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आवरण कथाः अयोध्याः बाकी है एक गुनाह की सजा

1992 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने घोषणा की कि अयोध्या में मंदिर का काम शुरू करने के लिए 6 दिसंबर का दिन चुना गया है. इसके बाद नवंबर के महीने में हजारों कारसेवक अयोध्या में जमा हो गए. 

फोटोः प्रवीण जैन फोटोः प्रवीण जैन

बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि के विवाद जितना पुराना विवाद कोई नहीं है. सदियों से हिंदू और मुसलमान उस जमीन पर अपना दावा पेश करते रहे हैं. लेकिन 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विवादित जमीन पर हिंदुओं को 'मालिकाना हक' दिए जाने के साथ अदालती कार्रवाई का अंत हो गया. 

फैसले के तुरंत बाद जो लोग बाबरी मस्जिद को गिराने (1992) में शामिल थे, उन्होंने खुद के निर्दोष होने और राहत महसूस करने की घोषणा की है. लेकिन यह बात ध्यान रखने की है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बाबरी मस्जिद के विध्वंस को सही नहीं ठहराया. कोर्ट ने बार-बार यही कहा है कि विध्वंस गैरकानूनी और 'कानून का खुला उल्लंघन' था. मस्जिद के विध्वंस की घटना पर अदालत के फैसले के नतीजे का कोई असर नहीं पडऩे वाला है. विध्वंस का मुकदमा 27 वर्ष से अदालतों में चलता आ रहा है. अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ''अभियुक्तों को मुख्य रूप से सीबीआइ के व्यवहार...और कुछ ऐसी तकनीकी खामियों के कारण सजा नहीं दी जा सकी जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता था, लेकिन राज्य सरकार ने उन्हें दूर नहीं किया.''

अगर हम सरसरी तौर पर गुजरे वक्त को देखें तो 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने जाति के आधार पर आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया था, जो हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों का वजूद मजबूत करने की वजह बन गई. इसके बाद 1990 के सितंबर-अक्तूबर में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की प्रसिद्ध रथयात्रा देश में चल रही बहस को दूसरी तरफ मोडऩे की कोशिश की शुरुआत थी—हिंदू संगठनों को डर था कि मंडल की बहस से हिंदू जाति के आधार पर आपस में बंट जाएंगे, इसलिए मंदिर और मस्जिद के सवाल पर एक बड़े ध्रुवीकरण के मकसद से उस समय की पूरी बहस को मोडऩे की कोशिश की गई.

1992 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने घोषणा की कि अयोध्या में मंदिर का काम शुरू करने के लिए 6 दिसंबर का दिन चुना गया है. इसके बाद नवंबर के महीने में हजारों कारसेवक अयोध्या में जमा हो गए. इससे केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सावधानी के तौर पर अयोध्या से एक घंटे की दूरी पर 20,000 अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया और उन्हें निर्देश दे दिया गया कि जरूरत पडऩे पर वे अयोध्या पहुंच जाएं. लेकिन 6 दिसंबर को मस्जिद की सुरक्षा का जिम्मा उत्तर प्रदेश पुलिस पर छोड़ दिया गया. पुलिस के जवानों की संख्या कम पड़ गई और वे वहां से भाग गए. बाबरी मस्जिद पर पहला हमला करीब दोपहर को हुआ और तीसरे पहर 5 बजे तक पूरी मस्जिद मलबे में तब्दील हो चुकी थी.

मस्जिद के विध्वंस के कुछ ही मिनटों बाद दो प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआइआर) दर्ज की गईं. पहली एफआइआर (1992 का अपराध नंबर 197) हजारों अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ दर्ज की गई; जिसमें डकैती, चोट पहुंचाने, सार्वजनिक पूजास्थल की जगहों को अपवित्र करने, धर्म के आधार पर दो समूहों के बीच में दुश्मनी पैदा करने आदि का आरोप लगाया गया था. दूसरी एफआइआर (1992 का अपराध नंबर 198) आठ व्यक्तियों के खिलाफ थी—जिनमें लाल कृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया के नाम शामिल थे.

ये सभी संघ परिवार—भारतीय जनता पार्टी, विहिप और दूसरे संगठनों के नेता थे जो मस्जिद की जगह के निकट एक मंच पर मौजूद थे और कारसेवकों को मस्जिद गिराने के लिए उकसा रहे थे. एफआइआर भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए (धर्म के आधार पर दो अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाने), 153बी (राष्ट्रीय एकता को लांछित करना और हानि पहुंचाना), धारा 505 (सार्वजनिक उद्दंडता को प्रेरित करना) के तहत दर्ज की गई थी. बाद में 47 अन्य एफआइआर भी दर्ज की गईं.

राज्य सरकार ने 8 सितंबर, 1993 को उस समय राष्ट्रपति शासन के अधीन इलाहाबाद हाइकोर्ट की सलाह से एक अधिसूचना जारी करके सभी मामलों को लखनऊ की एक विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया. कानून के तहत हाइकोर्ट की सलाह लेना अनिवार्य है. कारसेवकों के खिलाफ दर्ज पहली एफआइआर विधिवत विशेष अदालत को सौंपी गई थी. महत्वपूर्ण रूप से और अस्पष्ट रूप से दूसरी एफआइआर के साथ ऐसा नहीं किया गया. इसलिए पहली एफआइआर जहां सीबीआइ को सौंप दी गई, वहीं दूसरी एफआइआर पर कार्रवाई सीआइडी के लिए छोड़ते हुए उसे रायबरेली की अदालत में सुनवाई के लिए भेज दिया गया. 8 अक्तूबर, 1993 को राज्य सरकार ने अधिसूचना में संशोधन किया ताकि दूसरे मामले को विशेष अदालत में स्थानांतरित किया जा सके. सरकार की तरफ से यह अधिसूचना हाइकोर्ट की सलाह के बिना ही जारी कर दी गई.

सीबीआइ ने 1996 में आठ आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ एक पूरक आरोप-पत्र लखनऊ में विशेष न्यायाधीश की अदालत में दाखिल किया. 9 सितंबर, 1997 को विशेष न्यायाधीश ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं के साथ धारा 120बी के तहत सभी आठ आरोपियों के खिलाफ प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है. अदालत ने कहा कि सारे अपराध एक ही घटना के समय किए गए थे, उनके खिलाफ संयुक्त रूप से मामला बनता है और लखनऊ में एक विशेष न्यायाधीश के समक्ष उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए.

इसके बाद आरोपियों की एक अपील पर हाइकोर्ट ने विशेष अदालत के इस निष्कर्ष के बावजूद कि उनके खिलाफ संयुक्त मुकदमे का मामला बनता है, 8 अक्तूबर की अधिसूचना को इस आधार पर अवैध करार दे दिया कि हाइकोर्ट से सलाह नहीं ली गई थी. इसलिए विशेष अदालत को दूसरी एफआइआर (जिसमें आठ आरोपियों के नाम थे) पर सुनवाई का अधिकार नहीं था. हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार अगर हाइकोर्ट की सलाह लेकर एक संशोधित अधिसूचना पारित कर दे तो इस खामी को दूर किया जा सकता है. 

सीबीआइ ने 8 अक्तूबर, 1993 की अधिसूचना की खामी को दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से अनुरोध किया लेकिन उस अनुरोध को खारिज कर दिया गया. सीबीआइ ने अपना अनुरोध खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती देने के बजाए रायबरेली में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित मुकदमे में आठ व्यक्तियों के खिलाफ एक पूरक आरोप-पत्र दाखिल किया. इसकी वजह से विशेष अदालत ने 4 मई, 2001 के एक आदेश से दूसरी एफआइआर पर मुकदमा हटा दिया. मई 2010 में हाइकोर्ट ने मुकदमा खारिज करने के फैसले को सही ठहराया. इस तरह दूसरी एफआइआर और आठ व्यक्तियों के खिलाफ साजिश के आरोप कहीं दफन हो गए. 

आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अप्रैल 2017 को दिए गए एक फैसले में जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस पी.सी. घोष ने हाइकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया. दूसरी एफआइआर का मामला लखनऊ की विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया और उसे अतिरिक्त आरोप दर्ज करने का अधिकार भी दे दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला ''ऐसे अपराध से जुड़ा है जो भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को झकझोर देने वाला है.'' सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि सभी मामलों में दैनिक रूप से सुनवाई की जाए. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि मुकदमे की सुनवाई करने वाले जज का तबादला नहीं किया जाए.

इसके अलावा जांच एजेंसी को यह भी सुनिश्चित करना था कि सबूत दर्ज करने के लिए तय हर तारीख पर अभियोग लगाने वाले कुछ गवाहों को पेश किया जाए और उनसे जिरह की जाए. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट को अपना फैसला (अप्रैल 2017 से) दो साल के भीतर देना है. जुलाई 2019 में यह समय सीमा छह महीने के लिए बढ़ा दी गई. अदालत ने विशेष जज के कार्यकाल को भी मुकदमा पूरा होने तक बढ़ा दिया. सुप्रीम कोर्ट के ताजा हस्तक्षेप के बाद विशेष अदालत के समक्ष मुकदमे की सुनवाई जनवरी 2020 तक पूरी होनी है.

बाबरी मस्जिद का आपराधिक विध्वंस स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में हुआ था और राज्य की मशीनरी ने इतने वर्षों में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने और उन्हें सजा दिलाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. जमीन पर मालिकाना हक के विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बहुत-से हलकों में इस मामले के 'बंद' होने और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की कड़वाहट को पीछे छोड़कर आगे बढऩे की बातें चल रही हैं. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि विध्वंस के आरोपियों को उनके अपराध के लिए सजा मिले. लंबे समय से प्रतीक्षित मुकदमे के खत्म होने के बाद विध्वंस के आरोपियों को माफ नहीं किया जाना चाहिए—क्योंकि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और कानून के शासन पर बहुत भारी चोट थी. 

(प्रांजल किशोर दिल्ली के एक वकील हैं.)

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