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आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून

क्रिप्टो के उन्माद को हवा दे रहा है डिजिटल मुद्रा में युवा भारतीयों का 6 अरब डॉलर का निवेश. क्या यह बुलबुला है जो फूटने का इंतजार कर रहा है?

क्रिप्टोकरेंसी क्रिप्टोकरेंसी

एक दोस्त ने 2019 में मुंबई के विज्ञापन जगत के पेशेवर 42 वर्षीय शौविक सेन का तआरुफ क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया से करवाया. कौतूहल से भरे सेन ने एक क्रिप्टो एक्सचेंज में रजिस्टर कर लिया. केवाइसी (नो योर कस्टमर) नियमों की अनिवार्यताएं पूरी करने के बाद उन्होंने अपना बैंक खाता एक्सचेंज के ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म से लिंक कर दिया. फिर उन्होंने म्यूचुअल फंड की बचत का एक हिस्सा कुछ क्रिप्टोकरेंसियों में निवेश कर दिया.

करीबी दोस्तों ने डिजिटल जगत में इस तरह 'जुआ खेलने’ के खिलाफ उन्हें आगाह किया लेकिन सेन इतने उत्सुक और उत्साहित थे कि उन्होंने किसी की एक न सुनी. उन्होंने सबसे बड़ा दांव एथेरियम पर लगाया, जो मूल्य के लिहाज से बिटकॉइन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी है.

उन्होंने कुछ एथेरियम खरीदे, जिनमें से हरेक 15,000 रुपए का था, और इस साल की शुरुआत में जब उनमें हरेक का मूल्य 2.7 लाख रुपए पर पहुंच गया तो बेच दिए. वे कहते हैं, ''अगर ज्यादा इंतजार करता तो मैं और ज्यादा पैसा बना सकता था, क्योंकि एथेरियम की कीमत फिलहाल 3.5 लाख रुपए है. मगर क्रिप्टो की दुनिया में कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता.’’ 

सेन उन लाखों भारतीयों में हैं जो इन दिनों क्रिप्टो उन्माद की गिरफ्त में हैं. क्रिप्टोकरेंसी केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था के दायरे से बाहर काम करती है और अल साल्वाडोर तथा अब क्यूबा को छोड़कर यह कहीं भी वैध मुद्रा नहीं है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इसकी ट्रेडिंग के हिसाब से इसका मूल्य तय होता है और इसीलिए कई लोग इसे महज क्रिप्टो कहना पसंद करते हैं.

आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून
आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून

असल में, पहली क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन ऑनलाइन गेमिंग में प्रोत्साहन लाभ देने वाले टोकन के तौर पर शुरू हुई थी. जब ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें लेन-देन करने लगे तो इसकी कीमत बढ़ने लगी. 15 नवंबर को ऑनलाइन व्यापार में एक बिटकॉइन की कीमत 65,734 डॉलर या लगभग 48.7 लाख रुपए थी.

यह ज्यादा जोखिम ज्यादा इनाम की इसकी खासियत ही है जिसने युवा भारतीयों को अपनी तरफ लुभाया है. कॉइनस्विच कुबेर क्रिप्टो एक्सचेंज के संस्थापक और सीईओ आशीष सिंघल के मुताबिक, डेढ़-दो करोड़ भारतीयों ने क्रिप्टोकरेंसियों में करीब 6 अरब डॉलर (44,400 करोड़ रु.) निवेश किए हैं. कुबेर में 80 क्रिप्टोकरेंसी खरीदी और बेची जा सकती हैं.

मगर क्रिप्टो का अपना स्वभाव, जो नियम-कायदों से परे और विकेंद्रीकृत है, अब उसी के खिलाफ काम करने का खतरा पैदा कर रहा है. क्रिप्टो लॉन्च करने के लिए आपको केंद्रीय बैंक या कंपनी की जरूरत नहीं है. इसकी बुनियादी टेक्नोलॉजी की जानकारी रखने वाला कोई भी शख्स इसे शुरू कर सकता है. मिल्कियत एक ऑनलाइन खाते में दर्ज कर ली जाती है, जिसे दूसरे क्रिप्टो मालिकों का एक नेटवर्क संभालता है.

यह नेटवर्क जानकारी हासिल करने और संवाद के लिए मजबूत क्रिप्टोग्राफी का इस्तेमाल करता है और इसलिए इस व्यवस्था से बाहर के लोगों के लिए कुछ पता लगा पाना मुश्किल होता है. यह भौतिक रूप में मौजूद नहीं है और इसलिए इसे जब्त भी नहीं किया जा सकता. शेयरों की कीमत तो कंपनी की बुनियाद, उसके कार्य प्रदर्शन और कारोबारी नजरिये से तय होती है, लेकिन क्रिप्टो के पीछे ऐसा कोई आधार या समर्थन नहीं है.

इसके बजाए इसकी कीमत खालिस मांग और पूर्ति से तय होती है. बिटकॉइन सरीखी कुछ क्रिप्टोकरेंसी की सप्लाइ सीमित है, जबकि एथेरियम सरीखी दूसरी क्रिप्टोकरेंसी असीमित मात्रा में सप्लाइ हो रही हैं. कभी-कभी क्रिप्टो की सप्लाइ पूरी तरह प्रोजेक्ट की प्रभारी टीम के फैसले से तय होती है.

आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून
आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून

वे ज्यादा टोकन जारी करने का विकल्प चुन सकते हैं या आपूर्ति संभालने के लिए टोकन ''बर्न’’ कर सकते हैं. क्रिप्टो का मूल्य इस पर भी निर्भर करता है कि उसका कोड कैसे लिखा जाता है, डिजिटल क्षेत्र में किसी समस्या को सुलझाने के लिए उसका कितनी अच्छी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, वगैरह.

क्रिप्टोकरेंसी के नए टोकन जिस प्रक्रिया से बनाए जाते हैं, उसे 'माइनिंग’ कहते हैं. इसमें कंप्यूटर से लेन-देन की तस्दीक की जाती है. बदले में प्रोटोकॉल क्रिप्टो टोकन के रूप में इनाम देता है. इसके अलावा लेन-देन करने वाले पक्ष 'माइनर’ को फीस चुकाते हैं.

क्रिप्टो का वैश्विक बाजार पूंजीकरण (यह क्रिप्टो एक्सचेंजों में निवेशकों के क्रिप्टो की कीमत में कुल प्रचलित क्रिप्टो की संख्या का गुणा करके निकाला जाता है) 15 नवंबर को 2.88 ट्रिलियन डॉलर या करीब 212 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया. फिलहाल 7,393 से ज्यादा क्रिप्टोकरेंसी सार्वजनिक लेन-देन में हैं. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि क्रिप्टो जगत में इनकी संख्या इससे दोगुनी हो सकती है.

क्रिप्टो का बुखार जैसे-जैसे सरकारों के नियंत्रण से बाहर जोर पकड़ता जा रहा है, दुनिया भर की सरकारों में इसे नियमों के दायरे में लाने पर चर्चा छिड़ गई है. भारत भी क्रिप्टोकरेंसी के नियमन के लिए कानून बनाने पर विचार कर रहा है. इसके लिए संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक लाया जा सकता है. आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास लगातार सतर्कता बरतने की बात कर रहे हैं.

आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून
आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून

उन्होंने कहा है कि क्रिप्टोकरेंसी देश की ''वृहत अर्थव्यवस्था और वित्तीय स्थिरता’’ के लिए खतरा पैदा कर रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 नवंबर को नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें सरकारी सूत्रों के अनुसार, अन्य मुद्दों के अलावा इस बात पर विचार किया गया कि क्यों ''नियम-कायदों से मुक्त क्रिप्टो बाजारों को धन शोधन और आतंकी वित्तपोषण का जरिया बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती’’ और साथ ही क्रिप्टोकरेंसी के ''गुमराह करने वाले, बड़े-बड़े वादे करने वाले और अपारदर्शी’’ विज्ञापनों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया गया.

भाजपा नेता और सांसद जयंत सिन्हा की अध्यक्षता में वित्त मामलों की संसदीय समिति ने भी क्रिप्टो को लेकर चिंता जाहिर की. मगर क्रिप्टोकरेंसी के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद करने के बजाए उन्हें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के नियामकीय देखरेख के अधीन परिसंपत्ति वर्ग के रूप में इजाजत देने की कोशिशें चल रही हैं.

तो इस तरह क्रिप्टोकरेंसी फिलहाल किस मुकाम पर आ गई है? क्या इसका भविष्य की मुद्रा होना तय है, या यह सिर पर मंडराती मुसीब है जिसे हमें लीलने से पहले जड़ से उखाड़ फेंकना जरूरी है?  ऐसे और अन्य सवालों के जवाब पाने के लिए आइए शुरुआत की तरफ लौटें.

आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून
आवरण कथाः क्रिप्टो करेंसी का जुनून

क्रिप्टो की शुरुआत
क्रिप्टोकरेंसी 2008 के लीमन ब्रदर्स संकट की राख से उत्पन्न हुई. उस साल नवंबर में एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह ने सतोषी नाकामोटो के छद्मनाम से एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया और उसमें एक ग्लोबल वर्चुअल करेंसी बनाने की मांग की. दुनिया की वित्तीय प्रणालियों की अनिश्चितताओं और अनियमितताओं के चलते उन्होंने एक ऐसी करेंसी के रूप में इसकी कल्पना की, जो केंद्रीय बैंकों और नियामकों सरीखी केंद्रीयकृत संस्थाओं से (जहां मुट्ठी भर लोग तमाम फैसले लेते हैं और उस संकट ने उदाहरण सहित दिखाया कि वे सही फैसले नहीं लेते हैं) बचकर निकल सके.

विचार यह था कि दुनिया भर में पारंपरिक ''भरोसेमंद मध्यस्थों’’ के बगैर व्यक्ति से व्यक्ति से बीच लेन-देन की सुविधा विकसित की जाए, ताकि ऐसे लेन-देन ज्यादा तेजी से, ज्यादा सस्ते और ज्यादा पारदर्शी ढंग से किए जा सकें. क्रिप्टो के शुरुआती प्रस्तावकों ने इसे सीमाहीन नई ''मुद्रा’’ बिटकॉइन कहा.

नई व्यवस्था में भरोसा पैदा करने के लिए जिन प्रोटोकॉल या नियम-कायदों का इस्तेमाल किया गया, उन्हें ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी कहा गया. ब्लॉकचेन पूरे नेटवर्क में विभिन्न लेन-देन का विकेंद्रीकृत और वितरित खाता है. यह टेक्नोलॉजी पेशेवरों ने क्राउडसोर्सिंग के माध्यम से 2009 में विकसित की थी. बिटकॉइन पहली क्रिप्टोकरेंसी थी. मगर समय के साथ टेक्नोलॉजी के उत्साही समर्थकों ने कई और क्रिप्टोकरेंसी लॉन्च की. आज वर्चुअल दुनिया में इसके हजारों रूप प्रचलित हैं.

भारत में क्रिप्टो
स्पेसएक्स और टेस्ला के सीईओ इलॉन मस्क के पास क्रिप्टो का ऐसा पोर्टफोलियो है जिससे कोई भी ईर्ष्या करेगा. लाखों दूसरे लोग भी क्रिप्टो को लेकर पागल हुए जा रहे हैं. भारत भी कोई अपवाद नहीं है. महामारी के दौरान जब अनगिनत लोग घर से काम करने को मजबूर हो गए तब काफी निवेशक क्रिप्टो के इर्दगिर्द जमा भीड़ में शामिल हो गए.

हाल के दिनों में क्रिप्टो के मूल्य में जबरदस्त बढ़ोतरी ने भी इसे निवेश का लोकप्रिय विकल्प बना दिया. चूंकि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में क्रिप्टो को वैध मुद्रा के रूप में इजाजत नहीं दी गई, इसलिए इसने निवेश किए जा सकने वाले ''परिसंपत्ति वर्ग’’ (शेयर, नकद और नकद समकक्ष, रियल एस्टेट से मिलती-जुलती खासियतों वाला निवेशों का समूह) के रूप में लगातार ज्यादा से ज्यादा कामयाबी हासिल कर ली.

अल साल्वाडोर में खरीदार डिजिटल वॉलेट में, जिन्हें ''चीवो’’ (अंग्रेजी अनुवाद ''कूल’’) कहा जाता है, बिटकॉइन लोड कर सकते हैं और एक मोबाइल ऐप के जरिए उन तक पहुंच सकते हैं. भुगतान या तो बिटकॉइन में या उनके बराबर डॉलर में किए जा सकते हैं. भारत में निवेशक क्रिप्टो जमा करने और रखने के लिए डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल करते हैं, जिनका फिर क्रिप्टो एक्सचेंज पर लेन-देन किया जाता है.

बिटकॉइन और एथेरियम के अलावा ऊंचे मूल्य की दूसरी क्रिप्टोकरेंसी में बाइनेंस कॉइन, सोलाना, टेथर, कार्डानो, एक्सआरपी, पोलकाडोट, डॉजकॉइन और यूएसडी कॉइन शामिल हैं (देखें: 10 सबसे ज्यादा मूल्य वाली क्रिप्टोकरेंसी). एक प्रकार का डिजिटल टैग, नॉन-फंजिबल टोकन (एनएफटी) निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए हैं. इनका लेन-देन डिजिटल दुनिया में ज्यादातर कला की नीलामी में किया जाता है (देखें: एनएफटी को मिली सितारों की ताकत).

कुल मिलाकर छोटे और बड़े करीब 40 क्रिप्टो एक्सचेंज हैं, जो संभावित निवेशकों को लुभाने के लिए होड़ करते रहते हैं. कुछ एक्सचेंज ने ''जागरूकता पैदा करने’’ के लिए प्रमोशन और विज्ञापन का अभियान छेड़ दिया है और मुख्यधारा के मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भारी रकम खर्च कर रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने हाल में हुए टी20 विश्व कप के दौरान करीब 50 करोड़ रुपए खर्च किए, जिससे सरकार का ध्यान इन पर गया और वह बिन मांगी जांच-पड़ताल के लिए तत्पर हुई.

यूट्यूब और सोशल मीडिया साइटों पर सैकड़ों व्लॉगरों ने अंग्रेजी, हिंदी और कई क्षेत्रीय भाषाओं में इच्छुक निवेशकों को क्रिप्टो में निवेश के अवसरों के बारे में ''शिक्षित करने’’ का बीड़ा उठा रखा है. क्रिप्टो एक्सचेंज कॉइनडीसीएक्स के संस्थापक सुमित गुप्ता के इंटरव्यू का, जिसका शीर्षक था ''मीट इंडियाज क्रिप्टो मिलियनेयर’’ (मिलिए भारत के क्रिप्टो करोड़पति से), एक वीडियो मार्च में यूट्यूब पर अपलोड किया गया था और इसने दस लाख से ज्यादा व्यू जुटा लिए.

उद्योग की संस्था नैसकॉम की एक हालिया रिपोर्ट का अनुमान है कि यह क्रिप्टो बाजार में फिलहाल 50,000 लोग कार्यरत हैं, और यह 2030 तक 8,00,000 से ज्यादा नौकरियों का सृजन करने की क्षमता और संभावना से भरा है. रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत के 60 फीसद राज्य क्रिप्टो टेक्नोलॉजी को अपनाने वाले राज्यों के तौर पर उभर रहे हैं और 2030 तक इस उद्योग का 241 अरब डॉलर पर पहुंचना तय है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का क्रिप्टो टेक उद्योग बीते पांच सालों में 39 फीसद बढ़कर 2020-21 में 7.42 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया. इतना ही नहीं, बीते दो सालों में यह उद्योग टेक्नोलॉजी क्षेत्र की रफ्तार से चार गुना तेजी से बढ़ा है. इस अवधि में क्रिप्टो स्टार्ट-अप में सांस्थागत निवेश आठ गुना बढ़ा है. भारत में अभी 230 क्रिप्टो स्टार्ट-अप काम कर रहे हैं.

आलोचना और विरोध
अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन सरीखे देशों ने बिटकॉइन में व्यापार की इजाजत दी है जबकि चीन और रूस ने नहीं. चीन ने तो क्रिप्टो लेन-देन पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है. हालांकि उद्योग के कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह क्रिप्टो की कीमतें गिराने और फिर कम कीमत पर उन्हें खरीदने की सोची-समझी रणनीति है. चीन नियम-कायदों से अत्यधिक बंधे और केंद्रीयकृत डिजिटल युआन या ई-सीएनवाइ के सामने आने वाली किसी प्रतिस्पर्धा को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता है. ई-सीएनवाइ का इस्तेमाल मुख्यत: खुदरा लेनदेन में किया जाता है.

दूसरी तरफ भारत बहुत फूंक-फूंक कदम रख रहा है. 2018 में आरबीआइ (भारतीय रिजर्व बैंक) ने क्रिप्टो में व्यापार पर पाबंदी लगा दी थी. मार्च 2020 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इसे रद्द कर दिया. इससे क्रिप्टो व्यापार में फिर नया उछाल आ गया. दुनिया भर की सरकारें विचार कर रही हैं कि ऐसी चीज को नियंत्रण में कैसे लाया जाए जो पूरी तरह नियंत्रण रोकने के लिए ही डिजाइन की गई है. ऐसे में भारत में भी इस चर्चा की शुरुआत होती दिख रही है.

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के अनुसार, क्रिप्टो को लेकर जन नीति से जुड़े कई प्रमुख सरोकार हैं. इनमें सबसे अव्वल क्रिप्टो की असली फितरत को समझना है, क्योंकि ब्लॉकचेन और क्रिप्टोग्राफी टेक्नोलॉजी अपने आप में वैकल्पिक डिजिटल दुनिया है, जो बहुत तेजी से बढ़ रही है और क्रिप्टो प्लेटफॉर्म पर दी जा सकने वाली डिजिटल सेवाओं का लगातार ज्यादा से ज्यादा विस्तार कर रही है. औद्योगिक जमाने की कागजी मुद्रा के मुकाबले डिजिटल मुद्रा के अनगिनत फायदे हैं.

मुद्रा जारी करना हालांकि संप्रभु कार्य और जिम्मेदारी है और इन्हें चंद लोगों के हाथों में नहीं दिया जा सकता. जिस तरह किसी भी नई टेक्नोलॉजी से लोग जबरदस्त रोमांचित हो उठते हैं, उसी तरह क्रिप्टो के असली फितरत और क्षमता की ठोस जानकारी के अभाव में इसके जरूरत से ज्यादा फूला हुआ बुलबुला बन जाने का खतरा है. पूरी संभावना है कि कई निवेशक अपनी असली रकम क्रिप्टो में फूंक देंगे.

यही वजह है कि सरकार को निवेशकों और ग्राहकों को सुरक्षा देनी चाहिए. यही नहीं, क्रिप्टो की दुनिया में ज्यादातर आमदनी और पूंजीगत फायदे ''रडार की छत्रछाया’’ में कमाए जा रहे हैं. ऐसे में, सरकार को क्रिप्टो और उससे जुड़े कारोबारों के लिए वाजिब कराधान तय करने की जरूरत है. क्रिप्टो के कारोबार में मूल्य संवर्धन, लेन-देन, विकेंद्रीकृत वित्त और दूसरे कारोबारों से हासिल आमदनी और क्रिप्टो मुद्राओं में निवेश से मिले पूंजीगत लाभों पर कर लगाने के बारे में अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है.

खिर में, पूरी संभावना है कि आतंकवादी, धनशोधक और दूसरे असामाजिक तत्व क्रिप्टो पारितंत्र का दुरुपयोग कर सकते हैं. लिहाजा, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पर्याप्त रक्षाकवच का निर्माण करना अहम और जरूरी है.

क्रिप्टो के अवास्तविक ढंग से ऊंचे मूल्य निर्धारणों ने भी बुलबुले की आशंकाएं पैदा कर दी है. फिनटेक कंपनी यूट्रेड सॉल्यूशंस के सह-संस्थापक और सीईओ कुणाल नंदवाणी क्रिप्टो के इर्दगिर्द रचे गए प्रचार के खिलाफ आगाह करते हैं. यह प्रचार इसके पीछे किसी बुनियादी मजबूती की बजाए बीते साल इसके मूल्य में आए उछाल पर टिका है. वे कहते हैं, ''इसे क्रिप्टोकरेंसी के तौर पर ईजाद किया गया, जिसका मतलब है कि आप सरकार की ओर से अधिकृत केंद्रीय विनियमित व्यवस्था के समानांतर किसी को धन भेज सकते हैं.

मगर ऐसा कतई नहीं हो रहा है. इसकी बजाए हर कोई कॉइन की जमाखोरी कर रहा है ताकि उन्हें बाद में ऊंची कीमत पर बेच सके.’’ नंदवाणी इस समूची व्यववस्था के उस स्वरूप पर भी सवाल खड़े करते हैं, जिसे इसके समर्थक ''विकेंद्रीकृत’’ बताते हैं. वे कहते हैं, ''ज्यादातर क्रिप्टो के बीचोबीच एक सीईओ है और वे खुद अपना बेहतर मुनाफा बनाने पर काम कर रहे हैं. लिहाजा, इस तथाकथित विकेंद्रीकरण में बहुत ज्यादा केंद्रीकरण है.’’

क्रिप्टो की गुत्थी सुलझाना
कई देश क्रिप्टो को वैध मुद्रा का दर्जा देने में आनाकानी कर रहे हैं तो उसके मूल में उनकी यह आशंका है कि यह कहीं उनकी संप्रभु मुद्राओं को लेन-देन के साधन के रूप में बेदखल न कर दे. मगर सरकार समर्थित डिजिटल मुद्रा के काफी समर्थक हैं. भारत में डिजिटल भुगतान का बहुत विशाल पारितंत्र पहले से ही है, जिसमें मूल्य के हिसाब से 95 फीसद से ज्यादा भुगतान डिजिटल हैं जो यूपीआइ (यूनाइफाइड पेमेंट इंटरफेस) और आइएमपीएस (तत्काल भुगतान सेवा) से किए जाते हैं.

हालांकि मूल्य के लिहाज से ज्यादातर भुगतान अब भी भौतिक रूप में ही किए जाते हैं. ठीक यहीं ज्यादा बहुमुखी और इस्तेमाल में ज्यादा आसान डिजिटल मुद्रा अपनी भूमिका अदा कर सकती है. लेन-देन के लिए डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल करते हुए (जो भारत में बैंक खाते से होने वाले डिजिटल भुगतान से अलग हैं) चीन ठीक यही प्रयोग कर रहा है.

दूसरे विशेषज्ञ क्रिप्टो के कई फायदे गिनाते हैं. क्रिप्टो एक्सचेंज जेबपे के सीईओ राहुल पगड़ीपति बताते हैं कि बिटकॉइन ने किस तरह विकेंद्रीकृत, तिहरी प्रविष्टि वाली लेखा पद्धति और मूल्य हस्तांतरण व्यवस्था की शुरुआत की है, जो मुनाफे की खातिर जन नीति के साथ छेड़छाड़ को कम करती है, भ्रष्टाचार से लड़ती है और मुद्रास्फीति का मुकाबला करती है. इसकी सभी अंतर्निहित टेक्नोलॉजी और अनेक क्षेत्रों में उनके प्रयोग की जबरदस्त संभावनाएं भी हैं.

कंसल्टिंग फर्म प्राइसवॉटरहाउसकूपर्स के मुताबिक, क्रिप्टोकरेंसी दरअसल टेक्नोलॉजी से संचालित बाजारों के एक नए दौर की शुरुआत दर्शाती है. इन बाजारों में पारंपरिक बाजार रणनीतियों, लंबे समय से चली आ रही कारोबारी प्रथाओं और स्थापित नियामकीय नजरिये का कायापलट करने की क्षमता है, जिससे उपभोक्ता और व्यापक रूप से अर्थव्यवस्था को फायदा होगा. फर्म यह भी कहती है कि क्रिप्टो मुद्राओं में उपभोक्ताओं को किसी भी जगह, किसी भी समय वैश्विक भुगतान प्रणालियों तक पहुंचने देने की क्षमता है.

इसमें भागीदारी को कर्ज का इतिहास और बैंक खाता होने सरीखे कारकों की बजाए केवल एक चीज—टेक्नोलॉजी तक पहुंच—ही रोकती है. वित्तीय सेवाओं में इसका मतलब होगा बैंक से बैंक को कहीं सस्ता धन हस्तांतरण और खुदरा बाजार में ज्यादा आसान खरीद और क्रेडिट कार्ड के जरिए लेन-देन के मुकाबले कम लागत. इसकी बदौलत कई लोगों ने डिजिटल टोकन आधारित धन उगाही के जरिए शुरुआती चरण के टेक्नोलॉजी स्टार्ट-अप में निवेश किया. यह कई पारंपरिक नियामकीय खतरों को दरकिनार कर देती है और इसके जरिए आप नकदी की जगह कपड़े, खिलौने या लैपटॉप और अन्य चीजें भेज पाते हैं.

र्ग कहते हैं, ''क्रिप्टो टेक्नोलॉजी ईकोसिस्टम बहुत तेजी से विकसित हो रहा है. हर रोज संभावनाशील नए उत्पाद या सेवाएं आ रही हैं. संभावनाएं तो वाकई जबरदस्त हैं.’’ दुनिया भर में केंद्रीकृत डेटाबेस की डिजिटल अर्थव्यवस्था का जीडीपी इस वक्त 5 ट्रिलियन डॉलर (370 लाख करोड़ रु.) से अधिक हो गया है, वहीं विकेंद्रीकृत या क्रिप्टो की डिजिटल अर्थव्यवस्था के जीडीपी का फिलहाल कोई अनुमान नहीं है.

वे कहते हैं कि क्रिप्टो परिसंपत्तियों के पूंजी बाजार मूल्य निर्धारण को अर्थव्यवस्था/जीडीपी में उसका योगदान नहीं मान लेना चाहिए. मगर जीडीपी में विकेंद्रीकृत डिजिटल और क्रिप्टो टेक्नोलॉजी का योगदान तेजी से बढ़ने की संभावना है. वे यह भी कहते हैं, ''मैं नहीं मानता कि विकेंद्रीकृत क्रिप्टो व्यवस्था, केंद्रीकृत डेटाबेस डिजिटल अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर बेदखल कर देगी, पर इसका इस्तेमाल उन ज्यादातर क्षेत्रों में फैलने की संभावना जरूर है जिनमें फिलहाल कारोबार खड़े करने और चलाने के लिए केंद्रीकृत डेटाबेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है.’’

उनके अनुसार, भारत को सभी क्षेत्रों और खासकर सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय क्षेत्रों में क्रिप्टो डेटाबेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए उत्पादों, सेवाओं और परिसंपत्तियों का निर्माण करने के लिए समर्थ बनाने और ताकत देने वाले पारितंत्र के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए.

सिंघल मानते हैं कि आने वाले कल के टेक्नोलॉजी दिग्गज ब्लॉकचेन के इस्तेमाल से आएंगे और भारत से आएंगे. वे कहते हैं, ''आज भारत टेक्नोलॉजी का आयातक है. कारोबार शुरू कर रहे किसी भी शख्स को ऐसी टेक्नोलॉजी के लिए भारी कीमत अदा करनी पड़ती है और धन देश से बाहर चला जाता है. मगर अब हमारे सामने मौका है जब हम अपने यहां ऐसी टेक्नोलॉजी का निर्माण कर सकते हैं और शुद्ध निर्यातक बन सकते हैं.’’

आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास यह दलील मानने को राजी नहीं हैं. उनके अनुसार, ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी कोई नई नहीं है. यह 10 सालों से है. उन्हें कोई संदेह नहीं कि यह बढ़ेगी और इसके लिए उसे क्रिप्टो की जरूरत नहीं है.

तो सरकार और क्रिप्टो समर्थक दोनों की ही यह राय बन रही है कि क्रिप्टो को व्यापार के लिए परिसंपत्ति के रूप में काम करने देना चाहिए. सिंघल कहते हैं, ''संप्रभु राष्ट्र के रूप में हम मुद्रा का नियंत्रण सरकार के हाथों से बाहर नहीं जाने दे सकते.’’ मगर क्रिप्टो महज मुद्रा से कहीं ज्यादा हो गई है. वे कहते हैं, ''मुद्रा होने से यह परिसंपत्ति वर्ग होने की तरफ बढ़ गई है.’’ सरकार भी सहमत दिखती है. हालांकि इसके साथ वह नियामकीय देखरेख भी चाहेगी.

पनवेल, नवी मुंबई के डिजिटल मार्केटिंग आंत्रप्रेन्योर, 43 वर्षीय आनंद महेश कहते हैं, ''नियम-कायदों और जो निर्दिष्ट खुलासे करने पड़ते हैं उनके बारे में स्पष्टता से मुझ जैसे निवेशकों को मदद मिलेगी.’’ महेश ने सात महीने पहले क्रिप्टो में निवेश शुरू किया था और दो क्रिप्टो एक्सचेंज के मार्फत अब तक करीब 2.2 लाख रुपए लगाए हैं. वे कहते हैं, ''मैं अपना कोई भी निवेश लंबे समय तक कायम नहीं रखता.

अगर मुझे 25-30 फीसद रिटर्न भी मिल जाता है तो बाहर निकल आता हूं.’’ उनका क्रिप्टो पोर्टफोलियो बिटकॉइन और एथेरियम सरीखे लंबे वक्त के निवेशों, जो उनके मुताबिक ''स्थिर’’ हैं, और सोलाना, डॉजकॉइन, रिपल, लाइटकॉइन और कार्डानो सरीखे छोट वन्न्त के निवेशों का मिश्रण है.

शुरुआती स्टार्ट-अप में निवेश करने वाली वेंचर कैपिटल फर्म 100एक्स वीसी के संस्थापक और पार्टनर संजय मेहता मानते हैं कि एक्सचेंजों और वॉलेट कंपनियों के सुझाए सुरक्षा नियमों का पालन और एहतियात बरतने की जिम्मेदारी निवेशकों के कंधों पर है.

वे कहते हैं, ''निवेशकों ने इक्विटी बाजारों में निवेश का अपना सफर शुरू करते वक्त जैसे खुद को शिक्षित किया था, ठीक उसी तरह उन्हें चाहिए कि इस परिसंपत्ति वर्ग के बारे में भी अपने को शिक्षित करें. बैंकों ने सुरक्षा के ढेर सारे उपाय किए हैं, इसके बावजूद हम ऑनलाइन बैंकिंग चोरियों और फिशिंग हमलों के बारे में आए दिन मीडिया में पढ़ते हैं.’’

मसलन, कर्नाटक पुलिस ने भारतीय एक्सचेंजों को कथित तौर पर हैक करने और ''बग का फायदा उठाकर’’ बिटकॉइन चुराने पर 26 साल के एक शख्स को हाल ही में हिरासत में लिया. खबरों की मानें तो बड़े क्रिप्टो एक्सचेंजों ने साइबर हमलों के कम से कम दो-तीन बड़े मामले देखे हैं, जिनमें वॉलेट हैक हो जाने के बाद निवेशक अपनी क्रिप्टो पूंजी गंवा बैठे.

इसमें शक नहीं कि क्रिप्टो मुद्राओं ने खासा रोमांच पैदा कर दिया है. मगर किसी भी दूसरे व्यसन की तरह संयम ही कुंजी है. लोगों की तरफ से, प्रमोटरों की तरफ से और सरकार की तरफ से नियमन ही मुद्रा के रूप में क्रिप्टो को बनाए रखने का एकमात्र तरीका है. ठ्ठ

‘‘क्रिप्टो की असली फितरत और संभावनाओं की (भरोसेमंद) जानकारी के अभाव में खतरा यह है कि यह फूला हुआ बुलबुला साबित हो सकता है’’
—सुभाष चंद्र गर्ग, पूर्व वित्त सचिव


''नियमन का इस इंडस्ट्री में स्वागत है. हम नहीं चाहते कि इस ईको सिस्टम में कोई ऐसा खराब कुछ भी करे जिससे यूजर्स को नुक्सान हो.’’
आशीष सिंघल, संस्थापक और सीईओ कॉइनस्विच कुबेर

''निवेशकों ने इक्विटी बाजारों में निवेश का अपना सफर शुरू करते वक्त जिस तरह खुद को शिक्षित किया था, ठीक उसी तरह उन्हें चाहिए कि इस परिसंपत्ति वर्ग के बारे में भी अपने को शिक्षित करें’’ 
संजय मेहता, संस्थापक और पार्टनर, 100एक्स वीसी

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