scorecardresearch
 

आवरण कथाः महामारी ने दे दिए बड़े सबक

समस्या के हल को लेकर भारत के नजरिए ने कोविड-19 की जंग में मदद की. अब आगे उसे स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ाने, नई बीमारियों और उससे जुड़ी चिंताओं को प्राथमिकता के आधार पर पहचानने, उससे निबटने को एक अलग कार्यबल बनाने, प्राथमिक स्वास्थ्य के स्तर पर डिलिवरी सिस्टम मजबूत करने और बीमारियों से लडऩे को तकनीक का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने के संदर्भ में करने की जरूरत

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन डॉ. सौम्या स्वामीनाथन

नया दौर, नई राहें 2021
डॉ. सौम्या स्वामीनाथन

इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड-19 जैसी बीमारी से बड़ा स्वास्थ्य का संकट मैंने अपनी जिंदगी में दूसरा कोई नहीं देखा. मुझे ऐसी दूसरी कोई घटना याद नहीं, जिसका लोगों पर ऐसा भीषण प्रभाव न केवल एक देश में बल्कि दुनियाभर में देखा गया हो. महामारी का पहला सबक तो यही मिला कि दुनियाभर के देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों की तैयारियों में कमी थी. इनमें सबसे धनी-मानी देश भी शामिल हैं. अंतर मुख्य रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में संक्रामक रोग के खतरों का पता लगाने, निगरानी, रोकथाम और प्रतिक्रिया में खामियों के रूप में था.

प्रशिक्षित जनशक्ति, वास्तविक समय पर आंकड़ों का संग्रहण और विश्लेषण, गुणवत्तापूर्ण प्रयोगशालाएं, एक जोखिम संचार रणनीति और सरकार को कार्रवाई की उचित सलाह देने वाले सशन्न्त स्वास्थ्य अधिकारियों को सिस्टम में शामिल करने की आवश्यकता है. दूसरी ओर, हमें यह भी देखने को मिला कि  कुछ निम्न और मध्यम आय वाले देश, जो उच्च तकनीक पर कम और मौजूदा प्राथमिक स्वास्थ्य और समुदाय आधारित दृष्टिकोणों पर अधिक निर्भर करते हैं (जैसे रवांडा, सेनेगल, थाइलैंड और वियतनाम) ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया.

भारत में कई सकारात्मक विकास हुए हैं. शुरुआत में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रूप में एकमात्र प्रयोगशाला थी जो आरटी-पीसीआर जांच कर सकती थी. आज, 1,500 से ज्यादा प्रयोगशालाएं हैं जिन्हें निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों ने तेजी से स्थापित किया. व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) के बारे में भी यही सच है, जिन्हें शुरू में आयात किया जाता था लेकिन जल्द ही देश में ही बनाया जाने लगा.

नैदानिक उपकरणों, एनालिटिकल सॉफ्टवेयर में नवाचार और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग तथा कोविड मामलों का पता लगाने जैसी चीजों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग भी बहुत सराहनीय था. कई भारतीय कंपनियां न केवल विदेशी समूहों के साथ समझौते में बल्कि अपने नए विचारों पर काम करते हुए टीकों का निर्माण कर रही हैं. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. ये सारी चीजें बताती हैं कि भारत में पर्याप्त सामर्थ्य और क्षमता है. ये ऐसे सबक हैं जो दूसरी बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं पर लागू किए जा सकते हैं.

लॉकडाउन के संबंध में बात करें तो जब इसे लागू किया गया था, उस समय इसके अलावा कोई और वैकल्पिक रास्ता नहीं दिखता था. इसने चीन में काम किया था और इसे वायरस के फैलाव को धीमा करने या रोकने के एक बड़े ही कठोर लेकिन कुशल तरीके के रूप में देखा जाता था. हालांकि, एक बात जो मुझे अखरती है, वह यह है कि कई हक्रतों तक सख्त तालाबंदी के बावजूद भारत में हुए सीरो सर्वे सर्विलांस अध्ययन में पाया गया कि संक्रमण की दर 25 प्रतिशत से अधिक और कुछ भारतीय शहरों में तो 50 प्रतिशत से भी अधिक थी. यह कई तरह के इशारे करता है.

एक तो यह कि गरीब, भीड़भाड़ वाले शहरी क्षेत्रों में तालाबंदी काम नहीं करती, क्योंकि बहुत अधिक लोग एक साथ रहने को मजबूर होते हैं और इससे शारीरिक दूरी का बड़ा उद्देश्य खत्म हो जाता है. दूसरी बात, जिस तेजी से वायरस का फैलाव होता दिखा, उस अनुपात में अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ी और न ही उतनी मौतें हुईं. और यह किसी को भी हैरानी में डाल सकता है कि क्या इसका किसी अन्य वायरस या बैक्टीरिया के संपर्क में आने के कारण पैदा हुई इम्युनिटी से कोई लेना-देना है?

बेशक, जनसांख्यिकी एक बड़ा अंतर पैदा करती है. भारतीय जनसंख्या की औसत आयु 28 वर्ष है, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह 43 से 45 वर्ष है. वहां वृद्ध लोग अधिक गंभीर रूप से प्रभावित थे और उनकी मृत्यु दर बहुत अधिक थी. आयु के इस पहलू की भी भारत में कम मृत्यु दर में एक बड़ी भूमिका रही है, लेकिन हमें यह भी पता लगाने की जरूरत है कि क्या अन्य आनुवंशिक या प्रतिरक्षात्मक कारक भी हैं.

अब हम वायरस और इसके फैलने के तरीकों के बारे में अधिक जानते हैं, इसलिए हमारे कार्यों को और अधिक रणनीतिक बनाने की आवश्यकता है. हमें प्रकोप का पहला संकेत प्राप्त होने पर ही बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करने में सक्षम होना चाहिए, विशेष रूप से शैक्षणिक संस्थानों, रेस्तरांओं, कार्यस्थलों और ऐसे अन्य स्थानों पर जहां बहुत सारे लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं.

हमें इसका मुकाबला करने के लिए तकनीक की अधिक कुशलता से प्रयोग की आवश्यकता है. मिसाल के तौर पर, जीनोमिक सर्विलांस, जिसका इस्तेमाल कई देश अब महामारी को लेकर यह जानने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं कि उनके यहां यह वायरस कहां से आया, उसने कब प्रवेश किया, देश में कितनी प्रविष्टियां हुईं, यह कैसे फैला और किस प्रकार विकसित हो रहा है. भारत सरकार ने अब जीनोमिक निगरानी के उद्देश्य से संस्थानों का एक संघ बनाया है, जो सराहनीय है.

एक और महत्वपूर्ण सबक जो हमें मिला वह महामारी के विभिन्न चरणों के दौरान लोगों को उचित सूचनाएं प्रदान करने के संदर्भ में है. ज्यादा व्यावहारिक संदेश बनाने होंगे क्योंकि लोग बुरी तरह से उलझन में पड़ जाते हैं और हर कोई यह नहीं समझ पाता कि आखिर चल क्या रहा है. यह बताते हुए कि हम किस चरण में हैं, क्या बदल रहा है और क्यों, हम आगे क्या करने जा रहे हैं और संभावित परिदृश्य क्या हो सकते हैं, आंकड़ों का निरंतर, मजबूत, स्पष्ट प्रसारण होना चाहिए.

टॉप-डाउन ऑर्डर केवल कुछ समय के लिए काम करते हैं. अंतत:, समुदाय को ही समाधान का हिस्सा बनना होता है और यह पारदर्शी, विश्वसनीय और प्रभावी संचार के जरिए ही सबसे अच्छी तरह से हो सकता है. धारावी शुरू में एक टाइम बम जैसा बन गया था, वहां वायरस के प्रसार को किस प्रकार नियंत्रित किया था, इसका एक अच्छा उदाहरण है.

टीके हमें इस महामारी से बाहर निकालेंगे—यही हमारी इस आपदा से निकलने की रणनीति है. हम दुनियाभर में अरबों लोगों के टीकाकरण की बात कर रहे हैं और इसे पूरा करने में दो साल से अधिक का समय लगेगा. भारत ने एक राष्ट्रीय टीकाकरण योजना विकसित की है जो अच्छा नियमित टीकाकरण कार्यक्रम है और इसे बड़ी संख्या में बच्चों के टीकाकरण का अनुभव है. कम से कम 70 फीसद आबादी को कवर करने के लिए इसे 20-30 गुना बड़े पैमाने पर करने की आवश्यकता होगी.

यह बड़ी चुनौती है जिसके लिए बहुत तैयारी और नवाचार की आवश्यकता होगी. इस कार्यक्रम में न केवल सरकारी केंद्र, बल्कि फार्मेसियों सहित निजी क्षेत्र को भी वैक्सीन की डिलिवरी के लिए एक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता होगी. लगाए गए टीकों की सुरक्षा और प्रभावकारिता, साथ ही जनसंख्या समूहों की प्राथमिकता के औचित्य और उचित और न्यायसंगत वितरण के लिए किए जा रहे उपायों के बारे में ईमानदार और पारदर्शी सूचनाएं देना, जनता का विश्वास बढ़ाएगा.

विशेष रूप से इस बात की चिंता के साथ कि क्या हम टीकाकरण कार्यक्रम के साथ बहुत तेजी से भाग रहे हैं, वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावकारिता के लिए जोखिम-लाभ का आकलन जरूरी हो जाता है. दुनिया के कई हिस्सों में महामारी इतनी विस्फोटक गति से बढ़ रही है कि वायरस के संक्रमण की गति को जितना जल्द हो सके कम करने के लिए, टीकों की जरूरत है. एक सुरक्षित और प्रभावकारी टीका, जो आबादी में प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ा सकता है, की उपलब्धता के फायदे बहुत बड़े हैं.

आपातकालीन उपयोग की मंजूरी के बीच अंतरिम आंकड़े बताते हैं कि टीके के लाभ, जोखिमों से अधिक हैं, फिर भी लंबी अवधि की सुरक्षा और प्रभावकारिता निर्धारित करने के लिए उन लोगों की निगरानी आवश्यक है जो इन नैदानिक परीक्षणों के प्रतिभागी रहे हैं. हम यह भी जानते हैं कि जब टीके बड़े पैमाने पर लगाए जाते हैं, तो ऐसे अप्रत्याशित साइड-इफेक्ट्स जो कि परीक्षणों के दौरान नहीं देखे गए थे, उभर सकते हैं. इसलिए टीके के पूर्ण लाइसेंस से पहले, टीके लगाए जाने के बाद फार्मा-कोविजिलेंस या सुरक्षा की निगरानी की व्यवस्था और इसके आंकड़ों को अच्छी तरह जांचना महत्वपूर्ण है.

महामारी ने एक बार फिर से भारत के लिए इस बात की सख्त जरूरत जताई है कि एक अलग सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर की आवश्यकता है—यह न केवल एक महामारी में, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व के सभी रोगों (दोनों संचारी और गैर-संचारी) के लिए प्रभावी होगा. अभी, 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इसका उल्लेख होने के बावजूद, केवल कुछ राज्यों में ही ऐसा कैडर उपलब्ध है और यह महत्वपूर्ण कदम है. यह भी महत्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य में निवेश को बढ़ाकर कम से कम जीडीपी का 2.5 प्रतिशत तक किया जाए. इसके बाद हमें प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों और स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों की प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता है.

यहां, डिजिटल उपकरण और प्रौद्योगिकियां बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. वे मानव संसाधनों की जगह नहीं ले सकते लेकिन बेहतर गुणवत्ता देखभाल प्रदान करने के लिए इनका कुशलतापूर्वक और रणनीतिक रूप से उपयोग किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, अगर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों की कमी है तो टेलीमेडिसिन से वह कमी दूर की जा सकती है और एआइ आधारित ऐप नर्सों और ग्रामीण चिकित्सकों के जरिए कोविड प्रबंधन में मदद कर सकते हैं.

साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व के रोगों के लिए एक एकीकृत डेटाबेस की आवश्यकता है, जो वास्तविक समय में इनकी निगरानी करने और समय पर कार्रवाई करने में सक्षम बनाता है. भारत का एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच (आइएचआइपी) और एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आइडीएसपी) गेम चेंजर बनने की क्षमता रखता है.

अंत में, हमें भारत में शोध और अनुसंधान के लिए संसाधनों के प्रबंध के बारे में भी सोचने की आवश्यकता है. महामारी ने वास्तव में दिखाया है कि जरूरत पडऩे पर सभी प्रकार के स्वास्थ्य उत्पादों के उत्पादन में भारत कितना सक्षम है. आगे बढ़ते हुए हमें यह प्राथमिकता तय करनी चाहिए कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की अन्य क्या जरूरतें हैं, और उसके बाद हमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी का वही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जिसका उपयोग हमने देश में टीके के विकास के लिए किया. इसके साथ ही हमें एक बहुत मजबूत और विश्वसनीय नियामक संरचना की आवश्यकता है, खासकर अगर हम अभिनव चिकित्सा उत्पादों के महत्वपूर्ण निर्यातक बनना चाहते हैं.

एक बात बहुत स्पष्ट है: महामारी 2021 में या अगले कुछ वर्षों में भी खत्म नहीं होने जा रही. हम नहीं जानते कि क्या हम अंतत: इस वायरस को खत्म कर सकेंगे. प्रभावी टीकों से होगा यह कि लोगों में प्रतिरक्षा स्तर तैयार होगा और महामारी धीमी हो जाएगी. उसके बाद यह इतनी तेजी से नहीं फैलेगी और इसका मतलब यह है कि इतने लोग बीमार नहीं होंगे या मरेंगे नहीं.

इस बात का भी अंदेशा है कि वायरस उत्परिवर्तित होता है और हमारे सामने इन्फलूएंजा जैसी एक स्थिति पैदा हो जाती है जिसके लिए हर साल एक संशोधित टीके की आवश्यकता होती है जो उस समय प्रसारित स्ट्रेन पर आधारित होता है. लेकिन हम आशा करते हैं कि यह एक ऐसी महामारी है जो पूरे जीवनकाल में एक बार ही आती है और हम ऐसे ही लक्षणों वाले किसी अन्य वायरस की चपेट में कभी नहीं आएंगे. अगर ऐसी कोई आपदा फिर से आती है, और इसकी वास्तविक संभावना हो भी सकती है, तो हमें इससे निबटने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होना चाहिए. 
 
सौम्या स्वामीनाथन विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की पूर्व महानिदेशक हैं

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें