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क्या यूपी जीत पाएंगे मोदी के हनुमान?

सपा की नजर में वे दंगों की वजह हैं, तो बीजेपी के लिए तारणहार हैं. नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति वे ही हैं. आखिर बीजेपी महासचिव अमित शाह की क्या है रणनीति ? मोदी चाहते हैं कि शाह उत्तर प्रदेश जीतें तो, पर दीनदयाल उपाध्याय के समावेशी राष्ट्रवाद के सहारे. मतलब यह कि उन्हें उदार मुसलमानों को रिझाते हुए बीजेपी के मूल हिंदू वोट बैंक को साथ टिकाए रखना है.

अहमदाबाद के नरनपुरा इलाके में अमित शाह के भव्य मकान में बने उनके दफ्तर की दीवार पर टंगी दो तस्वीरें उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा और हिंदू राष्ट्रवादी होने का सबूत देती हैं. ये तस्वीरें हैं आदि शंकराचार्य और चाणक्य की—एक हिंदू संस्कृति का प्रतीक और दूसरा कूटनीति का उस्ताद. पचास बरस के शाह याद करते हैं कि करीब 100 साल पहले श्री अरविंद जब बड़ौदा के राजा सयाजीराव गायकवाड़ के यहां अपनी सेवाएं देते थे, तो वे एक बार अहमदाबाद के मनसा में उनके दादा की हवेली पर आए थे और एक कागज छोड़ गए थे, जिस पर एक आदर्श राजा के कर्तव्य दर्ज थे.

राज्य और सियासी कूटनीति के बारे में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव की समझ दूसरों से अलग है. राजनीति को वे सामान्य नजरों से नहीं देखते. इसी समझ ने उन्हें आज उस जगह पर ला बैठाया है, जहां नरेंद्र मोदी के दिमाग की चाबी अब उनके हाथ में है. और अब तक का सबसे मुश्किल काम उनके सुपुर्द कर दिया गया है—अस्थिर सियासी माहौल वाले उत्तर प्रदेश में 2014 के चुनावों में अपने आका को जीत का तोहफा देना.

2002 से 2010 तक गुजरात के गृह राज्यमंत्री रहे शाह 2005 के सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी रहे हैं और साबरमती जेल में तीन महीने की सजा काट चुके हैं. बीजेपी का आरोप है कि मोदी और शाह को फंसाने के लिए कांग्रेस ने फर्जी मुठभेड़ वाले मामलों में सीबीआइ का दुरुपयोग किया है. कहा जा रहा है कि इशरत जहां की हत्या के मामले में उन्हें पूछताछ के लिए सीबीआइ तलब करेगी. पर शाह परेशान नहीं दिखते. बीजेपी के दिल्ली स्थित मुख्यालय में उनका कमरा पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के ठीक बगल में है, जहां आजकल उत्तर प्रदेश से आने वाले टिकटार्थियों की कतार लगी हुई है. वे किसी को हां कहें या ना, उसकी वजह जरूर बताते हैं.

शाह जमीनी राजनीति करते रहे हैं. उनके दरबार में दबंग और पुराने नेताओं की बजाए मामूली और जमीनी कार्यकर्ताओं को ज्यादा तवज्जो मिलती है. उत्तर प्रदेश बीजेपी के महासचिव स्वतंत्रदेव सिंह कहते हैं, “सिर्फ चार महीने में उन्हें राज्य की राजनीति दूसरों से कहीं ज्यादा समझ में आने लगी है. प्रदेश इकाई में गड़बडिय़ों को उन्होंने पहले ही पहचान लिया है.” आज वे राज्य में मोदी की रैलियों की योजना बना रहे हैं. प्रदेश का प्रभार 19 मई को लेने के बाद से वे करीब 50 दिन के अंदर खुद 80 में से 40 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं.

कारोबारी खानदान से ताल्लुक रखने वाले शाह की मोदी से पहली बार मुलाकात 1980 में संघ की एक शाखा में हुई थी. दोनों में करीबी हालांकि 1987 में बीजेपी में एक साथ आने के बाद ही बढ़ी. पार्टी में दोनो की पहचान हटकर सोचने वालों के बतौर है. इसके चलते आरएसएस के आम कार्यकर्ताओं से दोनों की अलग पहचान बनने लगी. शाह  ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए अहमदाबाद आए थे लेकिन यहीं पीवीसी पाइपों का कारोबार करने के लिए रुक गए. बाद में वे शेयरों के कारोबार में लग गए, जो वे आज तक कर रहे हैं. उनकी पत्नी 47 वर्षीया सोनल गृहिणी हैं और लड़का 25 वर्षीय जय इंजीनियर है. शाह को शुरू में मोदी की इस जिद ने प्रभावित किया कि बीजेपी को सभी सक्रिय सदस्यों को सूचीबद्ध करना चाहिए और फर्जी सदस्यों को निकाल बाहर करना चाहिए. तभी से गुजरात में यही बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत रही है. दोनों ने ही संघ के तत्कालीन नेता लक्ष्मणदास ईनामदार के चरणों में राजनैतिक दीक्षा ली. उन्हें मोदी का गुरु माना जाता है. शाह बताते हैं, “पार्टी की नींव को मजबूत करने के नरेंद्रभाई के प्रयास ने मुझे बेहद प्रभावित किया.” मोदी 2002 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही अपनी सियासी रणनीतियों के लिए शाह के ऊपर निर्भर रहे हैं.

हालांकि शाह को अब जो जिम्मेदारी मिली है, वह इतनी आसान नहीं. मोदी चाहते हैं कि शाह उत्तर प्रदेश जीतें तो, पर दीनदयाल उपाध्याय के समावेशी राष्ट्रवाद के सहारे. मतलब यह कि उन्हें उदार मुसलमानों को रिझाते हुए बीजेपी के मूल हिंदू वोट बैंक को साथ टिकाए रखना है. इसका एक अर्थ हुआ कि मुजफ्फरनगर दंगों पर विश्व हिंदू परिषद ने जो रवैया अपनाया, उससे बचना और इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और कांग्रेस के रवैए को तुष्टीकरण की राजनीति के रूप में जनता के बीच पेश करना. शाह इसे यूं रखते हैं, “छद्म सेकुलर दलों का अल्पसंख्यक तुष्टीकरण ही मुसलमानों का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहा है. यह देश तुष्टीकरण से मुक्त एक नए ब्रांड की राजनीति का इंतजार कर रहा है. नरेंद्रभाई उसके प्रतीक हैं.”

पहले से ही ध्रुवीकृत माहौल में शाह को जो काम दिया गया है, वह तलवार की धार पर चलने जैसा है. लेकिन शाह नामुमकिन को मुमकिन करने में लगे हैं: “बिना भेदभाव वाले विकास” के तुष्टीकरण मुक्त, लेकिन समावेशी नारे के सहारे जीत. शाह ओबीसी हिंदुओं को यह समझने में जुटे है कि सपा और कांग्रेस जिस मुसलमान आरक्षण की बात कर रही है वह ओबीसी के कोटे से काटकर ही दिया जाएगा. इससे हिंदू ओबीसी घाटे में रहेंगे. ओबीसी प्रदेश का सबसे बड़ा वोटिंग समुदाय है और बीजेपी को उम्मीद है कि शाह के बूथ स्तर के सांगठनिक बदलावों के बाद पार्टी उन पर भी अपना असर डालेगी.

मायावती ने अपनी राजनीति की वजह से 2007 में सवर्णों और बीएसपी के दलितों समेत अति पिछड़ा वर्ग को साथ लाकर बीजेपी को गांव और बूथ स्तर पर हाशिये पर धकेल दिया था. हालांकि दूसरी पार्टियां इन वोटों में सेंध लगाती रहीं लेकिन इस खाली जगह को भरने के लिए कोई खास प्रयास नहीं हुए. हालत यहां तक पहुंच गई थी कि मतदाताओं को बूथ तक खींचकर लाने के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं तक का पार्टी में अभाव हो गया था. अब शाह ने जातिगत समीकरणों के आधार पर बूथ कमेटियों का पुनर्गठन कर एक संतुलित स्थिति बना दी है. बीजेपी को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यही कमेटियां बीजेपी के चुनावी अभियान में रीढ़ का काम करेंगी.

शाह का दावा है कि राज्य में मोदी के पक्ष में लहर है. वे मानते हैं कि फिलहाल हर लोकसभा क्षेत्र में 35,000 से 75,000 ऐसे मतदाता मोदी के पक्ष में आ चुके हैं जो इससे पहले भ्रम की स्थिति में थे. यह बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक के अतिरिक्त है जिसके लौट आने की पूरी आस पार्टी को है. प्रदेश नेतृत्व से बातचीत के दौरान हालांकि शाह अपने इस आशावादी लहजे को नरम ही बनाए रखते हैं. मोदी की रैलियों के आयोजन की जिम्मेदार प्रदेश बीजेपी कमेटी को संबोधित करते वक्त वे सावधानी बरतते हैं, “लोग मोदीजी की रैली में खुद चलकर नहीं आ जाएंगे, लेकिन हम एक योजना पर काम कर रहे हैं. अगर कोई खुद आ जाता है, तो यह बोनस ही होगा.” प्रदेश से जुड़े राष्ट्रीय स्तर के बीजेपी नेता से संवाद में वे इस तथ्य को नहीं छुपाते कि इस बार बीजेपी को 1989-91 के बाद से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की उम्मीद है क्योंकि इस बार मोदी मौजूद हैं.

शाह कहते हैं, “मायावती के प्रति मोह को खत्म होने में समय लगेगा. अखिलेश सरकार पहले ही जनता की सहानुभूति खो चुकी है और केंद्र के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर उससे भी तगड़ी है. उनकी नजर में भ्रष्टाचार से लेकर असुरक्षा तक हर समस्या का समाधान नरेंद्र मोदी हैं.”
शाह टिकट बंटवारे में भाई-भतीजावाद की भी जड़ खोदने में जुटे हैं, जो बीजेपी समेत प्रदेश में हर दल का बड़ा मर्र्ज है. आगरा में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “यह आपके अस्तित्व की लड़ाई है. नरेंद्र मोदी के होने के बावजूद अगर आप नहीं जीत सके तो समझएि यूपी से बीजेपी हमेशा के लिए साफ.” गुजरात के गृह राज्यमंत्री रहते हुए शाह ने अपराध पर अंकुश लगाने में कामयाबी हासिल की थी. सारे थानों को डीजीपी कार्यालय से ऑनलाइन जोड़कर प्रदेश पुलिस को आधुनिक बना दिया था और रक्षा शक्ति यूनिवर्सिटी नामक पुलिस और सुरक्षाबल प्रशिक्षण संस्थान तथा भारत की पहली फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी खोली थी.

फर्जी मुठभेड़ मामलों में शाह की कथित संलिप्तता ने उनकी छवि को धूमिल किया है. वे सोहराबुद्दीन (2005) और तुलसी प्रजापति (2006) फर्जी मुठभेड़ मामलों में आरोपी हैं. पहले मामले में सीबीआइ ने उन्हें जुलाई, 2010 में पुलिस से मिलकर सुनियोजित मुठभेड़ की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया था. दो माह बाद उन्हें जमानत मिल गई थी.

कई लोगों का मानना है कि शाह ने गुजरात पुलिस में आंतरिक कलह और मनमुटाव का माहौल पैदा कर दिया था. जेल में कैद डीसीपी वंजारा के इस्तीफे की चिट्ठी में शाह को ही निशाना बनाया गया, हालांकि वे इस आरोप का खंडन करते हैं. उनके काम करने का तरीका भी उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाता है. मोदी के करीबी सूत्र का कहना है, “शाह अगर खुलकर बात करते तो शायद उनकी स्थिति मजबूत होती और वे फर्जी मुठभेड़ के मामलों से बच सकते थे.” माना जा रहा है कि यूपी का प्रभार मिलने के बाद शाह से संपर्क करना काफी आसान हो गया है.

उनकी सबसे बड़ी खूबी एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर ही है. पिछले दिसंबर में गुजरात के देडियापाड़ा विधानसभा सीट पर बीजेपी की जीत उनके चुनावी कौशल का सबूत है. इस इलाके में ईसाई बन चुके आदिवासियों के बावजूद उन्होंने एक ऐसे हिंदू उम्मीदवार को चुना जिसकी पत्नी ईसाई है और जो कांग्रेस से अलग हो चुका था. इससे हिंदू और ईसाई वोट एक साथ आ गए और ऐसी सीट पर बीजेपी की जीत हुई जो कभी उसके पास नहीं रही. यही वजह है कि शाह के सहयोगी मानते हैं कि कांग्रेस सीबीआई के जरिए मोदी और उन्हें एक-दूसरे से दूर बनाए रखने की साजिश रच रही है. अब तक यह कारगर नहीं हुआ है. दोनों आखिर एक-दूजे के लिए ही बने हैं.

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