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आवरण कथाः आर या पार का साल 

साल 2021 में नरेंद्र मोदी के कामकाज से यह तय होगा कि वे राजनीतिज्ञ की तरह उभरेंगे या फिर उनके लिए 2024 की राह मुश्किल हो जाएगी. विपक्ष के लिए भी शायद यह आखिरी मौका होगा कि वे एकजुट होकर मोदी का विजय रथ रोक लें.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नया दौर, नई राहें 2021, राजनीति

कहते हैं शादी के सात साल पूरे होने पर पति-पत्नी के बीच प्रेम की डोर ढीली पड़ने लगती है और रिश्तों में खटास आने लगती है. यही वह समय होता है जब युगल बेहतर संभावनाएं तलाशने लगते हैं. आप भारतीय राजनीति और सात साल के बाद अपने मतदाताओं के साथ प्रधानमंत्रियों के संबंधों को लेकर भी यह बात कह सकते हैं. इंदिरा गांधी 1971 में बांग्लादेश युद्ध के बाद अजेय लग रही थीं लेकिन उनके कार्यकाल के सातवें वर्ष में, 1973 के तेल संकट और उस वर्ष शुरू हुए छात्र आंदोलन ने जेपी आंदोलन को जन्म दिया जो अंतत: 1977 में उनकी हार का कारण बना.

2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के सत्ता में सातवें वर्ष में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) फिर से चुनाव जीतने को लेकर आश्वस्त लग रहा था, लेकिन उसने विपक्षी गठबंधन की ताकत को कम करके आंका और उसकी कीमत चुकाई. मनमोहन सिंह और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के 2009 में फिर से चुनाव जीतने के बाद सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन सातवें वर्ष में भ्रष्टाचार के मामले उजागर होने लगे और यूपीए 2014 में सत्ता से बाहर हो गई.

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में सातवें वर्ष में हैं और ऐसा लगता है जैसे सारी मुसीबतें उनके सामने एक साथ आ खड़ी हुई हैं. उनके सामने चार बड़ी चुनौतियां हैं: कोविड-19 के कारण पैदा हुआ स्वास्थ्य संकट अभी तक जारी है, अर्थव्यवस्था महामारी के कारण बेहाल है, वास्तविक नियंत्रण रेखा चीनी आक्रामकता और हाल में लागू किए गए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के आंदोलन का लंबा खिंच जाना.

अब तक, मोदी अपने इरादों में दृढ़ रहे हैं और शांत दिखाई दे रहे हैं, भले ही उनकी सरकार प्रचंड तूफानों से घिरी है. 2021 में, उन्हें इन चुनौतियों के बीच अपनी नाव सफलतापूर्वक पार लगानी होगी और एक स्टेट्समैन की तरह उभरना होगा. अन्यथा, आने वाला साल उनके और भाजपा के 2024 के आम चुनाव जीतने की संभावनाओं को कम कर सकता है.

2014 में सत्ता में आने के बाद से, मोदी ने कांग्रेस की गरीब समर्थक छवि और यहां तक कि महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे उसके प्रतीक पुरुषों तक को उसके हाथ से सफलतापूर्वक झटक लिया है. अगर स्वतंत्र भारत के पहले 40 वर्षों में नेहरूवादी समाजवाद कायम रहा तो 1991 के आर्थिक सुधारों ने देश को मध्य की ओर धकेल दिया. भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव का मानना है कि 2021 में वैचारिक स्थिति के लिहाज से देश का झुकाव मध्य से दक्षिण की ओर होगा.

राष्ट्रीय पहचान, गौरव और सुरक्षा जैसे मुद्दे इसमें महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाएंगे और उन्हें पार्टी के कल्याणकारी नजरिए और पूंजीवाद के अद्वितीय मिश्रण का साथ मिलेगा. उनका मानना है कि यह एनडीए-1, और यूपीए-1 और 2 के गठबंधन युग को चिन्हित करने वाले क्षेत्रीय रुझानों को अपने में समाहित कर लेगा. प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी, भाजपा और उसके संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तेजी के साथ हिंदुत्व के तीन लक्ष्यों, अनुच्छेद 370 के उन्मूलन, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) जिसे अवैध मुस्लिम प्रवासियों के प्रति भेदभावपूर्ण माना गया है, को पारित कराने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए तेजी से आगे बढ़े.

राष्ट्रीय एजेंडे पर कथित इस्लामी खतरे को जोर-शोर से उभारने के लिए, इस वर्ष भाजपा ऐसे ध्रुवीकरण के मुद्दों को उठाएगी जिसमें ‘लव जिहाद’ भी शामिल है (पहले से ही, दो भाजपा शासित राज्यों ने विवादास्पद विधेयक पेश किए हैं जिनसे अंतर-धार्मिक विवाह आपराधिक कृत्य भी माने जा सकते हैं).

इस मई में होने जा रहे पश्चिम बंगाल में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव जीतने के लिए हिंदू वोटों को पक्ष में करने के लिए ध्रुवीकरण ही भाजपा की प्रमुख चुनावी रणनीति होने जा रही है. पार्टी, जिसने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतकर चौंका दिया था, इस लड़ाई के लिए अपने सारे हथियारों को जुटा रही है. बंगाल की जीत लगातार बढ़ती इस धारणा को बदलने के लिए महत्वपूर्ण है कि जब बात राज्य चुनावों की आती है, तो वोट जुटाने की मोदी की क्षमता मई 2019 में बड़ी जीत के बाद से लगातार कम होती जा रही है.

एनडीए बड़ी मुश्किल से 2020 के आखिर में हुए चुनावों में बिहार में अपनी सत्ता बरकरार रख पाई थी लेकिन उससे पहले, साल की शुरुआत में वह नई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को परास्त नहीं कर सकी. 2019 में, उसने झारखंड गंवा दिया, हरियाणा में साझेदारी वाली सरकार बनानी पड़ी और महाराष्ट्र को अपने हाथों से फिसलते देखा. हालांकि पिछले साल मध्य प्रदेश में कांग्रेस में टूट-फूट कराकर भाजपा मध्य प्रदेश में फिर से सरकार बनाने में कामयाब रही, लेकिन राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार को गिराने की उसकी वह रणनीति विफल रही. सौभाग्य से मोदी और भाजपा के लिए, किसानों का आंदोलन अब तक काफी हद तक 'गैर-राजनैतिक’ बना हुआ है और मजबूत नेता इस आंदोलन से नहीं उभरे सके हैं जैसा यूपीए-2 के शासन के दौरान भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में हुआ था.
 
बंगाल की लड़ाई के एक से अधिक वजहों से देश की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित होने की संभावना है. अगर भाजपा राज्य का चुनाव जीतती है तो वह दक्षिणपंथी विचारधारा को और मजबूती से आगे बढ़ाएगी और देश को एक दुर्लभ एकध्रुवीयता की ओर धकेल देगी जो केवल आजादी के शुरुआती दो दशकों के दौरान देखी गई थी. यह 2024 के चुनावी मुकाबले को जीतने के लिए भाजपा को एक अजेय शक्ति प्रदान करेगा.

भाजपा को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि देश में अपनी पकड़ मजबूत करने की जो भूख उसमें दिखती है, वह अन्य राजनैतिक दलों में नदारद है. विभिन्न संकटों, जिनमें महामारी भी शामिल है, के दौरान मोदी का प्रदर्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है.

तुगलक के संपादक और आरएसएस के विचारक एस. गुरुमूर्ति कहते हैं, ''आप उनके काम करने के तरीके से सहमत हों या न हों पर इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि प्रधानमंत्री लक्ष्यों के प्रति अत्यधिक सजग रहते हैं, उनकी एक साफ छवि है, 24&7 काम करते हैं और उनके पास अपने मौलिक विचार हैं.’’ चाहे विपक्ष में या उनकी अपनी ही पार्टी में, वर्तमान राजनेताओं में ऐसा कोई भी नजर नहीं आता जो कद में मोदी के आसपास भी टिकता हो.

माधव इससे सहमति जताते हैं और ''नेता, काडर और परिवार’’ को भाजपा की यूएसपी बताते हैं. कमोबेश, भाजपा का काडर स्वयं से अधिक विचारधारा को आगे बढ़ाने की प्रेरणा से काम करता है और अब एक दुर्जेय बल है. संघ परिवार, आरएसएस जिसका उद्गम स्रोत है, ने अपने सामाजिक कार्यों के दायरे का व्यापक विस्तार किया है. यह पार्टी का नैतिक चेहरा बना हुआ है और बड़े पैमाने पर लोगों को पार्टी के साथ जोड़ता है.

2021 में जिन अन्य राज्यों में चुनाव होने हैं, भाजपा को उम्मीद है कि वह असम को फिर से अपने साथ बनाए रखेगी और तमिलनाडु तथा केरल में एक ताकत के रूप में उभरेगी. ऑपरेशन कमलम, जैसा कि इसके दक्षिण भारतीय अभियान को नाम दिया जाता है, की इस साल परीक्षा होगी. वर्तमान में भाजपा के पास छह दक्षिणी राज्यों की 130 लोकसभा सीटों में से केवल 29 सीटें हैं और 2024 में वह इस संख्या में अच्छे-खासे इजाफे का इरादा रखती है.

2021 में विपक्ष क्या पाता है और क्या नहीं, यह इसके अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा. ममता बनर्जी ने 2019 के आम चुनाव में जो शालीनता दिखाई, उसे अब छोड़ दिया है. यह समझते हुए कि मतदाताओं में सत्ता-विरोधी रुझान बढ़ रहा है, उन्होंने बीते एक साल में अपने वोट बैंक, खासतौर पर महिलाओं को लुभाने के लिए सारे घोड़े खोल दिए हैं और भाजपा का मुकाबला करने के लिए गेम प्लान तैयार किया है.

केजरीवाल की तरह, वे भी चौकन्नी हैं और फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं ताकि वे चुनावी ध्रुवीकरण के भाजपा के फंदे में न फंस सकें. अगर ममता मोदी को बंगाल में रोक लेती हैं और सत्ता में वापसी करती हैं तो वे 2024 में भाजपा का मुकाबला करने के लिए संभावित विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने की कतार में होंगी.

टीएमसी बंगाल में जीत जाती है और अगर तमिलनाडु डीएमके और केरल या तो वाम लोकतांत्रिक मोर्चा या फिर संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा की झोली में चला जाता है तो यह विपक्ष को मोदी के साथ मुकाबले की जादुई शक्ति देगा. कांग्रेस के लिए भी वर्ष महत्वपूर्ण होगा; सबसे पुरानी पार्टी को जो काम सबसे पहले करने की जरूरत है, वह यह है कि एक अध्यक्ष की नियु‌क्ति करके पार्टी में बिखराव को समाप्त करना. इसके बाद इसे मंथन के बाद एक ऐसा एजेंडा तय करना होगा जिसमें उसका उद्देश्य स्पष्ट दिखता हो और जो उसे मोदी की भाजपा के मुकाबले एक विश्वसनीय वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करता हो.

मोदी को व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाने के बजाए, भाजपा सरकार की विफलताओं को उजागर करने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ काम करने की जरूरत है और मतदाताओं के साथ जुडऩे के लिए सकारात्मक एजेंडे के साथ आना होगा. उसके लिए, कांग्रेस को अपने काडर को जमीनी स्तर पर फिर से खड़ा करने की जरूरत है ताकि वे सत्ता में आने के लिए उत्साहित होकर प्रयास करें.

बहरहाल, मोदी ने आर्थिक विकास और सुधार के लिए कड़ी मेहनत करके विपक्ष को जहां चिंतित कर रखा है, वहीं भाजपा दृढ़ता के साथ अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है. 2014 में सत्ता में आने के बाद से मोदी ने समावेश, समानता और धन के पुनर्वितरण के मुद्दों के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण विकसित किया है जिसे पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम, ‘न्यू वेल्फेयरिज्म ऑफ इंडियाज राइट’ या 'भारत के दक्षिणवाद का नया कल्याणकारी नजरिया’ नाम देते हैं.

इसमें ग्रामीण गरीबों को पानी, स्वच्छता, रसोई गैस, बिजली, आवास, सड़क और बैंक खाते उपलब्ध कराने की व्यापक योजनाएं शामिल हैं. उन्होंने दो प्रमुख वोट बैंक-महिलाओं और युवाओं को अपने साथ करने पर ध्यान केंद्रित किया है और इनकी कई योजनाएं इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं. हालांकि लॉकडाउन के दौरान शहरी प्रवासी श्रमिकों को हुई परेशानियों के कारण सरकार की काफी किरकिरी भी हुई, लेकिन किसानों के अलावा, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गरीबों के कल्याण के लिए प्रोत्साहन पैकेज के जरिए उसे सुधारने की कोशिश भी की गई.

ऐसी संभावना है कि इन वर्गों को लाभान्वित करने के लिए, बजट 2021 में और अधिक कार्यक्रम होंगे. लेकिन, संघ विचारक शेषाद्री चारी कहते हैं, ‘‘मोदी सरकार को बजट का प्रयोग अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार की नींव रखने के लिए करना चाहिए. अगर भाजपा अगला आम चुनाव जीतना चाहती है तो उसे स्पष्ट योजना के साथ सामने आना होगा.’’ वित्त वर्ष 2020-21 के लिए देश के जीडीपी विकास दर के नकारात्मक रहने की संभावना के साथ, अर्थव्यवस्था को महामारी के झटके से उबरने में कम से कम दो साल लगेंगे.

मोदी अब मतदाताओं के सामने यूपीए सरकार के प्रदर्शन की तुलना नहीं कर सकते हैं. जैसा कि एक विपक्षी नेता कहते हैं, ‘‘मोदी जनता के सामने यह साबित करने के लिए कि उनका प्रदर्शन यूपीए सरकारों से बेहतर है, अब अपनी छप्पन इंच की छाती नहीं फुला सकते हैं और और न छप्पन इंच दाढ़ी बढ़ा सकते हैं.’’ न ही वे मतदाताओं को लुभाने के लिए अब चीन या इस्लाम का डर दिखाकर कह सकते हैं कि ‘हिन्दुस्तान खतरे में है.’ 

हालांकि प्रधानमंत्री ने एक आत्मनिर्भर भारत पर जोर दिया है, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह अकुशल घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए एक उच्च शुल्क अवरोध का माध्यम न बनने पाए. यह निर्यात बाजार में भारत को कम प्रतिस्पर्धी बना देगा. 2024 में भाजपा को सत्ता में बनाए रखने के लिए, मोदी को रोजगार और आर्थिक विकास के अलावा उन लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान करनी होगी जो बुरी तरह से महामारी की चपेट में आए हैं. 2021 में, उन्हें यह दिखाना होगा कि उन्होंने महामारी के कारण पैदा हुई असमानताओं को कम करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधार के रास्ते पर मजबूती से डाल दिया है. ठ्ठ

साल 2021 में वैचारिक स्थिति के लिहाज से देश का झुकाव मध्य से दक्षिण की ओर दिखाई देगा जिसमें क्षेत्रीय ताकतों की बजाए राष्ट्रीय पहचान, गौरव और सुरक्षा जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे.

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