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आवरण कथाः क्या होगा अंजाम

व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन को धूल चटाने के लिए मैदान में आ तो डटे हैं लेकिन इस गुस्ताखी की भारत, खुद उनके देश रूस और पूरी दुनिया को आखिर कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी?

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जंग के मैदान की तस्वीरें: खारकीव पर बमबारी के निशान जंग के मैदान की तस्वीरें: खारकीव पर बमबारी के निशान

होमर के महाकाव्य ओडिसी में मशहूर यूनानी राजा ओडिसियस भूमध्यसागर के सफर में इटली के नजदीक मेसिना जलडमरूमध्य के विपरीत तटों पर आबाद दो मिथकीय समुद्री दैत्यों सिला और करिब्डिस के बीच फंस जाता है. उसे सलाह दी जाती है कि वह अपना जहाज और उसका पूरा चालक दल ज्यादा दुर्दांत करिब्डिस के आगे समर्पित करने के बजाए सिला से कुछ नाविक हार जाए.

युगों बाद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यकीन था कि ओडिसियस सरीखी आगे कुआं पीछे खाई जैसी दुविधा उनके भी सामने है. नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (नाटो) से संबद्ध देशों की रूस को आहिस्ता-आहिस्ता घेरने की कोशिश उनके महान देश के लिए अस्तित्व का खतरा बन गई है, जो बीते तीन दशकों से उन पर लगाम कसने की रणनीति के तौर पर सामने आती रही है.

उनके सामने विकल्प क्या थे? या तो पश्चिमी गठबंधन में शामिल होने को आतुर अपने नजदीकी पड़ोसी यूक्रेन के खिलाफ युद्ध छेड़ दें, या अपमान का घूंट निगलकर उभरती नई विश्व व्यवस्था में रूस के साथ बौने की तरह व्यवहार होता देखते रहें. 

उन्होंने वह चुना जो उनकी नजर में दो बुराइयों में से कमतर बुराई थी—इससे पहले कि पश्चिमी ताकतें रूस को बौना बना दें, यूक्रेन को बौना कर दो. इतालवी रणनीतिकार निकोलो मैकियावली ने भी उन्हें यही सलाह दी होती—''युद्ध से बचने की कोई सूरत नहीं; इसे सिर्फ टाला जा सकता है जिससे दूसरों का फायदा होगा.’’

रुस-यूक्रेनः उथल-पुथल भरा इतिहास
रुस-यूक्रेनः उथल-पुथल भरा इतिहास

इसलिए रूसी राष्ट्रपति ने 24 फरवरी को यूक्रेन पर पूरे जोर-शोर से धावा बोल दिया और यूरोप की सरजमीन पर दूसरे विश्व युद्ध के बाद अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई का आगाज कर दिया. अब जब रूस का जबरदस्त हथियारबंद हमले का दूसरे हफ्ता शुरू हो रहा है, पुतिन का मकसद और साफ होता जा रहा है—यूक्रेन पर संपूर्ण आधिपत्य, जिसमें तख्तापलट भी है, जिससे वह उसी तरह रूस का कठपुतली देश बन जाए जैसा 1991 में सोवियत संघ के पतन से पहले था.

अगर नाटो ने उनके युद्ध में दखल दिया तो उन्होंने परमाणु हमले की धमकी दी है, और ऐसे ''नतीजों की जिनका आपने अपने इतिहास में कभी सामना नहीं किया होगा.’’ यह अशुभ चेतावनी है. सिर पर मंडराता खतरा यह है कि किसी भी तरफ से छोटी-सी गलती दुनिया को विनाशकारी तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल सकती है, जिसका नतीजा, पूर्व अमेरिकी रक्षा मंत्री विलियम कोहेन के शब्दों में, ''न केवल इतिहास बल्कि सभ्यता मात्र के खात्मे’’ में होगा.

पुतिन ने युद्ध क्यों छेड़ा

यूक्रेन में युद्ध के जोर पकड़ने के साथ सूचना युद्ध का पहला दौर पश्चिम के पक्ष में गया. कॉमेडियन से राजनीतिक बने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की देश छोड़कर नहीं जाने की दिलेरी और बहादुरी की भूरि-भूरि तारीफ की गई. दूसरी तरफ पुतिन पर भारी गलतफहमियों से ग्रस्त होने का आरोप लगाया. कुछ लोगों ने तो उनकी तुलना विक्षिप्त राजा लीयर तक से कर डाली. लेकिन क्या पुतिन के प्रत्यक्ष पागलपन में कोई तरतीब है? एक तरतीब तो दिखाई देती है.

रुस-यूक्रेनः उथल-पुथल भरा इतिहास
रुस-यूक्रेनः उथल-पुथल भरा इतिहास

एक तो केजीबी के पूर्व जासूस और जुडोका से राजनीतिक बने पुतिन 21 से ज्यादा साल रूस पर मजबूती और निर्ममता से हुकूमत कर चुके हैं. 2000 में जब उन्होंने कमान संभाली, रूस छिन्न-भिन्न, हताश और तीसरी दुनिया के मुल्क के दर्जे में बदल चुका था.

पुतिन ने सोवियत संघ के पतन के बाद अराजक किस्म के पश्चिमी पूंजीवाद की छत्रछाया में फले-फूले मुट्ठी भर ओलिगार्क यानी कुलीनों को कुचलकर तेजी से नियंत्रण अपने हाथ में मजबूत कर लिया. देश के तेल संसाधनों का फायदा उठाते हुए (रूस अब दुनिया में तेल और गैस के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में है) पुतिन ने अर्थव्यवस्था का पुनर्निमाण किया, मजबूत सेना को आधुनिक बनाया और रूस के 85 ओब्लास्ट या प्रांतों को एकता और व्यवस्था के धागे में पिरोया. 

फिर उन्होंने अपने को नए जार की तरह पेश किया और 1991 के सोवियत संघ के विघटन को ''20वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनैतिक आपदा’’ करार दिया. उन्होंने अमेरिका के तमाम आश्वासनों के बावजूद कि वह रूस के प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ नहीं करेगा, तत्कालीन सोवियत संघ के पिछलग्गू देशों और गणराज्यों को अपने सदस्य देशों के रूप में समाहित करने के लिए (1991 के बाद 15) नाटो को फटकार लगाई.

नाटो ने हौले-हौले की घेराबंदी
नाटो ने हौले-हौले की घेराबंदी

2008 में जब जॉर्जिया ने नाटो की सदस्यता लेने पर जोर दिया, तो पुतिन ने सैन्य कार्रवाई करते हुए उसके दो इलाकों—दक्षिण ओसेतिया और अब्खाजिया—को स्वतंत्र गणराज्यों के तौर पर स्थापित कर दिया. यूक्रेन ने भी उसी साल नाटो की सदस्यता के लिए अर्जी दी थी. 2014 में जब रूस समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को सत्ता से बेदखल किया गया, तो पुतिन ने काला सागर के किनारे आबाद क्रीमिया को बिना किसी खून-खराबे के अपने में मिला लिया. इसे 1954 में सोवियत संघ ने यूक्रेन को हस्तांतरित किया था. 

पश्चिम ने रूस पर नई पाबंदियां थोपीं और उससे उसकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंची, लेकिन क्रीमिया के अधिग्रहण की बदौलत पुतिन की लोकप्रियता आसमान छूने लगी. इससे उत्साहित होकर उन्होंने क्रीमिया तक जमीनी गलियारा बनाने के मकसद से रूस की सीमा पर बसे पूर्वी यूक्रेन के दो अन्य इलाकों—दोनेत्स्क और लुहांस्क—में रूस समर्थित बगावत का गुपचुप ताना-बाना बुना.

यूक्रेन में उस वक्त पश्चिम समर्थक नए राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशंको की हुकूमत थी. उन्होंने सितंबर 2014 में रूस और मिन्स्क के पृथकतावादियों के साथ एक युद्धविराम समझौते पर दस्तखत किए. मगर दोनों पक्षों ने शर्तों का पालन नहीं किया तो यह टूट गया. इस मुकाम पर फरवरी 2015 में रूस और यूक्रेन के बीच समझौता करवाने के लिए फ्रांस और जर्मनी आगे आए. जो समझौता हुआ, उसे मिन्स्क 2 कहा जाता है.

नाटो ने हौले-हौले की घेराबंदी
नाटो ने हौले-हौले की घेराबंदी

इस बार शर्तों में साफ गारंटी दी गई कि इन दो इलाकों को ज्यादा स्वायत्तता दी जाएगी, जबकि इन इलाकों की अपनी राष्ट्रीय सरहदों पर यूक्रेन का पूरा नियंत्रण होगा. फिर भी इस इलाके में रूस समर्थक और राष्ट्रवादी ताकतों के बीच झगड़े तीव्र होते गए. अप्रैल 2019 में जब जेलेंस्की जबरदस्त बहुमत से जीतकर आए, तो उन्होंने यूरोपीय कम्यूनिटी (ईसी) और नाटो की सदस्यता के लिए पूरा जोर लगा दिया. इस बीच ओडेसा में नौसैन्य अड्डा स्थापित करने के लिए उन्होंने ब्रिटिश मदद ली और यूक्रेन के सशस्त्र बलों को मजबूत बनाने के लिए अमेरिका ने उसे 2 अरब डॉलर के आधुनिक हथियार दिए. 

पुतिन के हिसाब से जेलेंस्की ने अदृश्य लाल लकीर पार कर ली थी. रूस में भारत के पूर्व राजदूत बाला वेंकटेश वर्मा कहते हैं, ''अगर यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाता, तो यह रूस की गर्दन पर रखे स्थायी खंजर की तरह होता. अगर नेपाल चीन के साथ सैन्य गठबंधन कर लेता, जिसमें हमारी तरफ तनी मिसाइलें भी शामिल होतीं, तो कल्पना कीजिए भारत की प्रतिक्रिया क्या होती? क्या हम हाथ पर हाथ धरे प्रतीक्षा करते?’’

फिर पुतिन ने यूक्रेनियाई सरहदों पर रूसी फौजों को इकट्ठा करके निर्णायक सैन्य कार्रवाई की धमकी दी, जब तक कि अमेरिका यह पक्का वादा नहीं करता कि वह यूक्रेन को नाटो में शामिल नहीं करेगा और इस इलाके में अपना विस्तार खत्म करेगा. रूसी बाहुबली ने नाटो में तत्कालीन गणराज्यों को पहले दी गई सदस्यता को उलटने, यूरोप में रखे गए अमेरिकी परमाणु हथियारों को हटाने और मुख्य रूप से बेलारूस, यूक्रेन और जॉर्जिया में रूस के सुरक्षा हितों को औपचारिक मान्यता देने की मांग रखकर दांव और बढ़ा दिया.

नाटो ने हौले-हौले की घेराबंदी
नाटो ने हौले-हौले की घेराबंदी

अमेरिका की चिंता यह थी कि रूस इन मांगों पर नहीं रुकेगा और पुतिन रूस की पुरानी महिमा बहाल करने पर आमादा हैं. इस जनवरी में थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज की एक दृष्टि-संपन्न रिपोर्ट, जो इसके वाइस प्रेसिडेंट सेठ सी. जोन्स और फिलिप सी. वासेलेव्स्की ने लिखी है, कहती है, ''कुछ या पूरे यूक्रेन को रूस में मिला लेने से रूसी मानवबल, औद्योगिक क्षमता और प्राकृतिक संसाधनों में ऐसा इजाफा हो जाएगा कि वह वैश्विक खतरा बन सकता है. अमेरिका और यूरोप यह गलती दोबारा नहीं कर सकते.’’

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूस के साथ किसी भी समझौते से इनकार कर दिया, यह कहकर कि यूक्रेन या जॉर्जिया को नाटो में मिलाने के लिए हाल में कोई कदम नहीं उठाया गया. जर्मनी और फ्रांस ने भी यूक्रेन को नाटो में शामिल करने को लेकर अपना विरोध जाहिर करके ऐसे किसी कदम को रोक दिया था.

अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक कारनेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस (सीईआइपी) में सीनियर फेलो एश्ले टेलिस कहते हैं, ''ये देश यूरोपीय संस्थाओं में इसलिए शामिल होना चाहते हैं क्योंकि उनके पास 70 साल सोवियत हुकूमत के अधीन रहने की खौफनाक यादें हैं. मेरी राय यह है कि नाटो के विस्तार का खतरा पुतिन के लिए तत्कालीन सोवियत संघ का जो कुछ भी वह दोबारा हासिल कर सकते हैं, उसे हासिल करने का बहाना भर है.’’ 

फिर अमेरिका ने दुनिया को आगाह किया कि रूस आक्रमण की कगार पर है. पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन कहते हैं कि ''इसने पुतिन को यूक्रेन पर आक्रमण के लिए उकसाया, वरना लगता कि वे डर गए हैं.’’ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व चेयरमैन पी.एस. राघवन भी कहते हैं, ''युद्ध नाटो के प्रमुख सदस्य देशों की बुनियादी कूटनीतिक नाकामी का नतीजा है.’’

रुस से हमें मिले हथियार
रुस से हमें मिले हथियार

यूरोप का पलट हमला

यूक्रेन पर आक्रमण करते हुए पुतिन ने हैरान-परेशान कर देने का जुआ खेला. उन्हें उम्मीद थी कि इससे जेलेंस्की पहले हफ्ते में ही घुटनों पर आ जाएंगे और नागरिक मौतें भी कम से कम होंगी. उन्हें इस कयास पर भी भरोसा था कि विभाजित यूरोप और अलग-थलग अमेरिका में लड़ाई में कूदने का माद्दा नहीं होगा. रूस के 600 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ उसके राष्ट्रपति के पास कैसे भी प्रतिबंधों के आगे टिके रहने के लिए पर्याप्त खजाना था.

टेलिस कहते हैं, ''पुतिन भारी जोखिम उठाने को तैयार हैं और व्यूहरचना के लिहाज से चतुर हैं. हालांकि वे रणनीतिक गलतियां करने में समर्थ भी हैं, जैसी हिटलर ने की थीं.’’ उनका सैन्य गुणा-भाग शुरुआत में गड़बड़ा गया लगता था, जब यूक्रेन ने तगड़ा प्रतिरोध पेश किया. मगर, एक बड़े अधिकारी कहते हैं, ''4.4 करोड़ आबादी के साथ यूक्रेन यूरोप का दूसरे सबसे बड़ा देश है, जिसे आसानी से कुचला नहीं जा सकता. पुतिन को अपने विरोधयों की दंडात्मक कार्रवाई सहित तमाम संकटों का ध्यान रहा ही होगा.’’

इसीलिए रूसी राष्ट्रपति ने तड़ातड़ मिसाइल हमलों के जरिए सबसे पहले यूक्रेन की हवाई रक्षा प्रणाली को ध्वस्त करके आसमान में दबदबा हासिल किया. साथ ही उन्होंने दोनेत्स्क और लुहांस्क पर कब्जे के लिए टुकड़ियां भेजीं, जिससे उन्हें क्रीमिया तक आंशिक जमीनी गलियारा हासिल करने मदद मिलती.

फिर उन्होंने यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खारकीव पर अपना ध्यान दिया, जहां उन्होंने प्रमुख सरकारी इमारतों को उड़ाकर दिखावटी नियंत्रण हासिल किया. (इसी हमले में अन्य यूक्रेनियाई नागिरकों के साथ भारतीय छात्र नवीन एस.जी. भी मारा गया.) साथ ही रूसी फौजों ने कीव को तीन तरफ से घेर लिया.

सौदे जो चल रहे हैं
सौदे जो चल रहे हैं

उपग्रह की तस्वीरों में टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों की 60 किमी लंबी कतार राजधानी की तरफ बढ़ती देखी गई. पुतिन के गुणा-भाग के मुताबिक अमेरिका सहित कोई भी देश विदेशी धरती पर  सैन्य टुकड़ियां उतारने और रूसी फौजों से सीधे लोहा लेने का इच्छुक नहीं था, जो जेलेंस्की को मायूस करने के लिए काफी था.

पुतिन को शायद उम्मीद नहीं थी कि यूरोप, अमेरिका और जापान बदले में इतनी कड़ी पाबंदियां लगाएंगे. इसमें सबसे कठोर रूस के कई बैंकों को वित्तीय लेन-देन की वैश्विक मैसेजिंग सेवा स्विफ्ट से काट देना था, जिससे मॉस्को पर तत्काल दबाव आ गया. राघवन इसे ''परमाणु बटन दबाने जैसा ही वित्तीय कदम’’ कहते हैं, जो ''विरले ही किया जाता है.’’ यूरोपीय प्रतिक्रिया भी एकजुट और सधी हुई थी. एक के बाद एक देश ने ऐसे उपाय किए जो संभवत: तात्कालिक आर्थिक प्रतिबंधों से आगे जाते थे.

भारत में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लीनां कहते हैं, ''पुतिन ने स्थिति को भांपने में एक बड़ी गलती की. उन्हें उम्मीद थी कि यूरोप विभाजित होगा, पर हकीकत बिल्कुल उलटी पाई. खासकर रक्षा के मामले में मजबूत एकजुट मोर्चा उभरा.’’ वे यह भी कहते हैं, ''अहम बात यह कि जर्मनी सरीखे यूरोपीय देश भी अब आक्रमण का प्रतिरोध करने में यूक्रेन की मदद के वास्ते अहम हथियारों की आपूर्ति करने के अलावा रक्षा पर अपने जीडीपी का दो फीसद खर्च करने में फ्रांस के साथ कदम से कदम मिला रहे हैं.

हमने पाबंदियों से रूस का जीना दूभर कर दिया है और इसका असर रूसी रूबल के 30 फीसद गिर जाने में दिखता है. यह दिखाता है कि पाबंदियां चुभ रही हैं.’’ मगर पाबंदियां यूरोप को भी नुक्सान पहुंचा सकती हैं, क्योंकि कई देश दूसरी कई चीजों के अलावा ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर हैं (जर्मनी 60 फीसद गैस रूस से आयात करता है), जिसका नतीजा मुद्रास्फीति के बढ़ने में होगा.

तनी हुई रस्सी पर भारत

आक्रमण शुरू होते ही भारत की पहली चिंता यूक्रेन के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे 20,000 से ज्यादा छात्रों को वापस लाना था. खारकीव में रूसी बमबारी में एक छात्र के मारे जाने के बाद इसे तत्काल अंजाम देने की जरूरत बढ़ गई. विदेश सचिव हर्ष शृंगला ने स्वीकार किया, ''हमारी अव्वल प्राथमिकता अपने नागरिकों और खासकर छात्रों को संघर्ष क्षेत्र से बाहर लाना थी और हमने सारी शक्ति उसी दिशा में लगाई.

इस बीच हमने मुद्दों को हल करने और युद्ध से बचने के लिए कूटनीति तथा संवाद की वकालत की. हमने सभी पक्षों के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखे.’’ मोदी सरकार ने बचाव कार्यक्रम 'ऑपरेशन गंगा’ शुरू किया, चौबीस घंटे सातों दिन चलने वाले नियंत्रण केंद्र बनाए, विशेष उड़ानें भेजने के लिए भारतीय विमान सेवाओं पर दबाव डाला और कोशिशों में तालमेल बिठाने के लिए प्रमुख पड़ोसी देशों में विशेष दूत के तौर पर चार केंद्रीय मंत्री भेजे. 1 मार्च तक 9,000 से ज्यादा छात्र वापस लाए जा चुके थे और बाकी भी युद्ध के इलाकों से बाहर ले आए गए थे.

फिर आक्रमण के मामले में भी भारत को कूटनीति की तनी हुई रस्सी पर चलना था. भारत कुछ वैसी ही स्थिति में था, जिसमें वह 1979 में अफगानिस्तान पर रूस के हमले के समय था. निश्चित रूप से इस बार भी उसने इसकी निंदा करने से परहेज बरता. उस वक्त की तरह अब भी भारत अपनी पारंपरिक और सामरिक दोनों जरूरतों के लिए रक्षा खरीद के मामले में रूस पर अत्यधिक निर्भर है.

भारतीय थल सेना की जरूरतों के 90 फीसद, वायु सेना की जरूरत के 65 फीसद और नौसेना की जरूरत के 41 फीसद उपकरण रूसी मूल के हैं. इसके अलावा जहाजों, विमानों और टैंकों से लेकर असॉल्ट राइफलों और मिसाइलों तक 15 अरब डॉलर के सौदे पाइपलाइन में हैं. इस फेहरिस्त में विवादित ट्रायम्फ एस-400 वायु रक्षा प्रणाली भी है, जो सीएएटीएसए (काट्सा) या काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस ऐक्ट के तहत आने के कारण अमेरिकी जांच के दायरे में है (देखें: रूस से हमें मिले हथियार).

मेनन मानते हैं कि तमाम कारणों से भारत का इस लड़ाई में किसी का भी पक्ष न लेना ही उचित है. वे कहते हैं, ''अमेरिका हमारे लिए रूस की जगह नहीं ले सकता. क्या अमेरिकी हमें परमाणु पनडुब्बी लीज पर देने को तैयार हैं, जैसे रूस ने दी हैं? या क्या वह न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप की अनुमति मिलने से बहुत पहले भारत को परमाणु रिएक्टर बनाने में मदद देने को तैयार है, जैसे रूस ने दी है?

इसके अलावा रूस हमें साथ मिलकर अत्याधुनिक लड़ाकू विमान विकसित करने दे रहा है जबकि अमेरिका ने अभी तक इसकी पेशकश भी नहीं की है.’’ वर्मा रक्षा उपकरणों के लिए अरबों डॉलर के उन छोटे कलपुर्जों का भी जिक्र करते हैं जिनके लिए भारत रूस पर निर्भर है. वे सवाल करते हैं, ''महज एक उदाहरण दें, तो क्या आपका मिग 29 वाइपर ब्लेड को बदलने वाले पुर्जों के बगैर उड़ सकता है?’’ 

रूस के साथ भारत के रक्षा संबंध तो प्रगाढ़ बने हुए हैं, पर नियमित दोतरफा व्यापार क्षमता से बहुत कम है. पिछले साल दोनों देशों के बीच कुल 9.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जबकि भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार अमेरिका के साथ व्यापार 113 अरब डॉलर था. रूस से आयात भारत के कुल आयात के महज 1.5 फीसद है और उसमें भी कच्चा तेल और उर्वरक सबसे ज्यादा है.

जबकि रूस को निर्यात कुल निर्यात के बेहद कम महज 0.8 फीसद है. अलबत्ता भारत ने अपनी भावी ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए रूस के तेल क्षेत्रों में अच्छा-खासा निवेश किया है. कई रूसी बैंकों को स्विफ्ट तक पहुंच से वंचित कर देने के बाद भारत के व्यापार पर असर पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय तेल के दामों मे बढ़ोतरी से ईंधन के महंगा होने का खतरा मंडरा रहा है, जिसकी तकलीफ अर्थव्यवस्था और आम आदमी को भुगतनी होगी, खासकर जब तेल के दाम आक्रमण के एक हफ्ते के भीतर ही 100 डॉलर प्रति बैरल का निशान पार करके 116 डॉलर को छूने लगे (देखें: भारत पर असर).

इसीलिए जब अमेरिका और यूरोप ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ निंदा प्रस्तावों का समर्थन करने के लिए भारत पर दबाव डाला, भारत ने बीच की राह पर चलना चुना. उसने प्रस्तावों पर मतदान में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन व्याख्यात्मक नोट प्रस्तुत किया, जिसमें रूस की समुचित आलोचना की गई. भारत ने युद्ध तत्काल रोकने की मांग की और कहा कि वह सभी देशों की भूभागीय अखंडता और संप्रभुता को अहमियत देता है, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने के पक्ष में है और कूटनीति तथा संवाद में विश्वास करता है.

राघवन कहते हैं, ''हम अनिवार्यत: रूस से यह कह रहे हैं कि तुम जो कर रहे हो वह हमें पसंद नहीं, पर हम तुम्हारे खिलाफ वोट नहीं देंगे, जो कि बिल्कुल ठीक है.’’ विदेश मंत्रालय के एक बड़े अफसर कहते हैं, ''हमें चाहिए कि सभी संबंधित पक्षों के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखें, अपनी भागीदारी के लिहाज से अपने हितों का ध्यान रखें. अगर हम किसी एक के पक्ष में प्रतिबद्ध होते हैं, तो उसे पूरा नहीं कर पाएंगे. लिहाजा, हम उस राह चलना गवारा नहीं कर सकते जहां से वापस न लौट सकें.’’ वर्मा बेलौस कहते हैं, ''एक बार हम अपने को किसी एक के पक्ष में प्रतिबद्ध कर लें, तो यह खाली चेक देने की तरह होगा, जिसे वे हमारे हितों का ख्याल रखने की गारंटी दिए बगैर भुना लेंगे.’’

चीन की छाया
विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत उसी तरफ था जिधर चीन था. चीन ने भी मतदान में हिस्सा नहीं लिया. 2008 में चीन जॉर्जिया पर रूस की सैन्य कार्रवाई के समर्थन में खुलकर नहीं आया था, न ही उसने 2014 में क्रीमिया पर किए गए रूसी कब्जे को अब तक मान्यता दी है. मगर दुनिया के दो सबसे ताकतवर स्वेच्छाचारी हुक्मरान पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूसी आक्रमण के महज दो हफ्ते पहले 7 फरवरी को एक दूरगामी समझौते पर दस्तखत किए.

तमाम मुद्दों को समाहित करने वाले 5,000 शब्दों के संयुक्त वक्तव्य में कहा गया, ''दोनों देशों के बीच मित्रता की कोई सीमा नहीं है. सहयोग का कोई भी क्षेत्र निषिद्ध नहीं है.’’ इससे दोनों देश पहले किसी भी वक्त से कहीं ज्यादा नजदीक आ गए, जहां वे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में नाटो की भूमिका को दोटूक चुनौती दे रहे थे और वैश्विक महाशक्ति के तौर पर अमेरिका के दबदबे पर सवाल खड़े कर रहे थे.

चीन को मजबूती से अपने पक्ष में लाकर पुतिन में यूक्रेन पर आक्रमण के अपने मनसूबे पर आगे बढ़ने की हिम्मत आ गई. अमेरिका के जर्मन मार्शल फंड में सीनियर ट्रांसअटलांटिक फेलो और चीनी मामलों के विशेषज्ञ एंड्र्यू स्मॉल कहते हैं, ''यह महज रूस का सवाल नहीं है. यह 'चीन की दोस्ती से समर्थ रूस’ का सवाल है और यूरोपीय नेताओं ने इस पर सुरक्षा परिषद में बीजिंग की मिलीभगत के बारे में दोटूक बात की.’’

स्मॉल के मुताबिक, यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए व्यापक डर की बात यह है कि अगर यूक्रेन में पुतिन कामयाब हो जाते हैं, तो बाल्टिक देशों के मामले में उनके खतरनाक ढंग से आगे बढ़ने की संभावना है. इसलिए पहले ही लाल लकीर खींचनी होगी. सख्त पाबंदियां लगाकर अमेरिका और यूरोप चीन को भी दोटूक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर उसने बलपूर्वक ताइवान को लेने की कोशिश की तो उसे कैसे प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा.

टेलिस कहते हैं, ''चीन को यूक्रेन पर रूस के अनुभव से सीखना ही चाहिए. अगर ताइवान के 48 घंटों के भीतर समर्पण कर देने को लेकर उनके मन में रूमानी ख्यालात हैं, तो उन्हें अब पता चल जाना चाहिए कि वे कितने गलत हो सकते हैं—कि उन्हें कहीं ज्यादा भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.’’ मेनन इतना और जोड़ते हैं, ''कोई भी शी को ताइवान के अंदर आने का न्यौता नहीं दे रहा है, वे यह दावा भी नहीं कर सकते उनकी सुरक्षा को खतरा है. कीमत इस रूप में भी है कि वे कितना चीनी रक्त बहाने को तैयार हैं.’’

पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन के अनुसार मुख्य चिंता यह है कि एशिया में अमेरिका की धुरी को तोड़ने की गरज से अपने खतरनाक, गंदे और गैरकानूनी मनसूबे को अंजाम देने के लिए रूस का इस्तेमाल करना चीन के मुआफिक पड़ सकता है. वे कहते हैं, ''अगर अमेरिका अपने मुख्य दुश्मन के तौर पर रूस की पहचान करता है और यूरोपीय सुरक्षा के मसलों में पैर फंसाता है, तो जाहिरा तौर पर उसका पहले का यह दावा कमजोर पड़ेगा कि चीन उसकी सबसे बड़ी चुनौती है.

इसका निहितार्थ उसकी हिंद-प्रशांत रणनीति और क्वाड समूह के लिए भी है, जिसका भारत भी हिस्सा है.’’ वर्मा सहमति जाहिर करते हुए कहते हैं, ''चीन ठहाके लगा रहा होगा और भांगड़ा करते हुए बैंक जा रहा होगा. रूस उसके लिए अब भूराजनैतिक एटीएम की तरह है.’’ वे यह भी मानते हैं कि अब जब युद्ध से रूस के काफी कमजोर हो जाने की संभावना है, ''तो मध्य एशिया के दरवाजे चीन के लिए खुल गए हैं कि वह आए और नियंत्रण हासिल करे.’’

मगर टेलिस नाइत्तफाकी जाहिर करते हुए कहते हैं कि दोनों मुद्दों में फर्क है. वे कहते हैं, ''चीन की समस्या ताकत से उपजी है, यूरोप के इस संकट के मुकाबले, जिसमें रूस फंसा है, जो बुनियादी तौर पर कमजोर शक्ति है. चीन से निपटते वक्त अमेरिका अपने संकल्प या संसाधनों को बर्बाद होने देना गवारा नहीं कर सकता. लेकिन हम महाशक्ति हैं और दोनों खतरों से एक साथ निपट सकते हैं.’’

न ही चीन, रूस की समस्या में गहराई से उलझना चाहेगा और मॉस्को की खातिर अमेरिका और यूरोप के पूरी तरफ खिलाफ जाना चाहेगा. दोनों के साथ रिश्ते चीन की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं. मेनन कहते हैं, ''चीन जानता है कि वह अमेरिका पर किस कदर निर्भर है और वे बेवकूफ नहीं हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था से खुद को काटकर अलग-थलग करेंगे. वे अमेरिका के बगैर, अमेरिका की टेक्नोलॉजी और उसके बाजार के बगैर जिंदा नहीं रह सकते.’’

नई वैश्विक अव्यवस्था?

शरण के शब्दों में कहें तो जब पुतिन ने यूक्रेन पर आक्रमण करने का फैसला किया था तो उनकी योजना में एक ऐसी नई यूरोपीय व्यवस्था का विकास करना शामिल था ''जो यूरोप द्वारा पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिए गए रूस की महत्वपूर्ण भूमिका और हैसियत को स्वीकार करेगी.’’ मेनन तो यहां तक कहने से नहीं हिचकते कि दुनिया में फिलहाल कोई व्यवस्था ही नहीं है.

वे पूछते हैं, ''क्या यह सच नहीं है कि कोई भी यूरोपीय या अमेरिकी यूक्रेन के पक्ष में खड़े होने और लड़ने को तैयार नहीं है?’’ शरण का भी मानना है कि महामारी ने कोई विश्व व्यवस्था न होने के तथ्य को उघाड़ कर सामने रख दिया क्योंकि दुनिया भर के देश इस बड़े सुरक्षा खतरे के खिलाफ मिलकर काम करने में असफल रहे जिसकी परिणति पारस्परिक सहयोग के स्थान पर वैक्सीन राष्ट्रवाद के रूप में हुई. 

बकौल टेलिस, यह मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाली बात है क्योंकि पश्चिमी उदारवादी व्यवस्था अभी भी हावी है और कुछ तनाव के साथ ही सही उसके सभी मानदंड और संस्थाएं बरकरार हैं. मेनन के अनुसार यूक्रेन संघर्ष के परिणाम दुनिया के लिए इस या उस पार का फैसला करने को बाध्य करने वाले नहीं होंगे. कारण: दुनिया को युद्ध के दुष्प्रभावों से निपटना होगा, जिससे ऊर्जा और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बहुत ऊपर चली जाएंगी और मंदी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी.

इन परिस्थितियों में चीन-रूस धुरी के मजबूत होने की संभावना है, जबकि इससे विचलित अमेरिका के पास वैश्विक समस्याओं से निपटने के अवसरों का फलक सिकुड़ रहा होगा. मेनन कहते हैं, ''दुनिया वास्तव में भारी अव्यवस्था में फंसी है. हम वैश्विक व्यवस्था के संक्रमण काल में हैं. अर्थव्यवस्था के नजरिए से हम बहुध्रुवीय हैं, लेकिन बात सैन्य शक्ति के संदर्भ में हो तो हम एकध्रुवीय हैं और अमेरिका अभी भी एकमात्र महाशक्ति है.’’

यूक्रेन संकट के बाद चीन-रूस धुरी मजबूत होती है, तो कुछ विद्वान एक नए शीतयुद्ध और यहां तक कि नए सर्वसत्तावादी दौर शुरू होने की भविष्यवाणी भी करते हैं. दूसरों का तर्क है कि यह पहले जैसा शीतयुद्ध नहीं होगा जिसका मजबूत सैन्य और वैचारिक आधार था. इसके अलावा, यूरोप दुनिया की केंद्रीय भू-राजनैतिक धुरी बन गया था.

लेकिन उसके बाद यूरोप का सकल घरेलू उत्पाद गिरकर 2016 में लगभग 16 प्रतिशत रह गया, जो 1980 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 30 प्रतिशत था, और उसका महत्व खत्म हो गया—अब उसका न सैन्य प्रभाव है, न ही कोई आर्थिक शक्ति है. मेनन का मानना है कि दुनिया की सबसे प्रमुख भू-राजनैतिक धुरी अब एशिया में स्थानांतरित हो गई है जहां कई क्षेत्रों में संघर्ष है और परमाणु शक्तियां होड़ कर रही हैं.

इन सारे उतार-चढ़ावों के बीच एक नई बहुध्रुवीय दुनिया उभर रही है—जो शायद कम स्थिर और अधिक खतरनाक होगी. तो, ऐसे में भारत की क्या स्थिति होगी? विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पास शायद इसका जवाब है, ''भारत कई देशों के निकट आएगा, लेकिन किसी के साथ बंधेगा नहीं.’’ राघवन की राय है कि रूस और अमेरिका के साथ गठबंधन के बजाए संयुक्त उद्यम होने चाहिए.

शरण का मानना है कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद हमें पश्चिम की ओर खड़ा होना होगा. हमारा मुख्य शत्रु चीन है, तो हमारे पास और विकल्प भी क्या है? भारत को ऐसों की तलाश करनी होगी जो चीनी विस्तार पर चिंताएं साझा करते हैं.’’

भारत के पास विकल्प कठिन हैं, खासकर जब अपने हितों बनाम सिद्धांतों का सवाल हो. विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि इस उथलपुथल भरे समय में सामरिक स्वायत्तता ही प्राथमिकता होनी चाहिए. वर्मा की सलाह है, ''हम अनजानी नई दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं. यह दुनिया बहादुरों की नहीं, बल्कि समझदारों की है.’’ बहादुरी और समझदारी दोनों ही यह इशारा कर सकते हैं कि भारत को जल्द से जल्द तटस्थता की मुद्रा त्यागनी होगी. 


पुतिन अमेरिका से यह वादा लेना चाहते थे कि यूक्रेन को नाटो में शामिल नहीं किया जाएगा. बाइडन ने सोचा कि उनकी मांग यहीं तक रुकने वाली नहीं है

श्याम सरन, पूर्व विदेश सचिव
अमेरिका का चीन की बजाए रूस को मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान लेने से क्वाड पर असर पड़ेगा, जिसका कि भारत भी सदस्य है  

बाल वेंकटेश वर्मा, रूस में भारत के पूर्व राजदूत
हमारा किसी भी ओर खड़े होना उन्हें ब्लैंक चेक थमाने जैसा होगा. वे उसे हमारे हितों की परवाह किए बगैर भुना लेंगे   

पी.एस. राघवन, पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार बोर्ड
रूसी बैंकों को स्विफ्ट से बाहर करना वित्तीय मामलों में एटमी हमले का बटन दबाने जैसी घटना है. ऐसा शायद ही होता है  

एंड्रयू स्मॉल, जर्मन मार्शल फंड, अमेरिका
यह सिर्फ रूस की बात नहीं, चीन की सह पाए रूस की बात है. बीजिंग के शामिल होने को यूरोप साफ-साफ देख पा रहा है  

इमैनुएल लीनां, भारत में फ्रांस के राजदूत
प्रतिबंधों ने रूस की जिंदगी दुश्वार कर दी है. रूबल के 30 फीसद तक लुढ़कने में उसका असर साफ देखा जा सकता है  

हर्ष शृंगला विदेश सचिव 
हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी अपने छात्रों को वहां से निकालना. हमने सारा ध्यान वहीं लगा दिया  

ऐश्ले जे. टेलिस, कारनेगी एनडोवमेंट
नाटो विस्तार की घुड़की की आड़ में पुतिन सोवियत संघ के दिनों वाली उपलब्धियों को जितना हो सके, वापस पाना चाहते हैं 

शिवशंकर मेनन, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
अमेरिका हमारे लिए रूस की जगह नहीं ले सकता. जिस तरह से रूस ने एटमी पनडुब्बी लीज पर दी है, अमेरिकी कभी दे पाएंगे?  

पुतिन को दरअसल इस बात का अंदाजा नहीं था कि यूरोप कुछ इस अंदाज में एकजुट होकर प्रतिक्रिया करेगा और स्विफ्ट जैसे सख्त प्रतिबंधों तक जाएगा

बीच का रास्ता तलाशते हुए भारत सुरक्षा परिषद में मतदान के दौरान गैर-हाजिर रहा पर साथ ही स्पष्टीकरण जारी किया जिसमें रूस के प्रति तल्ख रवैया अपनाया गया था.

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