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आवरण कथाः बेहतर संभावनाएं शंकाओं के साथ

यह महामारी निश्चित रूप से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर एक गहरा जख्म छोडऩे वाली है. वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में अनिश्चितताओं को देखते हुए हमारे नीति निर्माताओं को अडिय़ल और हठधर्मी रवैया छोड़कर बहुत ही चौकस और चौकन्ना रहना होगा.

नीलकंठ मिश्र नीलकंठ मिश्र

नया दौर, नई राहें 2021ः वैश्विक अर्थव्यवस्था

नीलकंठ मिश्र


उम्मीद है कि 2021 वर्ष 2020 के मुकाबले बेहतर होगा.’ आप ही सोचिए जरा! नए साल को लेकर की जाने वाली उम्मीदों-अपेक्षाओं के लिहाज से यह ऐसी कौन-सी खास बात हुई? मगर खस्ताहाल विश्व अर्थव्यवस्था के अब धीरे-धीरे रफ्तार पकडऩे के बाद यह उम्मीद भी अब काफी बड़ी है कि 2021 पिछले साल से बेहतर होगा, खासकर इसलिए कि अब वैक्सीन भी आ गई है. पर एक सवाल अब भी यहां खड़ा है कि नया साल आखिर कितना बेहतर होने की संभावना है?

कुछ पुरानी महामारियों ने इससे पहले भी उस दौरान होने वाली ऊंची मृत्यु दर की वजह से अर्थव्यवस्था का हुलिया ही बदल दिया था. लेकिन उन सबसे ठीक उलट कोविड-19 का आर्थिक असर प्राथमिक तौर पर उसके संक्रमण की रफ्तार धीमी करने के लिए उठाए गए प्रशासनिक कदमों से हुआ. सरकारें दरअसल इस बीमारी को बेहतर ढंग से समझने और उससे निबटने को वैक्सीन तैयार करने के लिए वह सब कर रही थीं.

अब सवाल है कि अगर लॉकडाउन लागू करने से आर्थिक मंदी पसरी तो उसके उठाए जाने से आर्थिक हालात सामान्य नहीं हो जाने चाहिए? पर बदकिस्मती से आर्थिक मंदी उत्पादन क्षमता को भी मंदा कर देती है, जैसे किसी धातु को मोड़ दें तो वह फिर पूरी तरह सीधी नहीं हो सकती. कारखाने-दुकानें बंद हुईं तो लोगों और कंपनियों को कुछ जमा-पूंजी गंवानी पड़ी या मंदी से उबरने के लिए अधिक कर्ज लेना पड़ा. उससे खपत या निवेश की क्षमता कई साल तक घट जाती है, उपभोक्ता और निवेशकों का मनोबल कमजोर हो जाता है और नियोक्ता और कर्मचारी या आपूर्तिकर्ता और उपभोक्ता के बीच का आर्थिक रिश्ता टूट-सा जाता है.

आर्थिक तंगहाली को घटाने और वित्तीय बाजार को चालू रखने के लिए दुनिया भर में नीति नियंता 2020 में अप्रत्याशित वित्तीय और मौद्रिक नीतियां लेकर आए, जिनमें कई तो 2021 में भी जारी रह सकती हैं. ये वित्तीय उपाय घाटे का सामाजिक बंटवारा करते हैं (यानी बोझ को मौजूदा और आगे के करदाताओं में बांट देते हैं), चाहे वह लोगों को नकद मदद मुहैया कराना हो या छोटी कंपनियों और कारोबार को सस्ते कर्ज देना हो, ताकि वे अपनी आर्थिक क्षमता न गंवा बैठें.

मौद्रिक नीतियों ने असाधारण अनिश्चितता और अप्रत्याशित सरकारी देनदारी के बावजूद ब्याज दरों को नीचे बनाए रखा. लिहाजा, इस कदम से जीडीपी और वैश्विक कर्ज के अनुपात पर दीर्घावधिक असर होना तय है, मगर फौरी नुक्सान कुछ घटा, जैसा कि संक्रमण की पहली लहर थमने के बाद आर्थिक सूचकांकों में आए उठान से जाहिर है. जब मौसम में गर्मी आएगी और टीकाकरण अपनी रफ्तार पकडऩे लगेगा तो पश्चिमी गोलार्द्ध में भी ऐसी ही उठान की उम्मीद करना मुनासिब है.

हालांकि उदार नीतिगत उपायों के बावजूद चीन के अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था 2022 तक कोविड-19 के प्रकोप के पहले वाले स्तर पर पहुंचने की उम्मीद नहीं है. ऊपर बताई वजहों से कारोबार के अनिवार्य नुक्सान के साथ कारोबार और उपभोक्ता का मनोबल सुधरने में वक्त लगने का अनुमान है.

मसलन, सबसे पहले संक्रमण की चपेट में आने और सबसे पहले लॉकडाउन उठाने वाले और साथ ही 2020 में सबसे कम आर्थिक नुक्सान झेलने वाले चीन में सभी पाबंदियां उठाने के बाद स्थितियां सामान्य करने के लिए कई तिमाही तक उपभोक्ता खर्च में इजाफे के उपाय किए गए. इसके अलावा आपूर्ति शृंखला में रुकावटों से उत्पादन की दिक्कतों को दूर होने में कुछ समय लगेगा.

पहली बात तो यही कि कुछेक अवयवों/पुर्जों/अंगों की कमी से भी उत्पादन रुक सकता है और ऐसे में सभी अवयवों की मांग से दुनिया भर में आपूर्ति शृंखला के टूटने का जोखिम पैदा हो गया है. मसलन, यूरोप में कुछ कार फैक्ट्रियों को ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स की कमी से हाल में उत्पादन रोकना पड़ा. इन वजहों से पैदा होने वाला डर जमाखोरी को बढ़ावा दे रहा है क्योंकि उत्पादन न होना, बना माल पड़े रहने से ज्यादा महंगा बैठता है.

लिहाजा, कमी और बढ़ेगी. दूसरे, सेवा क्षेत्र से गतिविधियां गुड्स सेक्टर में शिफ्ट हो रही हैं क्योंकि उपभोक्ता खपत में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले ट्रैवल, टुरिज्म और होटल-रेस्तरां जैसे सेवा क्षेत्र पर पाबंदियां हैं और सामान की खपत काफी कम है. यहां तक कि गुड्स सेक्टर में भी लैपटॉप और सर्वर जैसे कुछ क्षेत्रों में मांग सामान्य से ज्यादा है और घरेलू उपकरणों को अपग्रेड करने की मांग भी बढ़ी है जबकि कीमती कपड़ों की मांग घटी है. तीसरे, उत्पादन क्षमता अभी भी सीमित है, खपत के लिए प्रोत्साहन से सामान की बिक्री अमेरिका में जून तक और यूरोपीय संघ में कुछ महीने पहले कोविड के पहले के स्तर पर पहुंच गई. चीन में इन्फ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट में प्रोत्साहन से मांग बढ़ी है.

इन वजहों से हो रही कमियां कच्चे माल के आपूर्तिकर्ताओं के लिए और भी भारी पड़ रही हैं और आपूर्ति शृंखला में एक विचित्र किस्म की तेजडिय़ा आवक दिख रही है. लिहाजा, किसी खास उत्पाद कैटेगरी में असली मांग से ज्यादा मांग की धारणा में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है.

मसलन, ऑटो-निर्माता राम अपने माकूल समय में उत्पादन की व्यवस्था को रोकने का फैसला करता है और विभिन्न कल-पुर्जों का जखीरा सामान्य तौर पर दो हक्रते की जरूरत के बदले तीन हफ्ते की जरूरत के हिसाब से इकट्ठा कर लेता है.  उसके सप्लायर श्याम को तब लगेगा कि मांग सामान्य से ज्यादा है और वह न सिर्फ अपना उत्पादन बढ़ा देगा, बल्कि अपने कल-पुर्जों का जखीरा भी बढ़ा देगा. फिर, उसके सप्लायर को मांग और तेज लगेगी.

कई लंबी आपूर्ति शृंखला में सबसे अहम स्टील की मांग में असामान्य तेजी भारी कमी पैदा कर रही है और कीमतें बढ़ रही हैं. लिहाजा, जमाखोरी बढ़ रही है क्योंकि खरीदार कीमतों में और उछाल से पहले जखीरा बना लेना चाहते हैं. स्टील मिल में लौह अयस्क के सप्लायरों ने साल भर पहले कीमतों में बेइंतेहा बढ़ोतरी देखी. इस तरह तेजी की धारणाएं काम करती हैं क्योंकि असली रफ्तार धीमी रहने पर भी ये धारणाएं घंटे भर में सैकड़ों किलोमीटर का सफर कर लेती हैं.

किसी वस्तु की मांग के लगातार बने रहने वाले, मौसमी और फिर ढांचागत पहलुओं को एक-दूसरे से अलग करके देख पाना बहुत मुश्किल होता है, ऐसे में इस समय मांग में बढ़ोतरी महंगाई और बढऩे के अंदेशे को हवा दे रही है. मसलन, इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर बढऩे के कारण तांबे जैसे धातुओं की मांग लगातार तेज बनी हुई है और हरित ऊर्जा पर जोर से धातुओं की मांग में उछाल आने की उम्मीद है.

बेशक, यह सब घटनाक्रम अगले पूरे दशक में घटे, मगर मौजूदा मांग सामान्य नहीं है. और कल-पुर्जों का जखीरा बन जाने के बाद मांग तेजी से टूट सकती है, जैसे तेजडि़ए के बाद मंदडि़ए हावी हो जाते हैं. फिलहाल तो बढ़ती कीमतों से महंगाई और केंद्रीय बैंक की नीतियों तथा वित्तीय बाजार की स्थिरता पर उसके असर पर बहस छिड़ गई है.

टीकाकरण के बाद अगर स्थितियां सामान्य होती हैं और वैश्विक वृद्धि में उछाल आता है (क्रेडिट सुइस का अनुमान है कि अगले साल वैश्विक जीडीपी 4 फीसद रहेगी), तो सेवा क्षेत्र की खपत बढऩे के साथ कुछ माल की सामान्य से अधिक मांग खत्म हो सकती है. दरअसल, इससे फिर विश्व व्यापार का संतुलन सार्थक स्तर पर आ सकेगा.

मसलन, संयुक्त राज्य अमेरिका का व्यापार घाटा इस साल बढ़ गया है और उसके व्यापार सहयोगियों के व्यापार अधिशेष की खाई चौड़ी हो गई है. इस रुझान के उलटा होने से उसके व्यापार सहयोगियों के निर्यात पर असर पड़ सकता है क्योंकि अमेरिका में कुछ अन्य देशों की तरह मांग ज्यादातर स्थानीय सेवाओं की तरफ मुड़ गई है.

उभरते बाजारों की ओर पोर्टफोलियो निवेश के प्रवाह से मनोबल ऊंचा उठ रहा है और उससे नीतिगत पहल के लिए बेहद जरूरी गुंजाइश बन रही है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी है कि यह रुझान बना रहेगा और यह वैश्विक पोर्टफोलियो निवेश की रणनीतिक संतुलन से ज्यादा कुछ है. यह आम समझ आंकड़ों से पुष्ट नहीं होती है कि विकसित बाजारों में नीची ब्याज दरें पूंजी के प्रवाह को मजबूत करेंगी. पिछले दशक में अमेरिका में लगभग शून्य ब्याज दरों और यूरोपीय संघ में नकारात्मक जमा दरों के बावजूद इन अर्थव्यवस्थाओं से पोर्टफोलियो प्रवाह कमजोर रहा.

हमारी नजर में उसकी तीन वजहें थीं. एक, 2019 (महामारी के पहले) में अमेरिका और यूरोपीय संघ में सालाना पारिवारिक वित्तीय बचत की मात्रा 15 साल पहले के स्तर पर ही थी. महामारी के दौर में जबरन या सावधानी के तहत की गई बचत फौरी मामला ही हो सकता है. दूसरे, कई लोगों की उम्मीद के विपरीत, यूरोपीय संघ में जमा दरों के नकारात्मक रहने के बावजूद जमा की जा रही पारिवारिक बचत यूरोपीय संघ में सार्थक ढंग से बढ़ी और लगभग शून्य दर के बावजूद अमेरिका में स्थिर रही है.

परिवार एसेट के मद में कम रकम डाल रहे हैं, जो विदेशी इक्विटी में निवेश कर सकते हैं. यानी अमेरिका में पेंशन और म्युचुअल फंड में और यूरोपीय संघ में बीमा तथा निवेश फंड में. तीसरे, अमेरिका में पेंशन फंड से इक्विटी आवंटन और यूरोपीय संघ में संस्थागत मैनेजर असलियत में नहीं बदले हैं. यूरोपीय संघ में नीची दरों की वजह से संस्थागत निवेश वैकल्पिक एसेट (निजी इक्विटी या रियल एस्टेट) की ओर मुड़ गए.

हालांकि हमारी राय में दिसंबर में व्यापार घाटे में बढ़ोतरी के बावजूद भारत में फिलहाल दिख रहा भुगतान संतुलन अधिशेष बने रहने की उम्मीद है, जिससे महज नौ महीने में ही विदेशी मुद्रा भंडार में सैकड़ों अरब डॉलर का इजाफा हो गया है. यह अगर ऐसे ही छोड़ दिया गया तो समस्या खड़ी हो सकती है. भारतीय रिजर्व बैंक रुपए की मुद्रास्फीति को रोकने के लिए अतिरिक्त डॉलर खरीद रहा है, इसका नतीजा जरूरत से ज्यादा रुपए जारी करने में हो सकता है.

इससे वित्तीय एसेट में बुलबुले बढऩे का खतरा है, जो खास मदद तो नहीं करेगा लेकिन बैठने पर मुश्किल पैदा कर सकता है या अचानक फट सकता है. इसके अलावा मुद्रा बाजार में लगातार हस्तक्षेप से देश में मौद्रिक हेरफेर से नुक्सान का खतरा है. हल शायद घरेलू मांग बढ़ाने वाली नीतियों के रूप में हो सकता है और इस तरह स्वाभाविक तौर पर भुगतान संतुलन अधिशेष घट जाएगा. जब वित्तीय बाजार ऊंचे वित्तीय घाटे के लिए तैयार हो, खर्च की व्यावहारिक योजना, खासकर स्वास्थ्य या शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में आर्थिक वृद्धि को टिकाऊ बना सकती है और आर्थिक ऊंच-नीच को रोक सकती है. दूसरा कदम यह हो सकता है कि केंद्र राज्य सरकारों को पूंजीगत खर्च में ऊंचे घाटे की इजाजत दे.

वायरस का डर पीछे छूटने लगा तो धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में भी यह बात तेजी से बैठने लगेगी कि अब महामारी का प्रकोप दुनिया भर में तेजी से घटेगा. इसी के साथ अमीरों की समृद्धि ऊंची होने और आमदनी की गैर-बराबरी की खाई और चौड़ी होने की ओर भी ध्यान जाएगा. भारत में ही नहीं, दुनिया भर में उच्च आय वर्ग वाले लोग महामारी में और बचत करके ही निकले (इस दौरान उनकी आमदनी कम प्रभावित हुई लेकिन उनकी खपत जरूर कम हो गई).

दूसरी ओर निक्वन आय वर्ग वालों को जिंदा रहने के लिए संपत्ति बेचनी पड़ी या कर्ज लेना पड़ा (उनकी आमदनी काफी घटी, जबकि खर्चे कम नहीं किए जा सकते क्योंकि जरूरी खर्चों के अलावा उसके पास काफी कम बचता है).

क्रेडिट सुइस के विशेषज्ञों को उम्मीद है कि वैश्विक इक्विटी बाजार में 2021 में 15 फीसद का इजाफा होगा, जिसका अर्थ है कि दौलत की गैर-बराबरी की खाई और चौड़ी हो सकती है. इसके लिए कोई 2008 के संकट के दौर को देख सकता है, जो काफी राजनैतिक उथल-पुथल ले आया था.

मौजूदा बदलाव का असर भी भू-राजनैतिक स्थिति पर हो सकता है. मसलन, अमेरिका के नए हुक्मरान पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर वापसी का संकेत दे रहे हैं. दुनिया महामारी के पहले ही तेजी से बदल रही थी, इनमें कई बदलाव की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है लेकिन अभी इनका असर नहीं दिखा है.

भारत में महामारी ने सरकारी नीतियों में छेद को उजागर कर दिया है. मसलन, ग्रामीण इलाकों में मनरेगा की तरह शहरी गरीबों के लिए भी योजना और असंगठित क्षेत्र के उद्यमों की मदद की दरकार है. नीतिगत प्रयोग ही बड़ा सबक है.

भारत में आश्चर्यजनक संक्रमणजनित कम मृत्यु दर से स्थानीय अर्थव्यवस्था की बहाली में तेजी से मदद मिली है. सरकार और लोग भी वायरस के डर को पीछे छोड़कर सामान्य स्थिति में लौटने की प्रक्रिया तेज कर चुके हैं. इसके अलावा, उत्पादन आधारित लाभ पीएलआइ जैसी योजनाएं भारत की औद्योगिक नीति में सार्थक बदलाव का परिचायक हैं. कई साल बाद भारत की मध्यावधि वृद्धि की संभावनाएं ऊंची उठने की उम्मीद है. फिर भी दुनिया भर में राजनैतिक, आर्थिक और वित्तीय बाजारों की अस्थिरता से नीति नियंताओं को रूढिय़ां तोड़कर चौकस रहने की जरूरत है.

नीलकंठ मिश्र एपीएसी स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख और क्रेडिट सुइस के भारत संबंधी रणनीतिकार हैं

 

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