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खामोश हत्यारा

जांच और इलाज की अत्याधुनिक संपदा के बावजूद अचानक दिल के दौरे देश के युवा और सेहतमंद दिखाई दे रहे लोगों को मुश्किल में डाल रहे. चूक कहां रहे हैं हम?

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दिल का दौरा दिल का दौरा

सोनाली आचार्जी

तीन परेशानियां हमारे दिल की खैरियत के लिए काफी समय से घातक साबित होती आई हैं—हाइ ब्लड शुगर, हाइ ब्लड प्रेशर और हाइ ब्लड कोलेस्ट्रॉल. इसके बावजूद उस देश में जीवनशैली की पसंद देखकर चिकित्सा विशेषज्ञ अचरज में पड़ जाते हैं, जिसके लोगों में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दूसरे दक्षिण एशियाई लोगों के साथ पश्चिम के मुकाबले 40 फीसद ज्यादा हार्ट अटैक का अंदेशा जताया है.

मसलन, लोकप्रिय फूड डिलिवरी ऐप स्विगी और जोमैटो ने अकेले पिछले साल 1.2 करोड़ समोसे, एक सेकंड में दो बिरयानी और 2,00,000 से ज्यादा चीज चिप्स पहुंचाईं—इन सभी में वसा, नमक और कार्बोहाइड्रेट (जो अंतत: हमारे शरीर में शुगर या शर्करा में बदल जाते हैं) कूट-कूटकर भरे होते हैं. बदतर तो यह कि शहरी भारतीय कम पैदल चल रहे हैं, ज्यादा तनाव झेल रहे हैं और ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं. इसका मतलब यह भी है कि जिस उम्र में दिल की बीमारियां होती हैं, वह और नीचे आ गई है. डॉक्टरों को इससे हैरानी नहीं है. 

डॉक्टरों को इस बात से नहीं बल्कि हैरानी इस पर है कि हम अपने शरीर को कितना बेगाना समझते हैं—संकेतों, जोखिम के पहलुओं और यहां तक कि लक्षणों को तब तक अनदेखा करते रहते हैं जब तक बहुत देर नहीं हो जाती. हालांकि दिल के रोगों की जांच और पहचान के तरीकों में आमूल बदलाव आ गया है और इलाज भी कई तरह के नए रसायनों और सर्जरी की नई तकनीकों से ऐसे मुकाम पर पहुंच चुका है, जो एकदम लाइलाज समझे जाने वाले मामलों को भी संभाल सकती है.

मई की 31 तारीख ने ऐसी ही एक क्रूर याद दिलाई जब केके नाम से मशहूर गायक कृष्णकुमार कुन्नथ को आनन-फानन कोलकाता के कलकत्ता मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें 'मृत लाया गया’ घोषित कर दिया. बाद में पता चला कि उनकी मौत का कारण हाइपोक्सिया था. यह वह अवस्था है जिसमें खून में ऑक्सीजन कम हो जाती है जिससे कार्डियोवैस्कुलर जटिलताएं पैदा होती हैं.

इनमें दिल का दौरा भी है, वही जिसके आगे केके जिंदगी की लड़ाई हार गए. असामान्य बात यह थी कि केके केवल 53 साल के थे और मौत से कुछ घंटे पहले इतने फिट महसूस कर रहे थे कि मंच पर लाइव प्रदर्शन करते रहे. केके की मौत ने कुछ दूसरे मशहूर लोगों की ऐसी ही त्रासद और अकाल मौत की याद दिला दी. मसलन, पिछले साल 2 सितंबर को सिद्धार्थ शुक्ला और दो महीने पहले प्रोड्यूसर राज कौशल की मौत (देखें, जो खिलते ही मुर्झा गए).

केके के मामले के जिक्र पर गुड़गांव में मेदांता-द मेडिसिटी हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन कहते हैं, ''पचासेक वर्ष की उम्र में दिल की किसी बड़ी बीमारी के बिना एक युवा की अचानक मौत हो गई. ऐसा पहले भी हुआ है. फिर भी, दिल की समस्या के छोटे-मोटे संकेतों के प्रति थोड़ी ही जागरूकता है. हम अपनी शरीर की नहीं सुनते कि वक्त पर बचाव संबंधी जांच और इलाज के लिए जाएं.’’ 

केके जैसी यकायक हुईं मौतों से यह एहसास तारी हुआ कि जवान और सेहतमंद मालूम देने वाले लोगों को भी बगैर कोई चेतावनी दिए अचानक और चुपचाप दिल का दौरा पड़ सकता है. क्यों इसकी भनक नहीं पड़ती, इसकी एक वजह यह है कि इसमें दिल के दौरे से जुड़े सीने में दर्द या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण नहीं उभरते. मसलन, केके ने मृत्यु के दिन थकान और पेट में दर्द की शिकायत की थी, लेकिन सोचा कि कोई अपच की समस्या है और बदहजमी की गोली ले ली. हालांकि दूसरे दिल के दौरों की तरह ही चुप्पे दौरे में भी दिल में खून का प्रवाह रुक जाता है, जिससे मांसपेशियों को नुक्सान पहुंचता है.

कई तरह के अध्ययन तस्दीक करते हैं कि अपेक्षाकृत युवा लोगों में कार्डियोवैस्कुलर बीमारी और खासकर दिल के दौरे पिछले कुछ साल में ज्यादा आम हो गए हैं. वेलनेस केयर कंपनी इंडिया हेल्थ लिंक (आइएचएल) ने सामाजिक पैरोकारी समूह एचईएएल या हील फाउंडेशन के साथ मिलकर 'इंडियन हाट्ईर्स लैकिंग केयर (आइएचएल केयर) अध्ययन’ किया, जिससे पता चला कि 26 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के 53 फीसद भारतीयों में दो वजहों—मोटापा और उच्च रक्तचाप—से कार्डियोवैस्कुलर बीमारी का जोखिम बहुत ज्यादा है.

यह सर्वे मुंबई, दिल्ली, बेंगलूरू और चेन्नै के 1,461 लोगों के बीच किया गया. एक और ज्यादा लंबी अवधि के अध्ययन से, जो दो साल के दौरान किया गया, पता चला कि इस सर्वे में शामिल 2,200 मरीजों में से 35 फीसद को दिल की पहली बीमारी 35 वर्ष से कम उम्र में हो चुकी थी. यह बेंगलूरू में सरकार संचालित श्री जयदेव इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर साइंसेंज की तरफ से किया गया था.

नारायणा हेल्थकेयर के चेयरमैन देवी शेट्टी कहते हैं, ''निठल्ली जीवनशैली, धूम्रपान, प्रदूषण और जंक फूड के स्तर बढ़ रहे हैं और वह भी उस देश में जहां जेनेटिक तौर पर अमेरिकियों और यूरोपीयों के मुकाबले दिल के दौरों की संभावना पहले ही ज्यादा है.’’ इस जेनेटिक रुझान के अलावा लगातार खराब पोषण, कम व्यायाम, हाइ ब्लड प्रेशर, हाइ ब्लड शुगर और हाइ कोलेस्ट्रॉल के साथ जोखिम कई गुना, और युवतर उम्र में, बढ़ जाता है.

दिक्कत यह है कि कुछ ही लोगों को आखिरी दौर में पहुंचने से पहले समस्या का एहसास होता है. जैसा कि फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ कहते हैं, ''लोग जोखिम के छुपे तत्वों को नहीं गिनते हैं. मसलन, जीवन-शैली, प्रदूषण, पारिवारिक पृष्ठभूमि, ब्लड शुगर, हाइपरटेंशन वगैरह. करीब 25 फीसद कॉरोनरी धमनियों की बीमारी में कोई लक्षण नहीं उभरता और अमूमन लोग यही मानते हैं कि जब तक कोई बड़ा लक्षण न उभरे या खून की नियमित जांच में कुछ न दिखे, उन्हें जोखिम के दूसरे तत्वों पर गौर करने की जरूरत नहीं है.’’

खान-पान पर नजर रखें
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सब हमारे खान-पान से शुरू होता है. डब्ल्यूएचओ की सिफारिश है कि दिन में 16-22 ग्राम तेल-घी और 6 ग्राम से ज्यादा नमक नहीं खाना चाहिए. जहां तक फ्री शुगर की बात है तो रोजाना कुल ऊर्जा खपत का 10 फीसद से कम होना चाहिए और आदर्श तो यह है कि 5 फीसद या मोटे तौर पर 25 ग्राम या 6 चम्मच लें. फिर भी, भारत की सबसे लोकप्रिय फास्ट फूड शृंखलाओं की वेबसाइट पर मौजूद पोषण से जुड़े डेटा  हैरतअंगेज खुलासा करते हैं. मसलन, सबवे के एक पनीर टिक्का में 15 ग्राम सैचुरेटेड फैट होता है, जो आम तौर पर इस किस्म के वसा से जोड़े जाने वाले इसके कुछ गैर-शाकाहारी विकल्पों से भी ज्यादा है.

इसी तरह इसी चेन के वेज शामी कबाब रैप में 1.48 ग्राम नमक होता है. मैकस्पाइसी चिकन के साथ एक बार परोसे गए मैकडोनाल्ड के घी राइस में करीब 2.3 ग्राम नमक होता है, जो आपकी दिन भर की स्वीकृत खुराक से करीब आधा है. वहीं मैकस्पाइसी पनीर बर्गर में 17.12 ग्राम सैचुरेटेड फैट होता है, जो यहीं के रेगुलर फ्राइज के एक पैकेट से भी ज्यादा है. आप भले इसे बर्गर से जोड़कर न देख पाएं, पर इत्तेफाक यह है कि एक बर्गर किंग मसाला वेज हूपर में 11.8 ग्राम शुगर होती है.

पंडित बीडी शर्मा यूनिवर्सिटी, पीजीआइएमएस, रोहतक की वाइस चांसलर, एम्स की पूर्व डीन ऑफ एकेडमिक्स और जानी-मानी कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. अनीता सक्सेना कहती हैं, ''एक औसत शहरी व्यक्ति जो नमक, शक्कर और संतृप्त वसा लेता है, उसकी मात्रा काफी बढ़ गई है. यहां तक कि अगर कोई दुबला-पतला है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह स्वस्थ है. यही नहीं, मुझे अक्सर ऐसे मरीज मिलते हैं जो कहते हैं कि वे शाकाहारी हैं और फिर यह जानकर हैरत में पड़ जाते हैं कि उन्हें हाइ ब्लड प्रेशर और हाइ कोलेस्ट्रॉल है.’’

शुगर और नमक की अधिक खुराक लंबे वक्त में ऐसी बीमारियों को जन्म देती है, जो दिल की सेहत के लिए खतरनाक है. मसलन, ज्यादा नमक खाने से शरीर पानी को बचाए रखता है. फिर शरीर में अधिक पानी से उच्च रक्त चाप बढ़ता है. इसका मतलब यह है कि खून दिल में ज्यादा रफ्तार से पहुंचता है और उसकी दीवारों को नुक्सान पहुंचाता है. अधिक शक्कर खाने का भी वही, बल्कि उससे बदतर असर होता है.

इससे वसा कोशिकाओं में क्रोनिक सूजन होती है, जिससे बैड कोलेस्ट्रॉल और रक्तचाप में वृद्धि दोनों होती है. अमेरिका स्थित सीडीसी (सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन) का कहना है कि जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज है उन्हें दूसरे ज्यादातर लोगों के मुकाबले कम उम्र में दिल की बीमारी होने की दोगुनी संभावना होती है. हाइ कोलेस्ट्रॉल की वजह से धमनियों में प्लैक ज्यादा जमा होता है, जिससे ब्लॉकेज या अवरोध पैदा हो जाते हैं.

मैक्स हेल्थकेयर की न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. मेघा जेना इसके लिए पोषण संबंधी लेबल पढ़े बगैर खाने की चीजें चुनने की लोगों की आदत को दोषी ठहराती हैं. वे कहती हैं, ''कई मरीज कहते हैं कि वे चॉकलेट, सोडा, चिप्स नहीं खाते, ऐसी चीजें जिनमें वे जानते हैं कि अस्वस्थ तत्व बहुत ज्यादा होते हैं. मगर फिर वे पैकेट भर 'नो शुगर एडेड’ कॉर्नफ्लेक्स खाएंगे जिनमें नमक बहुत ज्यादा होता है. हम सीरियस के साथ नमक और चटपटी चीजों में शक्कर को जोड़कर नहीं देखते.’’

एम्स और नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी ऐट चैपल हिल की तरफ से किए गए 10,500 भारतीय प्रोसेस्ड फूड उत्पादों के अध्ययन से पता चला कि केवल 32 फीसद चीजें डब्ल्यूएचओ के पोषण मानदंडों को पूरा करती थीं. इन हालात से जितना लंबा रिश्ता होगा, दिल के रोगों और दौरों का खतरा जल्दी होगा.

बेंगलूरू में बान्नेरघट्टा रोड पर फोर्टिस हॉस्पिटल में इंटरवेशनल कॉर्डियोलॉजी के प्रमुख डॉ. शशिधर कहते हैं, ''जीवनशैली संबंधित कई सारी बीमारियां काफी कम उम्र में लग रही हैं. अगर आपको 20-30 साल से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं तो नुक्सान तो हो चुका है.’’ वाकई जर्नल ऑफ एंडोक्राइनोलॉजी ऐंड मेटाबोलिज्म में 2014 में प्रकाशित एक परीक्षण से पता चला कि टाइप 2 डायबिटीज से ग्रस्त 46 फीसद लोग 40 से कम उम्र के थे, जो अपनी जीवनशैली को संभालकर अपनी बीमारी को रोक या टाल सकते थे.

तनाव की तासीर
दिल के दौरों की संभावना तेज करने का दूसरा कसूरवार तनाव है. फरवरी 2021 में स्वीडन में लिंकोपिंग यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया कि दिल का दौरा पड़ने के पहले के महीनों में 174 लोगों में तनाव पैदा करने वाला हॉर्मोन कॉर्टीसोल काफी बढ़ा हुआ था. एम्स के पूर्व कॉर्डियोलॉजी प्रमुख तथा फिलहाल मैक्स हेल्थकेयर में कॉर्डिएक साइंसेज के प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. विनय कुमार बहल कहते हैं, ''तनाव की वजह से शरीर में सूजन हो सकती है, उच्च रक्तचाप बढ़ सकता है, यह आप पर परोक्ष असर भी डाल सकता है.’’

वाकई, कई विशेषज्ञों का कहना है कि क्रोनिक तनाव लोगों में बेचैनी बढ़ाता है, नींद बुरी तरह गड़बड़ा जाती है, व्यायाम वगैरह घट जाता है और 'अच्छा लगने’ वाला गैर-सेहतमंद खाने-पीने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. सितंबर 2021 में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अध्ययन में पाया गया कि अधिक तनाव वाले लोगों में उच्च रक्तचाप का मर्ज बढ़ सकता है और उसके बाद उपचार नहीं किया गया तो  अगले छह-सात साल में दिल की समस्याएं शुरू हो जाएंगी. 

दो भाइयों ईशान और शिवांश श्रीवास्तव का अजीब मामला इसकी मिसाल है. क्रमश: 48 वर्ष और 52 वर्ष के दोनों भाई मुंबई में पैकेजिंग मैन्युफेक्चिंंरग कंपनी चलाते हैं. ईशान में दिल की बीमारी के खतरे वाली आदतें हैं. वे धूम्रपान करते हैं, शराब पीते हैं और थोड़े भारी वजन के भी हैं. लेकिन 2021 में शिवांश में दिल की बीमारी के लक्षण मिले. डॉक्टरों ने बताया कि उनमें जोखिम बेहद ज्यादा मीठा और नमक खाने से बढ़ा, जो लगातार तनाव से देर रात में खाने का नतीजा है.

उनका दिन भी ज्यादातर बैठे-ठाले गुजरता है, रोज 500 कदमों से ज्यादा शायद ही चलते हैं. वे कहते हैं, ''मैं मोटा कभी नहीं हुआ, क्योंकि मैं सिर्फ एक बार ही खाता हूं. लेकिन वह ज्यादातर जंक फूड होता है. मेरा भाई हर सुबह समुद्र किनारे टहलने जाता है, रोजाना ध्यान और योग करता है. हम सब हैरान रह गए, जब मैं बीमार पड़ा लेकिन पीछे मुड़कर देखता हूं तो दशकों की उपेक्षा और तनाव का मेरे शरीर पर असर पड़ा.’’ 

तनाव के साथ समस्या यह है कि लोग जानते ही नहीं कि उसका उन पर असर पड़ रहा है. मुंबई स्थित मनोचिकत्सक डॉ. केदार तिलवे कहते हैं, ''आप इसके बारे में ऑनलाइन या खबरों में पढ़ते हैं लेकिन आप कभी नहीं सोचते कि यह आपके साथ हो रहा है.’’ डॉक्टरों का कहना है कि आप उसे माप नहीं सकते, लेकिन आप उस पर काबू पाने की कोशिश कर सकते हैं. जरूरी यह है कि आप अपने लिए समय निकालिए. आपको इसके लिए बाहर जाने की भी जरूरत नहीं है. आज तो ध्यान, थेरेपी, सामाजिक मेलजोल और हॉबीज के ऑनलाइन फोरम हैं.

आसान है जांच कराना
अगर आप इसे उम्मीद समझें तो इस निराशाजनक माहौल में उम्मीद बस यही है कि इन दिनों जोखिम के स्तर को मापने के कई उपकरण आ गए हैं. कुल कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर के टेस्ट के अलावा बड़े अस्पताल अब सूजन संबंधी सी-रिएक्टिव प्रोटीन (जिसके ऊंचे स्तर से दिल के दौरे के भारी जोखिम का संकेत मिलते हैं), प्लाज्मा सेरामाइड्स (जिसे कुछ दिल में प्लेक के बनने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है), ब्रेन नैट्रियूरेटिक पेप्टाइड्स (अक्सर इसका उत्सर्जन दिल पर दबाव घटाने में मदद के लिए होता है, जब उसे धड़कने में समस्या होती है), कैल्शियम स्कोरिंग (दिल में प्लेक बनने के बारे में पहचान के लिए), और प्रोटीन ट्रोपोनिन टी (जिसका बढ़ा स्तर जोखिम बढ़ाता है) टेस्ट की भी सिफारिश करते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि ये टेस्ट काफी संवेदनशील, आसानी से उपलब्ध और काफी किफायती हैं. मुंबई के मुलुंड में फोर्टिस हॉस्पिटल में वरिष्ठ इंटरवेंशनल कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. अतुल लिमये कहते हैं, ''ब्लड टेस्ट की सलाह देने की वजह यह है कि कोई असामान्य चीज मिलने पर उसका आसान से इलाज किया जा सकता है. हम रक्त में बायोमार्कर से दिल के दौरे का पहले ही पता लगा लेते हैं.’’

डॉक्टर कई अत्याधुनिक डायग्नोस्टिक टूल का भी इस्तेमाल करते हैं. ट्रेडमिल स्ट्रेस टेस्ट और एंजियोग्राफी का इस्तेमाल तो आम तौर पर किया जाता है. लेकिन ये टेस्ट अब ज्यादा संवेदनशील शारीरिक पैमाने हैं, जिनसे खून के प्रवाह, रुकावट और दूसरी ब्लॉकेज का आकलन किया जा सकता है. एक नॉन-इनवेसिव टेस्ट सीटी हार्ट स्कैन है, जिसे टेक्नोलॉजी की बड़ी प्रगति माना जाता है. ब्रेन की सीटी स्कैन की उलट, हार्ट के स्कैन में तस्वीर बेहतर पाने के लिए ज्यादा 'स्लाइस’ की दरकार होती है.

आज हार्ट की सटीक और चौतरफा तस्वीर के लिए 256 स्लाइस का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि पहले 64 स्लाइस का इस्तेमाल होता था. अस्पतालों में और कई नए टेस्ट उपकरण उपलब्ध हैं, जो ठीक-ठीक पता लगा लेते हैं कि समस्या कहां है. इनमें ईको-कॉर्डियोग्राफी (उच्च फ्रीक्वेंसी रेडियो तरंगों के जरिए दिल की गति की निगरानी), ट्रांसोइसोफैगिल ईको-कॉर्डियोग्राफी (जिसमें ब्लड क्लॉट और किसी ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए गले से प्रोब डालना), गामा कैमरा (जिसमें दिल की सेहत जानने के लिए रेडिएशन का इस्तेमाल होता है) और कॉर्डिएक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी (जिसमें असामान्यता की पहचान के लिए दिल की मांसपेशी में कैथीटर को घुसाया जाता है) हैं.

अलबत्ता, डॉक्टरों का कहना है कि शुरू में तो सालाना ब्लड टेस्ट ही काफी है. हालांकि, जिनमें वंशानुगत और जीवनशैली संबंधित जोखिम है, उन्हें अधिक आधुनिक सीटी एंजियो स्कैन जैसा टेस्ट कराना चाहिए. डॉ. सेठ कहते हैं, ''ये अधिक जोखिम वाले लोगों के लिए अधिक विकसित शुरुआती जांच हैं. इनसे दिल में ब्लॉकेज का सही-सही पता लगाया जा सकता है, ताकि इलाज शुरू हो.’’

इलाज में बड़ी प्रगति

विशेषज्ञों की सलाह है कि अपने शारीरिक लक्षणों के प्रति सावधान रहें. डॉ. बहल कहते हैं, ''अगर कोई दर्द कुछेक मिनटों से ज्यादा का होता है तो फौरन डॉक्टर के पास जाइए. लगातार दर्द अच्छा संकेत नहीं है. अगर यह दिल से जुड़ा नहीं है तो यह कोई दूसरी समस्या हो सकती है. ज्यादातर लोग छोटे-मोटे लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और जब समस्या बढ़ जाती है तब डॉक्टर के पास जाते हैं.’’ बहुत सारे लोग इस डर से दूर रहते हैं कि कहीं उनका शक पक्का न निकल जाए.

पुणे की गृहिणी 39 वर्षीया दिया पावस्कर को 2019 में कॉर्डियोवैस्कुलर मर्ज का पता चला. वे कबूल करती हैं, ''मैं काफी कमजोरी महसूस कर रही थी और दूर तक चलने में दिक्कत होती थी. मुझे दो दिन लगे अस्पताल जाने में, क्योंकि मैं प्रार्थना कर रही थी कि समस्या दूर हो जाए. मुझे डर था कि किसी बड़ी बीमारी के चक्कर में आए तो जीवन बर्बाद हो जाएगा.’’ पावस्कर उसके बाद यूरोप भ्रमण पर भी गईं, दूसरे बच्चे की मां बनीं और कोविड से भी बच गईं.

डर यह भी रहता है कि दिल का सभी इलाज गहन है या लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अब ऐसा मामला नहीं है. स्थिति गंभीर न हो तो स्टेंट सर्जरी सफलतापूर्वक बंद धमनियों को खोल देती है. आधुनिक मेडिसिन की सबसे आम और अत्याधुनिक प्रक्रियाएं कम गंभीर ही नहीं, बल्कि सिर्फ घंटे भर में पूरी हो जाती हैं. कीहोल या लैपरोस्कोपिक सर्जरी कई अस्पतालों में बेहद आम है, बेहतर नतीजों के लिए कंप्यूटर से मदद ली जाती है.

छोटे, फैलने वाले मेश कॉयल का इस्तेमाल संकरी या ब्लॉक धमनियों को खोलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसमें पिछले तीन दशकों में काफी प्रगति हुई है. डॉ. सेठ कहते हैं, ''इन्हें लगाना सुरक्षित और काफी कारगर है. 1990 के दशक में हमारे पास सिर्फ मेटल के स्टेंट थे. उनमें धमनियों की आंतरिक परत के फांक होने और दागदार टिश्यू बनने के 25 फीसद खतरे होते थे, जिससे फिर ब्लॉकेज हो सकता था.

उसके बाद हमें मेडिकेटेड स्टेंट की नई जेनेरेशन मिली, जिससे बाद की समस्याओं की आशंका 5 फीसद रह गई. आज, हमारे पास पतले स्टेंट हैं, साथ ही इंट्रावैस्कुलर इमेजिंग टेक्नोलॉजी है, जिससे हमें हर सर्जरी के नतीजों का पूरी तरह आकलन करने की सहूलत हो गई है. इससे भविष्य की समस्याओं की संभावना 1 या 2 फीसद रह गई है.’’ बायो-डिजॉल्वेबल स्टेंट की नई जेनेरेशन अपने आप दो या तीन साल में घुल जाती है और धमनी बिना किसी इंप्लांट के खुली रहती है.

आज ज्यादातर अस्पताल शरीर में स्वाभाविक तौर पर उभरने वाले तत्वों से बने बॉयो-रिजार्बेबल वैस्कुलर स्कैफोल्ड का इस्तेमाल करते हैं और इसलिए समय के साथ वे घुल जाते हैं. नए स्टेंट बायो-इंजीनियरिंग वाले (कोबाल्ट और क्रोमियम की जाली से बने हैं और पतले हैं), दवा भरे स्टेंट (दवा की लेप चढ़ाई होती है, ताकि ब्लड क्लॉट न बने) और डुअल थेरेपी स्टेंट (जो अत्याधुनिक सेल टेक्नोलॉजी से आए हैं. ये स्वस्थ टिश्यू के विकास-जल्दी सुधार में मददगार हैं) हैं.

हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक, इतनी प्रगति के बावजूद मरीज अभी भी दिल के रोग का मतलब ओपन हार्ट सर्जरी ही समझते हैं. हकीकत तो यह है कि डॉक्टर सर्जरी सिर्फ गंभीर मामलों और आखिरी उपाय के तौर पर ही करते हैं. वे दवाइयों से ही ठीक करने की कोशिश करते हैं. इसमें एन्हैंस्ड एक्सटर्नल काउंटर पल्सेशन भी शामिल है, जो निचली परत की रक्त धमनियों को दबाते हैं, ताकि दिल में रक्त प्रवाह बढ़े.

इस इलाज में रक्त धमनियों से छोटी शाखाएं निकल सकती हैं, जो स्वाभाविक बाइपास जैसी बन सकती हैं. दूसरा इलाज वैसोडाइलेशन या दवा की मदद से रक्त कोशिकाओं को खोलने की प्रक्रिया होती है, ताकि दिल में रक्त प्रवाह ज्यादा हो. इसके अलावा एडोक्साबैन, एपिएक्साबैन, डेबिगाट्रान और रिवरोक्साबैन जैसे अगली पीढ़ी के ब्लड थिनर भी ब्लड क्लॉट बनने और दिल में बदलाव से रोकते हैं, लेकिन इनके दुष्परिणाम पहले से कम हैं.

डॉक्टर इस पर जोर देने से चूकते नहीं कि रोग के निदान के बाद बड़ा बदलाव मरीज की जीवनशैली में आना चाहिए. बस अच्छा खाना-पीना और थोड़ा व्यायाम या चलना-फिरना ही काफी है. विशेषज्ञों का कहना है कि ताजा अनप्रोसेस्ड फूड, हर दिन 10,000 कदम चलना और नियमित डॉक्टर की सलाह दिल की सेहत की कुंजी है. फोर्टिस के डॉ. लिमये कहते हैं, ''मेरे मरीज अक्सर कहते हैं कि जिम जाने की फुर्सत नहीं है, सारा दिन काम करना पड़ता है. मैं बस यही पूछता हूं: क्या वह जीवन से ज्यादा मूल्यवान है?’’

दिल की बस एक ही शर्त है कि थोड़ा ज्यादा ध्यान दें. पारिवारिक रेकॉर्ड, कम व्यायाम, ऊटपटांग खान-पान और बढ़ा हुआ तनाव, ये कम उम्र में दिल के रोग के खतरे हैं. जरूरत इस बात की है कि समय पर डायग्नोस्टिक उपकरणों की संपदा का इस्तेमाल करें. जल्दी करने से आपके दिल को भी बचाने में मदद मिलेगी और आपको भी.

''दिल की समस्या के छोटे-मोटे संकेतों के बारे में जागरूकता बेहद कम है. हम अपने शरीर की नहीं सुनते कि हमें बचाव के लिए जांच और इलाज की ओर रुख करना चाहिए’’
डॉ. नरेश त्रेहन 
चेयरमैन, मेदांता-द मेडिसिटी, गुड़गांव

''निठल्लेपन वाला रहन-सहन, धूम्रपान, प्रदूषण और जंक फूड की खपत बेइंतहा बढ़ रही है, जबकि हमारे देश के लोगों में दिल के रोगों की संभावना पश्चिम के मुकाबले  ज्यादा है’’ 
डॉ. देवी शेट्टी 
चेयरमैन, नारायणा हेल्थकेयर

''कॉर्डिएक स्टेंट्स के मामले में पिछले 30 साल में काफी प्रगति हुई है. इन्हें लगाना न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि ये काफी कारगर भी हैं’’
डॉ. अशोक सेठ
चेयरमैन, फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट, दिल्ली

''दुबला-पतला होने का यह मतलब नहीं है कि आप सेहतमंद हैं. मेरे पास अक्सर ऐसे मरीज आते हैं, जो कहते हैं कि वे शाकाहारी हैं लेकिन उच्च रक्त चाप की शिकायत से चौंक जाते हैं’’
डॉ. अनीता सक्सेना 
वीसी, पंडित बी.डी. शर्मा यूनिवर्सिटी, पीजीआइएमएस, रोहतक.

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