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आवरण कथाः कोविड पीढ़ी के बोझिल कंधे

स्कूली और सामाजिक जिंदगी पूरी तरह से ऑनलाइन हुई और आमने-सामने की बात-मुलाकात भी करीब-करीब शून्य, ऐसे में भारत के बच्चों पर बहुत बुरी बीत रही.

आद्विक मित्तल, 17 वर्ष    कक्षा 12 (कॉमर्स छात्र) बाल भारती पब्लिक स्कूल, पीतमपुरा, दिल्ली आद्विक मित्तल, 17 वर्ष    कक्षा 12 (कॉमर्स छात्र) बाल भारती पब्लिक स्कूल, पीतमपुरा, दिल्ली

सामाजिक अलगाव, अस्त-व्यस्त हुई दिनचर्या और दिल बहलाने के सीमित साधनों की वजह से बच्चों की दुनिया उलट गई है. मार्च 2020 में कोविड की वैश्विक महामारी भारत में आने के बाद से देश भर के स्कूल बंद हैं. इससे पढ़ाई-लिखाई के कैलेंडर और बच्चों की सीखने की प्रक्रिया में अप्रत्याशित ढंग से खलल पड़ा है.

14 महीनों से वे वर्चुअल कक्षाओं, जूम प्ले डेट और घर की कैद में सिमट गए हैं. इसने बच्चों की सेहत और मानसिक-सामाजिक तंदुरुस्ती पर जबरदस्त असर डाला है. संयुन्न्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने बीते मार्च में कहा कि दुनिया भर के सात में से एक या 33.2 करोड़ बच्चों ने कम से कम नौ महीने लॉकडाउन में गुजारे हैं, जिसने उन्हें मानसिक परेशानियों की जद में ला दिया है. भारतीय बच्चे भी अपवाद नहीं.

स्कूल बंद होने से बहुतायत बच्चे घरों में कैद हैं, अपने संगी-साथियों से कट गए हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई में खलल पड़ा है और डिजिटल माध्यमों से नजदीकी बेहिसाब बढ़ गई है. यही नहीं, उनमें से कइयों ने अपने माता-पिता सहित परिजनों की बेवक्त मौत, रुपए-पैसे के संकट और चौतरफा तनाव और हताशा के माहौल का सामना किया है.

गुडग़ांव की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और फैमिली थिरैपिस्ट डॉ. शैलजा पोखरियाल कहती हैं, ‘‘आइसोलेशन और बंदिशों से भरे माहौल की वजह से छात्र-छात्राओं भावनात्मक अनियंत्रण बढ़ा है. अपनी छोटी-सी दुनिया को लील रही अनिश्चितताओं को लेकर उनमें बेहद चिंता और बेचैनी है.’’

ज्यादातर बच्चे स्कूलों में ही अपने संगी-साथियों से घुल-मिल पाते हैं. उन्हीं से वे ऐसे मसलों पर मदद मांगते हैं जिन पर बड़ों से बातचीत शायद न कर पाते हों. मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, स्कूल की दैनिक गतिविधियां—दोस्तों के साथ अड्डेबाजी, शिक्षकों के साथ बातचीत—मामूली लग सकती हैं, लेकिन यही वह प्लेटफार्म है जहां वे भावनात्मक सुरक्षा और स्थिरता पाते हैं, जो बच्चे की स्वस्थ वृद्धि और विकास की पूर्वशर्तें हैं. ञ़

यही अनुभव उन्हें उस शख्स के तौर ढालते हैं जो वे बड़े होकर बनते हैं. दिल्ली के बीएलके सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के मनोचिकित्सक और मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. श्वेतांक बंसल कहते हैं, ‘‘मनोविज्ञान के लिहाज से जिसे हम पहचान का ठिकाना कहते हैं, वह कुछ तो इससे बनता है कि हम खुद को कैसे देखते हैं और कुछ इससे कि दूसरे हमें कैसे देखते हैं. स्कूल में होने वाली सामाजिक बातचीत में खलल पडऩे से यह दूसरा हिस्सा इन बच्चों के लिए खासा कम हो गया है.’’

13 बरस के अर्णव आजाद का मामला लीजिए. दिल्ली के वसंत वैली स्कूल की कक्षा 9 के इस छात्र के मुताबिक, इन दिनों उन्हें बेमकसद बातचीत की कमी बहुत खल रही है. ‘‘अब मैं दोस्त या सहपाठी को तभी कॉल करता हूं जब मुझे उनसे कोई काम होता है. खेल के मैदान या कक्षाओं में होने वाली गपशप अब मुझे बहुत ज्यादा याद आती हैं.’’

महामारी ने सालगिरह और त्यौहार मनाने, समर कैंप, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने और गॢमयों की छुट्टियों में यात्रा सरीखी दूसरी सामाजिक गतिविधियों पर भी विराम लगा दिया है. दिल्ली के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के 15 वर्षीय छात्र मयंक पवार कहते हैं, ‘‘मेरी 10वीं बोर्ड की परीक्षा रद्द हो गई. लॉकडाउन ने छुट्टियों की भी संभावना खत्म कर दी.’’

बाल मनोवैज्ञानिक और दिल्ली स्थित चाइल्ड साइकोलॉजिकल थिरैपी क्लिनिक किडिसियस की संस्थापक रेणु गोयल के मुताबिक, जिंदगी में तमाम किस्म की गतिविधियां चाहने वाले बच्चे बेचैन हो रहे हैं क्योंकि एकरस और उबाऊ काम उन पर थोप दिए गए हैं. नतीजा: तमाम स्कूली बच्चे दुष्चिंता, मिजाज में उतार-चढ़ाव, चिढ़, गुस्सा, आक्रामकता, नींद में खलल और अवसाद अनुभव कर रहे हैं. डॉ. पोखरियाल कहती हैं, ‘‘एक तरतीब न होने से भारी भावनात्मक उथल-पुथल पैदा हुई है.’’

स्कूल, खेल, दूसरी गतिविधियां, पढ़ाई, और परिवार का बंधा-बंधाया ढर्रा गायब हो गया है. यहां तक कि पढ़ाई में भी कोई तरतीब नहीं रही क्योंकि कक्षाएं वर्चुअल और परीक्षाएं अनिश्चित काल के लिए रद्द या स्थगित हो गई हैं. सहपाठियों-दोस्तों के साथ आमने-सामने बातचीत किए बगैर एक साल बिता चुके 17 वर्षीय आद्विक मित्तल अपनी 12वीं की परीक्षा को लेकर रात भर सो नहीं पाते.

दिल्ली में पीतमपुरा के बाल भारती पब्लिक स्कूल के छात्र आद्विक कहते हैं, ‘‘लगातार फिक्र बनी रहती है कि एसेसमेंट कैसे होगा और कॉलेज एडमीशन पर इसका क्या असर पड़ेगा.’’ उनकी बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा कोविड की दूसरी लहर की वजह से अभी निलंबित है. वे कहते हैं, ‘‘बिना किसी निश्चित योजना के प्रेरित रहना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.’’

डिजिटल तनाव
स्कूलों के वर्चुअल होने से छात्रों का स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा बढ़ गया है. वे कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहते हैं. पिछले साल दिल्ली सरकार ने 5-15 साल के बच्चों के माता-पिता का एक सर्वे किया जिसमें से 54 फीसद ने माना कि उनके बच्चों का स्मार्टफोन और कंप्यूटर का इस्तेमाल औसतन पांच घंटे रोज बढ़ गया है.

बच्चे सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफार्म पर भी जा रहे हैं. घर या दफ्तर के कामों में मसरूफ कई माता-पिता भी स्क्रीन टाइम में इस बढ़ोतरी को अनदेखा कर देते हैं, यह सोचकर कि चलो उनका मन तो लगा रहता है. मगर सोशल मीडिया की कच्ची-पक्की जानकारियां बच्चों की उत्कंठा का स्तर बढ़ा देती हैं. कई माता-पिता ने बच्चों को पोर्नोग्राफिक साइट देखते पकड़ा.

स्मार्ट उपकरणों का अनियंत्रित इस्तेमाल उन्हें ऑनलाइन साइबर दबंगई और अपराधियों और यौन शिकारियों के आगे भी बेबस छोड़ देता है. माता-पिता को समझ नहीं आता कि क्या करें. दिल्ली में रहने वाली 47 वर्षीय गृहिणी और 12वीं कक्षा की कॉमर्स की छात्रा दिव्या की मां रचना गुप्ता कहती हैं, ‘‘हम सारे वक्त निगरानी नहीं करते रह सकते. हमें घर के दूसरे काम भी तो हैं. शिक्षक को भी पता नहीं होता कि ऑनलाइन कक्षा के दौरान छात्र लैपटॉप पर खुले दूसरे टैब पर क्या कर रहा है. फिर चैट-ग्रुप पर वे अपना बहुत सारा वक्त बर्बाद करते हैं.’’

बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम ने नींद का नियमित क्रम बिगाड़ दिया है, ध्यान एकाग्र करने का समय घटा है और मिजाज में उतार-चढ़ाव की संभावना बढ़ी है. इतना ही नहीं, इसकी वजह से बच्चों में आरामतलबी भी बढ़ी है. दिल्ली में साकेत की 45 वर्षीया कलाकार रिनी बख्शी अपने 14 वर्षीय बेटे और मदर्स इंटरनेशनल स्कूल के छात्र सुहान के आलसी और निष्क्रिय शख्स में बदलने के लिए डिजिटल क्लासरूम को दोषी ठहराती हैं.

वे कहती हैं, ‘‘लॉकडाउन में उसने बस इतना सीखा कि ऑनलाइन गेक्वस कैसे खेलते हैं. वह बहिर्मुखी था लेकिन अब किसी से बात नहीं करना चाहता क्योंकि सारे वक्त लैपटॉप पर गेम खेलना चाहता है.’’ रिसर्च से पता चला है कि शारीरिक गतिविधि कम होने से मांसपेशियों और दिल तथा सांस की फिटनेस में कमी, धीमा मेटाबॉलिज्म, मोटापे और आंख की परेशानियों जैसे मसले पैदा हो सकते हैं. डॉ. बंसल कहते हैं, ‘‘कई छात्रों में नेत्रविज्ञान की परेशानियां विकसित हो रही हैं.’’

चौड़ी खाई 
ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा या उसका लगभग अभाव एक अलग ही तरह की समस्या बन रही है. वर्चुअल शिक्षा के लिए कंप्यूटर या स्मार्टफोन की जरूरत होती है लेकिन भारत में ये बहुतों के पास उपलब्ध नहीं. 2017-18 में नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक, भारत के केवल 24 प्रतिशत घरों में इंटरनेट की सुविधा है और पांच से 24 साल तक की उम्र वाले सदस्यों वाले केवल 8 प्रतिशत परिवारों में कंप्यूटर और इंटरनेट दोनों हैं.

अप्रैल 2020 में, वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा के लिए काम करने वाले एनजीओ स्माइल फाउंडेशन की ओर से 23 राज्यों में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि कक्षा 1 और 12 तक के केवल 43.9 प्रतिशत बच्चों को स्मार्टफोन की सुविधा उपलब्ध थी. इसके अलावा सरकारी स्कूल के ज्यादातर अध्यापक या तो डिजिटल अध्यापन के मामले में अक्षम हैं या वे वर्चुअल अध्यापन करना ही नहीं चाहते.

इस विभाजन ने ग्रामीण क्षेत्र के विद्याॢथयों में चिंता और निराशा पैदा कर दी है. पिछले साल अन्न्तूबर में महाराष्ट्र में सतारा जिले के कराड में 15 वर्ष की एक लड़की ने स्कूल की ऑनलाइन क्लास न कर पाने के कारण घर में ही कथित रूप से आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके पास स्मार्टफोन नहीं था. गांवों में गरीब वर्ग के भीतर मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को प्रतिबिंबित करती ऐसी समस्याओं की ओर नीतिनिर्माताओं का ध्यान नहीं गया है.

व्यवस्था में खामियां
यहां तक कि शहरी क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में शिक्षकों ने माना कि वर्चुअल कक्षाएं नियमित कक्षाओं का विकल्प बनने में विफल रही हैं. अचानक डिजिटल शिक्षा का तरीका बच्चों और उनके माता-पिता पर एक बड़ा बोझ बन गया है जिसकी वजह से घरेलू तनाव भी बढ़ रहा है. यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि माता-पिता को वर्चुअल क्लास में बच्चों की मदद करने के साथ घर से ही ऑफिस का काम भी करना पड़ता है और इस वजह से उनकी आमदनी भी कम हो जाती है, कुछ बेरोजगार हो गए हैं और साथ ही उन्हें घर का रोजमर्रा का काम भी खुद ही करना पड़ रहा है.

माता-पिता सामान्य तौर पर अपने बच्चों को भावनात्मक और भौतिक सुरक्षा देते हैं लेकिन अब वे इस दबाव के कारण खुद ही कमजोर पड़ते जा रहे हैं. यहां तक कि शिक्षक भी अब साफ तौर पर परेशान होने लगे हैं और बच्चों के कोविड से संबंधित सवालों तथा उनके भय का जवाब नहीं दे पाते. नोएडा के अपोलो अस्पताल में ऐक्शन फॉर ह्युमन एक्सीलेंस ऐंड डेवलपमेंट (एएचईएडी) के निदेशक और कंसल्टेंट एवं बाल मनोचिकित्सक डॉ. धीरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘पूरा भावनात्मक वातावरण नकारात्मक हो गया है. स्कूली बच्चों को बड़ों की ओर से भी भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है.’’

लॉकडाउन के कारण बच्चों के साथ यौन उत्पीडऩ के मामले भी बढ़ने लगे हैं. बीते साल महिला और बाल विकास मंत्रालय की टेलीफोन हेल्पलाइन ‘चाइल्डलाइन’ को शुरू के मात्र 11 दिनों के लॉकडाउन के दौरान बाल उत्पीड़न और हिंसा के मामले में 92,000 फोन आए थे. जब दफ्तर खुल गए और माता-पिता काम के लिए घर से बाहर निकलने लगे थे तो उस दौरान स्कूल बंद थे जिसके कारण बच्चे ज्यादा असुरक्षित हो गए थे और वे उत्पीड़न करने वालों के ज्यादा करीब आ गए थे, खासकर अगर उत्पीडऩ करने वाले उनके रिश्तेदार हों. गोयल बताती हैं, ‘‘पिछले साल एक बच्ची की मां ने मुझे बताया कि स्कूल बंद रहने के दौरान, माता-पिता जब काम पर जाने लगे थे तो बच्ची का दादा ही उसका यौन उत्पीडऩ करता था.’’

स्थिति से तालमेल
महामारी अभी बरकरार है, ऐसे में माता-पिता और स्कूली बच्चे अपने तरीके से स्थिति के साथ तालमेल बैठाना सीख रहे हैं. कुछ लोग लॉकडाउन का इस्तेमाल पारिवारिक लगाव बढ़ाने में कर रहे हैं. डॉ. कुमार कहते हैं, ‘‘माता-पिता ज्यादा करीब से देखने लगे हैं कि उनके बच्चों की जिंदगी में क्या हो रहा है. वे उनके स्वभाव और उनकी असुरक्षा के बारे में बेहतर समझ रखने लगे हैं. बच्चे भी माता-पिता या कम से कम उनमें से किसी एक के साथ ज्यादा खुलने लगे हैं. वे एक-दूसरे के बारे में पहले की अपेक्षा ज्यादा बातें जानने लगे हैं.’’

दिल्ली के बेर सराय में मयंक के 44 वर्षीय व्यवसायी पिता लक्ष्मण पवार बेटे को टहलाने के लिए ले जाते रहे हैं ताकि दोनों एक-दूसरे से बातचीत कर सकें. इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि मयंक टीवी और मोबाइल पर ज्यादा समय तक चिपका न रहे और पिता और बेटे के बीच अच्छा रिश्ता कायम हो सके. वे मयंक और उसके 9 वर्षीय छोटे भाई रचित के लिए खाना भी पकाते हैं.

जिन माता-पिता को अपने बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने का अवसर नहीं मिलता, उन्होंने दूसरे तरीके निकाल लिए हैं. अर्णव की मां, स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. रश्मि आज़ाद जब क्लीनिक में होती हैं तो सारा दिन आइपैड के जरिए बेटे से जुड़ी रहती हैं. 42 वर्षीय डॉ. रश्मि कहती हैं, ‘‘ऑनलाइन जुड़े होने से बेटे को अकेलापन नहीं महसूस होता.’’ 

लेकिन कई बार ज्यादा समय साथ रहने से कुछ परिवारों में उलटा ही असर देखने को मिल रहा है. सुहान की मां रिनी बक्चशी कहती हैं, ‘‘हम पहले ही पर्याप्त समय व्यतीत करते थे, पर यह तो बहुत ज्यादा हो गया है. बेटा हर समय चिढ़ा रहता है.’’ उसके माता-पिता हर समय उसके सिर पर सवार रहते हैं और उसे कुछ न कुछ निर्देश देते रहते हैं. इसकी वजह से उसका अपना कोई निजी समय नहीं रह गया है जिससे वह गुमसुम-सा रहने लगा है.

रचना गुप्ता की बेटी दिव्या के साथ बातचीत बहुत कम हो गई है. वे कहती हैं, ‘‘पहले बेटी स्कूल में होने वाली हर चीज के बारे में विस्तार से बताती थी. अब वह सब खत्म हो गया है.’’ डॉ. बंसल के मुताबिक बहुत से परिवारों में ऐसा ही देखा जा रहा है. वह कहते हैं, ‘‘वे साथ-साथ ज्यादा समय बिताने लगे हैं, पर अंदरूनी तनाव के कारण परिवार में संवादहीनता बढ़ती जा रही है.’’

बच्चों में इस संवादहीनता और व्यवहारगत बदलाव के कारण कई माता-पिता मनोचिकित्सकों और परामर्शदाताओं की मदद लेने लगे हैं. साल 2020 में चाइल्डलाइन में फोन आने की संक्चया में 50 फीसद की वृद्धि हुई है. गोयल कहते हैं,‘‘मेरे पास चिंतित अभिभावकों के रोज 2-3 फोन आते हैं.’’ खैर, ज्यादातर पेशेवर लोगों का कहना है कि बच्चों को सबसे ज्यादा मदद माता-पिता और शिक्षकों से ही मिलनी चाहिए क्योंकि बच्चों में दबाव कम करने में उनकी भूमिका ज्यादा होती है.

ऑनलाइन कक्षा के घंटों और होमवर्क का बोझ कम किया जाना चाहिए. ऑनलाइन शिक्षा अहम है पर अध्यापकों और माता-पिता को पक्का करना होगा कि बच्चे सोशल मीडिया, समाचारों और चैटिंग से बहुत ज्यादा न जुड़े रहें. डॉ. बंसल कहते हैं, ‘‘माता-पिता को मोबाइल आदि पर बच्चों के समय को नियंत्रित करते हुए इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि उनके बच्चे को दूसरी गतिविधियों में व्यस्त रखा जाए.’’ स्कूलों को भी चाहिए कि वे वर्चुअल मनोरंजक गतिविधियों का आयोजन करें.

माता-पिता और अध्यापकों को इस बात का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे अगर महामारी के बारे में कोई चिंता जाहिर करें तो सच्ची जानकारी से उनकी आशंका दूर की जाए. बच्चों को लगातार यह बताते रहना चाहिए कि सब बस थोड़े दिन की बात है और सही सावधानियां रखकर महामारी से निबटा जा सकता है. अध्यापकों को चाहिए कि वे बच्चों को निजी तौर पर फोन करके उन्हें भावनात्मक सहयोग दें और उनकी चिंता दूर करें. पोखरियाल कहती हैं, ‘‘माता-पिता को बच्चों के सामने ऊंची आवाज में बहस नहीं करनी चाहिए.’’

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को घरेलू गतिविधियों में शामिल करने का यह सबसे अच्छा समय है. गोयल का कहना है, ‘‘चूंकि ज्यादातर परिवार इन दिनों घर में काम करने वाली सहायिका को नहीं बुला रहे, इसलिए बच्चों में घरेलू काम में मदद करने की भावना पैदा की जानी चाहिए.’’ लेकिन बच्चों के लिए समय के इस्तेमाल का एक निश्चित ढांचा होना चाहिए. उनके जागने, सोने, खाने, ऑनलाइन पढ़ाई, टीवी, परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ बातचीत का निश्चित समय बनाकर दिन भर का ढांचा तैयार किया जा सकता है.

मयंक की 44 वर्षीया गृहिणी मां कविता ने ऐसा ही एक ढांचा बना लिया है जिससे उन्हें घर में शांति बनाए रखने में काफी मदद मिल रही है. उन्होंने दोनों बेटों को समय-सारिणी का पालन करने की सख्त हिदायत दे रखी है. उनके बच्चे भले ही स्कूल नहीं जा पाते लेकिन घर पर बिल्कुल भी बोर नहीं होते. कोविड जिस तरह हमारी जिंदगी के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है, उसे देखते हुए मानसिक स्वास्थ्य के मामले में जागरूकता बहुत अहम हो गई है. यह बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर करने के साथ-साथ हमें महामारी से उबरने में मदद करेगी. 

‘‘बच्चों का स्क्रीन टाइम (मोबाइल आदि पर) बढऩे से उनकी एकाग्रता घटी है. यह इसी तरह से चलता रहा तो इससे उनके शरीर और उनके व्यक्तित्व पर अन्य बुरे असर भी पड़ सकते हैं’’
डॉ. शैलजा पोखरियाल, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और फैमिली थेरेपिस्ट, पॉजिटिव माइंड्स क्लीनिक


मयंक पवार, 15 वर्ष

कक्षा 10, रेयान इंटरनेशनल स्कूल, बसंत कुंज, दिल्ली

तनाव का कारण बोरियत
‘‘दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं और उसके बाद होने वाली छुट्टियां रद्द होने से मयंक के लिए जैसे साल का पूरा रोमांच ही चला गया. लगातार अकेलापन और इससे पैदा हुई बोरियत अब उन पर भारी पड़ रही है. वे उसकी जकड़न से निकलना चाहते हैं. वे कहते हैं, ‘‘ठीक है कि हमारा एक साल बर्बाद हो गया, लेकिन दूसरी लहर के बाद मुझे लगता नहीं कि अब इतनी जल्दी स्कूल नियमित रूप से जा पाएंगे.’’

उबरने का उपाय

अपने समय को व्यवस्थित करना और परिवार के साथ व्यस्त रहना
मयंक कहते हैं, ‘‘मैं गेम्स खेलता हूं, कॉमेडी शोज देखता हूं और छोटे भाई के साथ खेलता हूं.’’ उनकी गृहिणी मां कविता पवार यह पक्का करती हैं कि दोनों बेटे एक तय दिनचर्या का पालन करें. उनके कारोबारी पिता लक्ष्मण सिंह पवार प्राय: खास ट्रीट के तौर पर उनके लिए उनके पसंदीदा व्यंजन पकाते हैं. पिता कहते हैं, ‘‘हम उसकी डिजिटल फुटप्रिंट पर निगाह रखते हैं लेकिन उसकी पहरेदारी नहीं करते. इसकी बजाए उससे दोस्ताना रवैया बनाए रखते हैं और उसके साथ अलग से बातचीत भी करते हैं.’’


आद्विक मित्तल, 17 वर्ष   
कक्षा 12 (कॉमर्स छात्र) बाल भारती पब्लिक स्कूल, पीतमपुरा, दिल्ली
तनाव का कारण
परीक्षाओं में देरी से बेचैनी

महामारी आने के बाद से कोई नियमित कक्षाएं नहीं हो पाई हैं, ऐसे में आद्विक की अपने सहपाठियों के साथ बातचीत भी सीमित हो गई है और इससे उनके मन में अकेलेपन का भाव भी पैदा हो गया है. बारहवीं का यह छात्र दिल्ली के पश्चिम विहार में रहता है. अब जब उनकी बोर्ड परीक्षाओं की तारीख अनिश्चितकाल के लिए बढ़ गई है, इससे उनके मन में बेचैनी भी बढ़ गई है. भविष्य का कुछ साफ न दिखने से उनके लिए खुद को सकारात्मक बनाए रख पाना मुश्किल हो रहा है.

उबरने का उपाय: ध्यान
आद्विक की मां पूजा मित्तल इंटीरियल डिजाइनर हैं और वे उन्हें ध्यान करना सिखा रही हैं ताकि वे शांत रह सकें. आद्विक कहते हैं, ‘‘बोर्ड परीक्षा की अनिश्चितता ने बेचैनी बढ़ा दी है. ध्यान ने मुझे इससे उबरने में मदद की है पर अधिकारियों को हमारे लिए एक तय योजना लेकर आना चाहिए.’’

सुहान आर्यन
बख्शी, 14 वर्ष
कक्षा 10, द मदर्स इंटरनेशनल स्कूल, श्री अरविंदो मार्ग, दिल्ली
तनाव का कारण
ऑनलाइन गेमिंग की लत

सुहान कभी मैदान पर जाकर खेल खेलते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से धीरे-धीरे उन्हें ऑनलाइन गेमिंग की लत लगती गई. सुहान की मां और कलाकर रिनी बख्शी कहती हैं, ‘‘वह बहिर्मुखी था, लेकिन अब वह किसी से बात करना नहीं चाहता न्न्योंकि वह हर वन्न्त अपने लैपटॉप पर गेम खेलना चाहता है.’’ अभिभावकों के अपने आस-पास लगातार मौजूद रहने से भी यह किशोर चिढ़ा हुआ रहता है.

उबरने का उपाय: 
जरूरी किस्म की शारीरिक गतिविधियां
सुहान के अभिभावक यह तय करते हैं कि वह हर सुबह कम से कम एक घंटा शारीरिक गतिविधियों में व्यतीत करे. रिनी कहती हैं, ‘‘यह अस्थायी दौर है और यह बीत जाएगा. लेकिन स्वस्थ रहना जरूरी है ताकि उसका शरीर और दिमाग इस तनाव से बाहर निकल सके.’’

अर्णव आजाद,  13 वर्ष
कक्षा 9, वसंत वैली स्कूल, दिल्ली

तनाव का कारण
सामाजिक अकेलापन

घर पर अकेला होना किसी किसी दिन अर्णव को बेचैन कर देता है. 13 साल के अर्णव दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में अपने माता-पिता श्रवण आजाद और रश्मि आजाद के साथ रहते हैं. दोनों डॉक्टर हैं और अपना दिन क्लीनिक पर बिताते हैं. अर्णव अपने स्कूल और पड़ोस के दोस्तों के साथ खेल के मैदान में बैठकर की जाने वाली गपशप को मिस करते हैं. अर्णव कहते हैं, ‘‘इन दिनों मैं किसी को तभी कॉल करता हूं या चैट करता हूं जब उनसे कोई काम हो.’’

उबरने का उपाय
दिमाग को व्यस्त रखना
अर्णव कहते हैं, उनके शिक्षक वर्चुअल कक्षाओं में हर छात्र पर ध्यान देते हैं और डिजिटल पढ़ाई को उन्होंने अधिक भागीदारी भरा बनाया है. वे कहते हैं, ‘‘ऑनलाइन कक्षाओं के लिए भी हमें अपना यूनिफॉर्म पहनना होता है ताकि नियमित कक्षा की व्यवस्था छूट न जाए.’’ अर्णव खाली समय में खुद को व्यस्त रखने के लिए किताबें पढ़ते हैं या फिर पियानो बजाते हैं. वे आइपैड के जरिए भी हर वक्त अपनी मां से जुड़े रहते हैं. रश्मि कहती हैं, ‘‘हम उसे डिस्टर्ब नहीं करते लेकिन ऑनलाइन बने रहने से उसके भीतर सेे अकेलेपन का भाव खत्म हो जाता है.’’


खतरे की आहट
बच्चों को मदद की दरकार है, यह जानने के लिए अभिभावक और शिक्षक क्या देखें?

›› बच्चा अगर अपने आम बर्ताव और बातचीत के नियमित तौर-तरीकों से हटकर बर्ताव करे, या वह अपने पसंदीदा खेलों या खाने-पीने की चीजों को लेकर दिलचस्पी दिखाना बंद कर दे. ये शुरुआती लक्षण हैं
›› गैर-जरूरी गुस्सा या चिढ़ दिखाना या, कभी-कभी बिना किसी खास वजह के रोने लगना
›› अनियमित नींद, खाने को नजरअंदाज करना या ज्यादा खाने लगना, प्राइवेसी के बहाने अधिक समय अकेले बिताना
›› माता-पिता से चिपके रहना या माता-पिता को लेकर अधिक रक्षात्मक बन जाना

कैसे दूर करें अवसाद
बच्चों को अवसाद में डूबने से बचाने के लिए बड़ों को आखिर क्या करना चाहिए
›› घर पर व्यवस्थित जिंदगी बनाएं: जागने-सोने का तय समय, भोजन, ऑनलाइन पढ़ाई, टीवी, परिवार के साथ वक्त, दोस्तों-परिजनों के साथ बातचीत
›› स्कूलों को ऑनलाइन कक्षाओं का समय और होमवर्क का बोझ भी सीमित करना चाहिए. शिक्षक छात्रों के सामने आ रही भावनात्मक और अकादमिक समस्याओं के बारे में बात के लिए विशेष कक्षाएं लें.

›› स्कूलों को बंद होने पर भी वर्चुअल मनोरंजक गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए
›› अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों तक नकारात्मक सूचनाएं पहुंचने से रोकना चाहिए और इसको लेकर बहुत अधिक ध्यान रखना चाहिए, बच्चों को व्यस्त रखने के लिए वैकल्पिक गतिविधियों की व्यवस्था की जानी चाहिए, उन्हें घरेलू कामकाज से जोड़ें ताकि उनमें जिम्मेदारी का भाव आए.

›› अभिभावक और शिक्षक बच्चों को इतना स्पेस दें कि वे अपने विचार और भावनाएं व्यक्त कर सकें, सहानुभूति के साथ उन्हें सुना जाए
›› बच्चे कोविड और संबंधित मसलों के बारे में जो चिंताएं व्यक्त करें, माता-पिता को चाहिए कि उनका उचित समाधान दें
›› जन्मदिन या कोई उपलब्धि जैसे घर के उत्सव दोस्तों और परिजनों के साथ वर्चुअली मनाया जाना चाहिए
›› अभिभावकों को अपने बच्चों के सामने तेज आवाज में बहस करने से बचना चाहिए

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