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आवरण कथाः कोविड की गिरफ्त में अब गांव

देश के गांवों में कोविड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और इन ग्रामीण इलाकों में अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से महामारी के खिलाफ भारत की जंग निराशाजनक स्थिति में

कोविड जांच झारखंड के रांची जिले के खुल्दा गांव में जांच के लिए कतार में खड़े स्थानीय आदिवासी कोविड जांच झारखंड के रांची जिले के खुल्दा गांव में जांच के लिए कतार में खड़े स्थानीय आदिवासी

सोनाली अचार्जी

दक्षिणवर्ती राज्य तेलंगाना के चिन्नमबावी गांव में लोगों को डाकिए का बेसब्री से इंतजार रहता है. बुजुर्गों और विधवाओं को प्रतीक्षा रहती है कि वह आएगा और उनकी मासिक पेंशन के साथ-साथ बाहरी दुनिया की खबरें भी लाएगा. लगता है, 16 अगस्त को डाकिया अपने साथ कोरोना वायरस भी ले आया.

उसके आने के 10 दिन बाद 25,000 लोगों के इस गांव के 110 लोग संक्रमित पाए गए जिनमें कई बुजुर्ग हैं. कइयों को जिला मुख्यालय वानापर्थी में इलाज के लिए जाना पड़ा. जिले में 21 कंटेनमेंट जोन हैं, पर इलाज के लिए 100 बेड का सिर्फ एक कोविड अस्पताल है. वह भी तेजी से भर रहा है.

महाराष्ट्र में पुणे जिले की स्थिति भी विकट है. तीन हफ्ते पहले तक जिले के राजेवाड़ी गांव के सभी 360 निवासी कोविड से मुक्त थे. पर 17 अगस्त को वहां एक बुजुर्ग की कोविड से मृत्यु हो गई. संदेह है कि पड़ोस के गांव के मंदिर में जाने से उन्हें संक्रमण हुआ. आज गांव में कोविड के 91 मामले हैं यानी 25 प्रतिशत लोग संक्रमित हैं जो राष्ट्रीय औसत 8.6 प्रतिशत की तुलना में चिंताजनक रूप से उच्च संक्रमण दर है.

निकटतम कोविड अस्पताल गांव से 50 किमी दूर पुणे शहर में है. पर वहां के कोविड अस्पताल मरीजों से भरे पड़े हैं. संक्रमण के मामलों के दोगुना होने की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए जिले में अगले सप्ताह में 27,000 मामले देखने को मिलेंगे और यहां लगभग 2,000 ऑक्सीजन बेड, 150 आइसीयू बेड और करीब 350 वेंटिलेटर की कमी हो जाएगी. 

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआइ) के अध्यक्ष डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ‘‘कोविड छोटे शहरों-गांवों में फैल रहा है और यह चिंताजनक है.’’ 1 मार्च से 17 जुलाई के बीच कोविड के 15 प्रतिशत और 25 प्रतिशत मामले क्रमश: ग्रामीण और अर्द्ध-ग्रामीण जिलों के थे, तो वहीं अब यह आंकड़ा 24 प्रतिशत और 43 प्रतिशत हो गया है. कई राज्यों में बीते एक महीने में ग्रामीण मामलों का अनुपात बढ़ा है.

ओडिशा में 59 प्रतिशत, झारखंड में 41 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 37 प्रतिशत और बिहार में 40 प्रतिशत मामले ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. महाराष्ट्र में स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 1 अगस्त को ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रमण के मामलों और मौतों की संख्या क्रमश: 20.9 प्रतिशत और 16.4 प्रतिशत थी, वह अगस्त के अंत में बढ़कर क्रमश: 30 प्रतिशत तथा 23.6 प्रतिशत हो गई. पांच जिलों—नागपुर, उस्मानाबाद, बीड, सांगली और कोल्हापुर में अगस्त में मामलों में 400 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं मुंबई में यह 28 फीसद था.

कोविड का बदलता स्वरूप
भारत कोविड के 50 लाख के आंकड़े की ओर तेजी से बढ़ रहा है और पिछले महीने कोविड की रणभूमि में दिखे तीन बड़े बदलावों ने नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य महकमें के अधिकारियों को चिंता में डाल दिया है. सक्रिय मामलों में देश के शीर्ष 30 प्रभावित जिलों में अर्द्ध-ग्रामीण और ग्रामीण जिलों की बढ़ी संख्या के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ा खतरा दिख रहा है (देखें: ग्रामीण खतरा).

22 जिलों में—जिनमें से ज्यादातर महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के हैं—कोविड की संख्या में जुलाई के अंत से भारी वृद्धि देखी गई है. मसलन, गुंटूर जिले में 12 जुलाई से 31 अगस्त के बीच मामले बढ़कर 36,378 हो गए हैं, जो उससे पहले के चार महीनों में सिर्फ 3,000 मामले बढ़े थे.

नीति निर्माताओं के लिए लड़ाई का दूसरा मोर्चा भी उतना ही चिंताजनक है. अगस्त में नए राज्यों ने शीर्ष 10 कोविड प्रभावित राज्यों की सूची में अपनी जगह बना ली है. कोविड के कुल मामलों के लिहाज से कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम; तथा सक्रिय मामलों के लिहाज से कर्नाटक, यूपी, ओडिशा, असम और केरल इसमें शामिल हो गए हैं.

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में कोविड की जांच में उल्लेखनीय वृद्धि की वजह से ऐसा हुआ है. मसलन, यूपी में जून के मध्य तक कुल 5,00,000 जांच हुई थी, वह अगस्त तक 53 लाख तक पहुंच गई (देखें: चिंताजनक हाल). तीसरी बड़ी चुनौती उन राज्यों से आई है जिन्होंने एक महीने पहले संक्रामकता की लकीर नीचे झुका ली थी या जहां संक्रमण बहुत कम था, लेकिन वहां फिर से संक्रमण बढ़ता दिख रहा है.

मसलन, केरल में 31 जुलाई को कुल 20,000 मामले थे, पर तब से इसमें 75,000 नए मामले जुड़ चुके हैं. दिल्ली ने जुलाई में संक्रमण के सक्रिय मामलों की संख्या 25,000 से घटाकर 10,000 कर ली थी, वहां अगस्त में फिर से तेज वृद्धि देखी जा रही है. दिल्ली में 8 सितंबर को 23,773 सक्रिय मामले थे. (देखें: लौट आई बीमारी) 

कोविड ने ग्रामीण भारत में कैसे पसारे पांव
इनमें ग्रामीण भारत में कोविड मामलों की वृद्धि सबसे चिंताजनक है. विश्व बैंक के 2019 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की 1.3 अरब आबादी में से 65 प्रतिशत गांवों में बसती है और एक ग्रामीण महामारी विनाशकारी साबित होगी. गांवों में बीमारी के तेजी से फैलने की वजहें विभिन्न राज्यों में अलग-अलग हैं.

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने 15 अगस्त को अपने गृहनगर जालना में कहा, ‘‘ग्रामीण महाराष्ट्र में वृद्धि, मुंबई से लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों के कारण हुई है.’’ पुणे जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आयुष प्रसाद का कहना है कि कोविड हाइवे से लगते पुणे के ग्रामीण क्षेत्रों में फैला है. देश में किसी भी जिले के मुकाबले सबसे बड़ा ग्रामीण क्षेत्र पुणे में हाइवे के किनारे स्थित है.

जिले के 1,408 ग्राम पंचायतों में से 45 में लगभग 86 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए हैं. प्रसाद बताते हैं, ये गांव मुंबई-पुणे, पुणे-सोलापुर, पुणे-नासिक, पुणे-अहमदनगर और पुणे-नागपुर के किनारे हैं और यहां से शहर तथा औद्योगिक क्षेत्र बहुत करीब हैं. पुणे की 15 लाख आबादी के अलावा, पुणे के ग्रामीण क्षेत्रों में 7,00,000 से 10 लाख की आबादी है.

अनलॉक 4.0 शुरू हो गया है और कोविड के ग्रामीण इलाकों में बहुत भीतर तक पहुंचने का अंदेशा है. केरल में स्वास्थ्य के लिए नोडल अधिकारी डॉ. अमर फेटल कोविड के फिर से तेजी से पांव पसारने के लिए लोगों की ओर से कोविड प्रोटोकॉल के पालन में ढिलाई को जिम्मेदार ठहराते हैं.

वे कहते हैं, ‘‘सामाजिक दूरी और मास्क से जुड़े प्रोटोकॉल को गंभीरता से नहीं लिए जाने से हम चिंतित हैं; और अब नए तथा कम शहरी क्षेत्रों से मामले सामने आ रहे हैं. कुछ तो हालात से उपजी खीज और फिर से पहले जैसा 'सामान्य’ सामाजिक गतिविधि शुरू करने की लोगों की कोशिशें हैं. इससे निबटने का एकमात्र उपाय लोगों तक पहुंचकर उन्हें सचेत करना और जांच जारी रखना ही हो सकता है.’’

डॉ. रेड्डी इससे सहमत हैं, ''कोविड लापरवाह लोगों को सबसे ज्यादा शिकार बनाता है. हम पहले जैसी जीवनशैली में नहीं लौट सकते क्योंकि इससे हमारा रक्षा कवच टूट जाएगा, मामलों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है, बल्कि होने लगी है.’’

पिछले एक हक्रते में भारत में रोजाना औसतन 89,000 नए मामले सामने आए हैं. तीन महीने पहले संक्रमण दर 4 प्रतिशत थी जो अब दोगुनी से भी ज्यादा 8.6 प्रतिशत हो गई है. वैसे, 1.7 प्रतिशत की मृत्यु दर और 77.7 प्रतिशत की ठीक होने की दर (9 सितंबर को) दुनिया में सबसे अच्छी है.

बुनियादी ढांचे की चुनौती
डॉ. रेड्डी कहते हैं, ''ग्रामीण महामारी शहरी महामारी की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगी.’’ मामलों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए ग्रामीण स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा राज्यों में चिंता का सबब बना हुआ है. भारत के केवल 37 प्रतिशत डॉक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. 2018 तक देश के कुल 25,650 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में से 15,700 या 61 प्रतिशत में बस एक डॉक्टर था; करीब 1,974 या 7.7 प्रतिशत में डॉक्टर ही नहीं था.

इससे भी बदतर, 73 प्रतिशत उप-केंद्र जो ग्रामीणों के लिए संपर्क का पहला बिंदु हैं, तीन किलोमीटर दूर हैं और 28 प्रतिशत उप-केंद्रों तक सार्वजनिक परिवहन से पहुंचना भी सुलभ नहीं है. इसके अलावा, ग्रामीण भारत में प्रति 10,000 लोगों पर सिर्फ 3.2 बेड हैं, जो प्रति 300 लोगों पर एक बेड के विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के विपरीत हैं. 

पश्चिम बंगाल का उत्तर 24 परगना एक उदाहरण है कि एक कमजोर चिकित्सा प्रणाली के कारण कोविड देखभाल पर क्या असर होता है. जिले की एक करोड़ आबादी और 33,800 कोविड मरीजों के लिए बस एक रेफरल अस्पताल है—कमरहटी स्थित कोविड-समर्पित सागर दत्ता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल.

ब्लॉक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सा अधिकारी डॉ. शिउली विश्वास कहते हैं कि वे हर दिन 60-65 स्वैब नमूने एकत्र कर रहे हैं और रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलीमरेज चेन रिऐक्शन टेस्ट का उपयोग करके 35-40 का परीक्षण कर रहे हैं. केंद्र में दस्त, सांप के काटने और बुखार के इलाज के लिए सिर्फ दो बेड और आउटडोर सुविधाएं हैं.

गनारपोटा और नाकफुल के दो पीएचसी में स्थिति बदतर है. गनारपोटा पीएचसी मात्र दो कमरे की है जो केवल पोलियो अभियान के दौरान या फिर गर्भवती माताओं को मेडिकल किट दिए जाने के दौरान सक्रिय होती है. ये पीएचसी 18-20 ग्राम पंचायतों को सेवा देती हैं. कोविड की जरूरतों को पूरा करने के लिए सुविधाओं को बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है.
 
अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही कहानी है. मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग ने शुरू में हर जिले में वेंटिलेटर के साथ कम से कम 10 बेड तैयार करने का लक्ष्य रखा था; 52 में से केवल 14 जिलों में आइसीयू बेड हैं. और यहां तक कि अगर राज्य कोविड-विशिष्ट चिकित्सा बुनियादी ढांचे में कुछ जोड़ता है, तो यह शहरों में ही होगा.

स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ''ग्रामीण इलाकों में कोविड से जंग के लिए न तो कोई बुनियादी ढांचा मौजूद है न ही चिकित्साकर्मी हैं. कोविड के मरीजों को इलाज के लिए शहरों में आना पड़ेगा.’’

तेलगांना में भी अस्पताल सुविधाएं चिंताजनक हैं, विशेष रूप से हैदराबाद से लगते (मेडक, हैदराबाद और रंगा रेड्डी जिलों वाले) इलाकों से दूर 30 ग्रामीण जिलों में, जबकि इनमें राज्य की दो-तिहाई आबादी रहती है. कांग्रेस विधायक दल के नेता मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने 31 अगस्त को जिलों के सरकारी अस्पतालों में अपनी पार्टी के दौरे के पांचवें दिन कहा था, ''सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और दूसरे कर्मचारियों के तमाम पद खाली हैं.

इससे तेलंगाना में गरीबों के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रभावित हुई है.’’ उन्होंने आरोप लगाया कि बीते छह साल में तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का उधार लेने के बावजूद राज्य सरकार न तो सरकारी अस्पतालों में उचित बिस्तर उपलब्ध करा पा रही है और न ही चिकित्साकर्मियों तथा अन्य आउटसोर्स्ड कर्मचारियों को पांच महीने से वेतन दे रही है.

अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं के अलावा, चिंता का विषय यह भी है कि ग्रामीण भारत में कोविड को लेकर कोई तैयारी नहीं है. पुणे जिले के राजेशवाड़ी गांव के लिए उपलब्ध निकटतम सुविधा शालगांव का पीएचसी ही है. इससे संबद्ध एक आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) कार्यकर्ता कहती हैं, ''हमारे पास कोई पीपीई किट नहीं है, हमने अपने मास्क खुद बना लिए हैं और जब हम घरों में जाते हैं, तो हमें कभी-कभी साबुन और पानी के बिना भी अपना काम करना होता है.

मान लीजिए कि हमने पॉजिटिव लोगों की पहचान करके उन्हें अलग-थलग भी कर दिया, पर हम उनकी देखभाल कैसे करें? हमारे पास विटामिन सी और पैरासिटामॉल के अलावा कोविड से संबंधित कोई भी दवा नहीं आती है.’’

कोविड की जांच एक और बड़ी अड़चन है. जून 2020 तक कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए देश भर में 208 निजी प्रयोगशालाओं के साथ 480 सरकारी परीक्षण प्रयोगशालाएं थीं. फिर भी, देश के छोटे क्षेत्रों में ऐसे केंद्रों की सुविधा अपर्याप्त है.


इससे भी बदतर स्थिति यह कि जांच को लेकर असहयोग बढ़ता जा रहा है. इसके लिए कई चीजें जिक्वमेदार हैं—अफवाहें फैलाना, गैरजिम्मेदार राजनेता, कोरोना संक्रमित परिवारों के प्रति सामाजिक रूढिय़ां, खराब संस्थागत क्वारंटीन और कोविड सुविधाएं, निजी क्षेत्र में महंगे देखभाल और खराब संवाद.

पंजाब के नवांशहर के जाफरपुर गांव के निवासियों ने 21 अगस्त को जिला कलक्टर शीना अग्रवाल को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्हें जांच के लिए स्वास्थ्य टीम नहीं भेजने का अनुरोध किया गया था. चार दिन पहले, एक पूर्व सरपंच सहित गांव के दो लोगों की कोविड से मृत्यु हो गई थी. कोविड प्रोटोकॉल के अनुसार कोविड पीडि़त के संपर्क में आए लोगों की पहचान के लिए जब टीमों ने गांव का दौरा किया, तो लोगों ने उनके साथ सहयोग नहीं किया. 

जांच को लेकर विरोध मुख्य रूप से पंजाब में देखा जा रहा है. जाफरपुर ही नहीं, पंजाब के अन्य गांवों की पंचायतों ने भी प्रस्ताव पारित किए हैं और गांवों के गुरुद्वारों से घोषणाएं हुई हैं कि स्वास्थ्य सेवा टीमों को जांच के लिए गांव में आने की अनुमति न दी जाए विशेषकर एसिम्प्टोमैटिक लोगों की जांच के लिए.

आगे का रास्ता
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कस्बों और गांवों में कोविड के फैलाव को रोकने के लिए अब भी हमारे पास समय है. अभी राज्यों के पास दो मुख्य विकल्प हैं—ज्यादा टेस्टिंग और जागरूकता कार्यक्रम. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में कोविड के टेस्ट के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करने की कोशिशों का अच्छा नतीजा देखने को मिला है. इन दोनों राज्यों में क्रमश: 56 लाख और 42 लाख टेस्ट हो चुके हैं.

तमिलनाडु और दिल्ली के सभी जिलों में भ्रम को दूर करने में आशा कार्यकर्ताओं का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया था. उत्तर-पूर्वी दिल्ली के एक ग्रामीण जिले में इस तरह की एक कार्यकर्ता सुभद्रा कुमारी कहती हैं, ‘‘शुरू में कुछ लोग हमें शक की निगाह से देखते थे पर जल्दी ही वे भी समझने को तैयार हो गए.

हमने उन्हें केवल जुबानी तौर से नहीं बताया कि क्या करना चाहिए बल्कि हमने उन्हें करके दिखाया कि किस तरह मास्क पहनना चाहिए और खांसते समय किस तरह कोहनी का इस्तेमाल करना चाहिए.’’ यह इस बात का उदाहरण है कि लोगों के बीच जाकर किस तरह विश्वास पैदा किया जा सकता है और यह कैसे कोविड के खिलाफ जंग में सहायक साबित हो सकता है.

जिन राज्यों में कोविड के ज्यादा मामले नहीं हैं, वहां कोविड मरीजों को ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में पहुंचाने की योजना तैयार कर ली गई है. मध्य प्रदेश में न सिर्फ ग्रामीण बल्कि छोटे कस्बों और दूसरी श्रेणी के शहरों में कोविड मरीजों को इलाज के लिए बड़े शहरी केंद्रों में ले जाया जा रहा है. कई राज्यों में वहां की प्राथमिक और सेकंडरी स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए यह सबसे अच्छा उपाय साबित हो सकता है. 

कोविड के मामलों में संभावित तेजी से निबटने में सीमित संसाधनों का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है, यही बात ग्रामीण इलाकों में कोविड से लड़ाई का मूलमंत्र साबित होगी. लेकिन कोई भी इस बिंदु की तरफ ध्यान नहीं देना चाहता. यह बहुत जरूरी है कि वायरस गांवों में अपना पैर पूरी तरह पसार सके, उसके पहले ही हमें इसे रोकना होगा.

उम्मीद की एकमात्र किरण यही है कि ज्यादातर मामले अब भी लक्षणविहीन हैं या हल्के लक्षण वाले हैं. उम्मीद की जा रही है कि जिन लोगों में वायरस का हमला ज्यादा गंभीर नहीं है या जिन लोगों में हल्के लक्षण हैं, उनके जरिए इस बीमारी का संक्रमण ज्यादा नहीं होगा, हालांकि अभी तक इसका कोई वैज्ञानिक अनुमान नहीं है.

नीति आयोग के सदस्य और मेडिकल इमरजेंसी पर अधिकारप्राप्त समिति के अध्यक्ष डॉ. वी.के. पॉल उम्मीद करते हैं, ''कोई भी वायरल संक्रमण अपने बुनियादी स्वभाव के अनुसार फैलता है. हम बहुत ज्यादा टेस्ट कर रहे हैं—एक दिन में करीब दस लाख. देश अब आइसोलेशन के दिशानिर्देशों, बुनियादी सुविधाओं और उपकरणों के मामले में कोविड का सामना करने के लिए तैयार भी हो चुका है.’’

वे कहते हैं, ''इलाज के मोर्चे पर हम मजबूत स्थिति में हैं. हमें बस मामलों में बहुत तेज वृद्धि को रोकना होगा ताकि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली ही न चरमरा जाए.’’ इसी सलाह को मानकर ही देश कोरोना से जंग में बेहतर साबित हो सकता है.


—साथ में अनिलेश एस. महाजन, किरण डी. तारे, आशीष मिश्र, अमरनाथ के. मेनन और रोमिता दत्ता

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