्यादा संक्रामक रूपों और किस्म-किस्म के कई सारे लक्षणों को लेकर भी चिंता है. यही नहीं, जांच करने, पता लगाने, इलाज करने और टीके लगाने की भी जबरदस्त कमी है.

लोगों में कोविड के मुआफिक बर्ताव सख्ती से लागू करने की तो बात ही छोड़ दें. बिल्कुल सामने खड़े मेडिकल संकट से निपटना बेशक पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन हमारे ऊपर तीसरी लहर के हमले को रोकने की खातिर अभी तक की गई भीषण गलतियों से सीखना और दोहराने से बचना भी मुफीद होगा. 

अंधेरे में उडऩा बंद करें
विशेषज्ञों को पता था कि दूसरी लहर कहीं आसपास ही मंडरा रही है. आइसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) के एक राष्ट्रीय सेरोलॉजिकल सर्वे (जो खून की जांच के जरिए एंटीबॉडी का पता लगाता है और किसी व्यक्ति के कोविड के संपर्क में आने का संकेत है) ने बताया कि दिसंबर 2020 तक 80 फीसद देश संक्रमित नहीं हुआ था. इसका मतलब था कि एक अरब लोग अब भी बीमार पड़ सकते थे.

इसी के आसपास देश की अनेक वैज्ञानिक संस्थाएं कोविड के बदले हुए रूपों की इत्तला देने लगीं—ब्राजील का, दक्षिण अफ्रीका का, ब्रिटेन का और एक चौथा भारतीय स्ट्रेन (बी.1.167) जिसके दो बदले हुए रूप थे. इन तमाम रूपों में उनकी नोकदार प्रोटीन में रूपांतरण देखे गए जो मानव कोशिका से ज्यादा आसानी से जकड़े रहने में उनकी मदद करते थे और इसलिए ज्यादा संक्रामक थे. पिछले साल दोहरे रूपांतरण वाले भारतीय स्ट्रेन के संक्रमण का मुश्किल से ही कोई मामला था पर आज यह 10 राज्यों और अप्रैल की शुरुआत में महाराष्ट्र के 60 फीसद नमूनों में पाया जा सकता है.

इलाज का तरीका
इलाज का तरीका

सीएसआइआर (वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद) के डायरेक्टर अनुराग अग्रवाल कहते हैं कि अमेरिकी अध्ययनों से पता चला कि भारतीय स्ट्रेन का एल452आर रूपांतरण इसे 20 फीसद ज्यादा संक्रामक बनाता है. सीसीएमबी (सेंटर फॉर सेल्यूलर ऐंड मॉलीक्यूलर बॉयोलॉजी) के डायरेक्टर राकेश मिश्रा के अनुसार, ‘‘इस बार यह ज्यादा संक्रामक कोविड है और जल्द ही हम इसे भारत में प्रबल रूप बनते देख सकते हैं.’’

इलाज का तरीका
इलाज का तरीका

नए चिंताजनक रूपों के बारे में डब्ल्यूएचओ की वैश्विक चेतावनियों के बावजूद इस साल जनवरी में ही सरकार ने जीन सीक्वेसिंग की रक्रतार तेज करने के लिए 10 प्रयोगशालाओं का एक कंसोर्शियम बनाया, जिसे आइएनएसएसीओजी या इनसाकोग (इंडियन सार्सकोव2 जेनोमिक्स कंसोर्शियम) कहा गया. धीमी रफ्तार के लिए न केवल धनकी कमी बल्कि स्पष्ट दिशा की कमी को भी दोषी ठहराया जा सकता है.

इंसाकोग को 5 फीसद नमूनों का  तैयार करने के लिए कहा गया है. फिलहाल दिन के 2,50,000 मामलों के हिसाब से इसका मतलब 12,500 नमूने होगा. भारत फिलहाल बामुश्किल 1 फीसद कर पा रहा है. जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ और आइएमए (भारतीय चिकित्सा एसोसिएशन) के पूर्व चेयरमैन डॉ. के.के. अग्रवाल कहते हैं, ''हम देख सकते हैं कि न केवल वायरस इस बार ज्यादा फैला है बल्कि ऑक्सीजन की मांग भी ज्यादा है.

नए रूपों के नैदानिक लक्षणों पर नजर रखे बगैर हम नई चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हो सकते थे.’’ सीसीएमबी के निदेशक राकेश मिश्रा जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि तीसरी लहर को रोकने के लिए भारत को देश भर में इन रूपों की प्रगति पर नजर रखनी चाहिए और किसी भी प्रकोप से निपटने के लिए मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के वाजिब कदम उठाने चाहिए.

नए खतरे
आइसीएमआर अब इन भारतीय रूपों की ज्यादा नजदीक से निगरानी करने लगा है. अभी तक के राष्ट्रीय डेटा के आधार पर आइसीएमआर के प्रमुख डॉ. बलराम भार्गव कहते हैं कि मौतों के लिहाज से दूसरी लहर अब तक ‘कम प्रचंड’ मालूम देती है.

इसकी 1.2 फीसद मृत्यु दर पहली के मुकाबले थोड़ी कम है. अलबत्ता कुल आंकड़ों की बात करें तो संक्रमणों की ज्यादा तादाद को देखते हुए मौतों की संख्या कहीं ज्यादा है. 20 अप्रैल को भारत में कोविड से 2,000 लोगों की जानें गईं, जो एक दिन में मौतों की सबसे ज्यादा तादाद थी.

यही नहीं, पहली लहर में जहां लोग सूखी खांसी, जोड़ों में तेज दर्द और सिरदर्द के लक्षण बता रहे थे, दूसरी लहर में सांस फूलने की ज्यादा शिकायत कर रहे हैं. इससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव आ गया है. आइसीएमआर की नेशनल क्लिनिकल कोविड-19 रजिस्ट्री बताती है कि पिछली बार के 41.7 फीसद के मुकाबले इस बार लक्षणों वाले 47.5 फीसद मरीज सांस फूलने की शिकायत कर रहे हैं.

डॉ. भार्गव कहते हैं, ‘‘इसका असर ऑक्सीजन की मांग पर पड़ा है और उसकी मांग अच्छी-खासी बढ़ गई है.’’ सरकार की टास्क फोर्स की 19 अप्रैल की रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर के 40 केंद्रों के आंकड़ों के हिसाब से अस्पताल में भर्ती मरीजों की ऑक्सीजन की मांग इस बार 54.5 फीसद है, जो सितंबर 2020 में कोविड के शिखर की मांग से 13 फीसद अंक ज्यादा है.

इससे देश भर में मेडिकल ऑक्सीजन की जबरदस्त कमी पैदा हुई है, जिसके चलते महाराष्ट्र और दिल्ली दोनों ने तमाम बड़े अस्पतालों में ऑक्सीजन की पूर्ति के एसओएस संदेश केंद्र को भेजे क्योंकि इनमें कई अस्पतालों में उस दिन की जरूरत पूरी करने लायक ऑक्सीजन भी नहीं बची थी.

पहली लहर बनाम दूसरी लहर
पहली लहर बनाम दूसरी लहर

हालांकि डॉ. भार्गव कहते हैं कि ऑक्सीजन की मांग में बढ़ोतरी का अनिवार्य मतलब यह नहीं है कि नई लहर ज्यादा जानलेवा है. मसलन, कोविड से पैदा फेफड़ों के गंभीर संक्रमण के लिए जरूरी वेंटिलेटर की आवश्यकता पिछले साल जहां 37.3 फीसद थी, वहीं मौजूदा लहर में यह 27.8 फीसद है. नेशनल कोविड-19 रजिस्ट्री के आंकड़ों के हिसाब से, लक्षणों वाले मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने के मामले भी पिछली लहर के 87.4 फीसद के मुकाबले मौजूदा लहर में घटकर 74.5 फीसद पर आ गए हैं.

(पिछले साल 80 फीसद मामले बगैर लक्षण वाले थे जबकि 20 फीसद को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत थी, जिनमें 5 फीसद को आइसीयू और 1 फीसद को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी थी.) विशेषज्ञ मानते हैं कि दूसरी लहर के आंकड़े भी आखिर में इसके बराबर ही हो सकते हैं, वहीं कुल आंकड़े बनिस्बतन छोटे वक्त में कहीं ज्यादा हैं.

साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉ. रोमेल टिक्कू इसकी तस्दीक करते हैं, जो एक साल से ज्यादा वक्त से आइसीयू में कोविड मरीजों का इलाज करते रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘लक्षण मिलते-जुलते ही हैं. कुछ मामलों में फेफड़ों का शुरुआती संक्रमण है, लेकिन फेफड़े के गंभीर संक्रमण तक पहुंचने वाले लोगों का कुल अनुपात पिछले साल जितना ही है.’’ हालांकि वे यह भी कहते हैं, ‘‘पिछले साल हमने करीब 8,000 मामले देखे. अब हम 25,000 मामले देख रहे हैं क्योंकि यह वायरस ज्यादा संक्रामक है. एक ही बार में पूरा परिवार संक्रमित हो रहा है.’’

दूसरी लहर की एक और चुनौती संक्रमित हो रहे लोगों के आयु वर्ग से जुड़ी है. पिछली लहर में 30 साल के कम उम्र के लोगों के 31 फीसद मामलों में राष्ट्रीय डेटा भले महज 1 फीसद अंकों की भिन्नता दिखाता हो, लेकिन ज्यादा बारीकी में जाएं तो 0-19 साल की उम्र के लोगों के मामलों में करीब 2 फीसद अंकों की थोड़ी-सी बढ़ोतरी हुई है और 20-39 साल के लोगों में संक्रमित होने में इसी से मिलता-जुलता इजाफा हुआ है.

राज्यों में भी भिन्नताएं हैं. मसलन, महाराष्ट्र में जनवरी के बाद 10 साल से कम उम्र के 88,827 बच्चे पॉजिटिव पाए गए हैं और राज्य के कुल सक्रिय मामलों (21 अप्रैल को 6,83,856) में 52 फीसद 40 साल से कम उम्र के लोगों के हैं. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी ऐसी ही स्थिति से दो-चार है.

दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के प्रमुख और कोविड पर सरकार की टास्कफोर्स के सदस्य डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ''ज्यादातर मामलों में हल्के लक्षण दिखे लेकिन वे दूसरों को संक्रमित करने में समर्थ हैं. नौजवानों का जिम्मेदार होना बेहद जरूरी है क्योंकि वे इसे ऐसे कमजोर वर्गों में फैला सकते हैं, जिनमें गंभीर लक्षण विकसित हो सकते हैं.’’ वे कहते हैं कि बहुत कुछ बीमारी का जल्द पता लगने और इलाज पर निर्भर है.

खस्ताहाली के शिकार राज्य
खस्ताहाली के शिकार राज्य

जांच की बड़ी आजमाइश
अप्रैल में जब मामलों में कई गुना उछाल आया, जांच केंद्रों ने मांग पूरी करने में खुद को असहाय पाया. भारत में फिलहाल 2,449 जांच प्रयोगशालाएं हैं, जिनके पास रोज औसतन 13-15 लाख जांच करने की क्षमता है, जबकि पिछली लहर के दौरान 1,623 प्रयोगशालाएं रोज दस लाख टेस्ट ही कर सकती थीं. लैब मालिक कहते हैं कि इस बार मुख्य अंतर यह है कि कोविड की जांच का पैमाना पिछले साल सीमित था.

आज ज्यादातर राज्यों में मांग पर टेस्ट करना मुमकिन है. इसके नतीजतन बगैर लक्षणों वाले लोग भी दहशतजदा होकर टेस्ट करवा रहे हैं और इसका परिणाम यह हुआ है कि मांग बढ़ गई है. जांच के नतीजे के इंतजार का औसत समय, जो एक महीने पहले 24-48 घंटे था, अब बढ़ गया है और कुछ राज्यों में तो रिपोर्ट मिलने में चार दिन का लंबा वक्त लग रहा है.

मसलन, दिल्ली में 19 सरकारी और 23 निजी लैब ने 18 और 19 अप्रैल को 1,80,000 नमूनों की जांच की. राज्य सरकार ने भी दफ्तरों को अपने कर्मचारियों का हरेक पखवाड़े टेस्ट करवाने का फरमान जारी किया है. कई लैब का कहना है कि वे रोज तिगुने नमूनों की जांच कर रही हैं और दस्ताने, फ्लास्क, स्वाब और दूसरे सुरक्षा उपकरणों सरीखी एक बार इस्तेमाल की जाने वाली चीजें खत्म होने के करीब पहुंच गई हैं.

नोएडा स्थित राष्ट्रीय कैंसर रोकथाम संस्थान ने सरकार के साथ रोज 4,000 नमूने लेने का करार किया है और अब उसे हर रोज 6,000 नमूने मिल रहे हैं. डॉ. डैंग्ज लैब ने जांच में 150 फीसद की बढ़ोतरी होती देखी है और ऑनलाइन पोर्टल के खुलने के 20 मिनट के अंदर टेस्ट स्लॉट भर जाते हैं. राजधानी और महाराष्ट्र दोनों में टेस्ट करने वाली थायरोकेयर का कहना है कि जनवरी में वह अपनी क्षमता का 20 फीसद काम ही कर रही थी, लेकिन मध्य मार्च से मांग में हरेक हफ्ते 100 फीसद का उछाल आया है.

दिल्ली की सबसे प्रमुख टेस्ट लैब महाजन इमेजिंग सेंटर के संस्थापक हर्ष महाजन कहते हैं, ‘‘शहर में पॉजिटिव दर में कई गुना इजाफा हुआ है. लेकिन हमारा इन्फ्रास्ट्रक्चर सीमित है. इसे रातोरात बढ़ाया भी नहीं जा सकता, क्योंकि बहुत सारी टेस्टिंग मशीनें आयातित हैं और यह सब फिर से स्थापित करने में कुछेक हफ्ते लगते हैं. निजी निवेश भी सीमित ही होगा क्योंकि शहर में टेस्ट की अधिकतम कीमत 800 रुपए तय है.’’

आरटी-पीसीआर टेस्ट के असरदार होने को लेकर भी चिंताएं हैं. कई लोगों को शक है कि ये वायरस के नए स्ट्रेन का पता लगा सकते हैं या नहीं. डॉ. भार्गव भरोसा दिलाते हैं, ‘‘इस्तेमाल की जा रही टेस्ट किट कोविड वायरस के एक से ज्यादा जीन का पता लगाने के लिए डिजाइन की गई हैं और तमाम नए रूपों के खिलाफ भी भरोसेमंद हैं.’’

जहां तक कई टेस्ट में झूठे नेगेटिव आने की बात है, डॉ. डैंग्ज लैब सीईओ डॉ. अर्जुन डैंग दो वजहें गिनाते हैं कि ऐसा क्यों हो सकता है. पहली वजह तो खराब ढंग से नमूने लेना है. दूसरी गलत समयावधि में टेस्ट किया जाना है. वे कहते हैं, ‘‘कोविड संपर्क में आने के औसतन 5-6 दिन बाद टेस्ट में दिखाई देता है. अगर लोग किसी संक्रमित व्यक्ति से मिलने के फौरन बाद टेस्ट के लिए आते हैं तो इसका नतीजा नेगेटिव होगा, जिससे झूठा बोध पैदा हो सकता है.

प्रयोगशालाओं को पक्का करना चाहिए कि उनके किट आइसीएमआर से मंजूर हो और सार्स-कोव2 के सही जीन का पता लगा रहे हों.’’ डॉ. टिक्कू यह और जोड़ते हैं कि किसी में कोविड के सारे लक्षण हों, तो दूसरा टेस्ट भी किया जाना चाहिए ताकि यह पक्का किया जा सके कि वह व्यक्ति कोविड नेगेटिव है. तीसरी वजह खुद टेस्ट किट हो सकती है.

इलाज के लिए जहां टेस्ट करना जरूरी है, पिछले साल इसके बाद उसके संपर्क में आए लोगों का पता लगाने का जबरदस्त अभियान छेड़ा गया था ताकि पक्का किया जा सके कि वायरस फैले नहीं. केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के नियम कहते हैं कि पॉजिटिव व्यक्ति के संपर्क में आए 80 फीसद लोगों को तीन दिनों के भीतर अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए.

उत्तर प्रदेश में संपर्क में आए लोगों का पता लगाने की वजह से ही राज्य विशाल पहली लहर से बच निकलने में कामयाब रहा था—पिछले साल 75 जिलों में करीब 93 फीसद संपर्कों का पता लगाया और उनकी जांच की गई थी. इसमें 70,000 कार्यकर्ताओं की मेहनत लगी थी. शिखर पर भी पिछले साल राज्य में 60,000 सक्रिय मामले थे. इस बार मामले तिगुने हैं और सूत्रों का कहना है कि संपर्क में आए लोगों का पता लगाने के लिए मानवबल तत्काल बढ़ाने की जरूरत है.

ज्यादातर राज्यों में संपर्क में आए लोगों का पता लगाने और संक्रमितों को अलग-थलग करने की कोशिशें कम की गई हैं. जांच के नतीजे आने में देरी के साथ वायरस के तेजी से फैलाव को रोकने की कोशिशें नाकाम हो रही हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण कहते हैं, ‘‘करीबी संपर्कों का मतलब केवल पारिवारिक सदस्य ही नहीं, बल्कि वह कोई भी व्यक्ति है जो संपर्क में आया हो.

जिले ढीले पड़ गए थे और केवल परिवार के सदस्यों का पता लगा रहे थे जबकि वायरस पॉजिटिव व्यक्ति से मिलने वाले लोगों के जरिए फैल रहा था.’’ राज्यों को समुचित कॉन्टेक्ट ट्रैसिंग पक्का करने की जरूरत है. वरना विकल्प और बदतर है—संक्रमण की शृंखला को रोकने के लिए लॉकडाउन.

बिस्तरों के लिए नींद हराम
पिछली लहर में केंद्र ने कोविड के इलाज के तीन श्रेणियों में बांटा था—समर्पित कोविड अस्पताल (डीसीएच), समर्पित कोविड स्वास्थ्य केंद्र (डीसीएचसी) और समर्पित कोविड देखभाल केंद्र (डीसीसीसी). कागजों पर आंकड़े असरदार दिखाई देते हैं—देश भर में 18,800 कोविड सुविधा केंद्र हैं, जिनमें कुल मिलाकर 18 लाख आइसोलेशन बेड, 1,55,168 ऑक्सीजन बेड और 75,867 आइसीयू बेड हैं. मौजूदा लहर में केंद्र ने 6,303 वेंटिलेटर भी बांटे हैं.

बिस्तरों की संख्या भी पिछली बार से, जब सक्रिय मामले और रोज नए मामले आज की गिनती से आधे थे, लगभग 3,00,000 ज्यादा है. तो भी इन आंकड़ों से जिस बात की झलक नहीं मिलती, वह यह कि दूसरी लहर के प्रमुख केंद्रों पर बिस्तरों की भीषण कमी है और उनके पास कोविड के इलाज की समुचित सुविधाएं भी नहीं हैं. असल में कई राज्यों के लिए इलाज अप्रैल से ही व्यवस्थागत दुस्वप्न बन गया है, जिसमें महाराष्ट्र और दिल्ली बिस्तरों की भीषण कमी से दो-चार हैं.

मोटे तौर पर ऐसा इसलिए है क्योंकि इन राज्यों में नए मामले लोगों के अच्छे होने में लगने वाले समय से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं. एक व्यक्ति को औसतन 14 दिन अस्पताल में रहना पड़ता है, जो गंभीर लक्षण विकसित होने पर और लंबा भी खिंच सकता है.

20 अप्रैल को दिल्ली में महज 33 आइसीयू बेड और 2,627 ट्रीटमेंट बेड थे, जबकि शहर में रोज करीब 23,000 नए मामले आ रहे हैं. अगर इनमें 20 फीसद या 4,600 मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत हो, तो फिलहाल मौजूद बिस्तर बेहद नाकाफी हैं.

दिलचस्प यह है कि केंद्र ने नवंबर 2020 में दिल्ली में कोविड के लिए 6,000 आइसीयू बिस्तरों का वादा किया था. आज मौजूदा क्षमता में महज 4,500 बिस्तरों का इजाफा हुआ है. सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मालिनी ऐसोला कहती हैं, ‘‘दिल्ली की पिछली लहर के दृश्य दिमाग में आते हैं. तभी से हमने तैयारी क्यों नहीं की?’’

संकट राष्ट्रीय राजधानी तक सीमित नहीं है. मध्य प्रदेश ने 31 मार्च को कहा था कि उसके पास 20,139 आइसोलेशन, ऑक्सीजन और आइसीयू बिस्तरों का प्रावधान है और चिंता की जरूरत नहीं है. राज्य में तब केवल 2,332 नए मामले और 17,096 सक्रिय मामले थे. दो हफ्तों के भीतर राज्य में 68,576 सक्रिय मामले थे, जिनमें 12,248 नए संक्रमण थे और संक्रमित लोगों की कुल तादाद ने राज्य में बिस्तरों की स्थापित क्षमता को पीछे छोड़ दिया था.

इंदौर और भोपाल सबसे बुरी तरह ग्रस्त मालूम देते हैं, जहां राज्य के बहुतायत मामले हैं. इन शहरों में बच्चों के अस्पताल सहित हर दूसरे अस्पताल को अब कोविड सुविधा केंद्र में बदल दिया गया है और फिर भी बिस्तरों की क्षमता उछाल भरती मांग को पूरा नहीं कर सकती. बोझ कम करने के लिए डॉक्टर हल्के असर वाले मरीजों को घर पर ही अलग-थलग रहने या भरोसेमंद अस्पताल से होमकेयर पैकेज लेने की सलाह दे रहे हैं.

ऑक्सीजन ने फुलाया दम
तमाम बड़े शहरों के अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई ने बेहद अहमियत अख्तियार कर ली. इनमें दिल्ली भी था, जहां कुछ सबसे बड़े अस्पतालों ने खतरनाक ढंग से कम आपूर्ति की इत्तला दी. संकट थामने के लिए केंद्र और राज्यों को आपातकालीन उपाय करने पड़े. देश में रोज 7,287 मीट्रिक टन ऑक्सीजन बनाने की क्षमता है. 12 अप्रैल को मसलन उसने दैनिक उत्पादन क्षमता की महज 3,848 एमटी या 54 फीसद ऑक्सीजन ही इस्तेमाल की थी.

मांग और बढऩे के अनुमान के बीच ज्यादातर राज्यों ने ऑक्सीजन के औद्योगिक इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है. इस बीच, यह क्षमता 50,000 एमटी तक बढ़ाने के लिए केंद्र ने नए मैन्यूफैक्चर को राजी किया और इतनी ही ऑक्सीजन आयात करने की निविदा जारी कर दी.

केंद्र ने शीर्ष 12 कोविड प्रभावित राज्यों को 20 अप्रैल, 25 अप्रैल और 30 अप्रैल की स्थिति के अनुसार उनकी अनुमानित मांग पूरी करने के लिए 4,880 एमटी, 5,619 एमटी और 6,593 एमटी ऑक्सीजन जारी कर दी. तेजी से आपूर्ति पक्की करने के लिए रेलवे को समर्पित ग्रीन कॉरिडोर के जरिए ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने के लिए लगाया गया.

कहीं भी हालात उतने खराब नहीं हैं जितने महाराष्ट्र में हैं. यहां मेडिकल ऑक्सीजन की खपत राज्य की 1,250 टन प्रतिदिन की पूर्ण उत्पादन क्षमता पर पहुंच गई है. राज्य में 6,38,000 सक्रिय मामले हैं और उनमें 10 फीसद यानी करीब 60,000-65,000 मामले ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं, जो किसी भी राज्य से ज्यादा हैं. महाराष्ट्र अब रोज छत्तीसगढ़ से 50 टन और गुजरात से 50 टन ऑक्सीजन ले रहा है. उसे गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस के संयंत्र से और 100 टन मिलने की भी उम्मीद है.

राज्यों को ऑक्सीजन के विवेकसम्मत इस्तेमाल के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं. वाशी, मुंबई के फोर्टिस हीरानंदानी अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन की विशेषज्ञ डॉ. फाराह इंगले कहती हैं, ''अकेले ऑक्सीजन मरीज को नहीं बचा सकती. कई लोग घर पर सिलेंडरों की जमाखोरी कर रहे हैं. मुनासिब यही है कि ऑक्सीजन का इस्तेमाल सही वक्त पर चिकित्सा देखभाल और निगरानी के साथ किया जाए.’’

वेंटिलेटरों की भी कमी है, खासकर उन शहरों में जहां उनकी सबसे ज्यादा मांग है. गुजरात की मैक्स वेंटिलेटर कंपनी को, जो महीने में 1,000 वेंटिलेटर बना सकती है, इस साल पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले छह गुना ज्यादा ऑर्डर मिले हैं. कंपनी के डायरेक्टर अशोक पटेल कहते हैं, ‘‘अहमदाबाद और सूरत में ऐसे अस्पताल हैं जो वेंटिलेटर की कमी का सामना कर रहे हैं.

मैं 600 वेंटिलेटर दे चुका हूं और अभी 800-1,000 के ऑर्डर और हैं.’’ वे यह भी कहते हैं कि ज्यादातर राज्य सरकारें ऐसे वेंटिलेटरों का तरजीह देती हैं जिनका इस्तेमाल नॉन-इनवेसिव ऑक्सीजन सप्लाई के लिए भी किया जा सके. अलबत्ता केवल बुनियादी ढांचे को बढ़ाना काफी नहीं होगा, जब तक कि इसका इस्तेमाल करने के लिए कर्मियों को प्रशिक्षित न किया जाए.

वेंटिलेटर से लैस 10 बिस्तरों के आइसीयू के लिए हर 24 घंटों में 48 नर्सों, छह तकनीशियनों और नौ डॉक्टरों की जरूरत पड़ती है, जिसकी लागत प्रति मरीज 5.02 लाख रुपए आंकी जाती है. महाराष्ट्र में ज्यादा स्वास्थ्यकर्मियों की मांग पूरी करने के लिए पुणे ने नई भर्तियों की मंजूरियों को फास्ट-ट्रैक किया है. अगली कतार के करीब 16,000 कर्मियों ने तेजी से भर्ती की खातिर बेहतर वेतन का प्रोत्साहन लाभ देने के लिए एक दिन का वेतन भी दिया है. 

दवाइयों का टोटा
देश भर में कोविड की दवाइयों का अंधाधुंध इस्तेमाल एक और चिंता की बात हो गया है. लखनऊ, भोपाल, मुंबई और दिल्ली सरीखे शहरों से रेमडेसिविर नहीं मिलने और फैबिफ्लू, एजीथ्रोमाइसिन तथा पैरासिटामोल सरीखी कोविड की अन्य दवाइयों के लिए 24-72 घंटे इंतजार करने की खबरें आईं. रेमडेसिविर की कमी खास तौर पर जबरदस्त थी.

भारत में यह फिलहाल छह कंपनियां बनाती हैं और राज्यसभा की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रति माह इसकी 38.8 लाख शीशियों के उत्पादन की क्षमता है, जो सामान्य हालात में आपूर्ति के लिए काफी होती. लेकिन इन कंपनियों ने निर्यात के वायदे भी कर रखे हैं, जिन पर केंद्र ने फिलहाल रोक लगा दी है. सरकार इस दवाई की मैन्यूफैक्चरिंग के लिए फास्ट-ट्रैक मंजूरियां भी देगी, ताकि मई के मध्य तक उत्पादन दोगुना बढ़ाकर 78 लाख शीशियां प्रति माह किया जा सके.

हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि चिंता की कोई बात नहीं है. यह कोविड के इलाज के लिए अनिवार्य दवाई नहीं है. वहीं डब्ल्यूएचओ अब भी कह रहा है कि इसके असरदार होने को लेकर कोई ठोस डेटा नहीं है. डॉ. टिक्कू कहते हैं, ''रेमडेसिविर प्रयोगात्मक दवाई है, यह सही वक्त पर प्रशिक्षित पेशेवर के हाथों ही दी जानी चाहिए.’’ तमाम वायरल बीमारियां आत्मनियंत्रक हैं. इसका अर्थ है कि शरीर उन्हें खुद-ब-खुद लड़कर खत्म कर सकता है.

दवाई शरीर को केवल तभी मदद करती है जब वायरल संक्रमण हल्का या तीव्र हो. यही नहीं, पहले 5-7 दिनों के दौरान स्टेरॉइड देना असल में वायरस को अपनी नकल तैयार करने में मदद ही करता है. ऐसे ज्यादा से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं जिनमें लोग झूठे नुस्खा दिखाकर दवाइयां खरीद रहे हैं, ऐसे में सरकारें खुद अपनी समझ से दवाइयां लेने और कोविड की बेहद जरूरी दवाइयों की जमाखोरी करने के खिलाफ सलाह देने के अभियान तेज कर रही हैं.

मसलन तेलंगाना में, जहां रेमडेसिविर की कमी है, कुछ फार्मास्यूटिकल कंपनियों ने मरीज का आधार कार्ड देखने के बाद वितरण को आसान बनाने और दवा का अंधाधुंध दुरुपयोग तथा कालाबाजारी खत्म करने के लिए एक टास्क फोर्स बनाई है. स्वास्थ्य अधिकारियों ने भी हरेक मामले में इसकी सलाह देने के खिलाफ अस्पतालों को संवेदनशील बनाया है क्योंकि यह सीमित इस्तेमाल के लिए है.

तेलंगाना के सार्वजनिक स्वास्थ्य निदेशक डॉ. जी. श्रीनिवास राव सावधान करते हैं, ‘‘कोविड की पहली लहर के दौरान कोविड पॉजिटिव मरीजों की बड़ी संख्या को ताकतवर स्टेरॉइड टोसिलिजुमाब विवेकहीन ढंग से दिया गया. उन्हें इस दवा के इस्तेमाल की वजह से तकलीफ उठानी पड़ी. रेमडेसिविर के मामले में भी वही गलती दोहराई जा रही है. यह सभी कोविड मरीजों के लिए नहीं है. इन दिनों घरों से लेकर अस्पतालों तक हर जगह इसका दुरुपयोग हो रहा है.’’

आगे विकट लड़ाई
पिछले साल मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में दुनिया का सबसे कठोर लॉकडाउन लगा दिया था. 20 अप्रैल को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने इस बार इसकी संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, बावजूद इसके कि दूसरी लहर में मामलों की संख्या कहीं ज्यादा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि अर्थव्यवस्था की सेहत राष्ट्र की सेहत जितनी ही जरूरी और अहम है और वायरस के संक्रमण की शृंखला तोडऩे के लिए माइक्रो-कंटेनमेंट जोन और आत्म-अनुशासन की जरूरत है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अस्पतालों और संसाधनों पर बोझ कम करने के लिए यह बेहद जरूरी है. दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में एक औसत डॉक्टर अब करीब 12-14 घंटे काम करता है. कोविड देखभाल के एक से ज्यादा साल ने उन्हें थका दिया है. आइएमए के पूर्व प्रेसीडेंट डॉ. अग्रवाल कहते हैं, ''स्थानीय लॉकडाउन नहीं लगाने का फैसला अहम है. अगर आपको ज्यादा बिस्तर और वेंटिलेटर मिल भी जाएं तो स्वास्थ्यकर्मी तो सीमित ही रहेंगे. आप रातोरात लाखों डॉक्टर, नर्स और तकनीशियन नहीं बना सकते.’’

केंद्र राज्यों और जिलों से लगातार कह रहा है कि वे लॉकडाउन के साथ-साथ माइक्रो कंटेनमेंट जोन बनाएं. पिछले साल सबसे पहले राजस्थान के भीलवाड़ा में इस्तेमाल की गई इस रणनीति में अधिकारी पॉजिटिव मामलों को अलग-थलग रखते हैं, जबकि क्लस्टर के भीतर सीमित आवाजाही संक्रमण को फैसले से रोकती है.

दिल्ली में 1 अप्रैल से 18 अप्रैल 2021 के बीच कंटेनमेंट जोन की संख्या में 507 फीसद का उछाल आया. स्वास्थ्य सचिव भूषण के मुताबिक, फरवरी में राज्यों ने मामलों की संख्या में थोड़ी बढ़ोतरी देखी, लेकिन कंटेनमेंट जोन की संख्या नहीं बढ़ी. मौजूदा उछाल में इसका भी योगदान रहा है.

केंद्र यह भी उम्मीद कर रहा है कि व्यापक टीकाकरण से संक्रमण का फैलाव कम करने या कम से कम मामलों की तीव्रता घटाने में मदद मिलेगी. उत्पादन और डिलिवरी पर केंद्रीय नियंत्रण इस कोशिश का गला घोंट रहा है और ऐसे में अब तक वैक्सीन की केवल 12.80 करोड़ खुराकें लगाई गई हैं, जिससे महज 1.7 करोड़ लोगों या 1.28 फीसद आबादी का पूर्ण टीकाकरण हुआ है.

पिछले हफ्ते, स्वागत योग्य कदमों की शृंखला में, टीकाकरण को 1 मई से न केवल 18 साल से बड़ी उम्र के सभी लोगों के लिए खोल दिया गया, बल्कि राज्यों को भी अपने दम पर वैक्सीन खरीदने की इजाजत दे दी गई. उम्मीद है कि वैक्सीन कार्यक्रम को उदार बनाने से इसकी मांग और वितरण बढ़ेगा. चिंता इस बात की है कि आपूर्ति उन 40 करोड़ अतिरिक्त लोगों की मांग को पूरा कर पाएगी या नहीं जो टीकाकरण को 18 साल से ऊपर के सभी लोगों के लिए खोलने के सबब से इसके पात्र हो जाएंगे.

अलबत्ता देश को सबसे अहम कदम यह उठाने की जरूरत है कि वह कोविड के मुआफिक व्यवहार पर काम करे. प्रधानमंत्री ने देश के नौजवानों से आह्वान किया कि वे कोविड के बारे में जागरूकता फैलाने और कोविड अनुशासन लागू करने के लिए स्थानीय समितियां बनाएं. उन्होंने बच्चों से भी आग्रह किया कि वे परिवार के बड़ों से कहें कि वे बहुत जरूरी होने पर ही घर से बाहर जाएं.

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, मास्क पहनना और 2 फुट की दूरी रखना संक्रमण में 85 फीसद तक कटौती करता है. यह भारत में फिलहाल मौजूद दोनों वैक्सीनों से भी ऊंची प्रभाव दर है. मगर भारत में मास्क साक्षरता में एक गंभीर खामी है. स्वच्छ वायु समाधान फर्म निर्वाणा बीइंग के संस्थापक जय धर गुप्ता कहते हैं, ‘‘दुनिया में ऐसा कोई सूती कपड़ा नहीं है जो कोविड वायरस जितने छोटे कण को बाहर रख सके.

कम से कम एन95 मास्क की जरूरत तो है ही. यही नहीं, मास्क पहनने के तरीके को लेकर लोगों में जागरूकता नहीं आई है. नाक और ठोड़ी इससे ढकी होनी चाहिए. तीसरे, सांस लेने योग्य मास्क का न होना सेहत के लिए विनाशकारी है क्योंकि खुद अपनी ही कार्बन डाइऑक्साइड को सांस में लेना जहरीला है.’’ 

यूरोप में सामुदायिक मास्क के मानक हैं. महामारी के सबसे जरूरी बचावों में से एक के लिए अभी भारत को इससे मिलता-जुलता कुछ शुरू करना है. चुनिंदा ढंग से लॉकडाउन संक्रमण के हमारे मौजूदा बोझ को कम करने में कारगर हो सकते हैं, वहीं युद्ध स्तर पर टीकाकरण और व्यापक रूप से मास्क पहनना तीसरी लहर को रोकने के लिए बेहद अहम है.

इस बीच राज्यों को दूसरी लहर से पुख्ता हो चुके चिकित्सा के संकट को संभालने पर पूरा ध्यान देना चाहिए. कोविड अभी कहीं जाने वाला नहीं है. आप खुद अपनी जिम्मेदारी और अपनी कीमत पर ही इसे अनदेखा कर सकते हैं. यह सबक हम बेहद मुश्किल रास्ते से गुजरकर फिलहाल सीख ही रहे हैं.

इलाज का तरीका
इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयां और उनका असर
एंटी-वायरल
दी जाती है: मध्यम से तीव्र मामलों में
असर: गिलीड के तीसरे चरण के परीक्षणों से पता चला कि हल्के मरीजों के लिए पांच दिन के कोर्स से 65त्न से ज्यादा ने 11वां दिन सुधार दर्शाया. हालांकि डब्ल्यूएचओ का कहना है कि कोविड के खिलाफ इस दवा का असर साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है

भारत में उत्पादन: 
छह कंपनियां बनाती हैं जिनकी उत्पादन क्षमता प्रति माह 38.8 लाख शीशियां हैं. कंपनियां 127 दूसरे देशों के लिए भी यह दवा बनाती हैं. 14 अप्रैल को केंद्र ने कहा कि उत्पादन अगले महीने दोगुना करने के लिए फास्ट-ट्रैक मंजूरी देगा
कीमत: ब्रांड के मुताबिक 100 मिली. की शीशी 899 
रु.3,490 रु. में


एंटीवायरल
दी जाती है:
हल्के से मध्यम मामलों में
असर: ग्लेनमार्क के चरण 3 का डेटा बताता है कि करीब 70 फीसद मरीज मानक देखभाल हासिल करने वाले 44 फीसद की तुलना में चौथे दिन ठीक 
भारत में उत्पादन: पांच कंपनियां बनाती हैं—हेटरो, सिप्ला, ग्लेनमार्क, सन फार्मास्यूटिकल्स, जेनारा फार्मा
कीमत: ब्रांड के आधार पर 35-75 रुपए प्रति टैबलेट

एंटी बायोटिक
दी जाती है: हल्के से मध्यम लक्षण के मामलों में
असर: परीक्षण नहीं. अध्ययनों में मृत्यु दर में कमी और गंभीर अवस्था से बचाव पाया गया
भारत में उत्पादन: सिप्ला, फाइजर, ग्लेनमार्क, सन फर्मा जैसी पचास कंपनियां
कीमत: ब्रांड के मुताबिक 60-65 रु. प्रति स्ट्रिप

ब्लड प्लाज्मा
कोविड के भले-चंगे हुए मरीजों का प्लाज्मा दिया जाता है: मध्यम से गंभीर मामलों में
असर: भारत और विदेशों में परीक्षण अभी चल रहे हैं. बीएमजे जर्नल में प्रकाशित आइसीएमआर के एक अध्ययन ने पाया कि गंभीर अवस्था तक बढऩे को रोकने में इसका सीमित असर है
भारत में उत्पादन: ठीक हो चुके मरीजों से 30 दिनों बाद लिया जाता है
कीमत: अस्पताल के मुताबिक, 10,000 रुपए-20,000 रुपए 

आइएल-6 ब्लॉकर
दी जाती है: मध्यम से तीव्र मामलों में 
असर: अध्ययन जारी. न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपे एक हालिया अध्ययन ने पाया कि इनटुबेशन रोकने में इसका सीमित असर है
भारत में उत्पादन: सिप्ला बनाती है, जिसका रोशे के साथ निर्यात का करार भी है. 13 अप्रैल को कंपनी ने बताया कि मौजूदा मांग के हिसाब से दवा की किल्लत हो सकती है 
कीमत: 34,000 रु.-40,000 रु. प्रति शीशी

स्टेरॉइड
दिया जाता है: मध्यम से गंभीर मामलों में
असर: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिकवरी ट्राइल में पाया गया कि कोविड के गंभीर मामलों में यह मौत से एक तिहाई तक बचाव करती है
भारत में उत्पादन: कई फर्म बनाती हैं, जायडस सिप्ला का 80त्न बाजार हिस्सेदारी पर कब्जा है
कीमत: 30 रुपए से 50 रुपए प्रति स्ट्रिप
 

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