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मंदिर वापसी की मुहिम

उम्मीद थी कि अयोध्या विवाद फैसले के साथ ही ऐसे माहौल का पटाक्षेप हो गया, लेकिन काशी, मथुरा और कई दूसरे मंदिर-मस्जिद विवाद से हिंदू उफान के नए दौर का आगाज.

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मंदिर-म‌स्जिद विवाद मंदिर-म‌स्जिद विवाद

सुनील मेनन

कभी एक राजा हुआ करता था, जिसकी विरासत तीन-चौथाई राजपूत और एक-चौथाई घुमंतू जातियों की थी. उसने दुनिया का सबसे खूबसूरत स्मारक बनवाया...’ हकीकत में तो सिर्फ कुछ पत्थर ही हैं. आखिर में हम इस कहानी को जैसे बयान करते हैं, वही मायने रखता है. यानी कैसे हम उन पत्थरों को देखते हैं और दिमाग में कैसा आकार बुनते हैं, और फिर उसे अपनी कल्पना में कैसी शक्ल देते हैं. पहली पंक्तियां ताज महल के बारे में उसी तरह हकीकत बयानी है, जैसे बाकियों के लिए.

शाहजहां की मां राजपूत थीं और उनके पिता आधे-राजपूत. उनके बेटे औरंगजेब की शिराओं में अपने पिता की ओर से राजपूत और मां के पक्ष से फारसी खून बह रहा था. तो, उस पुराने मध्य एशियाई चगताई मुगल खून का एक छोटा कतरा बच गया था, जिसके साथ हम उसे बड़े जुनून के साथ जोड़ देते हैं.

लगभग एक या दो सदी से हवा में तैरता एक जुमला यह है कि 'मुगल विदेशी आक्रांता थे’ और भारत की राजनैतिक और सामाजिक संरचना को निर्णायक तौर पर बदल डालना है. हकीकत तो यह है कि छह 'महान मुगलों’ में आखिरी तीन वैवाहिक मेलजोल की संतति थे, जिससे सरल-सी लगने वाली वक्रोक्ति पेचीदा हो उठती है.

इन मूल जड़ों की पड़ताल जरूरी है, क्योंकि उन्हीं में उसका राज छुपा है, जो बाकी सब कुछ घटा है. कुछ तो वाकई घट रहा है. भारतीय गणतंत्र एक अप्रत्याशित संकट में सिर के बल खड़ा है, जो समाज, राजनीति, सरकार, कानून और संविधान सबमें समाया हुआ है. अचानक आसमान से कोई स्थायी-सी सुलगती आपदा धधकने को तैयार है, मानो किसी ने गैस के चूल्हे की लौ तेज कर दी हो. यह अमूर्त दायरे में खो जाए, उससे पहले यह सड़क पर उतर आई है.

नए शानदार काशी कॉरिडोर के गेट नंबर 4 के बाहर, जो मंदिर और मस्जिद के बीच फंसा है, आप हकीकत में हवा बदलते महसूस कर सकते हैं. वहां बैरिकेड लग गए हैं. कोर्ट के नियुक्त किए कमिशनर आ-जा रहे हैं. आम तौर पर लाखों पर्यटकों को शांत भाव से हंसते-खेलते सहजता से स्वागत करने वाली काशी में ये गर्मियां कुछ ज्यादा ही तपन पैदा कर रही हैं. होटल मालिक पर्यटकों में 60 फीसद कमी की बात करते हैं.

ज्ञानवापी विवाद ने उस बर्र के छत्ते को छेड़ दिया है, जो 2019 के अयोध्या फैसले के बाद खत्म हुआ लग रहा था. यानी ऐसे भूत को बुलावा, जो लगा था कि न्यायिक उद्घोष से हमेशा के लिए शांत हो गया. वह मथुरा में शाही ईदगाह में भी जा बैठा है, जहां औरंगजेब की ओर से ढहाए जाने के साक्ष्य हैं और जो बाबरी मस्जिद के बाद के नारे 'काशी-मथुरा बाकी है’ में गूंजा था. सिर्फ ये दो ही नहीं. इतिहास के सभी असली या काल्पनिक गड़े मुर्दों को उखाड़ने का जज्बा खतरे की घंटी बजाने लगा है.

मुस्लिम साम्राज्यवादी तोड़फोड़ के ज्ञात मामलों से लेकर व्याख्याजनित विवाद तक सब कुछ जायज बना दिया गया है. मसलन, कर्नाटक के कॉफी की सुगंध वाले चिकमगलूर में बाबा बुडनगिरि का मामला. यहां तक कि प्रसिद्ध ताज महल को भी एक मंदिर के ऊपर बनाए जाने के दावे उछल रहे हैं. वेबसाइट आर्टिकल 14 में न सिर्फ ज्ञानवापी पर ''एक जैसे शब्दों वाली याचिकओं’’ की फेहरिस्त है बल्कि चार राज्यों में ''12 मस्जिदों और स्मारकों पर ऐसे ही दावों’’ की भी सूची नुमायां है. हिंदू जन-जागृति समिति नामक एक संगठन ने देश भर में 1,862 मस्जिदों की फेहरिस्त बनाई है, जहां वह हिंदू पूजा-अर्चना का दावा करता है.

स्थानीय ब्यौरों के अलावा ये सभी दावे बस एक ही बुनियाद पर हैं—एक हिंदू मंदिर तोड़ा गया, और अमूमन उस जगह पर एक मस्जिद बनाई गई. सदियों पहले—जिनमें कुछेक हैं साढ़े तीन (औरंगजेब), सात (अलाउद्दीन खिलजी), या दस सदी पहले के. महमूद गजनवी ने 1025 में सोमनाथ मंदिर गिराया, तकरीबन एक सहस्राब्दी पहले और लगभग उसी समय उसने ईरान में भी कई शहरों को तबाह किया, मगर शुद्ध रूप से घोड़े पर सवार आक्रांता ने बनाया कुछ नहीं. बाद वाले, जो यहीं बस गए और राजा बने, उनमें पहला कुतुबुद्दीन ऐबक था. उनके प्रतीकों और स्मारकों को अब लोगों में गुस्से को हवा देने का शगल बनाया जा रहा है, जो नई 'मंदिर वापसी’ मुहिम की शक्ल ले रहा है.

कानूनी स्तंभों को खुरचना

विवाद का मैदान तो इतिहास है और उसकी चिंगारी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक, मगर विवाद का मौजूदा आकाश तो कानून की अदालतें बन गई हैं. बेहद महत्वपूर्ण पुल के अस्तित्व पर ही अचानक खतरा पैदा हो गया है और वह है 1991 का पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) कानून. अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर, 2019 में पांच जजों की पीठ के सर्वसम्मत अंतिम फैसले में इस कानून का जिक्र अकाट्य संवैधानिकता की तरह लगता है.

अदालत ने कहा, यह (कानून) ''हमारे इतिहास और राष्ट्र के भविष्य की बात करता है.’’ आगे कहा गया, ''इतिहास और उसकी गलतियों को वर्तमान और भविष्य के दमन का औजार नहीं बनाया जाएगा.’’ फैसले में ''धर्मनिरपेक्षता’’ को हमारे संविधान की ऐसी बुनियाद बताया गया, जो ''प्रतिगामी कदमों के विरुद्ध’’ के सिद्धांतों से संरक्षित है. और उसमें राज्य पर धर्मनिरपेक्षता को धारण करने का ''अकाट्य दायित्व भी डाला गया.’’ सो, होना तो यह चाहिए कि अदालत का आदेश अंतिम हो.

लेकिन अब, यह कानून कुछ हिला हुआ-सा लगता है. उसे कई मोर्चों से चुनौतियां मिल रही हैं. वकील और भाजपा सदस्य अश्विनी उपाध्याय ने (निजी हैसियत से) सुप्रीम कोर्ट में याचिका में इस कानून पर हमला बोला है कि इससे धर्म के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन होता है. याचिका पर शायद जुलाई में सुनवाई हो. वे इंडिया टुडे से कहते हैं, ''15 अगस्त, 1947 की अंतिम तारीख बर्बर आक्रांताओं के गैर-कानूनी कृत्यों को कानूनी बनाता है.’’ गौरतलब यह भी है कि याचिकाकर्ता कानून कुतरने के लिए उसके प्रावधानों का ही इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं.

पूजा स्थल कानून आयोध्या आंदोलन के चरम के दौरान सांप्रदायिक तनाव को खत्म करने और उसे अपवाद बनाने के लिए लाया गया था, क्योंकि वह विवाद स्वतंत्रता के पहले ही
अदालत में था. कानून अपने शब्दों, उद्देश्य और शर्तों में एकदम साफ है. उसकी अहम धारा 3 के मुताबिक, किसी भी धार्मिक आस्था का कोई भी पूजा स्थल किसी दूसरे या दूसरे संप्रदाय में भी नहीं ''बदला’’ जाना चाहिए.

धारा 4 (1) के मुताबिक, 15 अगस्त, 1947 को स्थित ऐसे सभी स्थलों का 'धार्मिक चरित्र’ कायम रहेगा. धारा 4 (2) के मुताबिक, बदलाव चाहने वाली हर अपील या सूट ''रद्द’’ हो जाएगी. ये दो धाराएं एकतरफा बंदिश लगाती हैं, लेकिन धारा 4 (3) (ए) एक अपवाद की इजाजत देती है और वे हैं प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और खंडहर (एएमएएसआर) कानून, 1958 के तहत आने वाले धरोहर स्थल.

ज्ञानवापी पर कई विरोधाभासी अदालती आदेश पूजा स्थलों को प्राप्त संविधान की लौह-सुरक्षा को अब कैसे खुरच रहे हैं, वह गौरतलब है और साथ में बर्र के छत्ते को छेड़ रहे हैं जो अनेक संभावित याचिकाकर्ताओं को शह दे रहा है. ज्ञानवापी सूट पहली दफा 1991 में दाखिल किया गया. याचिकाकर्ताओं ने उसकी मिल्कियत पर एकतरफा दावा किया और मांग की कि मध्ययुगीन मंदिर को बहाल किया जाए, जहां अब मस्जिद खड़ी है.

औरंगजेब की लगभग समकालीन जीवनी मासिर-ए-आलमगीरी में दर्ज है कि एक मंदिर वाकई 1669 में मुगल शासक के आदेश पर ढहाया गया था. साहित्य में यह संकेत है कि इस स्थान को आदि विश्वेश्वर मंदिर कहा जाता था. मस्जिद में भी मंदिर की वास्तुकला के कई चिन्ह दिखते हैं, जो हिंदुत्व की दलील का अयोध्या से भी ज्यादा पुख्ता मामला बनता है. लेकिन कानून उस पर हावी हो गया.

अक्तूबर, 1997 में एक दीवानी अदालत ने मूल सूट को खारिज कर दिया. 1998 में पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई कर रही जिला अदालत ने फैसला सुनाया कि दीवानी अदालत ''संबंधित पक्षों के साक्ष्यों पर गौर करके’’ नए सिरे से सुनवाई करे. अंजुमन इंतजामिया मस्जिद ने उसे इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनौती दी, जिसने सुनवाई पर रोक लगा दी और सूट दफन हो गया.

यह मामला दिसंबर, 2019 में ज्ञानवापी परिसर की ''व्यापक’’ पुरातात्विक जांच संबंधी याचिका के साथ फिर जी उठा. 8 अप्रैल, 2021 को सिविल जज (सीनियर डिविजन) आशुतोष तिवारी सहमत हो गए और एएसआइ (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को सर्वे करने का आदेश दिया. हालांकि 9 सितंबर को हाइकोर्ट ने सर्वे पर रोक लगा दी. इन गर्मियों में कई सूट, अपील और चुनौतियों के साथ मामले में नया आयाम जुड़ गया.

18 अप्रैल को महिला याचिकाकर्ताओं ने वाराणसी की एक दूसरी अदालत में याचिका दायर की. उसमें उनके दावे के मुताबिक, मस्जिद परिसर में स्थित मां शृंगार गौरी और ''गणेश, हुनमान और नंदी की मूर्तियों’’ की पूजा करने की इजाजत मांगी गई. अदालत ने आदेश दे दिया कि परिसर के सर्वे के लिए एक एडवोकेट कमिशनर की नियुक्ति की जाए, और अगले दिन निर्देश दिया कि जांच की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए.

न्यायपालिका के पूरे तंत्र ने—एक स्थानीय अदालत, हाइकोर्ट (जिसने 12 मई को ताज महल के तहखाने की जांच की याचिका रद्द की), और सुप्रीम कोर्ट—सर्वे पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. सर्वे 14-16 मई को किया गया. मीडिया लीक और ऐसी खबरें आईं कि सर्वे करने वालों को वुजूखाने में 'शिवलिंग’ मिला, जिसे मुस्लिम पक्ष ने पुराना टूटा-फूटा फौवारा बताया. फिर, स्थानीय अदालत ने इलाके को सील करने का आदेश सुना दिया. 16 मई को आखिरकार मस्जिद समिति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि मस्जिद की वीडियोग्राफी पूजा स्थल कानून की 'खुलमखुल्ला अवहेलना’ है.

इस मौके पर न्यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ की अगुआई में तीन जजों की पीठ ने एक तर्क के साथ अहम गुंजाइश पैदा की. अदालत ने कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों को ''जानने’’ में कोई बुराई नहीं है क्योंकि 1991 का कानून इसकी खुलकर मनाही नहीं करता. अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि ''शिवलिंग’’ के इलाके को सुरक्षित करें, मुसलमानों को नमाज की इजाजत दें. अदालत ने यह भी कहा कि मामला अधिक ''अनुभवी’’ जिला अदालत को सौंप दिया जाना चाहिए.

भानुमती की पिटारा

कई कानूनी विशेषज्ञ सुप्रीम कोर्ट के नजरिए से मायूस हैं. सुप्रीम कोर्ट के वकील शादान फरासत कहते हैं, ''पूजा स्थल कानून ठीक ऐसे ही विवादों को उभरने से रोकने के लिए लाया गया था, यह अच्छी तरह जानते हुए कि ऐसे विवादों के उभरने और नुक्सान पहुंचाने की पूरी संभावना है. इसके उद्देश्य में ही यह बात साफ लिख दी गई थी. स्थल की प्रथम दृष्ट्या जांच होने देना, और वह भी इस कदर कलह के माहौल में, इस कानून के उद्देश्य को ही नाकाम कर देता है. फिर इसमें बचेगा ही क्या?’’

वे यह भी कहते हैं कि अब तो किसी भी किस्म का मामला फिर से खोला जा सकता है, यहां तक कि वे स्थल भी जहां, फर्ज कीजिए, एक हिंदू पंथ या प्रभु दूसरे के मंदिर में घुस गया है, और पूरे नक्शे पर ऐसे मामलों का जलजला आ जाएगा.

इस मामले ने पूजा स्थल कानून और 15 अगस्त, 1947 की यथास्थिति बनाए रखने के फरमान की बारीक जांच-पड़ताल के लिए उकसाया है. उपाध्याय की तरफ से दी गई सीधी चुनौती के अलावा हिंदुत्व के वकीलों ने उन चीजों पर नजरें गड़ा दी हैं जिन्हें वे इसकी धाराओं में कमियों या खामियों की तरह देखते हैं. एक तो उनका कहना है कि नष्ट किए गए किसी भी मंदिर के अवशेष को—मसलन, ज्ञानवापी के तथाकथित शिवलिंग को—पुरातात्विक निशानी माना जाएगा.

दूसरे, ऐसे अवशेष अगर प्रामाणिक साबित हो जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से 1947 से पहले के ही होंगे और इसलिए ''यथास्थिति’’ का हिस्सा बन जाएंगे. तीसरा, अंग्रेजों के औपनिवेशिक काल से आई भारतीय कानून की एक विसंगति का (क्रूसेड या ईसाइयों के धर्मयुद्ध तक जाने वाली यूरोप की मध्यकालीन नजीरों के साथ) पुरजोर इस्तेमाल करता है>

देवता या ईश्वर के अधिकार-संपन्न ''न्यायिक व्यक्ति’’ होने का विचार, यानी कोई अमूर्त हस्ती जो ''नजदीकी दोस्तों’’ के जरिए मुकदमा दायर कर सकती है. उनका यह भी कहना है कि स्थल पर आदि विश्वेश्वर देवता का मालिकाना हक केवल इसलिए खत्म नहीं माना जा सकता क्योंकि मंदिर के भवन को तोड़ दिया गया है.

अगर इन दलीलों को स्वीकार कर भी लिया जाए, तो वे यह मानकर चलती हैं कि एक धर्म के उपासना स्थल को उखाड़कर दूसरे धर्म का उपासना स्थल बनाया गया है—कुछ मामलों में तो यह काफी साफ है, पर अनगिनत दूसरे मामलों में नहीं है. लखनऊ के वकील हरिशंकर जैन, जिनकी याचिका पर अयोध्या स्थल के दरवाजे पूजा-उपासना के लिए खोले गए थे, कहते हैं कि यह तो अंधेरे पक्षों पर रोशनी डालने की और भी ज्यादा वजह है.

उनका कहना है कि ज्ञानवापी न तो मालिकाना हक का मुकदमा है और न स्थल का धार्मिक स्वरूप बदलने की गुजारिश. वे कहते हैं, ''हम बस इतना चाहते हैं कि इसके धार्मिक चरित्र की पहचान की जाए. अनुच्छेद 25 के तहत कोई भी कानून किसी का भी पूजा-उपासना का बुनियादी अधिकार नहीं छीन सकता.’’ जैन पिता-पुत्र काशी और मथुरा से लेकर ताज महल तक पिछले तीन दशकों से जिन छह मामलों के पीछे लगे हैं, उन्होंने बीते कुछ हफ्तों में प्रतिक्रिया उकसाने के लिए जरूरी न्यूनतम ताकत हासिल कर ली है.

और राजनीति को तपते-लाल कड़ाहे में डाल दिया है. नक्शे के दूसरे छोर पर एआइएमआइएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) के मुखिया असदुद्दीन ओवौसी ने कहा कि ज्ञानवापी ''कयामत’’ तक कायम रहेगी. भाजपा के एक नेता ने तंज कसते हुए उनसे कहा कि ''इतिहास दोबारा पढ़ें...’’

लेकिन जहां इतिहास में अतिक्रमण वाकई हुए भी हैं, क्या उन सारे ढक्कनों को खोलना चाहिए? पूजा स्थल कानून ठीक यही तो नहीं करने के लिए कहता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2019 में कहा कि इतिहास के सारे गिले-शिकवों का ''जवाब कानून नहीं है.’’ ज्यादातर विशेषज्ञों को लगता है कि अदालतों में गिचपिच मचा रही अस्पष्ट याचिकाएं इस कानून के तहत गैर-कानूनी हैं.

सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील संजय हेगड़े का कहना है कि ज्ञानवापी के मुकदमे को शुरुआत में ही खारिज कर देना चाहिए था. तिस पर भी कई अदालतों ने अक्सर इसकी खामियों के आगे घुटने टेकते हुए ऐसी याचिकाएं स्वीकार कर लीं. खंड 4(3)(ए) से इसमें मदद मिलती है क्योंकि 100 साल से ज्यादा पुराना कोई भी ढांचा 'प्राचीन स्मारक’ की परिभाषा पर खरा उतरता है. एनएएलएसएआर या नलसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वाइस-चांसलर प्रोफेसर फैजान मुस्तफा बताते हैं, ''इससे तो कितनी भी पुरानी इमारतों को पूजा स्थल कानून के दायरे से बाहर ले जाया जा सकता है.’’

ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि 4(3)(ए) की ऐसी शाब्दिक व्याख्या इस कानून के अभीष्ट अर्थ के खिलाफ जाती है. फरासत कहते हैं, ''धारा 3 पूर्ण पाबंदी लगाती है... उपासना स्थल ए को बदलकर कोई उपासना स्थल बी नहीं बनेगा. 4(1) स्थल के 'धार्मिक चरित्र’ की रक्षा करती है, इसलिए आप इसे 'अधार्मिक’ स्थल में भी नहीं बदल सकते. 4(3)(ए) इसे धरोहर स्मारक के योग्य ठहराती है; मसलन, फर्ज कीजिए, एक पुरानी मस्जिद जहां लोगों के आने से ढांचा खतरे में पड़ जाता है.

बिल्कुल साफ है कि 4(3)(ए) खंड धारा 3 के तहत संपूर्ण पाबंदी से ऊपर नहीं हो सकता.’’ सुप्रीम कोर्ट के वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी को भी लगता है कि पुरातात्विक दलील टिकने योग्य नहीं है, क्योंकि एएमएसएआर कानून धरोहर स्थलों के धार्मिक इस्तेमाल की इजाजत नहीं देता. इलाहाबाद हाइकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर का कहना है कि पूजा स्थल कानून के उद्देश्य को प्रमुखता दी जानी चाहिए. वे कहते हैं, ''इसके उद्देश्य—कि बाबरी मस्जिद हथियाने (जैसे कृत्यों) को दोहराने न दिया जाए—को ध्यान में रखना चाहिए.’’

उधर, सुप्रीम कोर्ट के वकील अरुणेश्वर गुप्ता को लगता है कि अभी पूजा स्थल कानून और यहां तक कि एएमएएसएआर कानून को भी रद्द करने की मांग करने वाली और याचिकाएं आएंगी. मगर फिलहाल ध्यान कहीं ज्यादा नफीस चाल पर है: न्यायिक प्रणाली मौजूदा कानून के भीतर काम करते हुए उसे दरकिनार कैसे कर पाती है. फरासत कहते हैं कि पुरातात्विक जांच-पड़ताल होने देना उस जनभावना को भड़काने का ही काम कर सकता है जिसे ऌपूजा स्थल कानून के दायरे में संतुष्ट नहीं किया जा सकता. 

असहज सचाइयां

तमाम रंग-रूप के इतिहासकार इस नग्न सचाई को स्वीकार करते हैं कि सारे संदर्भों को हटा भी दें तो मंदिरों में की गई तोड़-फोड़ हकीकत है, चाहे वह गुलाम वंश के दौरान मुसलमानों की तरफ से की गई अंधाधुंध लूटपाट हो या मध्यकालीन राजनीति का आम ढर्रा हो जो किसी भी तरह मुसलमानों तक सीमित नहीं था. हिंदुत्व के कई पैरोकार इस तथ्य को अनदेखा करना पसंद करते हैं.

12वीं सदी के मशहूर संस्कृत ग्रंथ राजतरंगिणी में कल्हण लिखते हैं कि 9वीं सदी में कश्मीर के राजा शंकरवर्मन को उनके कायस्थ प्रशासकों ने सलाह दी कि ''इस सरजमीन से और ज्यादा धन-दौलत ऐंठने के लिए मंदिरों को लूटो और अपनी प्रजा का दमन करो.’’ दो सदी बाद राजा हर्ष के बारे में वे लिखते हैं, ''उसे अपनी सेना की विभिन्न पलटनों पर भारी फिजूलखर्ची की लत थी, इसलिए उसके विचार... उस वक्त पूरी तरह मंदिरों की लूट पर केंद्रित हो गए.

फिर उस लालची (राजा) ने वे सारे अद्भुत खजाने लूट लिए जो पूर्व राजाओं ने उन पर न्योछावर किए थे. जब खजाने लूट लिए गए, तो देवताओं की मूर्तियों पर कब्जा करने की खातिर उसने 'दैवीय प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकने के लिए राज्याधिकारी (देवोत्पतननायक)’ के तौर पर उदयराज को नियुक्ति किया.’’ पूरे नक्शे पर ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जिनमें मराठा पिंडारी भी हैं जिन्होंने 1791 में शृंगेरी मठ को लूटा था.

उपमहाद्वीप से बौद्ध धर्म का उन्मूलन भी, जो एक सुस्पष्ट कड़वी सचाई है, संभवत: महज दार्शनिक तर्क-वितर्क की फतह नहीं था. अहिंसक तरीके से हुआ हो या हिंसक तरीके से, प्राचीन तक्षशिला से लेकर मध्ययुगीन केरल तक मंदिर परिवर्तन की तर्कसंगत अटकलें लगाई जाती रही हैं. मगर जो लोग उस 'हिंदू मानस’ की तरफ से बोलते हैं जिसमें केवल दो सदियों की औपनिवेशिकता से प्रेरित पांडित्य के हाथों ठूंसी गई रूढ़िबद्ध धारणाएं या घिसी-पिटी बातें भरी हैं, वे केवल और केवल उन्हीं ''सभ्यतागत चोटों’’ की बात करते हैं जो इस्लामिक मुठभेड़ों से लगी थीं. 

ज्ञानवापी इस बात के अध्ययन का भी शास्त्रीय उदाहरण है कि किसी विवाद को उसके पूरे ऐतिहासिक संदर्भ में रख पाना कितना मुश्किल है. यहां आस्था का एक मूल पहलू यह है कि यह ठीक वही स्थल है जहां शिव स्वयंभू ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे. यह शाश्वत मंदिर के विचार को आदिकालीन, अपरिवर्ती, चिरकालिक काशी के विचार से जोड़ता है, जिसे अयोध्या के संदर्भ में समाजशास्त्री दीपक मेहता ने ''वास्तुशिल्पीय स्थल को पौराणिक काल से जोड़ने की कड़ी’’ कहा था.

इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि ऐबक ने 1194 में जो मंदिर तोड़ा, वह ठीक उसी जगह स्थित था. यह इस अफसाने या नैरेटिव का शुरुआती बिंदु है कि एक पवित्र स्थल तोड़-फोड़ के सिलसिले के बाद भी अमिट रहा और कई पुनर्निर्माणों से गुजरा. डायना ऐक और माधुरी देसाई सरीखे अध्येताओं की शृंखला ने उत्तरोत्तर जो ऐतिहासिक कड़ियां खोजी, मिलाई और उजागर की हैं और जिसमें कई बिंदुओं पर असहमतियां भी स्वीकार की गईं, वे शिव की रौशनी से उतनी दैदीप्यमान नहीं हैं, जितनी लोकप्रिय गाथा है.

फिल्मकार और लेखिका नीलोश्री बिस्वास, जिन्होंने बनारस: ऑफ गॉड्स, ह्यूमंस ऐंड स्टोरीज (2021) किताब लिखी, कहती हैं, ''किसी भी दूसरे शहर की तरह काशी भी हमेशा विकसित होती, बदलती और गंगा की बदलती राह के साथ आगे बढ़ती रही है. आज के बनारस की सटीक स्थिति, घाटों के मौजूदा भूदृश्य, जिन्हें डेनियल्स सरीखे कंपनी कलाकारों की प्राच्य कलाकृतियों ने हमारे मन में बसाया है, अपेक्षाकृत नए हैं.

इन्हें अकबर के वक्त के दौरान 16वीं सदी में ही प्रसिद्धि मिली.’’ देसाई, जिनकी प्रामाणिक किताब बनारस रिकंस्ट्रक्टेड: आर्किटेक्चर ऐंड सैक्रेड स्पेस इन ए हिंदू होली सिटी (2017) ठोस प्रमाणों और मध्यकालीन ग्रंथों के स्रोतों के व्यापक अनुसंधान पर आधारित थी, ''हिंदू तीर्थयात्रा के जीर्णोद्धारित स्थलों और मुगल शहरीयत... और सार्वदेशिकता के बीच जटिल रिश्ते’’ की बात करती हैं.

अन्य अध्येता 'पैक्स मुगलाना’ की उस शताब्दी की बात करते हैं जिसने हैरतअंगेज जोशो-खरोश से भरे बौद्धिक छानबीन के युग की शुरुआत की और जिसमें काशी, संस्कृत पांडित्य के प्रति अपने सक्वमान के साथ, ज्ञान के चहचहाते पारदेशीय नेटवर्क का केंद्रबिंदु बन गई. इस शहर की सच्ची रचनात्मक शक्ति के रूप में मुगल विध्वंसक शैतान के रूपक को प्रतिसंतुलित कर रहे थे. अकबर तो निश्चित रूप से कर रहे थे.

यहां तक कि औरंगजेब ने भी विश्वेश्वर मंदिर को नेस्तोनाबूद करने से पहले काशी के तमाम मंदिरों और उसके ब्राह्मणों की रक्षा के फरमान जारी किए थे, मंदिरों को जमीनें दान दी थीं और जंगम शैव पंथ को कई अधिकार दिए थे. इसे विरोधाभास कहिए.

बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते. इतना हम जरूर जानते हैं, जैसा कि बिस्वास कहती हैं, कि पुरानी काशी ''नदी के बहाव से आगे, मालवीय पुल से पार’’ बसी थी—अब यह एएसआइ द्वारा संरक्षित विशाल इलाका है. तो इतिहास फिर किसके कंधों पर घूमता है? बिस्वास कहती हैं, ''कहानी के मुख्य व्यक्तित्व नारायण भट्ट हैं, जो नागपुर के मराठी ब्राह्मण थे और अकबर के जमाने में काशी आए थे.

उन दिनों हर कोई काशी में होना चाहता था. यह पूरब का न्यूयॉर्क और हार्वर्ड था.’’ भट्ट, जो शहर को नए सिरे से गढ़ रहे ब्राह्मण सक्रियतावाद के अग्रणी व्यक्तित्व थे, अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहते थे. ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका आज की तरह उस वक्त भी मंदिर का निर्माण करना था. उन्होंने नए स्थल के चयन के लिए पुराणों और दूसरे ग्रंथों का अध्ययन किया, नया पवित्र भूगोल तराशा. उन्होंने अकबर के दरबार के बड़े नामों—मान सिंह और टोडर मल—का दरवाजा खटखटाया.

1580 में एक नए मंदिर का निर्माण हुआ, जो अकबर के संघीय दरबार के रुपए-पैसों से बना था—औरंगजेब ने जब इसे बढ़ती मराठा ताकत के साथ स्थानीय जमींदारियों के मेल-जोल से नाराज होकर नेस्तोनाबूद किया, यह उतना पुराना भी नहीं था, जितना आज कनॉट प्लेस है. बिस्वास कहती हैं, ''यहां तक कि आधुनिक शवदाह घाट मणिकर्णिका भट्ट का इंद्रजाल था.’’ तो, उस शाश्वतता का एक टुकड़ा 16वीं सदी में जन्मा था.

खुलती रणनीति

इस बीच वर्तमान उस कैनवस पर खुल रहा है जो हिंदू पुनरोत्थानवाद के जज्बे से बजबजा रहा है. विचारधारा के मूल देवपुरुष आरएसएस और भाजपा हालांकि वापस कुछ दुबक-से गए हैं—कुछ तो इसलिए कि वे पसोपेश में हैं और कुछ इसलिए कि बीच की रणनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. उन्हें अपने हिंदुत्व के मूल समर्थकों को गर्व और उल्लास की स्थिति में बनाए रखने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, साथ ही कोई सरकार चीजों को बेकाबू होने देना नहीं चाहती.

तौर-तरीकों पर अब सचमुच एक नफीस मुलम्मा चढ़ाया गया है, जो बाबरी विध्वंस से पहले के उन दिनों से साफ तौर पर अलहदा है जब भाजपा के दिग्गज फील्ड मार्शलों की तरह मोर्चे पर अगुआई कर रहे थे. हिंदुत्व के रंगों को कुछ हल्का और कुछ गाढ़ा करके काम बांटने में मदद मिलती है. पार्टी के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने इस हफ्ते कहा कि ज्ञानवापी सरीखे मुद्दे ''अदालत और संविधान से तय होते हैं; भाजपा उन्हें अक्षरश: लागू करती है.’’

शीर्ष नेतृत्व ने निर्देश दिए हैं कि पार्टी केवल काशी और मथुरा के बारे में बोले, ज्यादा मामलों पर लफ्फाजी करके चीजों को हल्का न करे. आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इंडिया टुडे से कहा, ''हमें सत्य को बाहर आने देना चाहिए. समय आ गया है कि हम ऐतिहासिक तथ्य सही नजरिए के साथ समाज के सामने रखें.’’

शतरंज की बिसात पर रणनीतिक विकल्पों की फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती. अदालत और संविधान का हवाला देकर भाजपा ने पूजा स्थल कानून में संशोधन का दरवाजा अधखुला छोड़ दिया है, उस स्थिति के लिए जब उसे लगे कि कानूनी लड़ाई उसके मनचाहे रास्ते पर नहीं जा रही है. अब जब 2024 के आम चुनाव बहुत दूर नहीं रह गए हैं, मंदिर वापसी के खदबदाते आंदोलन में उबाल लाना और ठप होती अर्थव्यवस्था से उपजी बेरोजगारी और महंगाई को लेकर किसी भी असंतोष को ठंडा करना काफी आसान हो जाएगा.

ज्ञानवापी में मिले अवशेष की ऐतिहासिकता सिद्ध करना तो खैर मामूली बात है—जो अभी तक एक वीडियोग्राफिक सबूत का टुकड़ा भर है, जिसे अदालत में दिखाने या विशेषज्ञों से प्रामाणिकता की तस्दीक करवाने से पहले मीडिया में लीक किया गया. यह वाकई ऐतिहासिक धार्मिक अवशेष है या वास्तुशिल्पीय पुर्जा भर?

तथ्य भी पवित्र हैं. अलबत्ता यह नया पुनरोत्थानवाद आस्था को सबसे ऊपर रखने की बात करता है. अंतर्मन की ओर जाने वाली आस्था नहीं: यह शत्रु की पहचान करने और जिन्हें वह 'दमनकारी मुस्लिम अत्याचारी’ मानता है, उनके तमाम अवशेषों का सफाया कर देने पर ध्यान देता है. ये अवशेष उसे हर कहीं दिख जाते हैं: शहंशाह के स्मारक से लेकर गंदी-गरीब झोंपड़ी तक.

मनोचिकित्सक इसे स्केपगोट मैकेनिज्म या बलि के बकरे का तंत्रविज्ञान कहते हैं—यानी रक्षात्मक आक्रामकता, जिसमें आप जिंदगी के संकटों का जवाब ''मनमाने ढंग से चुने गए समूहों या व्यक्तियों को स्वत:स्फूर्त ढंग से दोषी ठहराकर’’ देते हैं—जो इस मिथ्या भ्रम से फला-फूला है कि हिंदू इतिहास के मासूम शिकार हैं.

फिलहाल तो स्वतंत्र जुनूनी जत्थों ने सवालिया निशानों का जो परदा लटकाया है, उससे हवा में अंधेरा गहरा हो रहा है और इसकी कालिख मानवता के हाथों निर्मित धरोहरों और खूबसूरती के इतिहास में भारत के बेशकीमती योगदान के बीच कुतुब मीनार और ताज महल पर भी गिर रही है. इस तस्वीर में एक और भव्य ढांचा है हमारा संविधान, जो किसी स्मारक से कम नहीं.
—साथ में, कौशिक डेका और अनिलेश एस. महाजन.

असदउद्दीन ओवैसी 
सांसद और अध्यक्ष, एआइएमआइएम
''1991 का कानून स्थापित है मगर निचली अदालतें ऐसी अपीलें मंजूर कर रही हैं जबकि उन्हें नहीं करना चाहिए था... अगर ज्ञानवापी, मथुरा और दूसरे मुद्दों को आगे बढ़ने दिया गया तो नौजवान मुसलमानों का संवैधानिक प्रक्रिया से हमेशा के लिए मोहभंग हो जाएगा’’

''जो कुछ भी हो रहा है, संघ परिवार और सरकार के समर्थन से हो रहा है. यह कैसे हुआ कि एक सर्वे कमिशनर की रिपोर्ट बिना मुस्लिम पक्ष को सुने एक जज को पेश कर दी गई? या वह रिपोर्ट मीडिया में लीक कर दी गई? यह इसलिए किया गया, ताकि बताया जा सके कि यह मस्जिद नहीं है’’

''जहां तक मथुरा ईदगाह का सवाल है तो 54 साल पहले हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच एक लिखित समझौता हुआ था. अब आप कहते हैं कि वह बेमानी है और उन हिंदुओं का समझौता करने की कोई हैसियत ही नहीं थी. यह कैसे संभव है? अब, ख्वाजा अजमेरी की दरगाह पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं’’

—जैसा कि अमरनाथ के. मेनन को बताया

हरिशंकर जैन
ज्ञानवापी याचिकाकर्ताओं के वकील

मुहिम की मौजूदा स्थिति पर
''2013 के लक्ष्मण टीला (टीलेवाली मस्जिद) मुकदमे की सुनवाई जारी है. 2015 में मैंने एक मुकदमा दायर किया कि ताज महल तेजो महालय था, और 2021 में काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी परिसर में स्थित मां शृंगार गौरी के नाम एक मुकदमा दाखिल की. कुतुब मीनार में कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद के खिलाफ मुकदमा 2020 का है. धार में भोजशाला स्मारक के खिलाफ भी मुकदमा है’’

मंदिर वापसी मुहिम का मकसद
''हमारा उद्देश्य अतीत में तोड़े गए मंदिरों को वापस पाना है. मैंने बचपन में ही शपथ ली थी कि मंदिरों को वापस लेना है. मैं जब 12 साल का था तो मेरी मां ने आक्रांताओं के उत्पीड़न की कहानी सुनाई थी. उन्होंने मुझे प्रेरणा दी कि इतिहास के अत्याचारों का विरोध करूं’’

अब क्या है रणनीति
''हम कानूनी तरीके से जांच पूरी होने के बाद एक मुकदमा दाखिल करेंगे. वक्फ कानून हिंदू विरोधी है इसलिए उसे भी बदलने की मांग करेंगे. जो भी हिंदू विरोधी बचे हुए हैं, उन्हें खत्म करने के लिए हम संसद और न्यायालयों के समक्ष दलील रखते रहेंगे’’

—जैसा कि मनीष दीक्षित को बताया

न्यायमूर्ति गोविंद माथुर 
पूर्व मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद हाइकोर्ट
''बाबरी मस्जिद पर दावा एक आंदोलन के जरिए किया गया लेकिन आदालती आदेश से उसे राम जन्मभूमि घोषित किया गया. अब ज्ञानवापी और मथुरा मस्जिदों पर दावा कुछ व्यक्ति कानूनी लड़ाई के जरिए कर रहे हैं. यह सांप्रदायिक माहौल पैदा करने के लिए अदालतों का इस्तेमाल करने की नई रणनीति है. अदालतों को इस पर रोक लगानी है’’

''पूजा स्थल कानून, 1991 के आलोक में, वाराणसी में मामले की सुनवाई कर रही अदालत विवाद पर विचार करने के अपने क्षेत्राधिकार की जांच किए बगैर मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश नहीं दे सकती थी... इस मायने में सर्वे करने का दिया गया आदेश सरासर गैर-कानूनी है’’

''अदालातों को हमारी संवैधानिक योजना, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणतंत्र के नाते भारत के ऐतिहासिक संदर्भों और 1991 के कानून के उद्देश्यों पर जरूर गौर करना चाहिए. वरना, इतिहास न्यायपालिका को भी नहीं बख्शेगा कि जब देश को सबसे ज्यादा जरूरत थी तो उसने अपना संवैधानिक और वैधानिक दायित्व नहीं निभाया’’

—जैसा कि कौशिक डेका को बताया

रिचर्ड एटन 
इतिहासकार, इंडिया इन द पर्सिएनेट एज: 
1000-1765 के लेखक
हिंदू धर्म और इस्लाम के साझा इतिहास पर
''यह ब्रिटिश उपनिवेश के हित में था कि अपनी स्थानीय प्रजा को धर्म के आधार 'स्वाभाविक’ रूप से बंटा दिखाया जाए. एकरूप और अपनी पहचान के प्रति सचेत हिंदू और मुसलमान समुदायों के बीच 'हमेशा’ टकराव का रिश्ता होने की अवधारणा का खंडन 12वीं सदी में उत्तर भारत पर तुर्की विजय के साक्ष्यों से ही होती है. संस्कृत के अभिलेखों में खैबर के पार वालों का जिक्र उनकी भाषाई पहचान (यानी 'तुरुश्का’) से है, न कि मुसलमान होने के नाते. इससे पता चलता है कि उन्हें पहले के भारतीय राजवंशों से अलग किसी सभ्यतागत खतरे की तरह नहीं देखा गया’’

विश्वेश्वर मंदिर ढ़हाए जाने पर
''अकबर के सिपहसालार राजा मान सिंह द्वारा बनवाया गया विश्वेश्वर मंदिर को औरंगजेब के दौर में राजा के वारिसों का संरक्षण प्राप्त था, जिनमें कम से कम एक पर शंका थी कि उसने शिवाजी को कैद से भागने में मदद की थी. 1669 की शुरुआत में बादशाह ने फरमान जारी किया कि तीन मुगल शहरों में मंदिर तोड़े जाने हैं क्योंकि यह खबर मिल रही थी कि वहां ब्राह्मण 'स्थापित स्कूलों’ में हिंदू और मुसलमान दोनों को पथभ्रष्ट शिक्षा दे रहे हैं. इन शहरों में वाराणसी को विशेष चिंता वाला बताया गया’’.

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