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आवरण कथाः अभिशाप और उम्मीदें

महामारी हो या जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली मौसम की आपदाएं, कुदरत ने अपनी तकलीफ बयान कर दी है, पहले ही बहुत देर हो चुकी है, कम से कम अब हमें इस बर्बादी को दुरुस्त करना ही होगा

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन

मुझे कहना ही होगा कि साल 2020 हमारे जीवनकाल का सबसे उथल-पुथलकारी, सबसे विनाशकारी और बुरे अर्थों में सबसे बदलावकारी साल था. इस संकट की कोई पूर्व मिसाल नहीं है—ऐसा कोई शास्त्र नहीं है जो सरकारों को बताता हो कि क्या करना है, अर्थव्यवस्थाओं को कैसे बंद करना है और उन्हें कब खोलना है. यह वायरस रूप बदलता है, यह पशु से इनसानों में कूदा है; यह अत्यंत घातक है क्योंकि लगता है कि यह अपने को छिपाने के नए-नए तरीके खोज लेता है—कोई लक्षण न होते हुए भी हम इसके संक्रमण के वाहक हो सकते हैं.

हम जब 2020 में दाखिल हुए, तब उन विभीषिकाओं का लेशमात्र संकेत नहीं था जो दुनिया का इंतजार कर रही थीं. चीन के वुहान में कुछ हो रहा था लेकिन हममें से कइयों ने उस पर गौर ही नहीं किया. हमारी स्क्रीन पर तो कुछ और ही चिंताजनक नजारा था—ऑस्ट्रेलिया की विशाल पट्टियों में फैलती, लोगों और वन्यजीवों को हताहत करती और घरों को बर्बाद करती झाड़ियों की आग. इस आग की तीव्रता का रिश्ता जलवायु परिवर्तन से था क्योंकि ये ज्वालाएं ऊष्मा के उन बढ़ते स्तरों से पैदा हुई थीं जिन्होंने धरती को सुखाकर आग के गोले में बदल दिया था. लंबे सूखे के साथ मिलकर इसने धधकती आग के लिए आदर्श जमीन तैयार कर दी.

मगर जब विभिन्न देशों का ध्यान इस आग पर लगा हुआ था, दुनिया के हमारे हिस्से में कहीं ज्यादा बदतर मानवीय त्रासदी घटित हो रही थी. जनवरी आते-आते टिड्डियों के विशाल झुंड राजस्थान और गुजरात के मैदानों पर धावा बोल चुके थे. उन्होंने फसल चट करके किसानों की रोजी-रोटी तहस-नहस कर दीं. इस हमले का भारी पैमाना और तीव्रता भी जलवायु परिवर्तन से जुड़ा था: असामान्य बारिश, चक्रवात की घटनाओं और फिर अरब प्रायद्वीप, पूर्वी अफ्रीका और भारत के पश्चिमी राज्यों के रेगिस्तानों में सामान्य से लंबे मॉनसून ने कई गुना संततियां उत्पन्न करने वाले इस जीव के लिए प्रजनन की उर्वर जमीन तैयार कर दी. नतीजतन टिड्डियों की विनाशकारी बाढ़ आ गई, जिसे अक्सर अकाल की पूर्वसूचना की तरह देखा जाता है क्योंकि यह कीट नजर में आने वाली सब चीजें खा जाता है.

मध्य मार्च आते-आते कोविड-19 के संकट ने दस्तक दी और लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया. भारत के लॉकडाउन का पहला दौर अप्रैल मध्य में खत्म हो गया और जब इसे 3 मई और फिर महीने के आखिर तक बढ़ाया गया, तब ऐसा लगा कि यह बीमारी बस अब अपने अंत के नजदीक है. मगर इस तबाही भरे साल के दिसंबर के आखिर में जब मैं ये पंक्तियां लिख रही हूं, हम नए साल में इस तरह दाखिल हो रहे हैं कि हमारे पास उम्मीद और प्रार्थना के सिवा ज्यादा कुछ नहीं है.

फिर मई में हम एक मानवीय संकट से दोचार हुए, जब हजारों भूखे और लाचार लोग अपने काम की जगहों को छोड़कर गांवों में अपने घरों के लिए निकल पड़े, क्योंकि अर्थव्यवस्था धराशायी हो चुकी थी और उनके पास गुजारे के लिए पैसे नहीं बचे थे. हमने देखा कि किस तरह हमारे शहर के अदृश्य लोग बेगाने हो गए, जो अपना खून-पसीना देकर हमारी सुख-सुविधाओं के लिए बेहद जरूरी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन और निर्माण करते हैं, उन्होंने अपनी जान गंवाईं, क्योंकि वे रेल की पटरियों पर सो गए और रेल उनके ऊपर से गुजर गई या ट्रकों के नीचे कुचले गए. मैं यह इसलिए लिख रही हूं क्योंकि हमें यह भूलना नहीं चाहिए, हमें इन तस्वीरों को अपने दिलोदिमाग से मिटने नहीं देना चाहिए. हमारी दुनिया में इतना सब घट चुका है. हमें कतई नहीं भूलना चाहिए.

जून की 1 तारीख को जब पहले अनलॉक की घोषणा हुई, खोलने का उतावलापन बढ़ा. ठीक भी था क्योंकि अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी थी और सबसे बदतरीन मार दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी थी, जिनके पास काम-धंधे नहीं थे ताकि खाना या कोई भी चीज खरीद पाएं. सरकार के राहत पैकेज स्वागत योग्य तो थे पर इस संकट के आगे बेहद थोड़े थे. फिर इन बीते छह महीनों में ज्यों-ज्यों हम कामकाज खोलते थे, हमें फिर-फिर बंद करना पड़ता था, क्योंकि संक्रमण की संख्या बढ़ जाती थी. लॉकडाउन के लिए शहरों, राज्यों की सीमाएं बंद थीं. हरेक त्योहार के साथ, जब हर्षोल्लास आना चाहिए था, संक्रमण की संख्या बढ़ जाती थी. पूरे साल यही होता रहा और मैं बेखटके कह सकती हूं कि अब थकान हावी हो चुकी है. हम जानते हैं कि बाहर वायरस मंडरा रहा है लेकिन अब हम उम्मीद करते हैं नए साल में वैक्सीन आ जाएगी जो हमें हमारा पुराना सामान्य जीवन चमत्कारिक ढंग से लौटा देगी.

बीते साल की घटनाओं का अकेला यही लेखा-जोखा नहीं है. लॉकडाउन के दौरान ही मई में तीव्र चक्रवाती तूफान भारत के पूर्वी हिस्से से टकराया, जिसने जिंदगियां और संपत्तियां तबाह कर दीं. फिर निसर्ग पश्चिमी हिस्से से आ टकराया और तभी से चक्रवाती हलचल और महासागरों में गहरे दबाव के कारण बार-बार हो रही भारी बारिश ने दक्षिण और पूर्वी भारत के कई हिस्सों को परेशान कर दिया है.

कोविड-19 के बदतरीन महीनों के दौरान हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ आई. ये सारी अलग-अलग घटनाएं जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं, यह तो अब निर्विवाद है ही. आज हम जो देख रहे हैं, वह बढ़ती बारंबारता और तीव्रता से आ रहे चक्रवाती तूफानों तथा अचानक और प्रचंड बारिशों का नतीजा है. मौसम की यह उथल-पुथल जो कोविड-19 की उथल-पुथल जितनी ही बुरी है, धरती और समुद्र के तापमान में आए बदलावों से पैदा हुई है. इससे विनाश की शक्ति और घटनाओं की आकस्मिकता भी बढ़ रही है.

मौसम से जुड़ी ये तमाम घटनाएं अब प्राकृतिक या सामान्य नहीं रह गई हैं. जो बात साफ है वह यह कि हम दोहरा झटका झेल रहे हैं. एक तरफ हम अपनी धरती और अपने जल संसाधनों के साथ बदइंतजामी कर रहे हैं जिससे हमें और ज्यादा सूखे और बाढ़ झेलने पड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन इस संकट को और ज्यादा बिगाड़ रहा है. यह तब है जब हम जानते हैं कि इन घटनाओं के नतीजे और भी बदतर हैं क्योंकि यह विकास के फायदों को और लोगों की जिंदगियां बेहतर बनाने के लिए बुनियादी ढांचों के निर्माण में किए गए बरसों के निवेश को अकारथ कर देता है. जैसा कि हम अमेरिका से लेकर भारत तक दुनिया भर में हो रही उथल-पुथल से देख सकते हैं, दूसरों के मुकाबले इस वायरस की ज्यादा मार गरीबों पर पड़ी है. उन्होंने दो बार तकलीफ भुगती है; एक बार तो इसलिए कि उन्होंने संक्रमण की वजह से जान गंवाईं और फिर इसलिए कि उन्होंने आजीविकाएं गंवाईं.

एक और हकीकत भी है जो कोविड-19 ने हमारे सामने उघाड़कर रख दी है. इस बीमारी के फैलने और बढ़ने की सबसे ज्यादा संभावना उन जगहों पर है जहां शहरी सुविधाएं नहीं हैं, जहां भीड़ भरी बस्तियां हैं, जहां सुरक्षित पानी की आपूर्ति और साफ-सफाई नाकाफी है और लोगों के पास सुरक्षित रहने का कोई तरीका नहीं है. इस संकट ने हमारी दुनिया की गैरबराबरी और गहरे विभाजनों को बहुत बढ़ाकर हमारे सामने रख दिया है.

कोविड-19 कुदरत के साथ हमारे लगातार बदतर होते जाते मनूहस रिश्ते का भी नतीजा है. एक तरफ, हम अपने खाने-पीने की चीजों में अनेक रसायन और विषैले तत्व डाल रहे हैं. इससे खाना पोषण ही नहीं बल्कि बीमारी का स्रोत बन रहा है. पशुओं और यहां तक कि फसलों में भी ऐंटीबायोटिक डाले जा रहे हैं—रोग नियंत्रण के लिए ही नहीं, बल्कि उन्हें ज्यादा उगाने, उनका वजन बढ़ाने के लिए भी, ताकि कारोबार में मुनाफा हो. नतीजतन, इनसान के जिंदा रहने के लिए जरूरी दवाइयों के प्रति प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है. साथ ही, हम अपने खाने-पीने की चीजें ऐसे तरीकों से उगा रहे हैं जिनसे बीमारियों के बढऩे में मदद मिलती है—औद्योगिक खेत जो लंबाई में जुड़े होते हैं, तेजी से संक्रमण का स्रोत बनते जा रहे हैं. पशुओं और इनसानों की बस्तियों के बीच इस तरह सरहदों के टूटने के नतीजतन ऐसे और भी प्रकोप झेलने होंगे. यह संक्रमण को और भी घनघोर ढंग से संक्रामक बना देगा.

यह साल एक विकट चेतावनी भी देता है—हम देख रहे हैं कि हम क्या हैं, वर्षों का वह गंवाया हुआ वक्त, जब हम सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश और ज्यादा समतामूलक समाज का निर्माण कर सकते थे जिसमें गरीबों को दोगुनी मार नहीं झेलनी पड़ती. जलवायु परिवर्तन और आज हमारी आंखों में आंखें डालकर घूर रहे हर दूसरे मुद्दे के साथ भी ऐसा ही है. समस्या के वजूद को ही नकारने में बहुत सारा वक्त बर्बाद किया जा चुका है. वक्त की विलासिता अब हमारे पास नहीं है. मेरी पीढ़ी ने अपना विशेषाधिकार फिजूल में गंवा दिया.

अब हमें वाकई अपनी दुनिया की सामूहिक लाचारगी के बारे में सोचना चाहिए. सबसे बलशाली नेता, सबसे हाइ-टेक वैज्ञानिक प्रतिष्ठान और सबसे ताकतवर आर्थिक शूरवीर, सबको मुकाबले के लिए अपना जोड़ीदार इस दीन-हीन वायरस में मिला. इससे हमें विनम्र बनना चाहिए और सोचना चाहिए कि हमें क्या अलग ढंग से करने की जरूरत है. लेकिन मुझे शक है कि यहीं हम गलती करेंगे.

हमारी वैश्वीकृत दुनिया का सबसे अहम मुद्दा है कोविड-19 के जवाब में हमारी प्रतिक्रिया, और अगली विश्वव्यापी आपातस्थिति—जलवायु परिवर्तन—के लिए इसका क्या मतलब है. हमें पता था कि हमें एक साथ मिलकर कदम उठाने चाहिए थे और हमने नहीं उठाए.

चीन ने पर्याप्त तेजी से जानकारियां साझा नहीं कीं, वायरस ने देश से बाहर आकर संक्रमण फैला दिया; विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पर्याप्त फुर्ती से कदम नहीं उठाए, या हो सकता है उसकी आवाज की इतनी भी इज्जत न हो कि उसे सुना जाता. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हफ्तों तक बैठक ही नहीं बुलाई और जब बुलाई भी तो बस हल्की बुदबुदाहट के साथ खत्म हो गई.

बात सिर्फ चीन और डब्ल्यूएचओ की ही नहीं है—इस संकट में हरेक देश ने दिखा दिया कि इस गला-काट दुनिया में वह बस अपने लिए ही है. यह तब और रसातल में पहुंच गया जब देशों ने दूसरों के रक्षा उपकरणों की नकल तैयार की, मास्क और गाउनों की जमाखोरी की जबकि स्वास्थ्यकर्मियों को इनकी जरूरत थी, चिकित्सा आपूर्तियों के लिए एक दूसरे से होड़ की और इसको लेकर लड़े कि वैक्सीन पहले कौन बनाएगा. आज जब वैक्सीन सामने है, मुद्दा यह नहीं है कि इसका सबसे पास पहुंचना पक्का करने के लिए दुनिया कैसे काम कर सकती है.

एक बार फिर मुद्दा यह है कि देश इसकी जमाखोरी करके अपने लोगों की हिफाजत कैसे करेंगे, यह भूलकर कि जब तक पूरी दुनिया को वायरस से सुरक्षित नहीं किया जाता है तब तक महामारी जाएगी नहीं.

यह सोचकर तब और भी डर लगता है जब हम जानते हैं कि कोरोना वायरस महामारी अंतरनिर्भर वैश्वीकृत दुनिया का नतीजा है. यह भी साफ है कि हम सिर्फ उतने ही मजबूत हैं जितनी हमारी सबसे मजबूत कड़ी है. हम जीतेंगे नहीं जब तक कि हम यह लड़ाई साथ मिलकर नहीं लड़ते. इसी तरह, जलवायु परिवर्तन को भी वैश्विक नेतृत्व की दरकार है. एक देश उत्सर्जन करता रहता है तो बाकी देशों की कार्रवाइयां नाकारा हो सकती हैं. अगर हम चाहते हैं कि सब कदम उठाएं तो हमें सहयोग पर आधारित सहमति तैयार करनी होगी, ऐसी सहमति जिसमें आखिरी शक्चस, आखिरी देश को अपने विकास का अधिकार हो.

लेकिन यह भी साफ है कि इस साल हमने इतने बड़े पैमाने पर अव्यवस्था और उथल-पुथल देखी है कि जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी. लिहाजा अब हमें कुदरत के साथ अपने टूटे हुए रिश्ते को जोड़ने के लिए उतने ही बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है. भविष्य हमारे अपने हाथ में है. कुदरत अपना दर्द बयान कर चुकी है. अब हमें पलटकर उससे नरमी से बात करनी चाहिए.

2021: क्या बदलना ही चाहिए

फिर नए साल का एजेंडा यह है. बदलाव के चार छोटे मगर अहम निशान हैं जिन्हें हमें नए साल में आगे बढ़ाना ही चाहिए. पहला, अमेरिका में नेतृत्व बदल रहा है. डोनाल्ड ट्रंप के जाने और जो बाइडन-कमला हैरिस के आने का मतलब यह है कि जलवायु परिवर्तन वापस वैश्विक एजेंडे पर होगा. बाइडन-हैरिस कह चुके हैं कि अमेरिका उस पेरिस समझौते में फिर शामिल होगा, जिस पर 2015 में दस्तखत हुए थे और जिसके तहत अनेक देश उत्सर्जनों में कटौती करने को राजी हुए हैं. यह बड़ी बात है, पर पर्याप्त बड़ी नहीं. यह बात दिमाग में रखना जरूरी है कि अमेरिका को सस्ती ऊर्जा की लत पड़ गई है जो अब कोयले के बजाए शेल गैस है और वह पेरिस समझौते के तहत छोटा-मोटा लक्ष्य भी पूरा नहीं करेगा. फिर भी, अमेरिका अब पराया नहीं रह जाएगा, 2021 में वह जलवायु परिवर्तन पर चर्चा के लिए शिखर मेज पर लौट आएगा. यह अहम है क्योंकि वक्त हमारे हाथ से निकला जा रहा है.

दूसरा, नीले आसमान और स्वच्छ फेफड़ों का एजेंडा है. 2020 में लॉकडाउन का विडंबना से भरा एक फायदा यह हुआ कि हमारे शहरों की वायु गुणवत्ता में सुधार आया; यह कुछ ऐसा था कि मानो प्रकृति अपनी जगह फिर हासिल कर रही थी. मगर यह भी सच है कि यह भारी आर्थिक कीमत पर आया. लिहाजा हमें पक्का करना होगा कि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए स्वच्छ हवा बनाए रखने के लिए सब कुछ किया जाए—ऊर्जा से परिवहन तक में आमूल बदलाव किया जाए.

तीसरा और सबसे अहम, उत्पादन का सवाल है. शहर छोड़कर भागने वाले कामगारों ने हमें बताया कि उनके रहने और काम करने की स्थितियां भयावह थीं. यह वैश्विक आर्थिक समस्या का मर्म है क्योंकि 'उत्पादन' वहां ले जाया गया है जहां श्रम और पर्यावरण की लागत कम रखी जा सके. यह साल हमें बताता है कि भविष्य अलहदा होना चाहिए और भले ही उत्पादन की लागत बढ़ जाए तथा खपत घट जाए, लेकिन आगे का रास्ता यही होना चाहिए. अवसर भी इसी में निहित हैं—लचीलापन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश.

आखिर में, अंतरनिर्भरता का प्रश्न है. महामारी के इस साल ने हमें यह तो दिखा ही दिया कि वायरस ने हमारी दुनिया की गैरबराबरियों को तीखा कर दिया है. मगर इसने हमें यह भी सिखाया है कि भविष्य अलहदा होना ही चाहिए. बिल्कुल अलहदा. यही 2020 का श्राप है और यही 2021 की संभावना है.

सुनीता नारायण सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट की डायरेक्टर जनरल हैं

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