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सुर्खियों के सरताजः पढ़ाई का दुर्गम मोर्चा

कोविड की वजह से लगाए गए लॉकडाउन में बंद स्कूलों और ऑनलाइन पढ़ाई के बेअसर होने से शिक्षा व्यवस्था तबाही के कगार पर

इम्तिहान की घड़ीजून में भोपाल में मध्यप्रदेश स्कूल बोर्ड की परीक्षा देते छात्र इम्तिहान की घड़ीजून में भोपाल में मध्यप्रदेश स्कूल बोर्ड की परीक्षा देते छात्र

2020 सुर्खियों के सरताज   
कोविड-19: शिक्षा

शुभम गुप्ता दिल्ली के हंसराज कॉलेज के बीकॉम ऑनर्स के फर्स्ट इयर के छात्र हैं. लेकिन 18 साल के इस नौजवान ने सितंबर में दाखिला लेने के बाद से आज तक एक भी दिन कॉलेज परिसर में कदम नहीं रखा है. उन्होंने कॉलेज का एक वर्चुअल टूर किया है और उनकी पढ़ाई उनके मोबाइल फोन और आइपैड के जरिए ही हो रही है. ऐसा करने वाले शुभम अकेले नहीं हैं.

2020 के बैच—कोविड-19 पीढ़ी—असाधारण महामारी से जूझ रही दुनिया में इसी तरह से सांस्थानिक पढ़ाई का अनुभव हासिल कर रही है. इसकी वजह से, 'बिग क्यूज स्टूडेंट सर्वे’ नामक एक अध्ययन में सामने आया है कि  47 फीसद छात्रों ने उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर में न जाने का फैसला किया है. पचास फीसद ने विदेश जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की योजना का ख्याल छोड़ दिया.

राष्ट्रीय राजधानी से कोई 2,000 किमी दूर, असम के बरपेटा जिले में सरकारी फिंगुआगढ़ हाइस्कूल में 41 साल की शिक्षिका निभा चौधरी को मार्च के आखिरी हक्रते—जब देशभर में लॉकडाउन लगाया गया—से सितंबर तक लंबी छुट्टी मिल गई. स्कूल अधिकारियों ने ऑनलाइन कक्षाएं शुरू करने की कोशिश की, लेकिन पांच फीसद से भी कम छात्रों के पास भरोसेमंद और लगातार इंटरनेट सुविधा थी.

चौधरी कहती हैं, ''हम कुछेक छात्रों को पाठ्यसामग्री और होमवर्क भेज पाए जिनके पास स्मार्ट फोन और इंटरनेट कनेक्शन था. उन्होंने दूसरे छात्रों की मदद की, लेकिन यह किसी भी तरह से कक्षा में पढ़ाई का विकल्प नहीं हो सकता.’’ पिछले दो महीनों में, लॉकडाउन की वजह से हुए पढ़ाई के नुक्सान की भरपाई के लिए वे ताबड़तोड़ अतिरिक्त कक्षाएं लेकर पढ़ाई करवा रही हैं. ऐसे वक्त में, जब कोविड प्रोटोकॉल का पालन करने पर ही सारा ध्यान रहे, बंटी हुई कक्षा में पढ़ाना आसान नहीं है.

अब असम और कई दूसरे राज्यों में, छात्र धीरे-धीरे स्कूल और कॉलेजों में लौटने लगे हैं, दिल्ली जैसे राज्यों में उनके सहपाठियों को अभी भी घरों में कैद रहना पड़ रहा है, और लंबा समय ऑनलाइन ही बिताना पड़ रहा है, इससे उनकी सेहत पर तो असर पड़ ही रहा है, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लंबे समय तक किए जा रहे उपयोग की वजह से उनका तनाव भी बढ़ रहा है. 

ऑनलाइन शिक्षा की मुश्किलें
ऑनलाइन शिक्षा की मुश्किलें

भारत की शिक्षा व्यवस्था पहले से ही बीच में पढ़ाई छोडऩे वालों, पढ़ाई में खामी, शिक्षकों की अनुपस्थिति, छात्र-छात्रा गैर-बराबरी और बुनियादी ढांचे की कमी जैसे बहुत सारी समस्याओं के भार तले दबी हुई है और अब यह एक बड़ी चुनौती से दो-चार है—चौड़ी होती डिजिटल खाई. यहां तक कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में, जब सरकारी स्कूलों ने लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की, तो छात्रों की मौजूदगी 25 से 30 फीसद के बीच झूलती रही.

यूनिसेफ के अनुसार, कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है, और इसका असर दुनिया भर की 90 फीसद छात्रों पर पड़ा है. भारत में, करीब 15 लाख स्कूल इस महामारी की वजह से बंद हो गए, इससे प्री-प्राइमरी से सेकंडरी स्तर के करीब 28.6 करोड़ छात्रों पर असर पड़ा. यही नहीं, इसमें वह संख्या भी जोड़ लीजिए, जो कोविड-19 से पहले ही स्कूल से बाहर रहे 60 लाख छात्रों की है.

शिक्षा में आई इस बाधा का गंभीर आर्थिक दुष्प्रभाव भी हैं. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट, ‘बीटन ऑर ब्रोकन: इनफॉर्मेलटी ऐंड कोविड-19 इन साउथ एशिया’ ने स्कूलों के बंद होने के असर की कीमत का अंदाजा लगाया है—और भारत को इससे भविष्य में होने वाली कमाई में करीबन 440 अरब डॉलर (करीब 32.3 लाख करोड़ रुपए) का घाटा हुआ है.

इस बाधा और नुक्सान से लडऩे के लिए देशभर के शैक्षिक संस्थानों ने पढ़ाई के डिजिटल तरीके को अपना लिया, ताकि कक्षा में पढ़ाई की कमी कुछ पूरी की जा सके. लिहाजा, देश में डिजिटल शिक्षा का लंबित और हाशिए पर पड़ा मुद्दा अचानक केंद्र में आ गया और अब तेजी से मुख्यधारा की पढ़ाई-लिखाई में इसका इस्तेमाल बढऩे लगा है. जुलाई में जारी केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी ऑनलाइन शिक्षा की अहमियत को रेखांकित किया है, जिसे पारंपरिक तरीके की पढ़ाई के साथ मिलाने की बात कही गई है.

कोविड-19 के प्रकोप के पहले किए गए केपीएमजी और गूगल के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि भारत में 2021 तक ऑनलाइन शिक्षा का बाजार 1.96 अरब डॉलर (14,836 करोड़ रुपए) तक का हो सकता है और 96 लाख लोग इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. यह 2016 में 24.7 करोड़ डॉलर (1,870 करोड़ रुपए) था और 16 लाख लोग इसका इस्तेमाल कर रहे थे.

हालांकि, कोविड-19 महामारी ने ऑनलाइन शिक्षा को चर्चा में ला दिया, लेकिन ग्लोबल एजुकेशन नेटवर्क क्वाक्वेरीली साइमंड्स की हालिया एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में इंटरनेट का इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी भी इस बदलाव को सहारा देने के लिहाज से काफी पीछे है. 2019 में किए गए एक सरकारी सर्वे के मुताबिक, देश के महज 24 फीसद घरों तक इंटरनेट की पहुंच है. ग्रामीण भारत में, यह संख्या और भी कम है, जहां महज 4 फीसद घरों तक नेट का कनेक्शन है.

2018 की नीति आयोग की एक रिपोर्ट में दर्ज है कि भारत में 55,000 गांवों में मोबाइल नेटवर्क कवरेज नहीं है. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए 2017-18 के एक सर्वे में पाया गया कि भारत में 36 फीसद स्कूलों में बिजली नहीं है. हालत यह है कि टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा पर जोर देने से गरीब तबके के छात्र इससे महरूम हो रहे हैं, और वे अपनी पढ़ाई जारी रखने में अक्षम हैं. यही नहीं, दूसरी ओर भी इसकी कमियां दिखाई दे रही हैं. मसलन, सभी शिक्षक ऑनलाइन पढ़ाई के लिए न तो प्रशिक्षित हैं और न ही उनके पास इसके पर्याप्त साधन हैं. ये तमाम वजहें पढ़ाई में नया रोड़ा बनकर उभरी हैं. और ये मुश्किलें जल्दी हल होती नहीं लगती हैं.

हालांकि ई-लर्निंग अब नए दौर में सामान्य चलन जैसा बनता जा रहा है, तो सरकार की ओर से भी अब डिजिटल शिक्षा को सबकी पहुंच में लाने और सबके लिए सुलभ बनाने के कदम उठाए जाने लगे हैं. केंद्र सरकार इसके लिए भारत नेट प्रोजेक्ट पर निर्भर है, जिसका मकसद देश के 2,50,000 ग्राम पंचायतों में ऑप्टिकल फाइबर के जरिए ब्रॉडबैंड पहुंचाना है, ताकि कनेक्टिविटी बेहतर की जा सके. उम्मीद की जा रही है कि ग्राम पंचायतों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी से ऑनलाइन शिक्षा को उन छात्रों तक मुहैया कराया जा सकेगा, जिनके पास घरों में इंटरनेट नहीं है.

डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के अलावा, शिक्षकों को प्रशिक्षण भी देना होगा, ताकि वे उपकरणों का सही इस्तेमाल करके छात्रों को सही और निरंतर शिक्षा प्रदान कर सकें. सवाल यह भी है कि पढ़ाई सही तरीके से हो, क्योंकि कॉलेज और स्कूल की पढ़ाई में अंतर होता है. डिजिटल शिक्षा को हर स्तर पर एक ही तरीके से लागू नहीं किया जा सकता.

जाहिर है, डिजिटल खाई को दूर करके देश की शिक्षा व्यवस्था में ऑनलाइन लर्निंग की अहमियत बढ़ानी है तो केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा पर खर्च बढ़ाना होगा. उसे जीडीपी के कम से कम 6 फीसद के स्तर पर लाना होगा. फिलहाल, इस सेक्टर के लिए केंद्र और राज्य सरकारों का आवंटन 3 फीसद से कम है.
विडंबना यह भी देखिए कि शिक्षा मंत्रालय का डिजिटल ई-लर्निंग के लिए बजट कोविड ग्रस्त वर्ष 2020-21 में घटकर 469 करोड़ रुपए रह गया, जो इससे पिछले साल 604 करोड़ रुपए था. इस सरकारी रवैए से तो देश में शिक्षा का माहौल सुधरने से रहा. अगर इसे सुधारना है तो सरकार को गंभीरता दिखानी होगी.

‘‘ऑनलाइन क्लास का मेरा अनुभव अच्छा नहीं है. इसकी ज्यादातर वजह इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी रही है. लेकिन इससे मुझमें एक बदलाव आया और वह अच्छे के लिए है. मैंने कागज का इस्तेमाल छोड़ दिया और डिजिटल नोट ही तैयार कर रहा हूं. ऑनलाइन क्लास रिकॉर्ड की जाती है और हम कभी भी उस रिकॉर्ड से पढ़ सकते हैं, जो अच्छी बात है.’’
—प्रीतोम बर्मन

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