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आवरण कथाः अंदेशों के बीच से उभरती उम्मीद

केंद्र ने जम्मू-कश्मीर में ठप पड़ी राजनैतिक प्रक्रिया शुरू तो की है लेकिन इसमें कामयाबी के लिए उसे यहां के लोगों के दिल जीतने होंगे और उनका भरोसा भी.

आस्था का सवाल: श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित 14वीं सदी की खानकाहे मौला मस्जिद में दुआ पढ़ती एक बुजुर्ग कश्मीरी महिला आस्था का सवाल: श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित 14वीं सदी की खानकाहे मौला मस्जिद में दुआ पढ़ती एक बुजुर्ग कश्मीरी महिला

जुलाई के शुरू में जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अधिकारियों का एक छोटा-सा समूह श्रीनगर से लगे हरि पर्वत इलाके में इकट्ठा हुआ. आखिर उनका मिशन क्या था? दरअसल वे इस बात की थाह लेना चाहते थे कि पहाड़ी पर झंडा फहराने के लिए 100 फुट लंबा खंभा गाड़न मुमकिन है या नहीं, ताकि जब आसमान साफ हो तो उस पर फहराता भारत का विशाल ध्वज 50 किलोमीटर दूर गुलमर्ग से भी नजर आए.

यह झंडा इस बात का प्रतीक होना था कि मोदी सरकार के हाथों अनुच्छेद 370 को रद्द करके जक्वमू-कश्मीर का विशेष दर्जा छीन लिए जाने और उसे केंद्र शासित प्रदेश में पदावनत कर देने के करीब दो साल बाद भारतीय राज्यसत्ता ने घाटी में अपना निर्विरोध दबदबा स्थापित कर लिया है. यह भी कि कश्मीर अब विवादित राज्य नहीं रहा बल्कि भारतीय संघ का अभिन्न अंग है.

इस कदम के एक पखवाड़े पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र शासित प्रदेश के हालात पर चर्चा के लिए जम्मू-कश्मीर के नेताओं की सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. 24 जून की इस बैठक में वही नेता बुलाए गए और शामिल हुए जिन्हें केंद्र सरकार तत्कालीन राज्य को बर्बाद कर देने के लिए बदनाम करती रही थी. मोदी और इन नेताओं के लिए यह अपने-अपने घोषित रुख से पीछे हटना और यह स्वीकार करना था कि वे सब समस्या नहीं बल्कि समाधान का हिस्सा हैं.

मगर इस बैठक का आयोजन श्रीनगर की बजाए दिल्ली में करके साफ संदेश दे दिया गया कि स्वायत्तता और आजादी की तमाम बातों का अध्याय बंद हो चुका है. यह केंद्र ही था जिसकी तूती बोल रही थी और वही तय कर रहा था कि नए सामान्य हालात लाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का क्रम क्या होगा. एक विशेषज्ञ कहते हैं, ‘‘फतह के बाद प्रधानमंत्री झंडी दिखा रहे थे कि अगला दौर एकजुटता और सौजन्य का होगा.’’ 

कश्मीरः कथा अविराम
कश्मीरः कथा अविराम

तो आखिर वे कौन-से मानदंड हैं जिनसे जम्मू-कश्मीर की यथास्थिति को आमूलचूल बदलने के मोदी सरकार के दुस्साहसी गेमप्लान की सफलता निर्धारित की जा सकती है? इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है, अपने मकसद में उसका दोटूक होना. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन सरकार बनाने और दोस्ताना रिश्ते कायम रखने के लिए पाकिस्तान को संकेत भेजने सहित कई विकल्पों को आजमाने के बाद मोदी सरकार ने तय किया कि अब निर्णायक कदम उठाने और कश्मीर की स्थिति को लेकर अस्पष्टता खत्म करने का वक्त आ गया है.

एक बड़े अफसर कहते हैं, ''उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए साफ था कि पहले आतंकी कार्ड को बेमानी करना होगा, खलबली पैदा करने वाले हुर्रियत सरीखे नेटवर्कों से लौह इरादों से निबटना होगा और पाकिस्तान के लिए बगावत के समर्थन को कहीं ज्यादा महंगा बनाना होगा.’’

ऐसा करने के लिए सरकार ने साम, दाम, दंड, भेद के चाणक्यनुमा हथकंडे अपनाए. पहले उसने तमाम बड़े नेताओं को छह माह से एक साल तक के लिए घरों में नजरबंद कर दिया. सुरक्षा बलों ने उन लोगों को गिरफ्तार किया, जो उनकी राय में हिंसा भड़का सकते और दहशत पैदा कर सकते थे. फिर उसने महीनों घाटी में इंटरनेट बंद करके भीषण ब्लैकआउट थोपा.

उधर सुरक्षा बल दहशतगर्दों और उनके कमांडरों की तलाश में जुट गए और उन्होंने नियमित अंतराल से एक-एक करके अहम आतंकियों का सफाया किया. इस सबसे हिंसा के अर्थशास्त्र और टेरर नेटवर्कों की कमर तोड़ने में मदद मिली. जब पाकिस्तानी फौज ने नियंत्रण रेखा पर गरमागरमी बनाए रखते हुए घुसपैठ का अपना पुराना खेल खेलने की कोशिश की, तो भारतीय बलों को निर्देश दिया गया कि दोगुनी ताकत से जवाब दें जिसकी भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़े. 

कश्मीरः कथा अविराम
कश्मीरः कथा अविराम

नतीजे दिखाई दे रहे हैं. सुरक्षा बल बता रहे हैं कि घाटी में कानून-व्यवस्था की घटनाओं में बीते सालों के मुकाबले 60 फीसद कमी आई है. उधर पाकिस्तान जब अफगानिस्तान के बड़े घटनाक्रमों में उलझा था, भारत के साथ परदे के पीछे बातचीत में दोनों देश फरवरी में नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम के लिए राजी हो गए. वह अब तक कायम है

इस सबका नतीजा यह है, जैसा कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा इंडिया टुडे से कहते हैं, ''सुरक्षा की स्थिति अब बहुत अच्छी है. हमारे बलों का पूरा नियंत्रण है. उग्रवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की हमारी रणनीति के नतीजे मिले हैं. एक संकेत तो यही है कि बीते दो-एक साल के मुकाबले तिगुनी तादाद में सैलानी श्रीनगर आए.’’ (देखें बातचीत: परिसीमन के बाद क्या होता है).

साथ ही, मोदी सरकार भारतीय कानूनों और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे पर आधारित कानूनों के बीच विसंगतियां कानूनन खत्म करने में जुट गई. एक अधिकारी कहते हैं, ''हमने राज्य के पूरे ढांचे और सांस्थानिक स्थापत्य को नए सिरे से ढाला. हमने जो किया उसे अब कोई अनकिया नहीं कर सकता.’’

इस साल मार्च में संसद में जम्मू-कश्मीर का बजट पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खास तौर पर कहा, ''अब हम एक राष्ट्र, एक संविधान और एक कानून हैं. सभी 890 केंद्रीय कानून अब जम्मू-कश्मीर में लागू हो गए हैं, राज्य के 205 कानून रद्द और 129 बदल दिए गए हैं.’’ जम्मू-कश्मीर के लिए 1.08 लाख करोड़ रुपए का भारी-भरकम बजट दिया गया, जो 2017-18 के मुकाबले 33 फीसद ज्यादा था और उत्तर प्रदेश तथा बिहार सरीखे राज्यों के प्रति व्यक्ति खर्च से पांच गुना ज्यादा.

उसके लिए इतना विशालकाय खर्च इसलिए ताकि केंद्र सरकार 55 विकास योजनाएं लागू कर, बुनियादी ढांचा खड़ा करके और औद्योगिकीकरण में धन लगाकर केंद्र शासित प्रदेश के कायापलट का वादा पूरा कर सके.

अलबत्ता, सरकार का गेमप्लान यहीं लड़खड़ाता दिखता है. सिन्हा अपने प्रशासन की तरफ से स्वीकृत/निर्मित सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और चिकित्सा संस्थाओं की पूरी फेहरिस्त जहां धड़ल्ले से बोलते जाते हैं, वहीं ये परियोजनाएं लोगों की जिंदगी में अभी ठोस फर्क नहीं ला पाई हैं. एक अफसर कहते हैं, ‘‘एक फांक है. वे नौकरियां चाहते हैं, पुल और सड़कें नहीं.’’

कोविड-19 महामारी ने सरकार की कोशिशों में और भी रोड़े डाल दिए और एक के बाद एक लॉकडाउन ने ज्यादातर विकास परियोजनाएं रोक दीं. नई उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए माहौल अब भी अनुकूल नहीं है.

घाटी के नौजवानों को नौकरियां मुहैया करवाना बेहद अहम है ताकि उनकी ऊर्जा को उत्पादक कामों में लगाकर उन्हें बंदूक के प्रलोभन से दूर रखा जा सके. जब तक यह नहीं होता, सुरक्षा बलों को लगता है कि बहुत मेहनत से लड़कर हासिल उनकी उपलब्धियां जल्द बेकार चली जाएंगी. जम्मू-कश्मीर सरकार में 4,50,000 कर्मचारियों की भारी-भरकम नौकरशाही है. इतने कारिंदे तो इससे बड़े राज्यों में नहीं हैं.

लिहाजा मांग पूरी करने के लिए निजी नौकरियों की जरूरत है. अप्रैल में केंद्र शासित राज्य प्रशासन ने 28,400 करोड़ रुपए की भारी-भरकम औद्योगिक नीति का ऐलान किया. इकाइयां लगाने के लिए इसमें उद्यमियों को बड़े प्रोत्साहन लाभों की पेशकश की गई. उधर औद्योगिक पार्कों के लिए लैंड बैंक बनाया जा रहा है. मगर नतीजे देने से पहले इन कोशिशों में लंबा समय लगेगा, जबकि रोजगार की जरूरत तत्काल और अभी है.

राष्ट्रपति शासन के तीन साल (महबूबा मुफ्ती सरकार जून 2018 में बर्खास्त हुई थी) के दौरान अफसरशाही ही राज्य को चलाती रही, जो नुक्सानदायक साबित हुआ. अफसरशाहियां आम तौर पर मगरूर, भ्रष्ट और नियमों से बंधी होती हैं और बार-बार तबादलों की वजह से उस तरह जवाबदेह नहीं हो सकतीं जैसे राजनीतिज्ञों को दुबारा चुनकर आने की वजह से होना पड़ता है.

न ही कार्यक्रमों के अमल में व्यस्त बाबुओं के पास इतना वक्त होता है कि लोगों को धैर्य के साथ सुन सकें, जिसमें सियासी तबका पारंगत होता है. एक विशेषज्ञ कहते हैं, ''आप कश्मीर को स्विटजरलैंड नहीं बना सकते, खासकर जब बाकी देश बिहार बना रहे.

आदर्श स्थिति में मोदी सरकार राजनैतिक प्रक्रिया शुरू करने से पहले अपने विकास के एजेंडे को मजबूत करने के लिए राष्ट्रपति शासन एक और साल जारी रखने को तवज्जो देती. मगर दो कारकों ने उसे यह प्रक्रिया तेज करने को मजबूर किया. एक नकारात्मक कारक है अफसरशाही के कामकाज और उसकी नतीजे देने की क्षमता के प्रति लोगों का बढ़ता मोहभंग. दूसरे, नौजवानों का जमीनी नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश में 2018 में करवाए गए पंचायत चुनाव बेहद कामयाब साबित हुए.

तभी तो इन चुनावों का बहिष्कार करने वाली मुख्यधारा की पार्टियों को नवंबर 2020 में हुए जिला परिषद के चुनावों में उतरने का फैसला करना पड़ा. कश्मीर डिवीजन के पंचायत चुनावों में 60 फीसद मतदाताओं ने वोट डाले, जो उम्मीद से ज्यादा थे. इन्हीं वजहों से सरकार मानती है कि राजनैतिक प्रक्रिया को फिर शुरू करने का यही सही वक्त है.

प्रदेश की तमाम सियासी पार्टियों के साथ मोदी की बैठक के बाद सरकार ने ऐलान किया कि निर्वाचन क्षेत्रों को तर्कसंगत बनाने के लिए गठित परिसीमन आयोग जल्द से जल्द काम पूरा करेगा. उसने संकेत दिया कि इस कवायद के बाद विधानसभा चुनाव करवाए जाएंगे और फिर राज्य का दर्जा बहाल करने पर विचार होगा.

इनमें से हरेक प्रक्रिया विवादास्पद होगी, जिस तरह इनका क्रम तय किया गया है. परिसीमन की कवायद को सही, न्यायसंगत और पारदर्शी होना होगा. तभी इस आलोचना का जवाब दिया जा सकेगा कि यह घाटी में मुसलमानों का दबदबा खत्म करने को करवाया जा रहा है.

सियासी पार्टियां विधानसभा चुनाव से पहले राज्य का दर्जा बहाल करवाना चाहती हैं, पर सरकार एहतियात बरत रही है. एक अफसर कहते हैं, ''चुनाव हो या परिसीमन, राज्य का दर्जा देने से पहले वह राजनैतिक पार्टियों के अच्छे व्यवहार और ईमानदारी की कसौटी होगा. हम नहीं चाहते कि इस प्रक्रिया के साथ भितरघात हो या इसे नाकाम किया जाए.

देखिए गोलपोस्ट कैसे बदल गए हैं—स्वायत्तता और आजादी से अब महज पूर्ण राज्य का दर्जा.’’ इन अफसर के मुताबिक, आदर्श तो यह होगा कि एक अलिखित समझौता हो जिसमें भारत कश्मीर को विशेष महसूस करवाने (भले ही उसने अपना विशेष दर्जा कानूनी तौर पर गंवा दिया हो) के लिए सब कुछ करे और घाटी हिंसा और उग्रवाद को तिलांजलि दे दे. इतना ही जरूरी यह भी है कि 20 साल के नजरिए से छोटे और लंबे वक्त में हासिल किए जाने वाले विकास के लक्ष्यों का रोडमैप सामने हो.

इन सभी सुरक्षा, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जरूरतों ने कश्मीर को एक बार फिर एक महत्वपूर्ण चौराहे पर ला खड़ा किया है. यह क्षेत्र खुद को एक अन्य अहम मोड़ पर पाता है जहां बहुत सारे वादे हैं तो अंदशे भी हैं, अवसर हैं तो चिंताजनक खतरे भी. कश्मीर बेशक बेहतर का हकदार है. घाटी का मिजाज भांपने के लिए मैंने अपने सहयोगी और ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह के साथ पूरे कश्मीर की यात्रा की और हर तबके, हर उम्र के लोगों से दिल खोलकर बातें कीं, उनके संग फोटो खिंचवाए.

हमने उनका भी साक्षात्कार किया जो शासन कर रहे हैं (या इसकी इच्छा रखते हैं) और उनसे भी खुलकर बात की जो शासित हैं. हमने उपराज्यपाल से मुलाकात की, जिन्होंने कश्मीर की सूरत बदलने की योजना की एक रूपरेखा तैयार की है और दूसरे पक्ष की राय जानने के लिए दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित घाटी की तीन बड़ी सियासी हस्तियों से भी मिले. 

हमने सेना के एक जनरल और पुलिस महानिरीक्षक से भी बात की जिन्हें घाटी की सुरक्षा पक्की करने का जिम्मा सौंपा गया है. यह आकलन करने के लिए कि विकास की कोशिशें जमीन पर कितनी खरी उतर रही हैं, हम स्थानीय शासन व्यवस्था में तीनों स्तरों के प्रतिनिधियों के पास गए. एक संवेदनशील जिले के उपायुक्त से मिले तो एक नगरपालिका के अध्यक्ष और बारामूला जिले के एक दूरदराज के गांव में एक पंचायत के सरपंच से भी मिलने पहुंचे.

हमने कश्मीर के एक जाने-माने होटल व्यवसायी और फल बागानों के मालिकों से भी संपर्क किया. पर्यटन और बागवानी कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. एक प्रख्यात शिक्षाविद् और एक राजनीतिक रणनीतिकार ने हमें सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर अंतर्दृष्टि प्रदान की. पर हमने अपना अधिक ध्यान ज्यादा से ज्यादा महत्वाकांक्षी युवा कश्मीरियों से बात करने पर केंद्रित किया ताकि थाह ली जा सके कि वे कश्मीर का कैसा भविष्य देखते हैं. 

कश्मीर सिर्फ एक भूभाग, एक इलाका नहीं है. यह हमारे और आपके जैसे लोगों से भरी भूमि है. उनकी भागीदारी के बिना घाटी का कोई अर्थ नहीं. आगे के पन्नों में, हम आपके लिए उनके जीवन की कहानियों और विचारों को रख रहे हैं. उनके साथ करीब एक हफ्ता बिताने के बाद मैं इस भावना के साथ लौटा कि कश्मीरियों की रहस्यमयी चुप्पी को मौजूदा स्थिति के लिए उनकी मौन स्वीकृति न समझा जाए.

इस चिंता के अलावा कि उनके राज्य का विशेष दर्जा छीन लिए जाने से उनकी जमीन और उनकी नौकरियां बाहरी लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएंगी, आप उनमें भारतीय राज्य के प्रति गुस्सा, भय, घात और अविश्वास की भावना महसूस कर सकते हैं. उनका दिल जीतने के लिए इन चिंताओं को तत्काल दूर करना होगा.

हालांकि, तमाम अनिश्चितताओं के बीच बेशुमार आशाएं भी हैं. बहुत-से लोगों में सबकुछ भुलाकर आगे बढऩे की ललक भी दिखती है: नौकरी हासिल करें, अपने जुनून को पूरा करें और जीवन के वास्तविक आनंद को पा लें. उनका जोश चौंकाने वाला है, चाहे वह उद्यमी युवा महिला हो जो सहकारी व्यवस्था में दूध उत्पादन वाले स्वयं सहायता समूह का नेतृत्व करती हैं और समूह के विकास की अपार संभावनाएं देखती हैं.

या एक युवा जो किशोरावस्था में भटककर दहशतगर्दी के रास्ते चल पड़ा था पर लौट आया. वह मानता है कि जिहाद से कश्मीर की समस्याओं का हल नहीं निकल सकता. अब वह एक पुलिसकर्मी बनने का इच्छुक है. दो उभरते युवा गायकों ने बताया कि कैसे वे कश्मीर से आगे, भारतीय संगीत उद्योग में पहचान बनाना चाहते हैं. जब मैं उनके साथ था, उन्होंने एक पुराना गाना सुनाया: जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा/रोके जमाना चाहे रोके खुदाई सुनाया. यह भारत सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर का नया गीत हो सकता है.

श्रीनगर की बजाए दिल्ली में बैठक करना इस बात की ओर साफ इशारा था कि कश्मीर की स्वायत्तता को अब बीता अध्याय समझा जाए. अब केंद्र ही यह तय करेगा कि नए ढंग की सामान्य स्थिति वहां किस ढंग से बहाल हो

कश्मीरी अवाम के मौन को रजामंदी मान लेने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए. भारतीय राज्य को लेकर उनके भीतर गुस्से, खौफ और अविश्वास को कहीं गहरे महसूस किया जा सकता है. उनका दिल जीतना है तो इन चिंताओं को जल्द से जल्द दूर करना होगा

 

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