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आवरण कथाः बहाली की राह अभी लंबी

महामारी के असर से तेजी से उबरने के लिए वैक्सीन डिलिवरी में आक्रामक तेजी दिखाने, वित्तीय प्रोत्साहन देने, ज्यादा कर्ज मुहैया कराने और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को बड़े पैमाने पर निजी हाथों में सौंपने की जरूरत.

सख्त लॉकडाउन से वस्तुओं और सेवाओं के खरीदार और विक्रेताओं के बीच अप्रत्याशित गतिरोध पैदा हो गया, जिससे अर्थव्यवस्था चरमरा गई. सख्त लॉकडाउन से वस्तुओं और सेवाओं के खरीदार और विक्रेताओं के बीच अप्रत्याशित गतिरोध पैदा हो गया, जिससे अर्थव्यवस्था चरमरा गई.

नया दौर, नई राहें 2021 
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था

अरविंद पानगडिय़ा
 

वि‌त्तीय क्षेत्र पर आए अत्यधिक दबाव को छोड़ दें तो कोरोनो वायरस के संकट से घिरते समय भारत की आर्थिक बुनियादें मजबूत थीं. वायरस के खतरे के जवाब में लगाए गए लॉकडाउन ने वस्तुओं और सेवाओं के साथ-साथ श्रम सहित इनपुट के खरीदारों और विक्रेताओं के बीच कारोबार में अपूर्व रुकावट पैदा कर दी. वस्तुओं और सेवाओं के कारोबार में पैदा रुकावट से मांग पक्ष को धक्का लगा जबकि इनपुट के कारोबार की रुकावट से आपूर्ति पक्ष को धक्का लगा. आर्थिक क्षेत्र या भौगोलिक इलाके में यह अड़चन जितनी ज्यादा थी, धक्का भी उतना ही बड़ा था.

अमेरिका, जापान और जर्मनी सरीखे विकसित देशों में घोषित वित्तीय प्रोत्साहन पैकेजों से प्रभावित होकर बहुत-से टिप्पणीकारों ने 24 मार्च को भारत में लॉकडाउन के ऐलान के फौरन बाद ऐसे ही भारी-भरकम वित्तीय प्रोत्साहनों की मांग की थी. उस वक्त मैंने कहा था कि भारत को विशाल वित्तीय पैकेज से परहेज करना चाहिए और अपने अतिरिक्त खर्चों को सभी लोगों को खाने-रहने सरीखी जीवन की जरूरी चीजें मुहैया करने तक सीमित रखना चाहिए.

तर्क दोहरा था: एक, जब वस्तु और सेवाओं के खरीदार और विक्रेता कारोबार नहीं कर पा रहे, ऐसे में विशाल वित्तीय प्रोत्साहन मांग में तब्दील नहीं होंगे; दूसरे, भारी-भरकम प्रोत्साहनों से मांग में इजाफा हो भी जाए, तो भी चूंकि श्रम सहित इनपुट के खरीदार और विक्रेता कारोबार नहीं कर पा रहे, इसलिए मांग में बढ़ोतरी के अनुरूप आपूर्ति नहीं की जा सकेगी. सरकार ने समझदारी से सीमित वित्तीय हस्तक्षेप का रास्ता चुना.

संकट शुरू होने के बाद से ही भारत और दूसरे देशों का अनुभव सरकार के चुने हुए विकल्प को सही ठहराता है. अप्रैल-जून की तिमाही में जब भारत में लॉकडाउन बेहद सख्त था, जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में पिछले साल के इन्हीं महीनों के मुकाबले बहुत तेज 23.9 फीसद तक की गिरावट आई. भारत के भीतर तमाम क्षेत्रों में गिरावट का पैटर्न इस बात का और भी पुख्ता प्रमाण लेकर आया कि कोरोना वायरस से पैदा स्वास्थ्य संकट और आर्थिक प्रदर्शन के बीच करीबी संबंध है.

लॉकडाउन की पाबंदियों से मोटे तौर पर बच गया कृषि क्षेत्र अप्रैल-जून की तिमाही में 3.4 फीसद की दर से बढ़ा. मगर उन क्षेत्रों पर तीखी मार पड़ी जिनमें कारोबार गड़बड़ा गए थे: कंस्ट्रक्शन में 50.3 फीसद; व्यापार, होटल, यातायात, संचार और प्रसारण से जुड़ी सेवाओं में 47 फीसद; मैन्युफैक्चरिंग में 39.3 फीसद और खनन में 23.3 फीसद की गिरावट आई.

ठीक इसी तरह, घरों से बाहर लोगों का आना-जाना धीरे-धीरे फिर शुरू होने के साथ खरीदारों और विक्रेताओं की कारोबार की क्षमता में जैसे-जैसे सुधार आता गया, अर्थव्यवस्था भी बहाली के रास्ते पर लौटने लगी. जुलाई-सितंबर की तिमाही में जीडीपी में 7.5 फीसद की गिरावट आई. एक बार फिर कृषि 3.4 फीसद बढ़ी. बिजली और दूसरी उपयोगी सेवाएं, जिन्होंने पिछली पहली तिमाही में 7 फीसद की गिरावट दर्ज की थी, 4.4 फीसद की सकारात्मक वृद्धि के साथ फिर तेजी के रास्ते पर लौट आईं. मैन्युफैक्चरिंग भी 0.6 फीसद की मामूली वृद्धि के साथ बढ़ोतरी के रास्ते पर लौटी. व्यापार, होटल, यातायात, संचार और प्रसारण से जुड़ी सेवाओं में सबसे ज्यादा 15.6 फीसद की गिरावट दर्ज की गई.

2020-21 के पहले आधे हिस्से में जीडीपी में 15.7 फीसद संकुचन आया. यानी अगर साल के दूसरे हिस्से में आर्थिक गतिविधि पिछले साल की इसी अवधि के स्तर पर लौट भी आती है, तब भी पूरे साल का संकुचन 7.5 फीसद के दायरे में रहेगा. तो क्या बहाली तेज करने के लिए सरकार कोई हस्तक्षेप कर सकती है? उत्तर: हां, बिल्कुल. मैं चार विशिष्ट हस्तक्षेपों की सिफारिश करूंगा.

सबसे अव्वल, सरकार को वैक्सीन या टीके की डिलिवरी में ज्यादा आक्रामक रवैया अपनाना चाहिए. अर्थव्यवस्था की बहाली में देरी के चलते हर हफ्ते हम अरबों डॉलर गंवा रहे हैं. ऐसे में वैक्सीन में 8-10 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश तेज बहाली से जल्द वसूल हो जाएगा. जो वैक्सीन 50 फीसद या उससे ज्यादा असरदार हैं, उन्हें सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए तेजी से मंजूरी दी जानी चाहिए. वैक्सीन की सुरक्षा का भरोसा है तो अहम बात रफ्तार है.

दूसरे, अब जब लोगों की आवाजाही बहाल हो गई है और कोरोना वायरस की सुरंग के दूसरे मुहाने पर रोशनी दिखाई देने लगी है, उपभोक्ता का मिजाज अच्छा होता जा रहा है, ऐसे में ग्रामीण और शहरी गरीबों को जीडीपी के कुल 1 से 2 फीसद के बराबर नकदी के एकबारगी हस्तांतरण के जरिए वित्तीय प्रोत्साहन की छोटी-सी खुराक अच्छा दांव हो सकती है. अच्छी संभावना यह भी है कि इस उपाय से अर्थव्यवस्था के महामारी से पूर्व के रास्ते पर लौटने की रक्रतार तेज होगी. बुरी संभावना पर गौर करें तो बदतर से बदतर यह हो सकता है कि इससे कर्ज में बढ़ोतरी होगी जबकि गरीबों को मौजूदा मुश्किल दौर में कुछ राहत मिल जाएगी.

तीसरा, सरकार को पीएसबी (सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों) की पूंजी में अच्छी-खासी बढ़ोतरी करनी चाहिए. अर्थव्यवस्था जब महामारी से उबर जाएगी, तब दिवालियापन के मामले तेजी से बढ़ेंगे और बैंकों के पहले से ही ऊंचे डूबत खाते और बढ़ेंगे. नतीजतन लोगों को ज्यादा कर्ज मुहैया हो पाना मुश्किल हो जाएगा. यह वह समस्या है जिसका सामना भारत को 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के फौरन बाद करना पड़ा था. मगर सरकार ने जरूरी जवाबी कदम उठाने में लंबा वक्त लिया. इनमें पीएसबी में नई पूंजी डालना भी शामिल था. नतीजा: पीएसबी की ओर से दिए जाने वाले कर्जों की वृद्धि 2016-17 के दौरान पूरी तरह ध्वस्त हो गई. ऐसा दुबारा किसी भी हाल में न होने देना जरूरी है.

चौथा हस्तक्षेप पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों) को बड़े पैमाने पर निजी हाथों में सौंपने से जुड़ा है. अब आम तौर पर सहमति है कि अगर सरकार इस साल कोई अतिरिक्त वित्तीय प्रोत्साहन नहीं भी देती है, तब भी राजस्व में तेज गिरावट की वजह से 2020-21 में केंद्र और राज्यों का मिला-जुला राजकोषीय घाटा अंतत: जीडीपी के 12-13 फीसद के दायरे में कहीं होगा. इससे कर्ज के साथ जीडीपी का अनुपात 2019-20 के आखिर में 72 फीसद से बढ़कर 2020-21 के आखिर में 84-85 फीसद पर पहुंच जाएगा.

कोविड-19 से पहले राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन कानून की समीक्षा के लिए बनी एन.के. सिंह समिति ने इस अनुपात को 60 फीसद से नीचे लाने की सिफारिश की थी. पर इस संकट ने कर्ज के बोझ को उलटी ही दिशा में धकेल दिया है. इसलिए महामारी के बाद के दौर में बेहद जरूरी काम कर्ज के साथ जीडीपी के अनुपात को नीचे लाना होगा.

इस बात के ज्वलंत प्रमाण मौजूद हैं कि पीएसयू जो मुनाफे कमा रहे हैं, वे निजी क्षेत्रों के उनके समकक्षों के मुकाबले आधे भी नहीं हैं. ऐसा कुछ तो इस वजह है कि सीईओ के तौर पर छोटे वक्त के लिए नियुक्त सरकारी कर्मचारियों का आकलन कभी उनके सृजित मुनाफे के आधार पर नहीं किया जाता. उनकी ढिलाई इस बात से और पुख्ता हो जाती है कि जब उनकी बैलेंस शीट घाटे में चली जाती है, तब सरकार उन्हें बचाने के लिए आगे आ जाती है.

सार्वजनिक क्षेत्र की एक गतिविधि (मसलन, रेलवे) को दूसरी (मसलन, स्टील) के बंधक खरीदार में बदलकर सरकार कार्यकुशलता में और भी पलीता लगा देती है. आखिर में, जब स्टील सरीखे क्षेत्र में पीएसयू के लगातार घाटे से सामना होता है तब सरकार बचावकारी शुल्कों और ऐंटी-डंपिंग या पाटन-विरोधी शुल्कों का सहारा लेती है जो निजी क्षेत्र की कार्यकुशलता को भी चौपट कर देते हैं.

निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग 2016 से ही तीन दर्जन से ज्यादा पीएसयू के निजीकरण के कैबिनेट के आदेश पर अमल करने में नाकाम रहा है. ऐसे में वक्त आ गया है कि सरकार उस मॉडल पर लौटे जो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सफलतापूर्वक अपनाया था—निवेश का एक अलग मंत्रालय बनाए जिसकी अगुआई मंत्रिमंडल के आदेश पर अमल करने में वाकई यकीन रखने वाले मंत्री और सचिव के हाथों में हो.
अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने आर्थिक सुधारों पर अमल बेहद तेज कर दिया है. आला दर्जे के सुधारों में कॉर्पोरेट प्रॉफिट टैक्स में बड़ी कटौती, श्रम कानूनों को उदार और तर्कसंगत बनाना, किसानों को अपनी उपज की बिकवाली के लिए ज्यादा आजादी देना, कोयला खदानों की व्यावसायिक खुदाई की शुरुआत और मेडिकल की पढ़ाई में 1950 के दशक की नियामकीय व्यवस्था की जगह ज्यादा आधुनिक व्यवस्था लाना शामिल है.

इनके अलावा, अगर सरकार उद्यमियों को सस्ती कीमत पर जमीन मुहैया करवाने की खातिर भूमि कानूनों में सुधार के लिए राज्यों को समुचित प्रोत्साहन देती है, और बीते तीन साल में लाए गए संरक्षणों को वापस लेती है, तो महामारी के बाद के दशकों में भारत को दहाई-अंकों की ग्रोथ के रास्ते पर जाने से रोकने वाली कोई ताकत नहीं होगी.

अरविंद पानगडिय़ा कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं.

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