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एक-दूजे में ढलती-घुलती पहचान

आदिवासी माने क्या? हद से हद आप इसे ऐसे आदिमानवरूपों का समन्वय कह सकते हैं, जिसमें हरेक दूसरे से ज्यादा पेचीदा और समस्यापरक है

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छाया को छूते हुए : पिटवां लोहे से बनाई गई बस्तर के आदिवासियों की शिल्पाकृतियों पर रोशनी डालने से तैयार छायाचित्र छाया को छूते हुए : पिटवां लोहे से बनाई गई बस्तर के आदिवासियों की शिल्पाकृतियों पर रोशनी डालने से तैयार छायाचित्र

सुनील मेनन

आदिवासी. बड़ा ही जीवंत शब्द है यह. अर्थ इतने कि जैसे पूरा जंगल एक पेड़ में समा गया हो. इसकी आहट भर से हमारे दिमाग में विचारों का एक सिलसिला फूट पड़ता है. कितने रंग, ध्वनियां और एहसास—कितनी सघन और गुंथी-बिंधी अभिव्यक्ति. पर इसका आखिर मतलब क्या है? यहां आकर हम शाब्दिक धुंधलके में गुम हो जाते हैं. न तो औसत शहरी—जो कि 'गैर-आदिवासी' होने के एहसास से घिरे हैं—इसका सटीक अर्थ बता पाएंगे और न ही वैज्ञानिक. ऐसा इसलिए क्योंकि इसका कोई ऐसा सीधा-सादा अर्थ है ही नहीं. ज्यादा से ज्यादा कोई आदि मानवरूपों का समन्वित समूह मानकर इनकी पड़ताल कर सकता है: आदिम और/या अपरिष्कृत, असभ्य, एक-दूसरे से गुंथे-बिंधे समुदाय, जो अलग-थलग जंगल, रेगिस्तान या घास के मैदानों में रहते हैं, तर्कशीलता की उन व्यवस्थाओं से दूर जो सभ्यताओं का निर्माण करती हैं.

इनमें से हरेक के साथ समस्या है. अब 'अतार्किकता' को ही लीजिए. नब्बे के दशक में नर्मदा के ऊपरी इलाकों में विचरने गए एक पर्यावरणवादी यह देखकर भौचक रह गए कि स्थानीय भीलों ने नदी के पानी को पहाड़ियों के ऊपर तक बहाकर ले जाने का इंतजाम कर रखा था—अपनी सिंचाई प्रणाली में पानी का बहाव तेज करने को उन्होंने रणनीतिक युक्तियों का इस्तेमाल किया! अब जरा 'आदिम' पर गौर करें. लोहा सबसे पहले भारत में ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी में पिघलाया गया और यह उन लोगों ने किया जिन्हें अब आप समूचे देश में आदिवासी कहते हैं. दक्कन के इलाकों से लेकर झारखंड की नेतरहाट पहाड़ियों और बनारस के दक्षिण में कैमूर की पहाड़ियों तक असुर और अगरिया लोग आज भी उन भत्तियों का इस्तेमाल करते हैं जिनमें अशोक के लौह स्तंभ का निर्माण किया गया, जिसे आज भी जंग नहीं लग पाई है. और जनसंहार के लिए सबसे मशीनीकृत प्रणालियों की ईजाद को एक सदी हो चुकने के बावजूद हम आदिवासियों को 'असभ्य' ठहराएं तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी! जैसे एंग्लो-सैक्सन लोग दूसरों को 'जरायमपेशा जनजाति' कहें.

अब जरा गैर-सांसारिक संस्कृति को लीजिए. जिन लोगों ने वेदों की रचना की—जिन्हें अब आप आदिवासी तो कैसे मानेंगे—वे देहाती खानाबदोश थे. मध्य एशिया की सिंतष्ट संस्कृति से छिटककर वे एक जगह टिककर रहने वाले दौर में पहुंचे थे. बुद्ध शाक्यों के बीच ही तो पैदा हुए थे, जो निर्वाचित नेतृत्व वाला गणतांत्रिक कबीला था, जिससे उनके 'जनजातीय' राजनैतिक आदर्शों की गहरी झलक मिलती है—ऐसे आदर्श जो बौद्ध धर्म की संघ की अवधारणा में आ गए, जैसा कि इतिहासकार सुमित गुहा लिखते हैं. ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार पश्चिमी दर्शन की प्रमुख शख्सियत सेंट ऑगस्टीन उत्तर अफ्रीका की खानाबदोश जनजाति से थे. तमाम अध्येता और विद्वान ''स्वंत्रता, बंधुत्व और समानता'' सरीखे आदर्शों की जड़ें अब यूरोपीय ज्ञानोदय के उन विचारों में खोज रहे हैं जो ह्यूरोन प्रमुख कोन्डियारोंक ने सोलहवीं सदी के कनाडा में फ्रांसीसी सैनिक-अन्वेषक बैरन लाहोनटन से बातचीत में व्यक्त किए थे. लगता है वॉल्तेयर से लेकर रूसो तक सबने अटलांटिक महासागर के पार के देशज विवेक का स्वाद चखा था.

जहां तक मुख्यधारा से 'अलगाव' की बात है तो अध्येताओं में आम राय है कि उससे संवाद/मेल होने के बाद यह स्थिति बनी थी, न कि संवाद के अभाव के चलते. हड़प्पा संस्कृतियों और समकालीन नवपाषाण संस्कृतियों के बीच गहरा संपर्क था—जोरवे सरीखे उत्तरी दक्कन के स्थलों तक, और शायद उत्तर कर्नाटक में मस्की तक. आदिवासी समुदायों से साम्राज्यों का उदय हुआ. शक या सीथियन दरअसल स्तेपी के मैदानी इलाके के घुड़सवार धनुर्धर थे. कुषाण अंदरूनी एशिया के सरहदी इलाकों के यूएझी थे. मुगल इसी कड़ी से निकले थे. होयसला मालेनाडु जनजाति थे. 'गुर्जर प्रतिहार' और 'पाल' सरीखे नामों ने पुरानी देहाती छाप बनाए रखी है.

राजपूतों ने तो मध्ययुगीन काल में ही मनगढ़ंत वंशावलियों के साथ खुद को अपने आसपास के खानाबदोश चरवाहों से अलग किया था. अफ्रीकी मूल के सिद्दी आधुनिक भारतीय राज्य में 'आदिवासी' बनने से पहले सदियों के अपने सफर में दक्कन और बंगाल में शाही दर्जा पाने के करीब आ गए थे. कर्नाटक का बेडा नामक शिकारी समुदाय भी इसी राह से गुजरा—मराठा काल के दौरान जुझारू इतिहास और फिर उसी अवस्था में पतन. इनमें से कोई भी 'जातीयता' बहुत ठोस और अकाट्य या ''नस्ली तौर पर अलग'' भी नहीं है. आनुवंशिकविद कवाली-स्फोर्जा ने हूणों को ढीली-ढाली रचना वाली इकाई बताया है. भारत पर काम कर रहे नृतत्वशास्त्रियों को यह सब जानी-पहचानी बात लगेगी. यही कि काल्पनिक कबायली सीमाओं को लांघना आम बात थी.

तो अब बात यह है कि आप चाहे हमारी जैविकी को लें या चीजों को वैज्ञानिक नजरिए से देखने की हमारी क्षमता को, हमारी प्राचीन दार्शनिक कलाकृतियों को लें या हमारी भौतिक संस्कृति को, हम सब एक ही नाव पर सवार हैं—नवपाषाण युगीन नूहों से जन्मे और प्राचीन पाषाण युग के गुफाचित्रों के वाहक. यही वजह है कि नृतत्वशास्त्री मॉर्टन फ्राइड ने 1975 की अपनी क्लासिक किताब द नोशन ऑफ ट्राइब में सवाल किया था, ''क्या जनजातियां अब भी मौजूद हैं? या वे कल्पनाओं के प्राणी हैं: तमाम तरह के और कई दफे बेमेल हिस्सों से मिलकर बने काल्पनिक यौगिक, भिन्न-भिन्न वजहों से गढ़ी गई सामाजिक मरीचिकाएं.. '' फ्राइड के पाठ में ''आदिमयुगीन समुदायों'' का विचार गहराई से छानबीन करने पर टिक नहीं पाता; इसके बजाए वे ''दोयम दर्जे की गढ़ी हुई स्थापनाएं'' हैं जो उन राज्यों और साम्राज्यों के निर्माण की प्रतिक्रिया के तौर पर अविच्छिन्न आबादी के बीच उभरती हैं, जिन्हें उनसे अलग करके स्वतंत्र रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता. अगर 'स्व' को 'अन्य' से अलग के तौर पर परिभाषित करना आदिवासी कृत्य है तो यह हम सभी करते हैं.

इस तरह जिन्होंने खुद को 'आर्य' कहा, यही वे लोग रहे हो सकते हैं जिन्होंने दूसरों को 'वा-नर' (शायद नर) और 'किन-नर' (किस प्रकार का नर?) कहा. वा-नर और किन-नर भी हो सकता है यही सवाल पूछ रहे हों.

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