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आवरण कथाः शांति बहाली के लिए लंबी जद्दोजहद

घाटी में पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद और हिंसा की घटनाओं में निश्चित तौर पर गिरावट देखी गई है लेकिन सुरक्षा बल आतंकवादियों के ड्रोन के इस्तेमाल और सीमा पार से भारी मात्रा में आ रहे नशीले पदार्थों की खेप जैसे नए खतरों से निपटने के लिए तैयार हो रहे हैं

लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे 57 वर्ष, जनरल ऑफिसर कमांडिंग, चिनार कोर, भारतीय सेना लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे 57 वर्ष, जनरल ऑफिसर कमांडिंग, चिनार कोर, भारतीय सेना

कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) की रखवाली करने के अलावा जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ मिलकर घाटी में आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने वाले भारतीय सेना के श्रीनगर स्थित चिनार या 15 कोर के जनरल-ऑफिसर-कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे के लिए यह बहुत तनाव भरा दिन था. 2 जुलाई को सुरक्षा बलों के संयुक्त दल ने आतंकियों के छुपे होने की खबर मिलने के बाद पुलवामा जिले के राजपोरा इलाके में घेरा लगाया. फिर मुठभेड़ में पांच आतंकवादियों को मार गिराया गया, जिसमें लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का एक जिला कमांडर भी शामिल था. लेकिन इस कार्रवाई में सेना के 44 राष्ट्रीय राइफल्स के एक हवलदार भी शहीद हो गए. एक सहयोगी ने पांडे को जवान की शहादत की जानकारी देते हुए एक पर्ची भेजी. उन्होंने पर्ची देखी और कुछ पल के लिए मौन हो गए. मन की पीड़ा आंखों में उतर आई.

पांडे को जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद रोधी अभियानों का लंबा अनुभव है. इससे पहले, वे कुपवाड़ा, बारामूला और श्रीनगर की रखवाली करने वाले राष्ट्रीय राइफल्स की किलो फोर्स की कमान संभाल चुके हैं. मुठभेड़ में सैनिक की जान जाने के बावजूद पांडे पूरे विश्वास से कहते हैं, ''सभी सुरक्षा मापदंडों के आधार पर, घाटी में वर्तमान स्थिति बहुत अच्छी है. आतंकी घटनाओं, उनके जुल्म, विस्फोटकों के उपयोग, नागरिकों की मौत, पथराव और कानून-व्यवस्था से जुड़ी दूसरी चिंताओं में काफी कमी आई है.'' वे कहते हैं, ''आप किसी भी तरह की हिंसा को ले लें, उसमें पांच साल पहले की तुलना में 50-60 फीसद तक कमी आई है. जहां तक विरोध प्रदर्शनों की बात है, पथराव पहले की तुलना में 10 प्रतिशत भी नहीं है. स्थानीय काडर से आतंकवादियों की भर्ती भी इस साल कम रही है. मैं यह नहीं कहूंगा कि यह न के बराबर है, लेकिन इसमें खासी गिरावट है.''

15वीं कोर के मुख्यालय में जहां पांडे बैठते हैं वहां से थोड़ी ही दूर पर कश्मीर डिविजन के पुलिस महानिरीक्षक (आइजीपी) विजय कुमार पुलिस के केंद्रीय निगरानी केंद्र का दौरा कर रहे हैं. इस केंद्र को एक अजीब नाम 'कार्गो' से पुकारा जाता है (क्योंकि इस जगह का इस्तेमाल कभी एयर इंडिया अपना कार्गो भेजने के लिए करता था.) निगरानी केंद्र में, विजय कुमार को एक हाइ-टेक सर्विंलांस वेहिकल दिखाया जा रहा है जो कानून-व्यवस्था की बहुत नजदीक से निगरानी के लिए नवीनतम उपकरणों से लैस है. बगल के कमरे में, टीवी मॉनिटरों की कतारें हैं जिनसे श्रीनगर की हर संवेदनशील सड़क पर नजर रखी जाती है. सड़कों पर लगे शक्तिशाली कैमरे आसपास के किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की करीब से ली गई तस्वीरें तुरंत भेजते हैं. पुलिस और सेना के बीच ऐसा समन्वय है कि जिस समय पांडे को जवान की मौत की खबर मिली, विजय कुमार मीडिया के लिए ट्वीट तैयार कर रहे थे जिसमें शहीद हवलदार की बहादुरी की सराहना और मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए संयुक्त बलों को बधाई दी गई.

पुलिस से मिली गहन और वास्तविक समय की खुफिया जानकारी के साथ सेना के आतंकवाद-रोधी संगठनों की घातक प्रहार क्षमता का मेल, घाटी में सुरक्षा स्थिति को मजबूत करने वाले प्रमुख कारकों में से एक है. आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. साल में औसतन 800 से अधिक कानून-व्यवस्था की समस्याएं हुआ करती थीं, लेकिन 2020 में यह घटकर 147 रह गईं. इस साल जून तक सिर्फ 46 घटनाएं हुई हैं. पिछले तीन वर्षों में हर साल औसतन लगभग 200 आतंकवादी मारे गए जबकि उस अवधि से पहले औसतन 100 से भी कम ढेर किए जाते थे. आतंकवादियों के स्थानीय मददगारों की गिरफ्तारी तेजी से बढ़ी है. 2016-17 में यह 100 से भी कम थी लेकिन पिछले तीन वर्षों में औसतन 500 हो गई है. अकेले 2020-21 में, सुरक्षा बलों ने आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान 200 से अधिक एके-47 राइफल और 250 पिस्तौलें बरामद की हैं.

पांडे की तरह विजय कुमार भी आतंकवाद रोधी अभियानों के विशेषज्ञ माने जाते हैं. उन्होंने कश्मीर के विभिन्न जिलों और छत्तीसगढ़ के माओवादी क्षेत्रों, विशेष रूप से बस्तर में सेवाएं दी हैं. अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद हिंसा की आशंका के चलते सुरक्षा बलों ने संभावित उपद्रवियों के खिलाफ ऐक्शन प्लान बनाया जिसे विजय कुमार ''निवारक और दंडात्मक उपायों के साथ बहुआयामी कार्रवाई'' कहते हैं. प्लान में उपद्रवियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया था. ए श्रेणी में उन उपद्रवियों को रखा गया जिनका पथराव का इतिहास रहा है.

उन्हें पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट (पीएसए) के तहत गिरफ्तार किया गया. श्रेणी बी में वे लोग थे जो समय-समय हिंसक घटनाओं में शामिल हो जाते थे. उनमें से आधे पीएसए के तहत गिरफ्तार किए गए; बाकी को काउंसलिंग के लिए अपने माता-पिता के साथ पुलिस थाने पहुंचने को कहा गया. श्रेणी सी के व्यक्ति वे थे जिनके बारे पुलिस को आशंका थी कि वे उपद्रवियों में तब्दील हो सकते हैं. पुलिस ने उनकी मानवीय और तकनीकी निगरानी दोनों तरह से उनकी गतिविधियों पर नजर रखी. ऊपर से नरम पर भीतर से गरम दृष्टिकोण ने वारदात घटाने में मदद की.
 
इस बीच, अलगाववादियों सहित राजनैतिक नेताओं को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था. श्रेणी ए में सभी बड़ी और छोटी पार्टियों के नेता थे. अगस्त 2019 से शुरू करके, उन्हें चार से 15 महीने के लिए हिरासत में रखा गया. श्रेणी बी में वे लोग थे जिन पर आतंकी घटनाओं को हवा देने के आरोप थे. उन्हें अधिक कठोर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया; उनमें से कई अभी भी जेल में हैं. पिछले ढाई साल में गिरफ्तार किए गए 2,162 लोगों में से 913 जम्मू-कश्मीर और देश की जेलों में बंद हैं. पीएसए के तहत गिरफ्तार 600 से अधिक लोगों में से 65 अभी भी हिरासत में हैं.

इन उपायों के साथ, छह महीने से अधिक समय तक संचार पर पूर्ण रोक ने सुरक्षा बलों को गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने में सक्षम बनाया. इस बीच सुरक्षा बल घाटी में सक्रिय प्रमुख आतंकी गुटों को खत्म करने के अभियान में तेजी से जुट गए. लश्कर के शीर्ष कमांडर मारे गए और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने के लिए एलओसी पर आतंकवाद रोधी घेरे को और मजबूत कर दिया गया था. 2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जैसी हिंसा हुई थी उसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए बंदूक उठाने वाले कश्मीरियों को दहशतगर्द बनने के कुछ दिनों के भीतर ही ढेर कर दिया गया. जनाजे के जुलूसों पर पूरी तरह रोक लगाई गई, जिससे आमतौर पर मारे गए आतंकवादियों के लिए भारी सहानुभूति पैदा होती थी. कोविड महामारी के कारण भी बड़े सार्वजनिक समारोहों को रोकने का एक अच्छा बहाना मिल गया.

एक उत्साहजनक बात यह देखी गई है कि जो युवा लापता हो गए थे और माना जाता था कि वे आतंकवादी बन गए हैं, उनके माता-पिता उन्हें ढूंढने में पुलिस की मदद मांगने लगे हैं और अपने बच्चों को आतंक के रास्ते से वापस लौटने के लिए राजी करने को हर तरह का सहयोग देने के इच्छुक हैं. यहां तक कि आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान भी सुरक्षाबल जिन आतंकियों को घेर लेते हैं उनके खिलाफ कार्रवाई से पहले उनके परिवार के सदस्यों को लेकर आते हैं और उनसे बच्चों को समर्पण के लिए राजी करने को कहते हैं ताकि उनकी जान बच सके. पुलिस के लिए यह संकेत था कि आतंकवाद के लिए जनता का समर्थन तेजी से घट रहा था. जैसा कि एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, ''हमें कश्मीर में भी वही ट्रेंड दिख रहा है जो पंजाब में 1980 और 1990 के दशक में, राज्य से आतंकवाद के सफाए से पहले दिखा था. यह शुभ संकेत है.''

सुरक्षा बलों ने आतंकवादी संगठनों के फंडिंग नेटवर्क को भी तोड़ा है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की मदद से उन्होंने आतंकवाद की फंडिंग को रोक दिया. नार्कोटिक्स विभाग और पुलिस ने नार्को-टेररिज्म (आंतकवाद को बढ़ाने के लिए नशीले पदार्थों का कारोबार) के बढ़ते खतरे पर शिकंजा कसा. विजय कुमार इस बात से चिंतित हैं कि सीमा पार और देश के भीतर से भी जम्मू-कश्मीर में पहुंचने वाली नशीली दवाएं युवाओं को गिरफ्त में ले रही हैं. वे आगाह करते हैं, ''अगर नशे के इस नेटवर्क को जल्द खत्म नहीं किया गया, तो यह अगला बड़ा आतंकी खतरा बन जाएगा.'' पुलिस ने संवेदनशील जिलों में नशा मुक्ति केंद्र शुरू किए हैं. ऐसी समस्याओं पर पुलिस हर पखवाड़े पास-पड़ोस और समुदाय के बुजुर्गों के साथ मोहल्ला बैठक भी करती है.

इस साल एक बड़े घटनाक्रम में जो संभवत: अंतरराष्ट्रीय दबाव में हुआ, पाकिस्तान और भारत नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का पालन करने पर सहमत हुए. अफगानिस्तान में अंतिम खेल शुरू होने के साथ, पाकिस्तान को अफगानिस्तान में प्रभुत्व हासिल करने के लिए सुरक्षा बलों को उस मोर्चे पर लगाने की जरूरत थी. संघर्ष विराम से पहले, पाकिस्तान के नियंत्रण रेखा पर किसी भी तरह की हरकत का भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया. संघर्ष विराम भारत के लिए भी फायदेमंद था क्योंकि इससे कश्मीर में विकास और राजनैतिक प्रक्रिया बहाल करने की ओर ध्यान केंद्रित किया जा सकता था. लेकिन पांडे सचेत करते हैं, ''हालांकि पाकिस्तान की ओर से अब तक संघर्ष विराम का उल्लंघन नहीं हुआ, फिर भी हमें लगातार चौकस रहने की जरूरत है. कश्मीर को लेकर उनकी सोच में बदलाव नहीं आया है और उन्होंने आतंकवादियों के लिए लॉन्च पैड को पहले की तरह ही बरकरार रखा है.''

हाल ही में, घाटी में पाकिस्तान समर्थित आतंकी समूहों ने अपना तरीका बदल लिया है. वे अब किसी के दहशतगर्द बन जाने पर शेखी बघारने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते. उनकी सभी प्रेस विज्ञप्तियां अब एक सेंटर से जारी होती हैं. संचार ज्यादातर व्हाट्सऐप पर होता है. इस्लामी नामों के बजाए वे खुद को 'गुरिल्ला फोर्स' बताते हैं.

नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं. पिछले महीने जम्मू में हुए ड्रोन हमले के बाद सशस्त्र बल, इस नए खतरे पर करीब से नजर रख रहे हैं. पांडे का कहना है कि हमले में जिन विस्फोटकों और उपकरणों का इस्तेमाल हुआ वे बहुत परिष्कृत हैं और यह किसी देश की सरकारी एजेंसियों की मदद के बिना संभव नहीं है. उनके पास आतंकवाद पर निरंतर नियंत्रण का एक सिद्धांत है. वे कहते हैं, ''आतंकवाद दो पहलुओं से मिलकर बनता है—पहला आतंकवादियों की तरफ से मचाया जाने वाला 'आतंक' और दूसरा 'वाद' है. आतंकवादियों की संख्या घटती-बढ़ती रहती है, हमें इस 'वाद' को नियंत्रित करना होगा. टकराव या युद्ध की अर्थव्यवस्था को चलाने वाला गठजोड़ फल-फूल रहा है और इसे तोडऩे के लिए सरकार को पूरी ताकत झोंकने की जरूरत है.''

विजय कुमार कहते हैं, ''व्यापक कार्यक्रम चलाकर ही कट्टरपंथ के प्रति युवाओं के झुकाव को कम किया जा सकता है.'' अगर घाटी को सुरक्षित रखना है, तो इसके दीर्घकालिक विकास और रोजगार सृजन की विश्वसनीय योजना बनानी होगी.

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