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उत्तराखंडः सुधार का एक और मौका

कांग्रेस के आपसी झगड़े ने सत्तासीन भाजपा के लिए काम आसान कर दिया हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट हार गए.

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वोट देने के बाद धामी और उनकी पत्नी गीता धामी वोट देने के बाद धामी और उनकी पत्नी गीता धामी

कमल भट्ट

उत्तर भारत के छोटे-से पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड में कुछ नया देखने को मिल रहा है. यहां 10 मार्च की शाम को विधानसभा चुनावों के वोटों की गिनती खत्म हुई. चुनाव नतीजों से सरकार तो नहीं बदली, लेकिन इतिहास बदल चुका है. 21 साल पहले बने इस राज्य में पहली बार कोई पार्टी लगतार दूसरी बार अपनी सत्ता बरकरार रखने में सफल हुई है.

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 57 सीटें जीतकर अभूतपूर्व बहुमत हासिल किया था. हालांकि, साल 2022 के चुनाव परिणामों में भाजपा को 10 सीटों का नुक्सान हुआ है और उसे 47 सीटें मिली हैं. उसका वोट प्रतिशत भी 2017 में 46.5 फीसद था, जो घटकर 43.5 फीसद हो गया है. इसके बावजूद भाजपा की यह जीत अभूतपूर्व है.

हालांकि, साल 2017 से 2022 तक तीन मुख्यमंत्री बदल चुकी भाजपा को भी इस बार यह पक्का भरोसा नहीं था कि वह फिर से इतना बड़ा बहुमत हासिल करेगी. इस बात के संकेत भी दिखे जब 6 मार्च को भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय राजधानी देहरादून पहुंचे. उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि भाजपा ने बहुमत न आने की स्थिति में अपना बी-प्लान तैयार कर लिया है.

चुनाव नतीजे आने के बाद सरकार बनाने के लिए भाजपा को अब किसी और प्लान की जरूरत नहीं है. लेकिन एक चुनाव नतीजा है जिसके लिए भाजपा को थोड़ी माथापच्ची करनी पड़ेगी. चुनाव जीतकर भाजपा ने राज्य में लगातार दोबारा सरकार नहीं बना पाने वाले मिथक को तो तोड़ दिया है, लेकिन एक मिथक अभी भी बरकरार है. साल 2012 और 2017 की ही तरह मुख्यमंत्री का चेहरा इस बार भी अपनी सीट बचाने में नाकाम रहा है.

दरअसल, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उधमसिंहनगर जिले की खटीमा सीट से हार  गए. साल 2012 और 2017 में खटीमा से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे धामी को कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी ने 7,273 वोटों से हराया. कापड़ी और धामी के बीच पिछली बार भी वोटों का अंतर सिर्फ 2,709 था.

हालांकि धामी ने भाजपा की जीत पर खुशी जाहिर की है. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर रही है. मैं पार्टी और केंद्रीय नेतृत्व का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने मेरे जैसे कार्यकर्ताओं को मौका दिया, जो दूर-दराज के गांवों और विनम्र पृष्ठभूमि से आते हैं.’’

उत्तराखंडः सुधार का एक और मौका
उत्तराखंडः सुधार का एक और मौका

पिछले साल भाजपा ने छह महीने के भीतर दो मुख्यमंत्रियों को बदल दिया था. पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत को और फिर तीरथ सिंह रावत को हटा दिया गया था. उसके बाद भाजपा ने धामी पर दांव खेला. संघ का बैकग्राउंड, साफ-सुथरी छवि और युवा चेहरा, ये सब बातें धामी के पक्ष में गई थीं. हालांकि तब यह भी माना जा रहा था कि तीन मुख्यमंत्री बदल कर भाजपा ने बड़ा रिस्क लिया है.

लेकिन पार्टी के रणनीतिकार इस बात से सहमत नहीं थे. होते भी क्यों 2007 से 2012 के कार्यकाल में भी भाजपा ने दो बार मुख्यमंत्री बदले थे. साल 2009 में जनरल बी.सी. खंडूरी को हटाकर रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाया गया था. फिर 2012 के विधानसभा चुनाव से छह महीने पहले जनरल खंडूरी को दोबारा मुख्यमंत्री बना दिया गया था. तब भाजपा 31 सीट जीतकर सत्ता विरोधी लहर को काबू करने में कुछ हद तक सफल भी हो गई थी. 

साल 2002 से 2022 हर पांच साल में सरकार बदल देने वाली उत्तराखंड की जनता ने इस बार दोबारा भाजपा पर भरोसा जताया है. इस जीत में सबसे बड़ा फैक्टर रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा. केंद्र में मोदी के आगमन के बाद भाजपा उत्तराखंड में लगातार मजबूत हुई है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की पांचों सीट जीतने वाली भाजपा ने 2019 में भी पांचों सीटों पर कब्जा किया था. उत्तराखंड में फौजी पृष्ठभूमि वाले परिवारों की अच्छी-खासी संख्या है. यह वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा का वोटर माना जाता है और नरेंद्र मोदी के आने के बाद से इन वोटों पर भाजपा की पकड़ और मजबूत हुई है.

शहरी इलाकों में इस बार चाहे मोदी की वैसी लहर न दिखी हो, जैसी 2017 में दिखी थी. लेकिन ग्रामीण इलाकों में मोदी की फेस वैल्यू न सिर्फ कायम है बल्कि बढ़ी है. केंद्र की ग्रामीण शौचालय योजना हो या कोविड काल में राशन का वितरण, इन योजनाओं ने ग्रामीण इलाके में लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डाला है. इसके अलावा प्रधानमंत्री का सीधे लोगों से जुड़ाव भी इन चुनावों में एक बड़ा फैक्टर रहा. 

इस साल 11 फरवरी यानी वोटिंग से 3 तीन दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अल्मोड़ा स्टेडियम में चुनावी रैली की थी. यहां कांग्रेस को निशाना बनाने से पहले अपने चिर-परिचित अंदाज में प्रधानमंत्री ने लोगों का कुमाऊंनी बोली में अभिवादन किया. तब एक भाजपा कार्यकर्ता ने बताया, ''साल 2019 की रुद्रपुर रैली में भी ऐसा ही हुआ था, लोग इन बातों को भूलते नहीं हैं.’’

अल्मोड़ा और श्रीनगर की रैली में प्रधानमंत्री ने ने केंद्र की परियोजना, चार-धाम हाइवे प्रोजक्ट, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन आदि का भी जिक्र किया. भाजपा राज्य सरकार के कार्यों के बजाए केंद्र के काम पर वोट मांगती ज्यादा दिखाई दी. 

भाजपा की जीत में एक अनदेखा फैक्टर और रहा. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उत्तराखंड से पुराना रिश्ता. योगी का जन्म पौड़ी जिले में हुआ है. आज भी उनके परिवार के कई लोग यहीं रहते हैं. उत्तराखंड में कई बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं जो उत्तराखंड में योगी जैसा नेता चाहते हैं. यहां तक कि उत्तराखंड सरकार से नाराज कई लोग योगी की तारीफ करना नहीं भूलते.

भाजपा को चुनाव जिताने में उनकी विरोधी कांग्रेस ने भी कम मदद नहीं की.  कांग्रेस के भीतर आपसी खींचतान ने भाजपा को आसानी से एकजुट होने और हिंदुत्व, विकास और राष्ट्रवाद का ढोल पीटने का मौका दे दिया. चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस में अंदरूनी तकरार साफ दिखाई दी.

रामनगर सीट पर चुनाव की तैयारी कर रहे रणजीत रावत को रोकने के लिए हरीश रावत पहुंच गए. अंत में दोनों ही रामनगर सीट से नहीं लड़ पाए. इस उठापटक के चलते रामनगर की सीट तो कांग्रेस के हाथ से गई ही, साथ ही सल्ट की सीट, जहां रणजीत रावत को लड़ने भेजा गया, वहां भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा.

उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे, हरीश रावत को इस बार भी हार से संतोष करना पड़ा. नैनीताल की लालकुआं सीट से उन्हें भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने 17,527 वोटों से हराया. 2017 में मुख्यमंत्री रहते हुए रावत किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण, दो सीटों से लड़े थे. दोनों ही जगह उनकी हार हुई थी. हरीश रावत कहते हैं, ''हमें उम्मीद थी कि लोग बदलाव के लिए वोट देंगे. लेकिन हमारी कोशिशों में कुछ कमी रह गई. मैं इस हार की जिम्मेदारी लेता हूं.’’

भाजपा की जीत के बावजूद उत्तराखंड की राजनीति को स्थिरता मिलेगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा. यहां नारायण दत्त तिवारी (2002-07) के अलावा कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. धामी की हार के बाद भाजपा को नए सिरे से मुख्यमंत्री के लिए माथापच्ची करनी होगी. श्रीनगर से विधायक चुने गए धन सिंह बिष्ट और चौबट्टाखाल से विधायक सतपाल महाराज इस रेस में सबसे आगे दिख रहे हैं.

हालांकि रोजगार के लिए पलायन की मार झेल रहा यह राज्य, संभव है, इस बार मुख्यमंत्री का पलायन भी देखे. उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को छोड़ दें तो अब तक सभी मुख्यमंत्री पहाड़ी क्षेत्रों से चुने गए हैं. राज्य के चार मैदानी जिलों में विधानसभा की 34 सीटें आती हैं. पिछले 10 वर्षों में पहाड़ की अपेक्षा मैदानी इलाकों की जनसंख्या में अधिक वृद्धि हुई है.

अगले परिसीमन में संभव है, मैदानी सीटों में और भी इजाफा हो. इसलिए संभव है कि मुख्यमंत्री के लिए इस बार मैदानी इलाके को तरजीह मिले. उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष और पांचवीं बार हरिद्वार से चुनाव जीते मदन कौशिक भी पहले कह चुके हैं कि मैदानी इलाकों को भी एक बार मुख्यमंत्री चुनने का मौका मिलना चाहिए.

उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून स्थित विधानसभा को अगले पांच साल भी स्थायी सरकार मिलने जा रही है और यह भाजपा का लगातार दूसरा कार्यकाल होगा. लेकिन, राज्य की परेशानियां वही हैं जो 21 साल पहले थीं. बदहाल स्वास्थ्य सेवा, दरकते पहाड़, बेरोजगारी, पलायन जैसे मुद्दे ज्यों के त्यों बने हुए हैं. वैसे तो राज्य संभालना मुख्यमंत्री का काम होता है, पर 21 साल में राज्य इतने मुख्यमंत्री देख चुका है कि नए को यह कैसे संभालेगा, देखना दिलचस्प होगा. 

—कमल भट्ट साथ में अनिलेश एस. महाजन

उन्होंने क्यों दिया भाजपा को वोट

1. पीएम मोदी का ब्रान्ड और हिंदुत्व की अपील अभी भी पहाड़ों पर कायम है. काम को कर दिखाने वाली उनकी छवि और 'डबल इंजन’ के भाजपा के दांव को अभी भी समर्थन हासिल है

2. कांग्रेस के भीतर भारी घमासान ने वोटरों को निराश कर दिया. वरिष्ठ नेता हरीश रावत को काफी ड्रामे के बाद पार्टी के अभियान का प्रभारी बनाया गया, लेकिन उन्हें अपनी पसंद की सीट तक नहीं मिली और उम्मीदवारों के चयन में उनकी नहीं चली

3. हालांकि सीएम पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट ही हार गए, लेकिन उनकी छवि अच्छी थी और युवाओं के बीच वे लोकप्रिय थे.

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