scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

आवरण कथाः चुनौती तो दमदार

क्या समाजवादी पार्टी के युवा मुखिया उत्तर प्रदेश में ताकतवर भाजपा को हरा पाएंगे?

X
प्रमुख दावेदार अखिलेश 21 फरवरी को लखनऊ के रोड शो में प्रमुख दावेदार अखिलेश 21 फरवरी को लखनऊ के रोड शो में

लखनऊ के मुख्य बाजार हजरतगंज में चुनावी रोड शो और रैली के लिए अखिलेश यादव करीब घंटे भर देर से पहुंचे. फिर भी भीड़ छंटने के बजाए ऐसे रहस्यमय आदिम अंदाज में बढ़ती गई, जैसे किसी फंतासी वीडियो में कोई प्राचीन काल में अचानक जंगल को उगते देख रहा हो, जब तक वह विशाल सजीव लहरों की तरह उनके प्रचार अभियान वाले बस की ओर उछलने नहीं लगी.

उस विशाल जन-समूह से वैसा ही प्यार-दुलार उमड़ रहा था, जैसे कोई रॉकस्टार के लिए उन्माद-सा दिखता है, लड़कियां और महिलाएं उनकी नजरें अपनी ओर करने के लिए हाथ हिला रही थीं और झुंड के झुंड नौजवान किसी तरह उनका हाथ छू लेने को उतावले थे. कुछ जांबाज तो खतरनाक कलाबाजियां दिखा रहे थे, चलती मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा युवक खड़े होकर एक हाथ में झंडा और दूसरे से सेल्फी ले रहा था.

कुछ उन्हें कांसे का गदा देना चाहते थे, तो कुछ दूसरे हिंदू देवताओं की चमचमाती तस्वीरें या साइकिल (पार्टी का चुनाव चिन्ह) का लघु मॉडल या गुलदस्ते थमाना चाहते थे. अखिलेश की नजर भीड़ में उन पर पड़ी तो ड्राइवर से रुकने को कहा और तोहफे लेने के लिए हाथ बढ़ाए.... बेशक यह खतरा बदस्तूर था कि उनका हाथ ही न खींच लिया जाए.

आवरण कथाः चुनौती तो दमदार
आवरण कथाः चुनौती तो दमदार

अखिलेश कहते हैं, ''कम से कम मैं इतना तो कर ही सकता हूं कि उनके तोहफे लूं—यह मुझे उनसे जोड़े रखता है और इसकी याद हमेशा उनमें बनी रहती है.’’ वे अपनी खास शैली में बोलते हैं, जो बिना धमाकों के सब खोल देती है, लेकिन इस विशाल भीड़ में हर कोई उम्मीद कर रहा होगा कि ये सब महज यादगार लम्हे से ज्यादा कुछ हो.

ऐसी भीड़ शहर भर में उनकी प्रचार बस यात्रा में उमड़ती रहती है. इसके महज दो दिन बाद 23 फरवरी को लखनऊ में वोट पड़ा, जो चौथे चरण के मतदान के लिए मध्य उत्तर प्रदेश की कुल 59 विधानसभा क्षेत्रों का वर्ग बनाया गया था. लखनऊ शहर को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हाल के वर्षों में गढ़ माना जाता रहा है. वह यहां की इकलौती लोकसभा सीट 1991 से लगातार आठ बार जीत चुकी है और 2017 में सभी पांचों विधानसभा क्षेत्रों को उसने अपनी झोली में डाल लिया था.

आवरण कथाः चुनौती तो दमदार
आवरण कथाः चुनौती तो दमदार

तो, क्या यहां अखिलेश के लिए उमड़ी इस भीड़ को यह संकेत माना जा सकता है कि समूचे राज्य में समाजवादी पार्टी (सपा) के पक्ष में लहर बह रही है? हालांकि, अखिलेश इस भीड़ से जोश में नहीं आते और कहते हैं, ''यह देखकर उत्साह बढ़ता है, मगर मुझे अभी लंबी दूरी तय करना है.’’ सही भी है. अभी तीन चरण की वोटिंग बाकी है, और वह भी सबसे उलझे पूर्वी उत्तर प्रदेश के मैदान में. इसलिए ईमानदारी से कहें तो यह यही बताता है कि सपा नेता कितना जमीन से जुड़े और व्यावहारिक समझ के हैं. वे अपनी टीम के साथ बाकी की जंग के लिए पार्टी की चुनावी रणनीति तैयार करने में जुट जाते हैं.

यह राजनैतिक चमत्कार ही होगा कि 48 वर्षीय अखिलेश जीत खींच लाते हैं (नतीजे 10 मार्च को आने हैं). 2017 में भाजपा ने करीब 40 फीसद वोट और कुल 403 में 312 सीटें अपने दम पर (एनडीए को 325 सीटें) हासिल करके भारी बहुमत जुटा लिया था. इसके उलट, सपा को काफी झटका लगा था, जबकि उसे 2012 में 29 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ 224 सीटें मिली थीं. 2017 में उसकी सीटों की संख्या असम्माजनक 47 पर पहुंच गई और वोट हिस्सेदारी 21.8 फीसद पर पहुंच गई.

पार्टी के 1992 में गठन के बाद पहली बार इतनी सीटें कम हुईं. अगर अखिलेश को भाजपा को हराना है तो उन्हें सुनिश्चित करना होगा कि सपा की वोट हिस्सेदारी दोगुनी होकर करीब 40 फीसद पहुंच जाए, और यह भाजपा के वोट प्रतिशत में सेंध लगाकर करना होगा. संख्या में ऐसा उलट-फेर असंभव  नहीं है.

आवरण कथाः चुनौती तो दमदार
आवरण कथाः चुनौती तो दमदार

भाजपा ने 2017 में यही तो किया था. उसने 15 फीसद वोट हिस्सेदारी से 39.7 फीसद पर पहुंचने की भारी कामयाबी हासिल कर ली थी. सवाल है कि क्या अखिलेश ने सकारात्मक लहर तैयार करने के लिए ऐसा कुछ किया है, या अगर वे लोकप्रियता के ऊंचे पायदान पर खड़े होने से कुछ चूक जाते हैं तो क्या सरकार विरोधी रुझान इतना तगड़ा है कि वह भरपाई कर दे? 

इस सवाल का जवाब अभी बाकी है, लेकिन कई चुनाव विज्ञानी मानते हैं कि अभी तक अखिलेश काफी मार्के की कामयाबी हासिल कर चुके हैं. भीड़ भरे चुनावी मैदान में वे खुद को भाजपा के खिलाफ प्रमुख दावेदार की तरह पेश करने में कामयाब हुए हैं. उन्होंने अमूमन तितरफा मुकाबले को सीधी दोतरफा टक्कर में बदल दिया है, जिसमें तीसरा कोना चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का है.

अखिलेश ने 2017 की हार से बुझी, बिखरी सपा को मायूसी से बाहर निकालकर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी को चुनौती देने के लिए ऊर्जा से लबरेज लड़ाई को तैयार जुझारू दल में बदल दिया है. यही नहीं, उन्होंने चतुराई से मुख्यमंत्री पद की लड़ाई को अपनी और मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच सीधी टक्कर में बदल दिया है. वे बड़ी सावधानी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधे जिक्र से बचे हैं.

आवरण कथाः चुनौती तो दमदार
आवरण कथाः चुनौती तो दमदार

मोदी और योगी दोनों ही अपने चुनावी भाषणों में मायावती या राज्य कांग्रेस प्रभारी प्रियंका गांधी के बदले ज्यादातर अखिलेश पर ही निशाना साधते देखे जा सकते हैं. सीएसडीएस लोक नीति के डायरेक्टर, चुनाव विज्ञानी संजय कुमार उन लोगों में एक हैं, जिनका मानना है कि भाजपा राज्य में फिर सरकार बनाएगी, लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं, ''यह कड़ी टक्कर का चुनाव है और अखिलेश भाजपा की भारी ताकत के खिलाफ अकेले शख्स की फौज की तरह खड़े हैं. वे सपा की सीटों की संख्या 140 तक पहुंचा सकते हैं, जो 2017 में 47 सीटों के मद्देनजर भारी सफलता कहलाएगी.’’

हालांकि अखिलेश खुद को दूसरे नंबर का दर्जा देने से संतुष्ट नहीं हैं और मानते हैं कि वे और उनकी पार्टी जीत सकती है. सत्ता से पांच साल बाहर रहने के दौरान उन्होंने पार्टी पर पूरा नियंत्रण कायम करने, विभिन्न गुटों को एक साथ जोड़ने, यहां तक कि अपने असंतुष्ट चाचा शिवपाल सिंह यादव से सुलह करने का काम किया. शिवपाल यादव पार्टी छोड़ गए थे और अपनी अलग पार्टी बना ली थी. अखिलेश ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा के साथ बनाए महागठबंधन की हार से भी सीखा.

आवरण कथाः चुनौती तो दमदार
आवरण कथाः चुनौती तो दमदार

गठबंधन का मिलाजुला वोट शेयर करीब 40 फीसद दिखने के बावजूद भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को राज्य की कुल 80 में से 64 सीटें मिल गई थीं. ज्यादा तकलीफदेह यह था कि बसपा 10 सीटें जीत गई और सपा के हाथ महज 5 सीटें आईं. नतीजों के फौरन बाद मायावती ने हार के लिए सपा को दोष दिया और गठजोड़ से अलग हो गईं. अखिलेश तू-तू, मैं-मैं में नहीं पड़े. इसके बदले उन्होंने अपने अकेले की भावी योजनाएं तैयार कीं, जिससे भाजपा की भारी चुनावी मशीनरी को चुनौती दी जा सके. पहले से काफी ज्यादा परिपक्व दिख रहे अखिलेश अब अपने दिमाग से काम लेते दिखते हैं और कड़े फैसले लेने तथा लोगों को दो-टूक कहने को तैयार हैं.

इस बार उन्होंने कांग्रेस के साथ भी गठबंधन की संभावना से किनारा कर लिया. वजह यह थी कि वह बहुत ज्यादा सीटें मांग रही थी और उससे हाथ मिलाना सपा के लिए फायदेमंद भी नहीं लग रहा था. इसके बजाए उन्होंने और उनकी टीम ने 2017 की अपनी हार के मुख्य कारणों का अध्ययन किया. उनका ध्यान इस तथ्य पर गया कि 2012 के बाद भाजपा ने सवर्ण जातियों और खासकर ब्राह्मण तथा बनियों की पार्टी होने की अपनी छवि से छुटकारा पाने के लिए कड़ी मेहनत और काम किया.

इसके लिए उसने उत्तर प्रदेश के सामाजिक भूगोल के एक अलहदा हिस्से पर ध्यान दिया और वह था इसके ओबीसी समुदाय का विशाल हिस्सा, जिसकी राज्य के कुल वोटों में 40 फीसद जितनी बड़ी हिस्सेदारी है. पार्टी ने यादवों को अनदेखा करके, जिनकी कुल वोटों में महज आठ फीसद हिस्सेदारी है, गैर-यादवों के विशाल तबके से नाता और गठबंधन जोड़ा. इनमें मध्य ओबीसी जातियों से लेकर वे सब जातियां शामिल थीं, जो पटेल से लेकर राजभर, मौर्य, कुशवाहा, निषाद और कई अन्य सर्वाधिक पिछड़े वर्ग (एमबीसी) में आती हैं.

इनमें से कइयों की कुल वोटों में भले महज करीब 2-3 फीसद हिस्सेदारी हो और वह भी तमाम बड़े इलाकों में बिखरी हों, पर मिलकर उनकी तादाद अच्छी-खासी हो जाती है. यही नहीं, यह नक्शे के अंधेरे हिस्से में टॉर्च से रोशनी डालने की तरह था, जिससे अंदरूनी इलाकों के ज्यादा अंधेरे से ढके हिस्से भी दिखाई देने लगे. यह दलित आबादी थी, जो उत्तर प्रदेश की आबादी में 21 फीसद है, पर 65 जातियों में बंटी है. मायावती की खुद अपने समुदाय जाटवों पर मजबूत पकड़ थी, जो उत्तर प्रदेश के कुल दलितों में आधे से कुछ ज्यादा हैं.

इसलिए भाजपा ने गैर-जाटवों यानी पासी, धोबी, कोरी, खटीक, बसोड़, सपेरा वगैरह को साधा. नतीजा क्या रहा? 2017 के चुनाव-बाद विश्लेषण से पता चला कि भाजपा ने ओबीसी के 58 फीसद और दलितों के 17 फीसद वोट हासिल किए. इसके अलावा, उसने अपने पारंपरिक सवर्ण वोटों के 62 फीसद तो बेशक आसानी से हासिल कर ही लिए. यह सोशल इंजीनियरिंग की बेहद कामयाब कारस्तानी थी, जिसने हिंदू मतदाताओं को इस हद तक एक कर दिया कि ऐसा पहले राज्य में विरले ही देखा गया था.

अगर इस गोलबंदी को तोड़ना था, तो सपा की पुरानी व्यूह रचनाएं काफी नहीं थीं. इस किले की ईंट और गारे की दीवारों को हिलाना और तोड़ना जरूरी था, ताकि खुद अपना किला बनाया जा सके. भाजपा ने अपनी रणनीति ऊपरी भगवा परत को साबुत रखते हुए भूमिगत स्तरों पर विकसित की थी—उसने अपने हिंदुत्व का मंडलीकरण और अपने नए ओबीसी अनुयायियों का हिंदूकरण कर लिया था (यहां तक कि यादव भी हिंदुत्व के आकर्षण से बचे नहीं रह सके). इस सबका तकाजा था कि इससे निबटने के लिए समाजवादी अपना खेल बदलें और प्रतिद्वंद्वी की चालों की काट तलाशें.

इसे उलट सोशल इंजीनियरिंग भी कह सकते हैं. जिस बात ने अखिलेश और उनकी करीबी टीम की मदद की, वह यह कि भाजपा के किले की दीवारों में दरारें उभर आई थीं, जिनका वे फायदा उठा सकते थे. शुरुआत में ही योगी आदित्यनाथ यानी एक ठाकुर के राज्यारोहण से कई ओबीसी नाखुश थे. उन्हें उम्मीद थी कि तत्कालीन पार्टी प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, जो ओबीसी समुदाय से हैं. अलग-थलग पड़ने की वह हल्की-इसी भावना पांच साल के दौरान गहरी होती गई.

यही नहीं, आदित्यनाथ के कट्टर और खालिस हिंदुत्व के प्रति समर्पण से मुसलमानों का अलगाव तकरीबन पूर्णता पर पहुंच गया. चुनावों से ठीक पहले मुसलमानों ने, जो उत्तर प्रदेश की आबादी के 20 फीसद हैं, जाहिरा तौर पर फैसला किया कि सपा ही उनके लिए सबसे अच्छा दांव है. सुन्नी और शिया दोनों मुसलमानों ने अखिलेश के समर्थन का फैसला किया. आठ फीसद यादव वोटों के अच्छे हिस्से के साथ इसका मतलब यह था कि सपा ने अपनी चुनावी दौड़ अपने पाले में करीब 25 फीसद वोटों के साथ शुरू की. बात बस अब इससे ऊपर वोट हासिल करने की थी.

सपा पहले ही भाजपा के उन असंतुष्ट नेताओं के संपर्क में थी, जिन्हें लगता था कि उनके हितों की अनदेखी की गई है और उनके लिए पार्टी में कम जगह बची है. सपा के मुख्य रणनीतिकार और एमएलसी उदयवीर सिंह कहते हैं, ''भाजपा ने गैर-यादवों और मुख्य रूप से एमबीसी के बड़े हिस्से को अपने साथ लाकर 2017 में फतह हासिल की.

मगर जीत के बाद उन्होंने जिला स्तर पर उन्हें नुमाइंदगी नहीं दी. भाजपा की जिला इकाइयों पर ज्यादातर सवर्णों का दबदबा है, जिससे इन एमबीसी नेताओं को लगा कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. उन्हें लगा कि वे भाजपा के स्वाभाविक साथी नहीं हैं और उन्होंने हमारे साथ आने का फैसला किया.’’

प्रमुख गैर-यादव नेताओं को मनाने की योजना बनाई गई, पर ऐसा करते हुए धैर्य से काम लिया गया. पार्टी ने धावा बोलने के लिए बिल्कुल मौजूं वक्त यानी चुनावों के ऐलान का इंतजार किया. उस नाजुक मोड़ और अंतिम पायदान पर जब निर्णायक स्थिति के लिए माहौल बनाया जा सकता था, योगी और भाजपा को हैरान-परेशान करते हुए तीन प्रमुख गैर-यादव ओबीसी मंत्रियों—स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धरम सिंह सैनी—ने पदों से इस्तीफा दे दिया और सपा में आ गए.

फिर सपा ने छोटी-छोटी ओबीसी और एमबीसी पार्टियों के साथ उनके क्षेत्रीय फैलाव को ध्यान में रखते हुए गठबंधन किया. मध्य उत्तर प्रदेश में उसने महान दल से हाथ मिलाया, जिसके अनुयायियों में अच्छी-खासी तादाद मौर्यों और शाक्यों की है. पूर्वांचल में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए उसने अपना दल (कमेरावादी) से गठबंधन किया, जो 7 फीसद कुर्मी पटेल वोटों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे धड़ों में से एक है. उसने दो अन्य पार्टियों के साथ हाथ मिलाया, जिनकी पूरब में कुछ पकड़ है—ओमप्रकाश राजभर की अगुआई वाली असरदार सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) और लोनिया चौहानों में पकड़ रखने वाली जनवादी पार्टी.

राज्य की आबादी में इन दोनों की हिस्सेदारी कुल मिलाकर पांच फीसद है. उधर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा ने राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के साथ गठबंधन किया, जिसकी अगुआई अब पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी कर रहे हैं और जिन्होंने अपने पिता अजित सिंह के निधन के बाद जाट किसानों में विशाल समर्थन आधार बनाया है. अब रद्द कर दिए गए कृषि कानूनों के प्रति केंद्र के गड़बड़ रवैये ने इसमें उनकी मदद की.

इस चुनाव से पहले दलितों तक सपा की व्यावहारिक तौर पर कोई पहुंच नहीं थी. जमीन पर यादवों और दलितों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे और मायावती के साथ ऐतिहासिक तौर पर मुश्किल रिश्तों में भी इसकी झलक दिखाई देती है. सुधार के लिए सपा ने अपनी दलित शाखा 'बाबा साहेब वाहिनी’ शुरू की, जिसका मकसद खास तौर पर गैर-जाटव दलितों और अनुसूचित जनजातियों को साधना था.

सपा के एक पदाधिकारी दावा करते हैं कि बसपा के 18 विधायकों में 50 फीसद से ज्यादा और उसके क्षेत्रीय संयोजकों तथा जिला अध्यक्षों में 25 फीसद बीते डेढ़ साल में पाला बदलकर सपा के साथ आ गए. उन्हें इससे भी मदद मिली कि इस चुनाव की दौड़ में मायावती तकरीबन एकांतवास में रहीं. असल में सपा को शक है कि वे भाजपा के साथ मिलकर काम कर रही हैं. जो भी हो, अखिलेश का नारा यह है कि 'समाजवादी’ और 'आंबेडकरवादी’ मिलकर भाजपा का सफाया कर देंगे. वे वादा कर रहे हैं, ''भैया ही भरोसा है, नई हवा है, नई सपा है.’’ 

मकसद बहुमत हासिल करने के लिए जरूरी 40 फीसद वोटों के करीब पहुंचना है और उसके आधार में थोड़ी भी बढ़ोतरी से मदद मिलेगी. जब टिकट बंटवारे की बात आई तो अखिलेश ने पक्का किया कि इस नए पचमेल गठबंधन में बराबरी से टिकट बांटे जाएं, जिसका ताना-बाना उन्होंने जोड़ा है. सपा के एक नेता कहते हैं, ''एम-वाइ तमगे से छुटकारा पाने के लिए हमने यादवों और मुसलमानों के टिकटों की संख्या में कटौती की.’’ 

सपा 348 सीटों पर 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ रही है जबकि उसने 55 सीटें गठबंधन के सहयोगियों के लिए छोड़ी हैं. अखिलेश ने टिकट वितरण में हर वर्ग की सहभागिता का ध्यान रखा है. पार्टी ने अपने कोटे की सीटों में 53 मुस्लिम उम्मीवार उतारे हैं. यादव उम्मीदवारों की संख्या 45, ठाकुर 20 और 21 ब्राह्मण उम्मीदवार हैं. पार्टी ने 70 दलित और तीन कायस्थ उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारा है. 

अखिलेश ने भाजपा सरकार के दो सबसे बड़े चेहरे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की परंपरागत सीट पर जबरदस्त घेरेबंदी की है. गोरखपुर शहर विधानसभा सीट पर अखिलेश ने भाजपा के कद्दावर नेता रहे उपेंद्र शुक्ला की विधवा को योगी आदित्यनाथ के सामने उतारकर अपने चुनावी कौशल का परिचय दिया है. इससे अखिलेश ने पूर्वांचल में योगी के खिलाफ ब्राह्मण मतों को लामबंद करने की कोशिश की है. कहा जा रहा है कि 2020 में हुए बिकरू कांड में एक ब्राह्मण विधवा को अकारण जेल में रखने से ब्राह्मण समाज योगी से नाराज है.

योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मजबूत घेराबंदी करने के लिए सपा ने जातिगत आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति बनाई थी. इसी के तहत सपा ने गोरखपुर-बस्ती मंडल की 41 सीटों पर बसपा के इकलौते विधायक विनयशंकर तिवारी को परिवार सहित पार्टी में शामिल कराकर मुख्यमंत्री के खिलाफ ब्राह्मण मतों को एकजुट करने की कोशिश की है. पूर्वांचल के कद्दावर ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे विनयशंकर तिवारी चिल्लूपार विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव जीते थे और इस बार वे सपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं.

विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही सपा गोरखपुर में करीब छह महीने से खाली चल रहे जिलाध्यक्ष पद पर अवधेश यादव और पिछले ढाई साल से खाली पड़े महानगर अध्यक्ष पद पर कृष्ण कुमार त्रिपाठी की तैनाती कर जातिगत संतुलन बिठाने की भरपूर कोशिश की है. सोशल इंजीनियरिंग के तहत योगी के 'किले’ में सेंध लगाने की मंशा से सपा ने गोरखपुर की नौ विधानसभा सीटों में दो ब्राह्मण, दो दलित, चार पिछड़े और चौरीचौरा विधानसभा सीट पर पासवान जाति के नेताओं को उम्मीदवार बनाया है.

उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को उनके घर में ही घेरने के लिए अखिलेश ने अपना दल (कमेरावादी) की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल की बेटी पल्लवी पटेल को सिराथू से विधानसभा चुनाव में उतारा है. अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की चार बेटियों में सबसे बड़ी पल्लवी पटेल सिराथू विधानसभा सीट पर अपने चुनाव प्रचार में पूरे जोश के साथ जुटी हैं.

पल्लवी छोटी-छोटी सभाएं करके समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही हैं. सपा के परंपरागत यादव-मुस्लिम वोट के अलावा पल्लवी इसमें पटेल मतदाताओं का समर्थन जोड़ने की जुगत लगा रही हैं. हर सभा में अपने संबोधन की शुरुआत पल्लवी सोनेलाल पटेल और कृष्णा पटेल की जय बोलने के साथ करती हैं. पटेल स्वाभिमान जगाने के लिए पल्लवी, कृष्णा पटेल के नाम के आगे 'राजमाता’ शब्द जरूर जोड़ती हैं. 

केशव मौर्य की मजबूत घेराबंदी के लिए अखिलेश ने सिराथू विधानसभा सीट से लगी हुई मंझनपुर (सुरक्षित) सीट से पासी जाति के इंद्रजीत सरोज को उम्मीदवार बनाया है. अखिलेश ने मुस्लिम नेताओं को साथ लेने में भी इस बात का ध्यान रखा है कि कहीं प्रत्युत्तर में हिंदू मतों का 2017 के विधानसभा चुनाव जैसा ध्रुवीकरण न हो जाए. सहारनपुर में मुस्लिम राजनीति के धुरी रहे इमरान मसूद ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक भड़काऊ बयान दिया था.

इस बार इमरान ने कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल होने की घोषणा की, उनका पूर्व का बयान फिर सोशल मीडिया पर छा गया. नतीजा यह हुआ कि सपा ने इमरान मसूद पर दांव लगाने से हाथ खींच लिए. बताया जाता है कि अखिलेश ने यूपी में सरकार बनने पर इमरान मसूद को सम्मानजनक तरीके से 'एडजस्ट’ करने का भरोसा दिया है.

चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश पूरी सावधानी बरतते हैं कि वे भाजपा के बिछाए किसी भी जाल में न फंसें. सोशल इंजीनियरिंग और जातिवादी राजनीति की तमाम बातों को खारिज करते हुए वे कहते हैं, ''मेरा ध्यान विकास पर है, जाति पर नहीं. हमने टिकट इस तरह बांटे कि सभी जातियां और समुदाय शामिल हों.’’ भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश को मुसलमान समर्थक करार देने की कोशिश की, पर अखिलेश उसके साथ इस बहस में पड़े ही नहीं.

उन्होंने उस कटाक्ष को भी अनदेखा कर दिया, जो योगी ने अयोध्या के अपने भाषण में किया था कि सपा की पुरानी हुकूमत ने ईद के दौरान बिजली की आपूर्ति तय की, पर दीवाली के लिए नहीं की. मोदी तो इस हद तक चले गए कि उन्होंने अखिलेश पर आतंकवादियों का समर्थन करने का आरोप लगाया और उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल को अहमदाबाद के बम धमाकों को अंजाम देने वाले आतंकवादियों से जोड़ दिया. मगर अखिलेश ने इस उकसावे में आने से इनकार कर दिया.

इसमें कोई शक नहीं कि इन तीखी बातों का मकसद सपा की मजबूत जातिगत गोलबंदी को तोडऩा और ध्रुवीकरण के माध्यम से हिंदू वोटों को एकजुट करना था. भाजपा के पूर्व विचारक और अब कट्टर आलोचक सुधींद्र कुलकर्णी, जो राजनैतिक पर्यवेक्षक के तौर पर उत्तर प्रदेश में हैं, कहते हैं, ''यह गटर-लेवल की राजनीति है. ध्रुवीकरण की राजनीति का असर तो है, पर उतना नहीं है जितना 2017 में था. ऐसा इसलिए है क्योंकि अखिलेश ने मुस्लिम समर्थक होने की अपनी पार्टी की छवि को कम किया है.’’

अखिलेश मोदी की आलोचना नहीं करते, क्योंकि वे मुद्दों को स्थानीय ही बनाए रखना चाहते हैं. भाजपा की आलोचना करते हुए उनका जोर नौकरियों के सृजन, किसानों की आमदनी बढ़ाने और उनकी फसलों को नुक्सान पहुंचा रहे आवारा पशुओं की समस्या से निपटने में उसकी कथित नाकामी पर होता है. उन्नाव के भगवंतनगर निर्वाचन क्षेत्र की रैली में उन्होंने 'काले कानूनों’ (यानी कृषि कानूनों) को संक्षिप्त और आसान नाम देते हुए 'काका’ बताया और देसी हाजिरजवाबी का परिचय देते हुए कहा, ''काका तो चले गए, अब बाबा भी जाने वाले हैं.’’ 

अखिलेश युवाओं के मुद्दों को किसी भी दूसरी पार्टी की तुलना में कहीं अच्छे से उठा रहे हैं. वे युवाओं में बेहतर जिंदगी के अवसरों की आकांक्षा का लाभ उठाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. छात्रों के लिए आम खैरातों के अलावा उन्होंने सपा के घोषणापत्र में युवाओं के लिए 11 लाख सरकारी नौकरियों और इसके अलावा आइटी सेक्टर में अन्य 22 लाख नौकरियों के सृजन का वादा किया है. किसानों के लिए वे निश्चित एमएसपी, मुफ्त खाद और ब्याज मुक्त कर्ज पर जोर दे रहे हैं.

महिलाओं के लिए, सरकारी नौकरियों में आरक्षण और पुराने सदस्यों की मासिक पेंशन तीन गुना करने के अलावा, वे उनकी सुरक्षा के लिए विशेष बल बनाने का वादा कर रहे हैं. सपा का घोषणापत्र तैयार करने में मदद करने वाले पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन कहते हैं, ''अखिलेश दूरदृष्टि से संपन्न नेता हैं, जो उत्तर प्रदेश को विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा देना चाहते हैं और इसका उनका पुष्ट ट्रैक रिकॉर्ड भी है.’’  

यह जोशो-खरोश से भरी लड़ाई है. मगर करहल से लखनऊ की राह में अभी कई किंतु-परंतु हैं. सी-वोटर के संस्थापक-निदेशक और चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख को लगता है कि अखिलेश ने अपना जवाबी हमला बहुत देर से किया और बीते दो साल भी ज्यादा कुछ नहीं किया. वे कहते हैं, ''अखिलेश भाजपा के लिए अव्वल चैलेंजर भले बन गए हों, पर ऐसा कुछ हद तक इसलिए भी हुआ क्योंकि मायावती निष्क्रिय रहीं. आप दूसरों के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकते. वे ममता बनर्जी नहीं हैं, जिन्होंने काफी जल्दी अपनी रणनीति बदल ली थी.

उन्हें इतने प्रतिशत वोट मिलने की संभावना नहीं है, जिससे भाजपा को हरा सकें.’’ देशमुख मानते हैं कि जाटों ने सपा के पक्ष में थोक के भाव वोट नहीं दिए और उन्होंने जिन गठबंधनों का ताना-बाना जोड़ा, उनसे उतना फायदा नहीं हो रहा है जितनी उन्हें उम्मीद रही हो सकती है. वे यह भी कहते हैं कि आखिरी चरणों में मोदी ने रैलियों की बमवर्षा का जो मंसूबा बनाया है, उससे भाजपा की संभावनाओं में उसी तरह इजाफा हो सकता है, जैसा 2017 में हुआ था. जबकि सुधींद्र कुलकर्णी मानते हैं कि अखिलेश एक-आदमी की सेना हैं.

वे कहते हैं, ''सब कुछ उनके कंधों पर है. योजना नाकाफी ढंग से बनाई गई है और जिम्मेदारियों का बंटवारा भी पूरी तरह नहीं किया गया. अहम मुद्दों पर संदेश भी समुचित ढंग से नहीं दिया जा रहा है. उनके शत्रु की सधी-सधाई और तैयार पार्टी मशीन से तुलना करने पर उनका चुनाव अभियान भी असंगठित दिखाई देता है. हालांकि इस सबके बावजूद यह करीबी लड़ाई होगी.’’

फिर भी अखिलेश ने इतना तो किया ही है कि भाजपा को उसके आत्मसंतोष से झकझोर कर रख दिया है. जो भी हो, 2022 के विधानसभा नतीजों का असर उत्तर प्रदेश की सरहदों से बाहर तक जाएगा. भाजपा की जीत से देश हिंदुत्व की तरफ ज्यादा तेजी और मजबूती से कूच करेगा और 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा को बढ़त मिल जाएगी.

लेकिन, अखिलेश अगर उलटफेर करने में कामयाब हो जाते हैं, तो इससे देश भर में विपक्षी ताकतों में नई जान आ जाएगी. क एक कदम और आगे जाकर कहते हैं, ''यह मोदी युग के अंत की शुरुआत होगी.’’ दांव वाकई बहुत ऊंचे हैं, न केवल अखिलेश के लिए, बल्कि देश के समूचे राजनैतिक फलक के लिए भी.

— साथ में प्रशांत श्रीवास्तव

रुख मोड़ने की कोशिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 फरवरी को बाराबंकी की भाजपा रैली के दौरान

मोदी की योजना उत्तर प्रदेश के आखिरी चरणों के चुनाव में रैलियों की बरसात करने की है, ताकि लहर भाजपा के पक्ष में मोड़ी जा सके, जैसा उन्होंने 2017 में किया था और कामयाब हुए थे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें