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आवरण कथाः इश्क में उतरने के नए नियम

टीकाकरण के बाद भारत में डेटिंग भी हाइब्रिड हुई, यानी ऑनलाइन भी और आमने-सामने मिलकर भी.

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टीकाकरण के बाद भारत में डेटिंग भी हाइब्रिड हुई टीकाकरण के बाद भारत में डेटिंग भी हाइब्रिड हुई

सोनाली आचार्जी

दिल्ली में रहती फ्रेंच अनुवादक शमिता कुलकर्णी ने पूरी महामारी के दौरान सिंगल रहने के बाद छह माह पहले तय किया कि चलो फिर डेटिंग करके देखा जाए. टीके की दोनों खुराक उन्हें लग चुकी थीं. डेट नाइट के बाने में सज-धजकर और मैचिंग मास्क पहनकर उन्हें लगा कि वे डेटिंग के दरिया में डुबकी लगाने को बिल्कुल तैयार है.

उन्हें फोडा—'फियर ऑफ डेटिंग अगेन’ यानी फिर डेट करने के डर—का जरा अंदेशा नहीं था. उन्हें नहीं पता था कि ऑनलाइन डेटिंग की सलाहियत उनमें कितनी है. लिहाजा अपनी टिंडर प्रोफाइल बनाने और डेटिंग सर्किट में कदम रखने में उन्हें एक महीना लगा.

महामारी के बाद की दुनिया में यह एहसास कई लोगों के लिए जाना-पहचाना है. लव लाइफ तो 'कोविडेटेड’ यानी महामारी की वजह से खत्म या तब्दील हो ही चुकी थी, अनेकानेक लोग 'कोविडिवोर्सी’ हो गए यानी कोविड की वजह से तलाक हो गया. लोकप्रिय डेटिंग ऐप बंबल ने जून में भारत के अपने 2,000 यूजर में एक सर्वे किया.

इसमें 28 फीसद लोगों ने कहा कि महामारी के दौरान उनका ब्रेकअप हो गया. डेटिंग और मेलजोल से लंबे वक्त तक दूर रहकर कई लोग शंकालु हो उठे कि वे भावनात्मक रूप से फिर जुड़ भी पाएंगे या नहीं. मीडिया में कार्यरत 25 वर्षीया मृणि देवनानी कहती हैं, ''महामारी से पहले मैं बहुत सोशल थी. अब लोगों के साथ इमोशनल रिश्तों में बंधने का मन नहीं करता.’’

मीडिया प्लेटफॉर्म मैशेबल के इस साल के कोविड-19 डेटिंग सर्वे से भी जाहिर हुआ कि डेट करने वाले (डेटर्स) आज फिर नए रिश्ते शुरू करने को लेकर जितने रोमांचित हैं उतने ही नर्वस भी हैं. एक और ऑनलाइन डेटिंग सर्विस मैच डॉट कॉम के अध्ययन से भी इस रुझान की तस्दीक हुई. इस सर्वे में शामिल 38 फीसद सिंगल या अविवाहितों ने माना कि ''असल जिंदगी में दोबारा डेटिंग की बात मन में आते ही उन्हें अपनी सामाजिक सलाहियत को लेकर बेचैनी’’ होती है.

दिल्ली की मनोवैज्ञानिक और माइंडस्केप सेंटर फॉर काउंसलिंग की संस्थापक डॉ. उपासना चड्ढा कहती हैं, ''यह वही भावना है जो कुछ महीने काम या पढ़ाई करना बंद कर देने पर महसूस होती है. परिस्थितियां बदल जाती हैं और आपको यकीन नहीं होता कि आप कार्यस्थल या यूनिवर्सिटी की नई अपेक्षाओं पर खरे उतर पाएंगे या नहीं. मिलने-जुलने के मामले में भी ऐसा ही होता है.’’ 

वर्चुअल कनेक्शन
दूसरी बहुत-सी चीजों की तरह कोविड के दिनों में डेटिंग भी वर्चुअल हो गई. वर्क फ्रॉम होम, सामाजिक दूरी और रेस्तरां, बार व सिनेमाघरों के बंद होने से नए लोगों से मिलने-जुलने की संभावनाएं खत्म हो गईं. ऐसे में आप ज्यादा से ज्यादा वीडियो डेटिंग ही कर सकते थे. 3.1 करोड़ यूजर के साथ भारत में सबसे बड़ा यूजर बेस टिंडर का है.

मार्च 2020 में इसने एक दिन में 3 अरब स्वाइप दर्ज किए, जो इसके एक दिन में सबसे ज्यादा स्वाइप थे. ओकेक्यूपिड पर दुनिया भर में मार्च और मई 2020 के बीच डेटों में 700 फीसद का इजाफा हुआ. वहीं बंबल पर 2020 में वीडियो कॉल 70 फीसद बढ़ गए. इन डेटिंग ऐप्स का कहना है कि 2021 में भी ये आंकड़े ऊंचे ही बने हुए हैं.

बंबल ने भारत में जिन सिंगल्स से बात की, उनमें से 72 फीसद ने कहा कि अब रू-ब-रू मिले बिना भी ऑनलाइन किसी से प्यार होना मुमकिन है. ओकेक्यूपिड इंडिया की सीनियर मार्केटिंग मैनेजर सितारा मेनन कहती हैं कि असल जिंदगी की रुकावटों के मुकाबले ऑनलाइन डेटिंग में किसी से अचानक मिलने और उसे पाने की खुशी के कहीं ज्यादा क्षण आते हैं. कुलकर्णी के दोस्तों ने भी उन्हें यही बताया.

मगर वे यह जानने को उत्सुक थीं कि ऑनलाइन किसी से 'मिलें’ कैसे? वे कहती हैं, ''ऑफलाइन आपका ध्यान बंटाने वाली इतनी सारी चीजें होती हैं. आप खाना ऑर्डर कर सकते हैं, माहौल में मन रमा सकते हैं, आसपास के लोगों पर टीका-टिप्पणी कर सकते हैं. ऑनलाइन आप क्या करते हैं? स्क्रीन पर बस एक दूसरे को घूरते रहते हैं?’’

इस पसोपेश में कुलकर्णी अकेली नहीं थीं. ऑनलाइन डेटिंग कर रहे दूसरे कई लोगों के मन में भी यही सवाल थे. इसने हिंज, बंबल, टिंडर, मैच, ओकेक्यूपिड और डेटिंग ग्रुप (जो डेटिंग डॉट कॉम, डेटमाइएज, प्रॉमिस और चाइनालव सरीखे कई ब्रांड का मालिक है) सरीखे प्लेटफॉर्म का स्तर ऊंचा उठाने के लिए मजबूर कर दिया. हिंज अब ई-कॉमर्स साइट अनकॉमन गुड्स के साथ मिलकर एक 'वर्चुअल डेट नाइट किट’ दे रहा है.

किट में तीन डेट नाइट कॉकटेल और चुप्पी तोड़ने तथा बातचीत शुरू करने के तरीकों की लंबी फेहरिस्त है. इन तरीकों में साझा रुचियों, व्यक्तित्व, डेटिंग जिंदगी के बारे में सवाल शामिल हैं. कुलकर्णी को तो इनमें जिंदगी मिल गई. वे कहती हैं, ''मैंने डेट किया. हमने वीडियो पर ड्रिंक बनाए, गेम्स खेले और साथ-मूवी देखने के लिए स्क्रीन भी साझा की.’’

बंबल ने यूजर की प्रोफाइल के हिसाब से 150 नए 'इंटरेस्ट बैज’ जोड़े. वह 'नाइट इन फीचर’ भी लाया, जिसमें दो लोग वीडियो चैट के दौरान ट्रिविया सरीखे इंटरैक्टिव गेम में हिस्सा ले सकते हैं. वीडियो कॉल और वीडियो नोट्स के भीतर स्नैप के एआर (ऑग्मेंटेड रियलिटी) लेंस मजा बढ़ा देते हैं. चेन्नै के डेटिंग और पर्सनैलिटी कोच इलावरासन राजा कहते हैं, ''लॉकडाउन के दौरान वर्चुअल डेटिंग सभी उम्र के लोगों में लोकप्रिय हो गई.

फोन पर साथ-साथ नेटफ्लिक्स देखना, पार्टी ऐप और वीडियो डिनर डेट तक अब डेटिंग के नए-नवेले तरीके हैं.’’ डेटिंग ऐप ट्रूली मैडली के सह-संस्थापक और सीईओ स्नेहिल खनोर के मुताबिक, ''हमने भविष्य में कम से कम तीन साल लंबी छलांग लगाई है. वर्चुअल डेटिंग को लेकर जिनके मन में ऊहापोह थी, इससे उबरकर उन्होंने पाया कि यह नए लोगों से मिलने के सबसे सुरक्षित तरीकों में से एक है.’’

कोविड के बाद प्यार
मगर अब जब चीजें धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं, डेटिंग का भविष्य क्या होगा? टिंडर का 'फ्यूचर ऑफ डेटिंग सर्वे’ कहता है कि यह अस्थिर होगा. बंबल के एक अध्ययन से पता चला कि वीडियो डेटिंग का दौर लंबा चलने वाला है, क्योंकि भारत के उसके 39 फीसद यूजर ने माना कि 2021 में उन्होंने पहली डेट के विकल्प के तौर पर वीडियो डेट को आजमाया. वर्चुअल डेटिंग फोडा से उबरने में भी मदद करती है.

मुंबई की ग्राफिक डिजाइनर कृतिका (आग्रह पर बदला हुआ नाम) मार्च 2020 में महामारी की दस्तक के बाद एक भी डेट पर नहीं गईं. उनके माता-पिता लखनऊ में रहते हैं. भीषण अकेलेपन से उकताकर 28 वर्षीय कृतिका ने ''महज नए चेहरे देखने और कुछ गपशप करने के लिए’’ डेटिंग और मैचमेकिंग साइटों पर नाम दर्ज किया.

वर्चुअल माध्यम से वे एक युवा कारोबारी से जुड़ीं, जिनसे जून में उनकी रू-ब-रू मुलाकात हुई. रिश्ता ज्यादा नहीं चला, पर उन्हें कोई शिकायत नहीं है. वे कहती हैं, ''डेट पर जाने के एहसास भर से मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा. मुझे लगा कि मैं अब भी लोगों से जुड़ सकती हूं.’’

कोविड से दागदार दुनिया में ऑनलाइन डेटिंग सुरक्षित विकल्प भी है. इन दिनों बातचीत शुरू करने के लिए सबसे सामान्य वाक्य है—''मुझे टीके लग चुके हैं.’’ बंबल के सर्वे में शामिल 35 फीसद भारतीयों ने कहा कि दूसरी लहर के बाद वे सुरक्षा को लेकर और ज्यादा सतर्क हो गए हैं. बंबल के 38 फीसद यूजर के लिए टीके की स्थिति जानना बहुत जरूरी है.

वे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ डेट पर जाना या सेक्स करना नहीं चाहेंगे जिन्हें टीके न लगे हों. कई डेटिंग साइट ने ''बैज फीचर’’ जोड़ा है जिस पर यूजर टीके की अपनी ताजातरीन स्थिति दर्ज कर सकते हैं या यह भी बता सकते हैं कि ऑफलाइन गतिविधियों में उनकी सहजता का स्तर क्या है. टीके न लगे होना अब पीछे हट जाने की बड़ी वजह है.

पुणे के 26 वर्षीय एमबीए छात्र विवेक खन्ना कहते हैं कि उन्हें दूसरे इलाकों, देशों या तलाकशुदा के साथ डेट पर जाना गवारा है पर ऐसे शख्स के साथ नहीं, जिसने टीके न लगवाए हों. वे कहते हैं, ''मुझे लगता है कि इससे व्यक्ति की मानसिकता—पब्लिक हेल्थ, साइंस और मेडिसिन के प्रति उसकी अवहेलना—का पता चलती है.

तथ्यात्मक ज्ञान के प्रति निष्ठावान होने के नाते मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसे शख्स के साथ जा सकता हूं जो वैक्सीन के प्रति शंकालु हो.’’ खन्ना यह भी कहते हैं कि वे ऑनलाइन ऐसे लोगों से मिले हैं जो उन लोगों को डेट करने को लेकर इतने ही सतर्क हैं जिन्हें टीके नहीं लगे हैं. वे कहते हैं, ''खुशकिस्मती से अब तक जितनों के साथ मेरी जोड़ी बनी, सभी को टीके लगे थे.’’

रू-ब-रू मिलने से पहले ऑनलाइन मीटिंग और चैटिंग की सुरक्षा और सहजता महिलाओं को निश्चित रूप से रास आ रही है. स्टैटिस्टा की रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण भारत की महिलाएं टिंडर के मुकाबले वू को तरजीह देती हैं. वू महिलाओं को खासी तवज्जो देता है. उनके ब्योरे हमेशा गोपनीय रखे जाते हैं और महिलाएं सीधे ऐप से प्राइवेट कॉल कर सकती हैं.

बेंगलूरू की 32 वर्षीया कॉर्पोरेट वकील भावना शास्त्री वू की सक्रिय यूजर हैं. यह उन्हें ''चापलूसों’’ से दूर रहने में मदद करता है. वे कहती हैं, ''टिंडर पर आपकी प्रोफाइल देख सकने वालों पर कोई नियंत्रण नहीं है. ऐप को लगता है कि जोड़ी मिलने की संभावना है, तो वे उस व्यक्ति को आपकी प्रोफाइल भेज देंगे. आप अक्सर आखिरकार बिल्कुल अजनबी लोगों से जुड़ जाते हैं, जिनमें से कई फेक (फर्जी) होते हैं. मैंने पाया कि वू ज्यादा सच्चा और प्राइवेट है.’’

ट्रूली मैडली के खनोर कहते हैं, ''ऑनलाइन डेटिंग में कम मेहनत, कम जोखिम और ज्यादा सुरक्षा है.’’ बंबल के ग्लोबल सर्वे में शामिल सिंगल यूजर में से 45 फीसद ने कहा कि वे वर्चुअल डेट को तरजीह देंगे क्योंकि इससे समय और पैसा बचता है. वर्चुअल डेट से आप अनावश्यक तकलीफ से बच जाते हैं.

मुंबई के 28 वर्षीय अरुण वाही कहते हैं, ''कोई आपको ऑनलाइन रिजेक्ट कर देता है, तो आपको ऐसा महसूस नहीं होता कि अरे, उनसे मिलने के लिए आने-जाने में इतना वक्त या तैयार होने और डेट पर (बिल) चुकाने के लिए इतना सारा पैसा बर्बाद कर दिया.’’ फिर हैरानी क्या कि ओकेक्यूपिड पर भारत की 38 फीसद महिलाओं और 25 फीसद पुरुषों ने कहा कि महामारी के रुखसत होने के बाद भी डेटिंग के शुरुआती चरण में वे वर्चुअल बातचीत करना ही चाहेंगे.

वर्चुअल माध्यम पर नामुमकिन?
महामारी हो या न हो, अपने से मिलते विचारों के लोग खोजना हमेशा मुश्किल होता है. जब आप ऐसे लोगों को वर्चुअल माध्यम से खोज रहे हों, तो यह और मुश्किल हो जाता है. यहीं स्लो डेटिंग या धीमे-धीमे डेटिंग की एंट्री होती है, जिसमें युगल एक दूसरे को जानने के लिए पर्याप्त समय लेते हैं और उसके बाद ही डीटीआर ('डिफाइनिंग द रिलेशनशिप’ यानी रिश्ते को परिभाषित करने के दौर) में जाते हैं.

ओकेक्यूपिड की मेनन कहती हैं, ''मिलेनियल्स (नई सदी में जवान हुए लोग) अब लंबी, गहरी बातचीत और डिजिटल माध्यम पर साझा अनुभवों से प्यार खोज रहे हैं.’’ छड़े लोग ऐसा जोड़ीदार चाहते हैं जो उनका, वे जैसे हैं और जिंदगी से जो चाहते हैं, उस सबका सम्मान करे. टिंडर के मुताबिक ''पारदर्शिता’’ और ''प्रामाणिकता’’ अब नए प्रचलित शब्द हैं. मेनन कहती हैं, ''ऐसे मुद्दों पर जागरूकता और बातचीत बढ़ रही है जो बेहद अहम हैं, मसलन घर के रोजमर्रा के कामों का बंटवारा कैसे हो और क्या महिलाओं को शादी के बाद काम करना चाहिए.’’

साथ ही, ‘पाइ हंटिंग’ (जानबूझकर कमजोर लोगों को खोजना) और 'गोस्टिंग’ (संभावित  साथी से अचानक सारे रिश्ते तोड़ लेना) सरीखे जहर-बुझे डेटिंग व्यवहारों में कमी आई है. खन्ना कहते हैं, ''ऑनलाइन डेटिंग मेरे लिए फुरसत का शगल हुआ करती थी, इसलिए मैंने परवाह नहीं कि मैं बदतमीज था या ऐप पर मिले किसी व्यक्ति से अचानक कट लिया. अब मैं इसे लेकर ज्यादा जागरूक महसूस करता हूं क्योंकि इससे फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति कौन है, कोविड की वजह से वे भी तो उतने ही परेशान होंगे जितना मैं हूं.’’

शादी की जल्दबाजी नहीं
महामारी के चलते भावनात्मक लगाव ज्यादा अहम हो गया है, यहां तक कि जब रिश्ता गंभीरता की हद तक न पहुंचा हो, तब भी. मेनन कहती हैं, ''पूरी महामारी के दौरान मिलेनियल्स मृतप्राय रिश्तों को बनाए रखने को लेकर अधीर हो उठे. इसके बजाए वे ऐसे रिश्तों में निवेश करने लगे जिनमें आगे संभावनाएं हैं.’’ इससे 'हार्डबॉलिंग’ का रुझान बढ़ा. जेनरेशन जेड या बिल्कुल नई पीढ़ी अब इस बात को लेकर बहुत चौकन्नी नहीं रह गई है कि वे क्या चाहते हैं.

यह सब तो उनके बायो में पहले से ही है. खन्ना कहते हैं, ''डेट के मामले अब मुझे संवेदनशील या कमजोर होने का डर नहीं रहा. मैं फर्जी वैकल्पिक व्यक्तित्व सामने रखना नहीं चाहता. ढोंग या झूठे दिखावों की आड़ में न तो लंबे वक्त के रिश्ते बनाए जा सकते हैं और न भावनात्मक सामंजस्य कायम नहीं किया जा सकता, खासकर जब आप उस व्यक्ति से ऑफलाइन नहीं मिल रहे हों.’’

टिंडर के मुताबिक, अपने बायो में ''एंग्जाइटी’’ शब्द का जिक्र करने वाले यूजर की तादाद 31 फीसद, ''बाउंड्रीज’’ का जिक्र करने वालों की तादाद 19 फीसद और ''कंसेंट’’ का जिक्र करने वालों की तादाद 11 फीसद बढ़ी है. बंबल इंडिया की कम्युनिकेशंस डायरेक्टर समर्पिता समद्दर कहती हैं, ''भारत में वैक्सिनेशन बढ़ने के साथ सिंगल लोग अब अपने डेटिंग के फैसले ज्यादा सोच-समझकर ले रहे हैं और सुरक्षा तथा सामंजस्य को प्राथमिकता दे रहे हैं.’’

लॉकडाउन के दौरान सिंगल मिलेनियल्स के बीच अपने लिए एक 'क्वारंटीन बेइ’—ऐसा व्यक्ति जिसके साथ वे महामारी का वक्त गुजार सकें—खोजने के लिए होड़ मच गई. कइयों ने खुद को 'एपोकैलिप्सिंग’ यानी डेटिंग शुरू करते ही किसी के साथ बहुत गंभीर होते पाया. यही वजह थी कि प्लेंटी ऑफ फिश के तमाम देशों के सर्वे में शामिल एक-तिहाई लोगों ने कहा कि वे ''हर रिश्ते के साथ ऐसे पेश आ रहे थे मानो यह उनका आखिरी रिश्ता हो’’.

टिंडर पर कहीं ज्यादा लोग यह देखने के इच्छुक हैं कि ''नैया किस किनारे लगती है.’’ एक वैश्विक सर्वे में 62 फीसद ने कहा कि उन्हें प्रतिबद्ध रिश्ते की तलाश नहीं है बल्कि वे रूमानी संभावना या कैजुअल डेटिंग वाली दोस्ती को तरजीह देंगे. दिल्ली की 19 वर्षीय छात्रा अनन्या पाल (आग्रह पर बदला हुआ नाम) ने अपने ऑनलाइन प्रेमी से तीन महीने चैटिंग और वीडियो डेटिंग की और फिर उससे मिलने का फैसला किया.

वे कहती हैं, ''हर शुक्रवार की रात हम एक साथ स्क्रीन शेयर करते और मूवी देखते, हाउसहोल्ड पार्टी ऐप पर वर्चुअल गेम्स खेलते थे.’’ जब उनका 'अंतरंग’ होने का मन करता, वे जूम के लोकप्रिय और बेहतर सुरक्षा उपायों वाले विकल्प जित्सी मीट पर वीडियो कॉल करते. यहां तक कि दो-एक बार उन्होंने साइबर सेक्स भी किया. ''मैंने सिंड्रेला हैलोवीन मास्क पहना. उसे चेहरा दिखाने में कोई एतराज नहीं था.’’

दिल्ली के महरौली इलाके में एक चैरिटी के दवा वितरण अभियान में वॉलंटियर का काम करते हुए अंतत: वे मिले. ''हम एक-दूसरे को देखने के लिए और इंतजार नहीं कर सके. यह अपने रिश्ते को ऑफलाइन शुरू करने सार्थक तरीका भी था.’’ जब चीजें गंभीर होने लगीं, यह बिखर गया. कोविड की वजह से दादा-दादी को खोने के बाद पाल को लगा कि वे भावनात्मक रूप से तैयार नहीं हैं.

डेटिंग कोच राजा कहते हैं, ''लंबे वक्त तक घर में फंसे रहने की वजह से भी डेटिंग में पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा बदलाव आए. अपेक्षाएं बदल गईं, अपने को व्यक्त करने का तरीका भी बदल गया. ऐसे किशोर भी हैं जो गंभीर रिश्तों की तलाश में नहीं हैं, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में हैं जो उनकी निजता का सम्मान करता हो.’’

फोडा से उबरने की कुलकर्णी की कोशिशें रंग लाईं. छह महीने ऑनलाइन बातें और वीडियो डेटिंग करने के बाद उन्होंने अंतत: अपने ऑनलाइन पार्टनर से मिलने का फैसला किया. उन्हें यकीन था कि उनकी पहली मुलाकात के बाद ही यह खत्म हो जाएगा.

''पर नहीं हुआ. मुझे लगता है शायद इसलिए कि हम एक दूसरे के साथ इतने दोटूक और खुले थे कि इसमें आश्चर्य लायक कोई छिपी बात नहीं थी. चुटकी बजाते हमारा तार जुड़ गया और हमने ऑनलाइन जो नींव रखी थी उसी की बदौलत हम ऑफलाइन मिलने-जुलने पर भी आगे बढ़ते रहे. हमें जल्दी नहीं है. हम शादी या लिव-इन की बात नहीं कर रहे हैं.’’ वे फिलहाल खुश हैं और शादी की जल्दबाजी नहीं है.

सोनाली आचार्जी साथ में, संतोष राज सर्वानन, अदिति पै और शैली आनंद

''लॉकडाउन के दौरान सभी उम्र के लोगों में वर्चुअल डेटिंग खासी लोकप्रिय हुई. फोन पर नेटफ्लिक्स देखने के अलावा पार्टी ऐप और वीडियो डेट्स डेट करने के नए विकल्प बन गए’’
इलावरासन राजा, पर्सनालिटी और डेटिंग कोच

''कई अहम मुद्दों को लेकर ज्यादा बातचीत हुई है, मसलन यही कि घर के कामकाज का बंटवारा किस तरह से होना चाहिए और शादी के बाद पत्नी नौकरी करे या नहीं’’
सितारा मेनन, सीनियर मार्केटिंग मैनेजर, ओकेक्यूपिड इंडिया

''भारत में कुंवारे लोग अब डेटिंग के बारे में फैसलों को लेकर ज्यादा मुखर हो रहे हैं. भारत में टीकाकरण बढऩे के साथ वे सुरक्षा और तालमेल को अहमियत देने लगे हैं’’
समर्पिता समद्दर,संचार निदेशक, बंबल इंडिया

''हमने सीधे तीन साल आगे छलांग लगा दी है. वर्चुअल डेटिंग को लेकर जिन्हें भी झिझक थी, दूर हो गई है और उन्हें एहसास हो गया है कि नए लोगों से मिलने का यह सबसे सुरक्षित तरीका है’’
स्नेहिल खानोर, सह-संस्थापक और सीईओ, ट्रूलीमैडली.

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