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पुलवामा का षड्यंत्रकारी

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने किस तरह एक अबूझ मामले को खोला और रहस्योद्घाटन किया कि बम बनाने वाला पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों के इशारों पर काम कर रहा था, वही पुलवामा हमले का गुनाहगार भी था—इस अंतर्कथा में जानिए.

कायराना धमाका पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर हमले के बाद का दृश्य कायराना धमाका पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर हमले के बाद का दृश्य

फरवरी 2019 की 14 तारीख की दोपहर पुलवामा में आतंकी हमले से कत्लेआम और तबाही के जो मंजर सामने आए, वे किसी डरावनी फिल्म से ज्यादा भयावह थे. दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले को चीरते हुए गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 के जम्मू-श्रीनगर भाग में जले हुए मानव अंगों के कतरे और चकनाचूर इस्पात के छोटे-छोटे टुकड़े वहां पर बिखरे हुए थे.

यह तत्कालीन राज्य के सबसे बदतरीन आतंकी हमलों में से एक था, जिसमें एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी कार को सीआरपीएफ के काफिले की बस से टकराकर 40 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था. पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) ने तत्काल हमले की जिम्मेदारी ली और पहले से रिकॉर्ड 

किया हुआ कथित तौर पर आत्मघाती हमलावर का एक वीडियो जारी किया, जिसमें वह इस भीषण हमले की साजिश के पीछे अपने मंसूबों का खुलासा कर रहा था. इस फिदायीन हमले ने भारत और पाकिस्तान को युद्ध की कगार पर धकेल दिया था. दोनों देशों की वायु सेनाओं ने एक-दूसरे के इलाकों में घुसकर हवाई हमले किए—ऐसा 1971 की जंग के बाद पहली बार हुआ था.


उस हमले के 18 महीनों बाद अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने इस पूरी रहस्य कथा के टुकड़े-टुकड़े जोड़े हैं और अन्य बातों के अलावा यह भी बताया है कि पुलवामा का यह बमसाज कौन था, उसने कैसे साजिश रची, इस खौफनाक काम को कैसे अंजाम दिया और उसके आका कौन थे. केंद्रीय एजेंसी ने 25 अगस्त को जम्मू की एक विशेष अदालत में 13,800 पन्नों का आरोप-पत्र दाखिल किया है, जिसमें उसने इस आतंकी हमले में मदद देने, इसे उकसाने और अंजाम देने के लिए 19 लोगों को आरोपित किया है.

इनमें जेईएम के शीर्ष सरगनाओं सहित सात पाकिस्तानी नागरिक हैं. हालांकि एनआइए का सबसे चौंकाने वाला खुलासा उस वक्त 22 बरस के रहे पाकिस्तानी उमर फारूक की भूमिका है, जिसने इस हमले को अंजाम देने वाले जेईएम के मॉड्यूल की अगुआई की थी. उमर फारूक को बम बनाने में महारत हासिल थी.

एनआइए ने सबूतों के साथ बताया है कि हमले से एक पखवाड़े पहले उसने पुलवामा में काकापोरा के अपने घर पर, जो हमले की जगह से ज्यादा दूर नहीं है, आरडीएक्स के अलावा दूसरे बेहद शक्तिशाली विस्फोटक मिलाकर कुल 200 किलोग्राम वजन की दो आइईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) तैयार किए थे.

उमर फारूक ने इतनी एहतियात और सावधानी से पुलवामा हमले की योजना बनाई थी कि हमले के एक दिन बाद जब एनआइए ने जांच अपने हाथ में ली तो घटना स्थल पर तत्काल ऐसे कोई सुराग नहीं मिले, जिनसे पता चलता कि अपराधी कौन हैं. उमर फारूक शुरुआती संदिग्धों की फेहरिस्त में भी नहीं था.

वह और जेईएम का एक और आतंकी पुलवामा की घटना के 43 दिन बाद 29 मार्च 2019 को बडगाम जिले के नौगाम में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए. लेकिन इस मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी पुलवामा हमले के साथ इसका संबंध नहीं जोड़ पाए और इसलिए उन्होंने एनआइए की टीम को जानकारी तक नहीं दी.

टीम की अगुआई कर रहे एनआइए के पुलिस महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जनरल) अनिल शुक्ला ने जांच का काम अपने हाथ में लेने के बाद एजेंसी के सामने आई बड़ी चुनौतियों का खाका पेश किया है. इनमें आत्मघाती हमलावर, हमले में इस्तेमाल कार, आइईडी एसेंबल करने वालों, मुख्य षड्यंत्रकारियों की पहचान करने और हमले को अंजाम देने के जेईएम के दावे की सचाई का पता लगाने सरीखी चुनौतियां शामिल थीं.

संदिग्धों से मिली जानकारियों का पीछा करते हुए वे महज बंद गली के आखिरी के मुहानों पर पहुंचते और मायूस हो जाते. लिहाजा, उन्होंने तरीका बदला और तरतीबवार ढंग से उन सबूतों को खंगालना शुरू किया जो पुलवामा हमले के बाद मुठभेड़ों में मारे गए आतंकवादी अपने पीछे छोड़ गए थे.

नया मोड़
दिसंबर 2019 में कहीं जाकर इस टीम की किस्मत पलटी, जब उन्होंने उमर फारूक के सेलफोन से नौगाम पुलिस थाने की ओर से निकाली गई जानकारी का अध्ययन किया. जिस मुठभेड़ में वह मारा गया था, उसी में उसका यह सैमसंग गैलेक्सी नोट 9 फोन भी थोड़ा-बहुत टूट-फूट गया था.

मगर इसमें ऐसी तस्वीरें और जानकारियां महफूज थीं जिनसे पुलवामा धमाके में उमर फारूक की गहरी संलिप्तता का संकेत मिला. कानूनी वजहों के चलते, विडंबना यह थी कि इस फोन तक पूरी पहुंच हासिल करने और इसमें बंद जानकारियां निकालने के लिए जेऐंडके की अदालतों से अनुमति हासिल करने में एनआइए को करीब दो महीने लगे.

फिर एनआइए ने यह फोन साइबर सुरक्षा के लिए सरकार की नोडल एजेंसी सीईआरटी-इन या कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम को भेज दिया. इसकी डिजिटल एनालिसिस प्रयोगशाला ने इसमें से तस्वीरों के अलावा भारी तादाद में वीडियो रिकॉर्डिंग वॉइस मैसेज और चैट निकालीं. इनमें आइईडी और उन्हें बनाने वाले लोगों की तस्वीरें हाथ लगीं.

बड़े अफसरों के मुताबिक, 16 घंटे से ज्यादा के वॉइस मेसेज सुने गए, जिनमें पाकिस्तान स्थिति जेईएम के अपने आकाओं के साथ उमर फारूक की चैट भी शामिल थीं. एनआइए की टीम जानती थी कि सोने का खजाना उसके हाथ लग गया है. एक अफसर ने थोड़े व्यंग्य से भरे अंदाज में कहा, ‘‘अगर दहशतगर्दों की किस्मत होती है, तो हमारी भी होती है.’’
इस फोन के जरिए हाथ लगे सुरागों से लैस शुक्ला और उनके एनआइए के साथियों—पुलिस उपमहानिरीक्षक सोनिया नारंग और जम्मू स्थित पुलिस अधीक्षक राकेश बलवाल—ने पहेली के अलग-अलग बिखरे टुकड़ों को जोडऩा शुरू किया और साथ ही दूसरे सुरागों की तहकीकात जरिए मामले की परतें उधेड़कर रख दीं.

मेहनत और लगन से तमाम सबूतों को दर्ज करते हुए एनआइए ने जो लंबा-चौड़ा आरोप-पत्र दाखिल किया है, उसे पढऩा क्राइम थ्रिलर पढऩे की तरह लगता है, जो अनेक दूसरी चीजों के अलावा बॉलीवुड की फिल्मों सरीखे उतार-चढ़ावों और रहस्यमय मोड़ों से भरा है.

उमर फारूक की अहमियत
उमर फारूक की अहमियत समझने के लिए आपको पहले यह जानना होगा कि वह एक और वांछित पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद इब्राहीम अतहर का बेटा था. अतहर और जेईएम का सरगना मसूद अजहर भाई हैं. अतहर ने दिसंबर 1999 में काठमांडू से दिल्ली की इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आइसी-814 को हाइजैक करके अफगानिस्तान के कंधार ले जाने में प्रमुख भूमिका अदा की थी.

तब अफगानिस्तान में गद्दीनशीन तालिबान और पाकिस्तान की आइएसआइ की शह पर इन अपहरणकर्ताओं ने बंधक बनाए गए विमान यात्रियों को छोडऩे और विमान को भारत वापस आने देने के बदले भारतीय जेलों में बंद तीन कैदियों को रिहा करने की मांग की थी. इन तीन कैदियों में, जिन्हें भारत सरकार छोडऩे को राजी हो गई थी, मसूद अजहर भी था, जिसे 1994 में आतंकी होने के शक में गिरफ्तार किया गया था और जम्मू की जेल में रखा गया था.

रिहाई के फौरन बाद मसूद अजहर पाकिस्तान स्थित अपने अड्डे बहावलपुर लौट गया. वहां उसने मार्च 2000 में जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की. अगले दो सालों में जेईएम ने बड़े हमलों को अंजाम दिया. इनमें एक अप्रैल 2000 में श्रीनगर के बादामी बाग में सेना के 15 कोर मुख्यालय में हुआ आतंकी हमला था जिसमें सात सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे.

दूसरा हमला 1 अक्तूबर, 2001 को किया गया. जेऐंडके विधानसभा पर आत्मघाती बम हमले में 38 लोग मारे गए थे. मगर उसी साल 13 दिसंबर को भारतीय संसद पर हुआ हमला था, जिसमें आठ सुरक्षा कर्मचारी शहीद हो गए थे, जिसकी वजह से जेईएम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गया तथा जिसने भारत और पाकिस्तान को युद्ध की कगार पर धकेल दिया था. 

बाद में, राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की हुकूमत के वक्त, जेईएम के पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के साथ रिश्ते बिगड़ गए. इसे बाद आइएसआइ भारत के खिलाफ हमले करवाने के लिए लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का इस्तेमाल करने लगी. इनमें नवंबर 2008 में मुंबई का आतंकी हमला भी शामिल था. लेकिन इससे जेईएम की गतिविधियां नहीं रुकीं.

उसने अल कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान के साथ अपना टांका जोड़ लिया. अजहर ने फिर जनवरी 2016 में कहीं जाकर अपनी वापसी का संकेत दिया, जब भारी हथियारों से लदे जेईएम के छह फिदायीन हमलावरों ने पठानकोट एयरबेस पर धावा बोलने की कोशिश की, जिसमें एयरबेस के सात सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे.

उमर फारूक उस वक्त महज तीन साल का था जब उसके पिता ने  आइसी-184 को हाइजैक करने में हाथ बंटाया था. एनआइए को उसकी शुरुआती जिंदगी के बारे में ज्यादा नहीं पता है और न यह कि उसकी पढ़ाई-लिखाई कहां हुई. लेकिन उन्हें इतना जरूर पता है कि उसके पिता के भाई अम्मार अल्वी ने उसे अप्रैल 2016 में, जब वह महज 20 साल का था, अफगानिस्तान भेजा था ताकि वहां वह हेलमंड प्रांत के सांगिन स्थित अल कायद के कैंप में प्रशिक्षण ले सके.

वहां उसने आइईडी एसेंबल करने में महारत हासिल कर ली और यह भी एक वजह थी कि उसे अप्रैल 2018 में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए भारत भेज दिया गया. (वायु सेना में लड़ाकू पायलटों की तरह, आतंकवादी संगठनों में बम बनाने वालों को ऊंचा दर्जा दिया जाता है.)

समझा जाता है कि भारत आने से पहले उमर फारूक ने अफीरा बीबी से निकाह किया, पर उनकी पृष्ठभूमि के बारे में ज्यादा नहीं पता है. उधर, उसके आने से कुछ महीने पहले उसके भाई और प्रशिक्षित निशानेबाज उस्मान इब्राहीम हैदर को घुसपैठ के लिए कश्मीर भेजा गया. उमर फारूक के पास अपने फोन में उन विदाई पार्टियों की तस्वीरें थीं जो मसूद अजहर की मेजबानी में हैदर के लिए आयोजित की गई थीं.

ये विदाई पार्टियां उस परंपरा के मुताबिक ही थीं जिसका पालन जेईएम प्रमुख अपने किसी प्रमुख सदस्य को बड़े मिशन पर भेजते वक्त करता था. हैदर ने जल्द ही अपनी अमेरिका में बनी स्नाइपर कार्बाइन से कुछ दूरी से निशाना लगाते हुए कई भारतीय सुरक्षा कर्मियों को मारकर खासा नाम कमा लिया.

लगता है, जेईएम ने जेऐंडके में भारत के बहुस्तरीय सुरक्षा जाल को चकमा देकर अपने आतंकियों को घुसाने का एक सुचालित तंत्र स्थापित कर लिया था. 14 और 15 अप्रैल की दरम्यानी पूर्णिमा की रात को, कहा जाता है कि उमर फारूक ने जम्मू के सांबा-कठुआ क्षेत्र में हीरानगर के नजदीक अंतरराष्ट्रीय सीमा से बाड़ पार की. उसके फोन पर उसकी घुसपैठ का वीडियो भी दर्ज बताया जाता है.

एक तयशुदा जगह से उसे जेईएम के दो ओवरग्राउंड वर्करों (ओजीडब्ल्यू)—33 वर्षीय असहाक अहमद नेंगरू और 25 वर्षीय मोहम्मद इकबाल राठेर—ने उठाया. उमर फारूक घाटी में सामान लेकर जा रहे एक ट्रक के पिछले हिस्से में छिप गया.

ट्रक नेंगरू चला रहा था, जबकि राठेर अपनी फिएट पुंटो ड्राइव करते हुए आगे चल रहा था ताकि रास्ते में सुरक्षा जांच से आगाह कर सके. उमर फारूक को कोकापारा में एक सुरक्षित मकान में ले जाया गया, जहां दूसरे पाकिस्तानी और स्थानीय आतंकवादी भी उसके साथ आ मिले.

बहावलपुर के आकाओं ने उमर फारूक को पुलवामा के लिए जेईएम कमांडर नामजद किया था और वह सीधे मसूद अजहर के डिप्टी का काम करने वालों में से एक अल्वी को रिपोर्ट करता था. कश्मीर में दाखिल होने के बाद उमर फारूक की अल्वी के साथ बातचीत के कई ऑडियो एनआइए के कब्जे में हैं. इन वार्तालापों को सुनते हुए जिस बात ने जांचकर्ताओं का ध्यान खींचा, वह यह कि उमर फारूक के दिमाग में जिहाद की धुन सवार थी, वह इस मकसद के लिए जी-जान से समर्पित था.

उसे मारने-मरने से डर नहीं लगता था. बताया जाता है कि जब उसके हैंडलर उसे दूसरे हमले करने से रोकते थे तो वह अपना आपा खो बैठता था. एक अधिकारी कहते हैं, ''वह केवल बमसाज नहीं था, बल्कि अच्छा रणनीतिकार भी था, जो जानता था कि अपने मकसद को आगे बढ़ाने के लिए प्रोपैगैंडा का इस्तेमाल कैसे किया जाए.’’

फारूक ने संभाली कमान
जेईएम की पुलवामा इकाई का कमांडर होने के नाते उमर फारूक ने अपना मिशन चलाने के लिए कई मिनी मॉड्यूलों की स्थापना करना शुरू कर दिया. उसने आइईडी और हमलों की योजनाएं बनाने में अपनी मदद के लिए कोर या केंद्रीय और हमलावर मॉड्यूल बनाए. वहीं महफूज मकानों और आने-जाने के साधनों के इंतजाम के लिए लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट मॉड्यूल बनाए.

हमलावर मॉड्यूल में पाकिस्तानी नागरिकों का दबदबा था, जिनमें मोहम्मद इस्माइल, मोहम्मद कामरान अली और कारी यासिर शामिल थे. ये तीनों अत्यंत प्रशिक्षित थे और पठानकोट से भी बड़े हमले को अंजाम देने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे. एनआइए का अनुमान है कि भारत में घुसपैठ के वक्त ये तीनों अपने बैकपैक में 35 किलो आरडीएक्स लेकर आए जिसका इस्तेमाल पुलवामा आतंकी हमले में किया गया.

फारूक ने जो कोर, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट मॉड्यूल बनाए, उनमें स्थानीय कश्मीरियों को बोलबाला था, जो या तो पूर्णकालिक आतंकवादी या ओजीडब्ल्यू थे. इतने सालों के दौरान जेईएम ने काम करवाने के लिए संपर्कों का जो सघन जाल बिछाया था, वह एनआइए की टीम की आंखें खोल देने वाला था.

लॉजिटिक्स मॉड्यूल में बिलाल अहमद कुछे था, जो आरा मशीनों के दौलतमंद मालिक का बेटा और जेईएम का ओडीडब्ल्यू था. उसने फारूक को जो चीजें दिलवाईं, उनमें सैमसंग के दो महंगे सेलफोन भी थे, जो अगस्त में बडगाम के एक डीलर से खरीदे गए थे. इन्हीं में से एक फोन उमर फारूक के मारे जाने के बाद सुरक्षा बलों ने बरामद किया था.

काकापोरा के 53 वर्षीय पीर तारिक अहमद शाह और उसकी 22 वर्षीया बेटी इंशा जान सरीखे कई बाशिंदे थे, जिन्होंने उमर फारूक और उसकी टीम को कई मौकों पर पनाह दी. एनआइए के पास सबूत मौजूद हैं, जो बताते हैं कि शाह ने एक स्थानीय दुकान से सेना की वर्दी खरीदी ताकि आतंकी जरूरत पड़ने पर खुद को भारतीय सुरक्षा बलों के छद्मवेश में छिपा सकें.

इंशा, फारूक के करीब आ गई जान पड़ती है, क्योंकि एनआइए को उसके फोन में उन दोनों की बीसियों तस्वीरें मिली हैं. इंशा कई तस्वीरों में उमर फारूक की कार्बाइन अपने कंधों पर और उसकी पिस्तौल अपने हाथ में लिए दिखाई देती है.

उधर, जेऐंडके उस वक्त बड़ी सियासी उथल-पुथल से गुजर रहा था. महीनों से केंद्र सरकार के इरादों और मकसदों के खिलाफ काम कर रही महबूबा मुक्रती ने गठबंधन की भागीदार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन वापस लेने के बाद जून 2018 में इस्तीफा दे दिया था और राष्ट्रपति शासन लगा दिया दिया गया था. साफ संकेत उभर रहे थे कि उग्रवाद बढ़ रहा है और उस पर काबू पाने के लिए सुरक्षा बलों को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी.

सुरक्षा बलों ने उमर फारूक के भाई उस्मान इब्राहीम को 30 अक्तूबर, 2018 को पुलवामा जिले में त्राल के नजदीक मुठभेड़ में मार गिराया. अपने भतीजे की मौत से मसूद अजहर आपा खो बैठा और उसने 1 नवंबर को एक ऑडियो प्रसारण में कश्मीर के अपने समर्थकों से ‘‘एकजुट होने और भारत सरकार को उखाड़ फेंकने’’ का आह्वान किया. जेईएम के आकाओं ने उमर फारूक को बड़ा आतंकी हमला करने की मंजूरी दे दी.

हमले की तैयारी
एनआइए ने पता लगाया कि इसके बाद जल्द ही उमर फारूक ने रफ्तार तेज कर दी. एजेंसी उसके दो बैंक खातों—पेशावर के मीजान बैंक और खैबर एजेंसी के एलाइड बैंक—में लगातार आ रही रकमों का पता लगाने में कामयाब रही. यहां तक कि बैंक में जमा रकमों की पर्चियां भी उसने जुटा लीं.

अगले दो महीनों के दौरान इन खातों में 1.1 लाख रुपए से 1.5 लाख रुपए तक अलग-अलग रकमों में कुल 10.43 लाख रुपए जमा हुए. ये धनराशियां फिर हवाला चैनलों के जरिए उमर फारूक को सौंप दी गईं. एनआइए के पास उमर फारूक के फोन के ऑडियो मैसेज हैं जिनमें वह जेईएम मुख्यालय के अपने हैंडलरों से रकम मिलने की तस्दीक कर रहा है.

पैसा हाथ में आने के साथ ही अब उमर फारूक ने आतंकी हमले का तानाबुना बुना. उसने वाहन पर लदे आइईडी या वीबी-आइईडी बनाने के लिए जरूरी साजो-सामान खरीदने और हमले को अंजाम देने के मकसद से आत्मघाती हमलावर जुटाने की खातिर एक कोर टीम जोड़ी. काकापोरा में फर्नीचर की एक दुकान के मालिक का बेटा 24 वर्षीय शाकिर बशीर, उमर फारूक के मंसूबों में अहम बन गया.

उसने आइईडी में अतिरिक्त विस्फोटक के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए खाद बेचने वाली एक स्थानीय दुकान से अमोनियम नाइट्रेट खरीदने में उसकी मदद की. उसने विस्फोटक रखने के लिए एक अन्य दुकान से दो प्लास्टिक के ड्रम भी खरीदे, जिनमें से एक चमकीले नारंगी और दूसरा गहरे नीले रंग का था.

बशीर ने हमले से पहले लक्ष्य की जासूसी और मौका मुआयना भी किया. एनआइए ने उमर फारूक के फोन से रेकी के लिए उसके दौरों के वीडियो बरामद किए हैं और दुकानों से तस्दीक भी की है कि उसने आइईडी के लिए उनसे सामान खरीदे थे. बाद में जब उन्होंने उससे पूछताछ की तो पाया कि वह ''शातिर, शांतचित्त और सख्त जान’’ था.

बशीर से उमर फारूक इस कदर खुश था कि पाकिस्तान स्थित अपने हैंडलरों से अपनी एक बातचीत में उसने उसे अपना ‘अफजल गुरु’ बताया. जाहिर है, वह जेईएम के ही उस आतंकी का जिक्र कर रहा था जिसे 2001 में संसद पर हुए हमले में उसकी लिप्तता के लिए 2013 में फांसी दे दी गई थी.

उमर फारूक अपने कोर मॉड्यूल के सदस्यों का जिक्र भी 'अफजल गुरु स्क्वाइड’ कहकर करता था, लेकिन उसे फोन पर इस शब्द का इस्तेमाल करने के लिए अपने हैंडलरों की फटकार भी सुननी पड़ी थी. उन्हें डर था कि इससे कहीं भारतीय सुरक्षा बलों के कान न खड़े हो जाएं, जो उसका फोन टैप कर रहे हो सकते थे.

उमर फारूक के कोर मॉड्यूल के एक और सदस्य श्रीनगर में रहने वाले जेईएम के ओजीडब्ल्यू 20 वर्षीय वाइज-उल-इस्लाम ने अपने अपने अकाउंट से बम के लिए खरीदारियां की थीं. इस्लाम ने 15 से 20 नवंबर के बीच एल्यूमिनियम का चार किलो बुरादा (यह ईंधन का काम करता है और विस्फोटकों को जोड़कर रखने में मदद करता है) और डेटोनेटर को बिजली देने के लिए दो बैटरियां, सीसे के तार के अलावा बम जोड़ते वक्त जरूरी दस्ताने तथा चेहरे के नकाब सरीखे सुरक्षा उपकरणों के ऑर्डर दिए थे.

एनआइए की टीम अमेजन की रसीदें खोज निकालने में कामयाब रही, ताकि यह पता लगा सके कि उसने ये खरीदारियां कब की थीं और साबित कर सके कि वह जुर्म में शामिल था. उमर फारूक ने जेईएम के एक और कारिंदे अवंतीपोरा के 24 वर्षीय मुदस्सर अहमद खान को दक्षिण कश्मीर में काम कर रहे खदान ठेकेदारों से गैरकानूनी ढंग से जिलेटिन की छड़ों के पुलिंदे खरीदने को भेजा था.

अंतिम उल्टी गिनती
जेईएम के आकाओं ने जनवरी 2019 में उमर फारूक से कहा कि वह एक हमला पाकिस्तान में कश्मीर सॉलिडैरिटी दिवस के तौर पर मनाई जाने वाली 5 फरवरी की तारीख के एक दिन बाद करे. हमले के लिए गाड़ी का इंतजाम करने की गरज से उमर फारूक ने जेईएम के अनंतनाग में रहने वाले उग्रवादी सज्जाद अहमद भट को श्रीनगर से सेकंड-हैंड कार खरीदने के लिए भेजा. भट ने एक कोबाल्ट ब्लू मारुति ईको मिनी वैन तय की और 1.85 लाख रुपए में खरीद ली.

उसने डीलर से कहा कि वह उसकी पिछली सीट हटा दे क्योंकि उसे इस जगह का इस्तेमाल खाने-पीने की चीजें भरने के लिए करना है. बशीर ने 25 जनवरी को यह कार भट से ली और उसे खुद चलाते हुए काकापोरा ले गया, जहां उसने इसे अपने मकान के सामने पार्क कर दिया. एनआइए के कब्जे में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग है, जिसमें उमर फारूक शांत और संयत आवाज में जेईएम मुख्यालय के अपने हैंडलरों को यह बताता सुनाई दे रहा है कि अब तक कुल खर्च 5.4 लाख रुपए हुआ है. यहां तक कि उसने यह भी बताया कि किस मद में कितना खर्च हुआ है.

इस सबके बाद उमर फारूक को इस खेल का आखिरी मोहरा तलाशना था—फिदायीन हमलावर. उसके पाकिस्तानी सहयोगियों ने इसेलिए मुनासिब आदमी चुना-काकापोरा का 21 साल का आदिल अहमद डार.डार ने जेईएम में शामिल होने के लिए पिछले साल घर छोड़ दिया था.

मजदूरी करने वाले उसके पिता ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट स्थानीय पुलिस थाने में लिखवाई थी. नवंबर में अजहर की बदला लेने की अपील सुनने के बाद डार को ये मिशन सौंपा गया. इसके बाद उमर फारूक अपनी मदद के लिए जेईएम के एक और सदस्य 22 साल के समीर अहमद डार को पुलवामा से ले आया जो विस्फोटक का माहिर था. 

5 फरवरी की रात को उमर फारूक, समीर और आदिल ने बशीर के मकान में बैठकर आइईडी एसेंबल किया. बम बनाने के लिए जरूरी रसायनों की ठीक-ठीक मात्रा मापने और मिलाने के लिए उन्होंने तौलने की एक वजन नापने की मशीन भी खरीदी. अपने फन में माहिर उमर फारूक ने आरडीएक्स, अमोनियम नाइट्रेट और जिलेटिन की छड़ें परत-दर-परत भर दीं और विस्फोटकों पर एल्यूमिनियम पाउडर का लेप चढ़ा दिया.

काम हो जाने पर उमर फारूक ने तीनों के साथ एक सेल्फी ली जिसमें उनके चेहरे और कपड़े तक में एल्यूमिनियम पाउडर की परत चढ़ी थी. एनआइए ने कंटेनरों के साथ इस सबकी तस्वीरें बरामद की हैं. बाद की और भी तस्वीरें हैं, जिनमें आइईडी को कार में लादते, तारों को बैटरियों तक जाते और डेटोनेटरों को सुलगाने के लिए डैशबोर्ड पर लगे टोगल स्विच देखे जा सकते हैं. 

वीबी-आइईडी जब तैयार हो गई तो तीनों ने दस्तूर के मुताबिक प्रोपैगैंडा वीडियो रिकॉर्ड किया. इसमें आदिल एसॉल्ट राइफल थामे बता रहा है कि उसने आत्मघाती बॉक्वबर बनना क्यों तय किया. एनआइए का कहना है कि वह लगातार अटक-अटककर बोल रहा था, इसलिए इन दहशतगर्दों ने आखिरकार तय किया कि उसके लक्रज समीर बोलेगा और वह सिर्फ उसके मुताबिक अपने होंठ हिलाएगा.

फिर यह वीडियो रिकॉर्डिंग मंजूरी के लिए जेईएम के शीर्ष आकाओं को भेज दी गई. धमाके के बाद जब इसे जारी किया गया, एनआइए ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद ली और उन्होंने बताया कि ये पाकिस्तान में रह रहे किसी शख्स के आइपी एड्रेस की हैं. उधर आखिरी वक्त पर डर के मारे आदिल के पीछे हट जाने की आशंका से परेशान जेईएम के कश्मीर कमांडर कारी यासिर ने बैकअप के तौर पर एक और आत्मघाती बॉम्बर यावर अहमद को भी भर्ती किया था.

हमला और उसके बाद कार्रवाई  
उमर फारूक के सेलफोन रिकॉर्ड बताते हैं कि 6 फरवरी को उसने एसेंबल्ड आइईडी की तस्वीरें उस रऊफ असगर को भेजी जिसने उसे हमले की मंजूरी दी थी. हालांकि सीआरपीएफ काफिले पर हमला दोपहर को करना तय हुआ था लेकिन पिछली रात भारी बर्फबारी के कारण हाइवे पर गाड़ियों की आवाजाही रुक गई थी इसलिए हमला आगे खिसका दिया गया. इस बीच वीबी-आइईडी बशीर के घर के बाहर खड़ी थी और किसी को भी उस पर कोई संदेह नहीं हुआ. 

14 फरवरी को बशीर को उसके सूत्रों से पता चला कि सीआरपीएफ बसों का एक बड़ा काफिला उस दोपहर एनएच 44 से होकर गुजरेगा. वे इस मौके को हाथ से निकलने नहीं देना चाहते थे. बशीर ने रेकी कि तो पाया कि जो तीन रास्ते उसके घर से उसे राजमार्ग (एनएच) पर पहुंचा सकते थे उनमें से दो पर पुलिस नाका था लेकिन एक कच्चे रास्ते की कोई निगरानी नहीं होती थी.

लगभग 2 बजे बशीर ने आदिल से कहा कि वह कार में सवार हो जाए और पुलिस की निगाह से बचने के लिए एक घुमावदार रास्ते से होते हुए कच्ची सड़क पर चले. हाइवे से एक किलोमीटर पहले बशीर उतर गया. स्टीयरिंग अब आदिल ने संभाली और इंतजार किया. वह दो कारणों से अपने साथ पिस्तौल लेकर आया था. अगर वह पकड़ा गया, तो खुद को गोली मार लेगा. और अगर डेटोनेटर आईईडी को ट्रिगर करने में विफल रहा, तो वह ब्लास्ट कराने के लिए पिस्तौल का इस्तेमाल करेगा.

आदिल को सीआरपीएफ की 76वीं बटालियन की 78 गाडिय़ों का काफिला दिखा जो धीमी गति से एनएच-44 पर बढ़ रहा था. जैसे ही काफिला करीब आया, आदिल ने इंजन चालू किया और चार बसें गुजरने के बाद हाइवे पर अपनी कार चढ़ाई. उसने कुछ मीटर तक अपनी कार पांचवीं बस के समानांतर चलाई और फिर बस को टक्कर मारी और डैशबोर्ड पर लगा डेटोनेशन स्विच दबा दिया. जोरदार विस्फोट हुआ जिसकी आवाज कई मील दूर तक सुनाई दी. विस्फोट इतना जबरदस्त था कि सड़क में एक गहरा गड्ढा बन गया. 

जब एनआइए ने अगले दिन अपनी जांच शुरू की तो कार सहित हर सुराग के परखच्चे उड़ गए थे. कार के एक धातुई हिस्से पर मांस का एक टुकड़ा चिपका हुआ पाया गया जिसे डीएनए जांच के लिए भेजा गया था. चूंकि विस्फोट के बाद जेईएम ने आदिल डार का वीडियो जारी किया था, एनआइए उसके माता-पिता के पास पहुंची और उनका डीएनए लिया. डीएनए मैच कर गए. इस बात की पुष्टि हो गई कि जेईएम का वीडियो प्रामाणिक था. एनआइए को विस्फोट स्थल से कुछ दूरी पर कार के क्रैंकशाफ्ट का एक टुकड़ा भी मिला.

मोटर विशेषज्ञों से सलाह ली गई और उन्होंने बताया कि यह एक मारुति कार का हिस्सा है. कंपनी के अधिकारियों ने टुकड़े का अध्ययन किया और वे यह इंगित करने में सक्षम थे कि कार 22 जनवरी, 2011 को खरीदी गई थी. उस जानकारी के साथ, एनआइए उस डीलर को खोज सकी जिसने इसे बेचा था. भट के पास पहुंचने से पहले कार सात बार बिक चुकी थी. 

उमर फारूक के फोन के डेटा की जांच करते हुए जांचकर्ताओं को नंबर प्लेट के साथ कार की एक तस्वीर भी मिल गई और वे समझ गए कि जांच सही रास्ते पर है. एनआइए के महानिदेशक वाइ.सी. मोदी ने इस काम के लिए अपनी टीम की सराहना करते हुए कहा, ‘‘यह एक कठिन जांच थी क्योंकि सब कुछ अंधेरे से निकालने जैसा था.

हमने सबूतों को इकट्ठा करने और कडिय़ों को जोड़ने के लिए अपने स्तर से बेहतरीन प्रयास किया. बहुत मेहनत और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए, हम इस साजिश की तह में पहुंच सके.’’

एनआइए टीम के पास इस बात के भी सबूत हैं कि हमले के बाद, उमर फारूक जश्न के मूड में था. उसने अपने चाचा अम्मार अल्वी से कहा कि उसे पूरी उम्मीद है कि अब भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ जाएगी और कश्मीर को आजाद कराया जा सकेगा. पुलवामा हमले के बाद मसूद अजहर और उसके कुछ सहयोगियों को नजरबंद कर लिया गया था. उमर फारूक उनकी खैरियत को लेकर चिंतित था.

लेकिन उसे भरोसा दिलाया गया था कि उन्हें जल्द ही रिहा कर दिया जाएगा और आइएसआइ में उसके अपने संपर्कों ने भी उसे यही बताया था. बालाकोट पर भारत के हमले के बाद, उमर फारूक इस बात को लेकर नाराज था कि पाकिस्तान की सेना ‘सोती’ रही और उसने पलटकर हमला तक नहीं किया.


रऊफ असगर के साथ एक बातचीत में उमर फारूक ने एक और हमले की अनुमति मांगी, लेकिन उसे ऐसा न करने की सलाह दी गई. हालांकि, एनआइए को जानकारी है कि उमर फारूक को मार्च में एक और हमले के लिए मंजूरी मिल गई थी, और इसके लिए वह विस्फोटक जमा कर रहा था और उसने एक कार खरीद भी ली थी.

जब 29 मार्च को पुलवामा में एक मुठभेड़ में उमर फारूक को उसके एक सहयोगी कामरान अली के साथ मार गिराया गया, तो उसके चाचा रऊफ असगर ने शोक व्यक्त करते हुए एक ऑडियो संदेश प्रसारित किया. दु:ख से भरे स्वर में, उसने जेईएम समर्थकों से कहा कि उमर फारूक की जिंदगी भले ही छोटी रही हो, लेकिन पुलवामा विस्फोटों से उसने जो असर छोड़ा है, उसे कभी भुलाया नहीं जाएगा. बेशक, लेकिन हमेशा गलत वजहों से ही याद किया जाएगा. 

यह मामला अब जम्मू की अदालत में स्थानांतरित हो गया है जहां एनआइए की टीम को पूरा भरोसा है कि वह इस अपराध में पाकिस्तान की गहरी संलिप्तता के साथ इस मामले को साबित कर देगी. फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की जल्द ही समीक्षा होने वाली है. पाकिस्तान को एफएटीएफ की काली सूची में डालने के लिए भारत को पुलवामा हमले से जुड़े इन निष्कर्षों का उपयोग करना चाहिए. 

नीति-निर्माताओं और जिनके कंधे पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उन्हें एनआइए के इन निष्कर्षों पर चुपचाप बैठना नहीं चाहिए, बल्कि त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए. जांच संकेत देती है कि घाटी में भारी सैन्य उपस्थिति के बावजूद जेईएम भारतीय सुरक्षा घेरे को आसानी से तोड़ सकता है.

और कैसे संगठन के पास पर्याप्त संख्या में लोग हैं जो न सिर्फ जैश से सहानुभूति रखते हैं बल्कि उन्हें अपने कारनामों को अंजाम देने के लिए पैसा और साजो-सामान के साथ-साथ छिपने के लिए सुरक्षित ठिकाने भी मुहैया कराते हैं.

जिस चीज की जांच की जरूरत है लेकिन वह एनआइए के दायरे से बाहर आती है, वह यह है कि केंद्रीय और राज्य की खुफिया एजेंसियां प्रमुख आतंकवादियों की उपस्थिति का पता लगाने और आसन्न हमले की चेतावनी देने में कैसे विफल रहीं. भारत ने पुलवामा हमले से कई सबक सीखे हैं. पर इतिहास में एक बुरी आदत है कि वह खुद को दोहराता है.

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